Unplugged ft. Sri Pundrik Goswami | Bhakti | Spirituality | Guru Purnima Special | baba bageshwar
श्री पुंडलिक गोस्वामी जी. मैं तो सरकार से निवेदन करूं पैंट उतारने. वालों की गर्दन उतारनी चाहिए।. महाराज जी की 38 पीढ़ी जो है वो भगवत कथा. की परंपरा में है।. समझ ही नहीं आ रहा हनुमान जी का मच्छर. कहां से घूम रहा है मेरे कान में।. शनिवार को हनुमान जी का व्रत। रविवार को. सब खाने को तैयार हो जाते हैं। तो क्या. रविवार को हनुमान जी आंगन कर लेते? मंगल. को नहीं खाते हम नॉनवेज. हां मंगल को नॉनवेज नहीं खाते और फिर. शनिवार को सब भेड़ बकरी खा जाएंगे। रिधिवन.
को लेकर जो किस्सा सुनाया जाता है वो उतनी. ही सत्य जितना हम सुनते हैं। गनीमत है कि. हमारे बड़े लोगों ने यह बात कह दी नहीं तो. वो पेड़ भी नहीं बचने थे। वहां भी कोई. फ्लैट बना के और डुप्लेक्स बना के इस. जमाने में 2020 करोड़ के बेच रहा। आपने. नहीं जानो अंधे हो जाओगे। इससे बड़ी. सिक्योरिटी और की जा सकती है किसी भी जगह।. क्षमा किन-किन अपराधों में हो सकती है? इस राष्ट्र के अहित के विषय में जो कोई. विचार करें, वह किसी भी हद तक कभी क्षम्य. नहीं है।. भक्ति और पूजा पाठ में अंतर क्या होता है? पूजा प्रोसेस है। भक्ति इमोशन है।. तो ऐसा हो सकता है कि पूजा पाठ करने वाला. व्यक्ति भक्त ना हो।.
हो सकता है।. पुण्य मिलता है? मिलता तो है या बिना किसी इमोशन के जहर खा. लो तो मरोगे तो सही।. पूछा रावण ने राम जी से। मैं कुल में आपसे. बड़ा, पुरुषार्थ में आपसे बड़ा, तपस्या. में आपसे बड़ा, राजा मैं आपसे बड़ा, मेरा. किंगडम आपसे बड़ा। ऐसी कौन सी चीज है जो. आपसे आगे मैं आप मुझसे आगे निकल गए? तो. राम जी ने उत्तर दिया तेरे भाई को निकाल. दिया और मैंने अपने भाई को संभाल लिया।. बुद्ध को मानने वाले खासतौर पर जो. हिंदुस्तान में लोग हैं वो सनातन से अक्सर. तुलना करते हैं और कई बार जब ये आरोप लगता. है कि कुछ खोदिए वहां पर नीचे मंदिर है तो.
वो कहते हैं थोड़ा और खोदेंगे तो नीचे. आपको बौद्ध मठ मिल जाएंगे।. और भी तो खोदो। उसको फिर खोदोगे तो कोई ना. कोई कृष्ण मंदिर ही निकलेगा। राम मंदिर ही. निकलेगा। कावड़ यात्रा को लेकर हर बार यह. सोशल मीडिया पर आता है कि सिर्फ छोटी. जातियों के लोग वहां जाते हैं। मंदिरों को. लेकर अक्सर आरोप लगता है कि मंदिरों में. ब्राह्मणों का पूरा कब्जा है। अगर कोई. दूसरी जाति से आना चाहे तो उसके लिए जगह. नहीं है। ये सत्य है दोनों चीजें। महाराज. जी हमारे धर्म में झूठ बोलने की इजाजत भी. है।. वकील को झूठ बोलने से दोष नहीं लगता।. वैल्यू सिस्टम तो सत्य का ही है।.
आपके सत्य से अगर दूसरे की प्राण जाते हो. तो आपको झूठ का सहारा लेना चाहिए।. जो जो चरम सीमा पे पहुंचे वो आध्यात्मिक. हो गए। तो जिन वस्तुओं में प्रथम आकर्षण. में विलासिता में सुख मिलता है उन्हीं. वस्तुओं में कुछ वर्ष के बाद में दुख का. कारण बन जाता है। अद्भुत पर वही अध्यात्म. दूसरी तरफ से शुरू होता है।.
अध्यात्म की दुनिया में कुछ ऐसे नाम है जो. अपने ज्ञान अपने अनुभवों से हम सभी को हर. रोज इंस्पायर करते हैं।. इंस्पायर से भी ज्यादा कहें तो धर्म को. लेकर सही मायनों में एजुकेट करते हैं।. कम लोग ऐसे और उन्हीं में से एक है आज के. मेरे मेहमान श्रीमान माधव गॉडेश्वर. वैष्णवाचार्य श्री पुंडरी गोस्वामी जी।. महाराज जी की 38 पीढ़ी जो है वह भगवत कथा. की परंपरा में है। सात साल की उम्र से.
उन्होंने भगवत गीता का ज्ञान देकर दुनिया. को चकित कर दिया था। और बड़ी बात ये है कि. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है।. उसके बाद धर्म को चुना है। तो धर्म की. पढ़ाई से पहले उन्होंने दुनिया को देखा, समझा और उसके बाद अपने पारिवारिक परंपराओं. का पालन किया। महाराज जी बहुत-बहुत स्वागत. है आपका।. प्रणाम भैया।. कुछ गलत तो नहीं था इसमें? कुछ भी नहीं आप. अद्भुत हैं। बस मैं एक मैं चीज संशोधन. नहीं करूंगा जोड़ बढ़ा लूंगा.
कि धर्म की सेवा तो जैसे सात वर्ष से मैं. प्रवचन कर रहा था. तो मेरे विदेश जाके पढ़ने का उद्देश्य भी. यही था. कि मैं आज का व्यक्ति जिस शिक्षा प्रणाली. में है. जब तक मैं उसके स्तर तक नहीं उतरूंगा समझ. नहीं पाऊंगा कि वो किस विचार तक सोच रहा. है. हम. तब तक मैं अपनी बात उसकी भाषा और उसके. लहजे में और उसके तरीके में और उसकी. वोकैबलरी में उसकी बॉडी लैंग्वेज मैं कैसे. रख सकूंगा? तो मेरे पिताजी ने मुझसे ये. बात कही थी। इसलिए मैं एक कृष्ण स्कूल का.
पढ़ा हूं। बचपन में धर्म की शिक्षा. साथ-साथ करी है। फिर मैं मथुरा के एक ऐसे. स्कूल में पढ़ा हूं जहां थोड़ा राष्ट्रवाद. और थोड़ा हिंदूवाद था। फिर मैं दिल्ली. विश्वविद्यालय का विद्यार्थी रहा हूं। एक. वर्ष तक डीयू का ही और फिर विदेश पढ़ा. हूं। तो मुझे भगवान की कृपा से गांव से. लेकर बाहर तक की शिक्षा का एक अनुभव मिला।. जहां कुछ थोड़ा मिशनरी इनवॉल्वमेंट भी था।. जहां राष्ट्रवादी इनवॉल्वमेंट भी था। तो.
उसने पिताजी की कृपा से बुद्धि इतनी खोली. कि फिर मैं जैसा कि आपने कहा बड़े लोगों. के आशीर्वाद से और कि मैं थोड़ा रेलेवेंस. होने की कोशिश कर पाया। नहीं महाराज जी ये. मैंने इतना अलग से इसकी व्याख्या इसलिए. किया इसका आपके बारे में इसलिए बताया. क्योंकि मौजूदा दौर में धर्म को लेकर. लोगों का एक माइंडसेट बन गया है कि जिसको. कुछ नहीं आता वो बाबा बन जाता है. और ऐसे सैकड़ों बाबा है भी.
तो उसमें कोई ऐसा व्यक्ति. जिसने पैशन को प्रोफेशन या अपने खानदानी. परंपरा को प्रोफेशन में तब्दील किया उसको. अलग से हाईलाइट करना जरूरी है क्योंकि. उसका रेलेवेंस अलग रहेगा।. उसकी समझ अलग रहेगी। 38 पीढ़ियों का अनुभव. अलग रहेगा।. जी।. ये कितना बड़ा चिंता का विषय भी है जो ये. विषय मैंने हाईलाइट किया। कहने में बड़ा. हल्का है। लेकिन ये बहुत सीरियस इशू भी है. क्योंकि जब उन पर आरोप लगता है तो वो कहते. हैं देखिए सनातन पर आरोप लगा रहे हैं और. ऐसे बहुत सारे लोग हैं।.
तो एक सनातनी होने के नाते भी मैं कई बार. सवाल खड़ा करना चाहता हूं। लेकिन मैं कर. नहीं पाता हूं क्योंकि मुझे लगता है कहीं. ऐसा ना हो कि व्यक्ति विशेष पर सवाल उठाने. से वो धर्म पर सवाल उठ जाए। हम. तो यह कैसे आप देखते हैं कि हर कोई बाबा. बन जा रहा है।. देखिए ये पहली बात तो यह है कि बाबा शब्द. भी बड़ा खतरनाक बना है।. हम. ये बड़ा ये बड़ा मीडिया क्रिएटेड वर्ड है।. बड़ा कंट्रोवर्शल स्पाइसी वर्ड है। पूरे. धर्म में बाबा शब्द का प्रयोग ही नहीं है।. वो सब बनने को तैयार है। तो पहले तो जो.
टाइटल ही है वही गड़बड़ है। बाबा तो हमारे. यहां दादा जी को भी बोलते हैं। तो ये. फिल्म सिटी वाला होगा। बस वो वही सब आप. सही जगह पहुंच रहे हैं। बाबा शब्द तो. हमारे नंद बाबा भोले बाबा. हां. भोले बाबा एक परिभाषा गढ़ दी गई अल्हड़पने. को. हम. और दूसरी एक और बात एक जैसे आपने बात की. ना किसी को कुछ नहीं आ रहा पॉलिटिकली. इन्फ्लुएंस हो लाइजनिंग करने में निपुण हो. वेरी सॉरी टू से बट मैं भी बड़ी. इंपॉर्टेंट बात रख रहा हूं ये सब करते हुए. चोला उसका धार्मिक परिवेश का हो तो मीडिया.
भी या कोई लोग मेरे को भी बड़ी आसानी से. बाबा कह देते कई भाषाओं में सम्मान में. बाबा कहा जाता है कई भाषाओं में बच्चे. बच्चे को बाबा कहा जाता है। अरे हमारा. बाबा है। कई हमारे ब्रज में नंद को बाबा. कहा जाता है। हमारे पूरे भारत में भोले को. बाबा कहा जाता है। तो जो बड़े सम्मान शब्द. से शब्द बना बड़ी भारी समस्या है। कृष्ण. ने गीता में कहा जन्मांतर सहस्त्रेशु. कश्यति सिद्ध है। करोड़ों जन्म लेकर के. कोई एक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। तो.
देखिए कोई कोई धर्म में पद से पूज्य है।. कोई कोई-कोई धर्म में केवल वेशभूषा से. पूज्य है। कोई कोई-कोई धर्म में प्रसिद्धि. से भी पूज्य है। यह सब अच्छे लोग हैं।. प्रणम्य लोग हैं। जैसे पेड़ केवल पेड़ है. कुछ नहीं है तो भी छाया तो दे रहा है।. उसमें पत्ते हैं तो औषधि दे रहा है। फूल. हैं तो खुशबू दे रहा है। पर भूख तो तभी. मिटेगी जब फल लगेगा। ऐसी कोई धर्म केवल पद.
से पूज्य है। कोई धर्मगुरु केवल परंपरा से. पूज्य है। कोई धर्म गुरु केवल वेशभूषा और. प्रतिष्ठा से पूज्य है। पर किसी किसी के. पास ज्ञान का फल लगा हुआ है।. दुनिया की तृप्ति तो वही कर सकता है। भगवत. प्राप्ति तो वही करा सकता है। सब जगह आगे. पीछे होता है। आशा की किरण हम सबके भीतर. है ही है। पर डेफिनेटली. अनुभव, ज्ञान, शिक्षा, भक्ति, वैराग्य,
अनुभव, परंपरा इन सब से युक्त जो है. आज सनातन धर्म इस परिवेश से युक्त किसी. व्यक्ति को पाता है। तो किसी जमाने में. विवेकानंद जी को पाता है। किसी जमाने में. प्रभुपाद जी को पाता है। किसी जमाने में. ओशो को पाता है। किसी जमाने में योगानंद. जी को पाता है। जिन्होंने पूरी दुनिया में. सनातन धर्म की छवि को क्रिएट किया है और. लोगों की भी तो समस्या है जो कई प्रकार के. पॉलिटिकल टच में है या जो कई प्रकार के.
बिजनेस प्रोफेशनल टच में है या जो कई. प्रकार की प्रसिद्धियों के टच में है।. मीडिया हाउसेस के टच में है।. या जिसके बड़े भारी आश्रम है कि वृंदावन. आने से उसको रूम अच्छा मिल जाएगा। है ना? इन सब साधनों से अगर आप अप्रोच कर रहे हो. तो आपकी डिमांड ही रॉन्ग है।. फिर आपके पास राइट बंदा मिलेगा कहां से? समाज की डिमांड ही रॉन्ग है। वो ढूंढ ऐसे. व्यक्ति को रहे तो उनको सही व्यक्ति. मिलेगा कैसे? परंतु हां आप जितने भी.
उपलब्ध पुरुषों की कहानियां सुनते हैं. कितना परिश्रम किया उन्होंने गुरुओं को. ढूंढने के लिए। एक गुरु को एक हमारी. परंपरा में एक वैष्णव हुए नरोत्तम दास. ठाकुर। उनके मन में इच्छा हुई। एक स्वरूप. एक हैं उनसे दीक्षा लेने की। हमारी परंपरा. के कि वो उनसे दीक्षा ग्रहण करें गोस्वामी. से। अब कैसे कहें. सेवा भी मैं कैसे करूं? मन में विचार आया.
कि मैं इनकी सेवा भी कैसे करूं? दिन भर लगे रहे विचार करते रहे। उन्हें अब. दो ऐसे महात्मा है जिनकी कोई सेवा ही नहीं. कर सकता। एक जिसे कुछ नहीं चाहिए और दूसरा. जिसके पास सब कुछ हो उसे क्या दोगे? जिसको. कपड़ा भी नहीं चाहिए उसको क्या दोगे? जिसके पास सब कुछ हो आप जो ले आओगे उसके. पहले उसके पास उससे ज्यादा है। यह भी. सोचने में पड़ गए। तो उन्होंने चुनाव किया. कि सुबह-सुबह गोसाई जी जहां जाके शौच. क्रिया में जाते थे। मैं वहां जाके मार्जन.
करके व्यवस्था रखूं। कितनी बड़ी बात है।. मैं मैं विनम्रता की बात बता रहा हूं।. सुबह-सुबह हमारे यहां के सर्वोत्तम. वैष्णवों में उनकी संख्या होती है। उन्हीं. के लिखे भजन हम लोग गौ संप्रदाय में जिसके. अंतर्गत ये हरे कृष्ण मंत्र बना पूरी. दुनिया बोलती है उसके उन्हीं के भजन गाए. जाते हैं। वो सुबह-सुबह खड़े हो गए और. जहां गुरु जी गोसाई जी शौच क्रिया को जाते. थे। वहां पर सफाई कर देते थे। कुछ दिन तो. उन्होंने कहा कोई आया होगा। एक दिन वह.
पहले पहुंचे तो देखा नरोत्तम दास वहां. सफाई कर रहा है। इतनी परीक्षा के बाद. उन्होंने फिर कहा कि आज मैं तुझे शिष्य. बनाता हूं। एक ही मेरा चेला है तू।. उन्होंने भक्ति मतलब उनके भजनों को हमारे. यहां जो पढ़ ले असंभव है कि उसको भक्ति की. प्राप्ति ना हो जाए। अगर डिमांड ही असली. है। अब अब आप देखो इतने लोग हैं दुर्योधन. के पास। कमी नहीं है।. भीष्म कृपाचार्य, द्रोणाचार्य.
खुद उसकी मां गांधारी. कर्ण भी बड़ा जानकार आदमी है। पर सुनता. शकुनी की है तो क्या करोगे? मार्गदर्शक ही उसने शकुनी चुन रखा है। तो. महाभारत होएगी ही होएगी।. पर पांडवों के पास वैसे भी कोई नहीं है और. जो एक हैं कृष्ण वो उनके पीछे सब कुछ करने. को तैयार है। इसलिए पहला युद्ध हुआ कि. संजय अंतिम श्लोक में धृतराष्ट्र को कह. देता है जहां अर्जुन और कृष्ण खड़े हैं।. तत्र श्री विजयो भूत ध्रवा.
जीत तो उन्हीं की होएगी। पक्की बात है। तो. समाज को भी धर्म से संबंधित अपनी डिमांड. को ठीक करना पड़ेगा। अगर वह वास्तविक. ज्ञान की खोज कर रहे हैं, तपस्या की खोज. कर रहे हैं। ऐसे ऐसे महात्मा इस समय. उपलब्ध है जिनको कोई जानता नहीं है।. गोवर्धन है मिश्रा जी गिरिराज जी 21. किलोमीटर की परिक्रमा है। सब जानते हैं. ब्रज में। कौन नहीं जानता होगा गोवर्धन जी. को? ऐसे ऐसे महात्मा है। तीन-तीन परिक्रमा. रोज देते हैं।.
तीन-तीन हम जानते हैं प्रणाम करते हैं. मिलते हैं उनसे। दुनिया नहीं जानती।. तीन-तीन परिक्रमा नंगे पैर उसके बाद भोजन. भी स्वयं बना के खाते हैं। ठाकुर जी की. सेवा अलग करते हैं। और जो काम है वो अलग. मतलब 75 किलोमीटर रोज चलते हैं। बाप रे. ऐसे ऐसे महापुरुष अभी मैं नासिक में जिनके. यहां कथा कर रहा था संस्कृत के प्रकांड. विद्वान वर्षों से मौन स्थान के महंत. मुखिया.
बड़े-बड़े उनके यहां वैदिक विद्यालय चल. रहे हैं। दिन भर मौन रहते हैं और मेरे को. तो एक दिन क्या आश्चर्य हो गया कि आश्रम. में नित्य प्रति 200 250 लोग भोजन करते. हैं। वह खुद बनाते हैं। मैं तो ऐसा. महात्मा नहीं देखा और खुद हफ्ते में एक. दिन भोजन करते हैं। अद्भुत फोटो भी नहीं. खींच सकता उनकी कोई।. तो अगर डिमांड हम लोगों की डिमांड ऐसी है. तो तो आनंद आ ही जाता है। अपन लोगों को. मिल जाते। अब असली हीरा चाहिए तो फिर.
सुनार का विचार करोगे ना? सही बात है।. अब चाहिए ही तुमको वो कांच वाला तो फिर तो. कहां कहीं से सड़क के कोने से उठा ही. लोगे।. सही बात है।. डिमांड सही करनी है और महात्माओं को भी. अपनी जिम्मेदारी समझकर किसी व्यक्ति को. संत के पास व्यवहारिक जिज्ञासा लेकर जाना. ही नहीं चाहिए। मेरे पास ही कई लोग आकर. पूछते हैं महाराज बताओ मेरी दुकान कैसे. चलेगी? मैं बोला मुझे पता होता तो मैं. अपना गला क्यों फाड़ रहे हो तो?
मैं कहां से बताऊं? हां, मार्गदर्शन कर. सकता हूं। तेरी लालटेन बन सकता हूं। पर. बैसाखी थोड़ी ना बन सकता हूं। चलना तो. तुझे ही पड़ेगा। तो महाराज जी जब डिमांड. क्योंकि आज असली वाली हमने रखी है। हमने. कहा ये लव लाइफ रिलेशनशिप तो दुनिया रील. के लिए कटवा रही है। कुछ थोड़ा धर्म के. ज्ञान की बात कर लेते हैं आपसे। उसके बाद. वायरल कंटेंट मिल लेंगे। लेकिन सिर्फ. वायरल कंटेंट लेके. आज पडकास्ट नहीं करेंगे। क्योंकि आमतौर पर. हो क्या गया है कि कोई भी ऐसी महात्मा या.
कोई भी ऐसी कोई ऐसा पुरुष आता है जिससे आप. कुछ ज्ञान ले सकते हो तो हम खाली जिंदगी. ज्ञान लेते हैं। धर्म का ज्ञान कम ले पाते. हैं। तो शुरुआत आज धर्म को लेकर करते हैं।. सनातन को लेकर करते हैं। अ हिंदूइज़्म की. स्थापना कैसे हुई थी? मैं अभी इस्लाम पर. एक पडकास्ट किया मैंने तो वह भी मुझसे कह. रहे थे कि. जो शिव है एक एक शक्ति है शक्ति से ही आप. गॉड निकलता है और सारी कहानियां सब सारी. इक्वल होती है। तो मेरे ज़हन में सवाल आया. कि पूजा पाठ तो हम सब करते हैं लेकिन एकदम.
डीप जाके कभी सोचा नहीं। सनातन की शुरुआत. कैसे होती है? सबसे पहले मिश्रिया. शुरुआत तो शब्द ही सनातन है। सनातन का. मतलब एटरर्नल ऑलवेज एकिस्टेड मतलब जब से. ह्यूमन है, इंसान है, इंसान ने एक जीवन. चुनने का अभ्यास किया। जैसे शेर बना तो. शेर के साथ उसकी एक जीवन शैली भी जुड़ी।. ध्यान दीजिएगा। और जब वो जीवन शैली. बिगड़ती है तो हमें दया भी आती है और शेर.
भी चाहे उसी में रहे पर है तो वो तकलीफ. में क्योंकि शेर की जीवन शैली क्या है कि. वो स्वच्छंद जंगल में घूमेगा उसका एक अपना. दायरा होगा शेरनियों के साथ उसका संबंध. होगा कितनों के साथ होगा इतना तो मैं नहीं. जानता पर कुछ ना कुछ जो नेचर से जुड़े लोग. हैं वो ये सब जानते हैं परिवार उसका कैसे. होगा इतने दौड़ के इतने समय ऐसे समय शिकार. करेगा अब आप उसको ज में डाल दो तो खाने का. भी उसको सब मिलेगा सब कुछ मिलेगा पर वो. अपनी प्राकृतिक जीवन शैली से विरोध चला. गया। ऐसे हिरण हो, मच्छर हो, मक्खी हो.
सबकी एक पद्धति है। 84 लाख प्रकार की. योनियां उसमें एक मानव योनि है। मानव योनि. जब से स्थापित हुई और उसने एक जीवन शैली. का निर्माण किया जिसमें उसने अपने को हम. जगत को और एक ईश्वरी शक्ति जिसने उसने. अवलोकन किया कि यह सब चला कौन रहा है? क्योंकि बुद्धि का विकास हुआ ना। हम ही. एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो अगेंस्ट द. ग्रेविटी खड़े हो सके। क्योंकि हमने आउटर.
ग्रेविटेशनल फोर्स को भी एक्सपीरियंस. किया। हजारों साल लगे रीड की हड्डी को. सीधा होने में। इसका मतलब हमने दोनों. पुलों को अनुभव किया है। मनुष्य ने अनुभव. किया तो उसने सोचा कि मैं सीधा कैसे हो. रहा हूं।. इसका मतलब कुछ है जो इस पूरी सत्ता को चला. रहा है। तो तीन चीजों को जहन में लेके. अनुभव में लेकर एक जीवन शैली तैयार की गई. जिसमें संबंधों का विचार हुआ जिसमें. उपासना का विचार हुआ जिसमें प्रकृति का. विचार हुआ जिसमें शरीर का जैसे शेर ने एक. दायरा बनाया.
जब मानव ने इस दायरा को बनाया और वो जिस. पद्धति से चला उसको एक धर्म का नाम दिया. गया और फिर क्योंकि सदा चलता आया तो लोगों. ने उसको सनातन शब्द जोड़ दिया। सनातन. क्यों जोड़ना पड़ा? फिर उसमें बाद में. एडिशन होने लगे ना कुछ ना कुछ जुड़ता गया।. धर्म शब्द के चार अर्थ होते हैं। हम पहला. अर्थ होता है स्वभाव।. दूसरा अर्थ होता है उद्देश्य।. उद्देश्य।.
तीसरा अर्थ होता है उपासना पद्धति जो हम. जानते हैं। और चौथा अर्थ होता है दायित्व।. दायित्व को भी धर्म। पति का धर्म। पत्रकार. का धर्म। गुरु का धर्म। यह दायित्व की बात. है। धर्म से स्वभाव सूरज का धर्म है. प्रकाशित करना। धर्म शब्द चार अर्थों में. प्रयोग में आता है। तो ऐसे ही मनुष्य ने. स्वभाव, दायित्व, उद्देश्य और उपासना. पद्धति इन चार चीजों का एक स्थाई स्वरूप.
बनाया और उसको धर्म नाम दिया। धार तेति. धर्म जिसको हम धारण करते हैं और जो हमें. धारण करता है। सरल शब्द यही है।. तो मनुष्य जीवन की शैली के साथ ये धर्म. चलने लगा। मनुस्मृति का निर्माण हुआ। फिर. उसी क्रिया से हमारे यहां कृष्णदय व्यास. जो भगवान के अवतार हैं उनके द्वारा. ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद उसी जीवन शैली. को उन्होंने उल्लेखित किया। भगवान की.
प्रेरणा से समाधि भाषा में ज्ञान का. प्रकाश हुआ और सब शास्त्रों का निर्माण. हुआ। तो धर्म में एक काल आया जिसको हम. कहेंगे वैदिक काल। इस समय हम जिस धर्म को. फॉलो कर रहे हैं जैसा मेरा आपका संवाद हुआ. था वो छह फेसेस से लगभग गुजर चुका है।. पहला फेस आया वैदिक काल का कृष्ण देपायण. व्यास के द्वारा सब तरफ स्थापना की गई है।. त्रिपथ विज्ञान मैं कौन हूं? जगत क्या है. और ईश्वर क्या है? इन तीन विषयों को.
विस्तार से एक्सप्लेन करते हुए सब कुछ. ज्ञान पब्लिश किया गया। पहली बार लिखा गया. जो केवल फॉलो हो रहा था। जिसमें प्रकृति. की बात भी है, ज्योतिष की बात भी है, ग्रहों की बात भी है, तारी चंद्रमा की बात. भी है, परमार्थ की बात भी है, अर्थ की बात. भी है, काम की बात भी है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चतुर्वेद पुरुषार्थों की बात. भी है, संपूर्ण वेदों का निर्माण वहां पर. आकर के खड़ा हुआ।. अब इसके साथ-साथ.
वैदिक युग जब तैयार हुआ और उसका चारों तरफ. संचालन होने लगा।. इसके साथ-साथ हमारे परंपरा में षड दर्शन. जुड़े। वैशेषिक दर्शन, योग दर्शन, न्याय. दर्शन, मीमांसा दर्शन, पतंजलि जैसे योग के. अधिपति हैं।. सांख्य दर्शन, कणाद, गौतम ये षड ऋषि इसी. वेद के सार को ले के दर्शन की तरह से इस. संपूर्ण धर्म को बहुत बहुत टेक्निकल है।. पर मैं संक्षेप करके आपसे कह रहा हूं। इसी.
समय को चलते-चलते. जब वैदिक काल, दार्शनिक काल और साथ-साथ. पौराणिक काल जिसमें पुराणों का निर्माण. हुआ। मार्कंडेय, मत्स्य, भागवत, भविष्य, वामन, वायु, विष्णु, ब्रह्म, ब्रह्म, वैवर्त, ब्रह्मांड, अग्नि, नारद, पद्म, लिंग, गरुण, कुर्म, स्कंद ये 18 पुराणों. का प्रकाश हुआ। पौराणिक काल स्थापित हो. गया। इसी के साथ-साथ. एक पद्धति शुरू हुई।.
बुद्धिज्म और जैनिज्म इसी के साथ पनपना. शुरू हुआ और साथ की साथ में देश में उसकी. व्याप्ति होने लगी। तो सबसे पहला फेज आया. वैदिक काल का, पौराणिक काल का, दार्शनिक. काल का। फिर बुद्धिज्म और जैनिज्म ने जब. इन्फ्लुएंस करना शुरू किया तो उसके. साथ-साथ. हम यह नहीं कहेंगे सही है या गलत है। पर. मैं इसी के साथ एक और बात आपसे कह दूं।. जनरली लोग समझते हैं भगवान को नहीं मानने. को नास्तिक कहा जाता है।.
पर ये बड़ी फॉरेन डेफिनेशन है। आस्तिको. वेद संपन्न परिभाषा लिखी कि जो वेद को ना. माने वो नास्तिक है। वेद को जो माने वो. आस्तिक है। हमारे यहां सांख्य दर्शन ईश्वर. पर भरोसा नहीं करता। फिर भी वो शास्त्र. प्रमुख शास्त्र में आता है।. तो कई धर्म उत्पन्न पे जिन्होंने वैदिक. प्रिंसिपल्स का खंडन किया उसी को हम पर. धर्म के रूप में देखने लगे। कृष्ण ने गीता. में कहा स्वधर्म निधम श्रेय पर धर्म भयापा.
मेरा धर्म मेरे लिए श्रेयस्कर है। पर धर्म. दूसरे का धर्म भयाव।. यह एक सिनेरियो आया जिसने किसी न किसी हद. तक सन्यास परंपराओं को, वैराग परंपराओं. को, त्याग परंपराओं को क्योंकि उनमें ये. बहुत सुदृढ़ता से फॉलो होती थी। एक. इन्फ्लुएंस फैला। इसी के साथ-साथ एक फेज. आया फिर हमारे धर्म में संप्रदायवाद।. आदि शंकराचार्य जिन्होंने पूरे देश में. यात्रा करके चारों दिशाओं में अद्वैत.
दर्शन की स्थापना करी। सन्यास का विस्तार. किया। अखाड़ों की स्थापना की। धर्म. योद्धाओं को तैयार किया। आज कुंभ का मेले. में सब जितने अखाड़े आप देख रहे हैं उसके. मूल स्थापित्व तो आदि शंकराचार्य हैं। फिर. संप्रदायवाद में भी मतभेद शुरू हुए जिसमें. फिर रामानुजाचार्य आए। मतभेद नहीं कहेंगे. हम इसको एक्सटेंशन कहेंगे। मैं यू नहीं. कहूंगा कि वो खराब है। पर जैसे बीज है तो. बीज फूटेगा तो पेड़ बनेगा। अब पेड़ है.
इसका मतलब बीज नहीं है। बीज है इसका मतलब. पेड़ नहीं है। तो यह यह खंडन मंडन शास्त्र. का विमर्श रहा है। एकमात्र हमारा धर्म ऐसा. है मिश्रा जी जहां खंडन मंडन की सुविधा. दूसरी जगह खंडन कर दो तो गला काट दिया. जाएगा। चौराहे पर जला दिया जाएगा। पर यहां. इस पर भी बात हुई है इतिहास में कि भगवान. नहीं है। प्रमाणित करो। शास्त्र के विमर्श. से प्रमाणित करो। उससे संप्रदाय. शास्त्रार्थ की परंपराएं नहीं। दुनिया सोच. नहीं सकती कि शास्त्रों के अर्थ पर कोई दो. लोग बात कर सकते हैं। वहां तो रिजिडनेस.
है। मानो तो मानो नहीं तो फिर जला दिए. जाओगे, चढ़ा दिए जाओगे, मार दिए जाओगे, दंडित कर दिए जाओगे। पर भारतीय मनीषा ऐसी. नहीं रही। तो संप्रदायवाद उत्पन्न हुआ।. जिसमें मुख्यतः से. अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, अचिंत. भेदाभेद इस प्रकार से संप्रदाय उत्पन्न. हुए। आप देखते हैं एक तिलक यूं लगाता है।. एक तिलक लाल लगाता है। ये आदमी को लगता है. ये क्या टैटू लगा के घूम रहे हैं। ऐसा.
नहीं है। उस हर एक चीज की एक-एक परिभाषा. है। वो पूरी एक फिलॉसोफी को फॉलो कर रहा. है। वो काला लगाते हैं।. एक काला हमने काला लगाया और एक आपने देखा. होगा हमारे गौडियों में ताला और नाक तक. ऐसे लंबा तिलक आते हैं। जैसे इस में. गौडिया मठ में आपने देखा है। तो ये मधु. गौडिया तिलक है। उडूपी की तरफ आप जाइए। वो. केवल काला लगाते हैं। अब हम वहां जाएं. तिरुपति की तरफ जाए विष्णु स्वामी पीला. लगाते हैं आप जाइए जैसे बड़ी भारी. रामानुजाचार्य जी की मूर्ति प्रधानमंत्री. जी ने लाल उन्होंने स्वयं भी तिलक लगाया.
फिर अब आदि शंकराचार्य या सब शंकराचार्य. है वो इस तरीके से तिलक तो शव इस तरीके से. तिलक लगाते धनुष आकृति में लगता है ये सब. संप्रदायों के चिन्ह है तो वो सनातन धर्म. को मान रहे हैं पर. पहली बात आत्मा पर विश्वास करें। दूसरी. बात कर्म पर विश्वास करें। तीसरी बात. प्रारब्ध भाग्य पर जो आप कर रहे हो. भोगतोगे उस पर विश्वास करें। चौथी बात. मोक्ष पर विश्वास करें। और पांचवी बात.
ईश्वर पर विश्वास करें। ये पांच चीजें जो. माने वो सनातन धर्मी है। क्योंकि ये पांच. वेद के प्रिंसिपल है। अब पांचवी चीज जो. ईश्वर है उसमें सबकी अपनी-अपनी. अंडरस्टैंडिंग है। उसने संप्रदायवाद को. शुरू किया। एक जना कहता है जो सब में है. वो मुझ में है और वही मंदिर में है। दूसरा. कहता है जो मुझ में है वह सब जगह है वही. मंदिर में है। तीसरा कहता है जो मंदिर में. है वही मुझ में है वही सब जगह है। गलत. तीनों नहीं है। पर तीनों को देखने का. अपना-अपना नजरिया है। इसने संप्रदायवाद को.
शुरू किया। अब और समय आया और बदलाव आया।. मुगलों का साम्राज्य इस देश में व्याप्त. होना शुरू हुआ। जो भी कारण है हम उस पर. नहीं जाएंगे। बहुत सी ऐसी चीजें हमारे. धर्म में इन्फ्लुएंस होना शुरू हुई जो कि. वहां से जुड़ी हुई थी। जैसे मैं आपसे एक. बहुत इंपॉर्टेंट बात कहूं। स्त्री का सिर. ढकना अनिवार्य है।. हम. पर पुरुष का ढकना उससे भी ज्यादा अनिवार्य. है। तभी तो हर राष्ट्र की अपनी-अपनी पगड़ी. है। मराठी अलग है, मारवाड़ी अलग है,
गुजराती अलग है, गढ़वाली अलग है, छत्तीसगढ़िया अलग है, राजपूती अलग है। कोई. भी विशेष कार्य करना हो पगड़ी बांधकर अभी. भी कोई पूजा करने बैठे तो आपने देखा हो. सिर ढको सिर ढको। कोई रुमाल ही धर लेता. है। हम हम. एक तरफ की परंपराओं ने जिस देश का राज्य. किया कि वहां तो स्त्री का आंख के अलावा. कुछ देखा ही नहीं जा सकता।. उसके अलावा ऊपर देख लिया भाई बुर्खे में. ही रहो भाई पूरा ढक दो। तो कल्चरली कहीं. ना कहीं तो उसका इन्फ्लुएंस हमारे ऊपर आता.
है। एक बड़ी इंपॉर्टेंट बात बिना अर्थ. जाने, बिना कुछ भी जाने दिन में पांच बार. या चार बार आपको सेम चीज रिपीट करनी है।. हमने कहीं ना कहीं उससे इन्फ्लुएंस होकर. विचार किया पाठ करो। पाठ शब्द का अर्थ. क्या होता है? पाठ का अर्थ होता है सीखना।. पाठशाला पढ़ना जानना। पर हमने क्या किया? पाठ करे जाओ। तो कई कई माताएं आठआ पुस्तक. रख लेती हैं या कई भाई लोग भी रखते हैं।. उन्हें मतलब कुछ नहीं पता भी नहीं होगा।. बस पुस्तक सवेरे.
इतनी जल्दी-जल्दी तो वो हनुमान चालीसा पाठ. करें। हनुमान जी भी परेशान है। बोल क्या. रहा है? पाठ करने की भी तो नियम है। गीति. शीघ्र शराकंपी बहुत ज्यादा गाते हुए मंत्र. बोलना हिलते हुए मंत्र बोलना. शीघ्र श्री कृष्ण वर्ण. समझ ही नहीं आ रहा हनुमान जी के मच्छर. कहां से घूम रहे हैं मेरे कान में।. ये क्या चल रहा है? ये हमारे यहां की विध. ही नहीं है। सेम चीज बिना जाने बस रिपीट. करते जाना। हमारे यहां त्रिकाल संध्या का.
विधान है। त्रिकाल संध्या में हम सूर्य. नमस्कार करते हैं, प्राणायाम करते हैं, जप. करते हैं, मंत्र साधना करते हैं। नॉट सेम. रिपीट ये बहुत सारी चीजें हमारी. व्यवस्थाओं में इतनी गुप्त रूप से. इन्फ्लुएंस्ड हो गई जो हमें पता भी नहीं. चला और हम अभी तक फॉलो कर रहे हैं। फिर एक. समय आया ब्रिटिश रूल आकर के खड़ा हुआ। फिर. कहीं ना कहीं एक लेविशनेस, सेवा, पूजा, दिन के साथ धर्म का बंधना.
क्रिश्चियनिटी में संडे प्रेयर वेरी. इंपॉर्टेंट है। और कहीं ना कहीं हम आजकल. नहीं देखते। संडे होते ही मंदिर दौड़ते. हैं। बहुत सारे लोग कहते हैं ओ शनिवार को. हनुमान जी का व्रत रखो। और रविवार को सब. खाने को तैयार हो जाते हैं। तो क्या. रविवार को हनुमान जी आंख बंद कर लेते हैं।. मंगल को लेके बड़ा चलता है ये।. मंगल को नहीं खाते हम नॉनवेज। हां मंगल को. नॉनवेज नहीं खाते और फिर शनिवार को सब. भेड़ बकरी खा जाएंगे तो फायदा क्या सोमवार. के ही दिन ही शिव जी देखते हैं शनिवार को.
कहेंगे बेटा मैं नहीं देख रहा तुझे जो. करना है सो कर ले ये पद्धति कहां से शुरू. हुई शास्त्र का श्लोक कहता है धर्मम भज. सततम तज लोक धर्मान सततम एकांत हो चाहे जो. शिव का भक्त है 24 घंटे है वो सातों दिन. है कोई स्थान से उसका मतलब नहीं है मैं. कहूं किसी से बोल बोले मंदिर में झूठ. बोलूंगा मैं चल फिर पार्किंग में चलते हैं. वहां बोलियो. इसका स्थान से क्या मतलब है? दिन से क्या. मतलब है? समय से क्या मतलब है? ना तो ये. पद्धति कहां से आई? अंग्रेजों ने दी।. मतलब आप ये समझिए ना जो एक पद्धति में.
प्रेयर्स टाइम से फिक्स होना रिलीजियस. एक डे टाइम कहीं ना कहीं स्लो इन्फ्लुएंस. होता है। हमारी चेतना में। धीरे-धीरे. धीरे-धीरे हमने समय से धर्म को बांध लिया।. केवल उतने तक भाई संडे जब हम चर्च में. जाकर उतनी देर प्रेयर करेंगे तब बिल्कुल. आदमी जेन्युइन होना चाहिए।. हम. उसके अलावा जो मर्जी करो एक थॉट प्रोसेस. क्रिएट हुआ और बहुत सारी चीजें ऐसी शुरू. हुई। फिर एक काल आया राजा राममोहन रॉय का.
बंगाल के क्षेत्र में पूरे मूवमेंट्स शुरू. हुए जहां थोड़ा इन्फ्लुएंस टच था इंग्लिश. का भी। उसके साथ-साथ भारतीय धर्म को. प्रवेशित करना शुरू किया।. अब वेदांत फिर से इनफ्लुएंस्ड हुआ। मैं. पांचव चरण तक पहुंच चुका हूं। जहां से. सनातन धर्म में गुरु का शीर्षस्थ आना शुरू. हुआ। स्वामी विवेकानंद ने जाकर डंका. बजाया। 150 साल 150 साल में अभी इतिहास. रचना शुरू हुआ। पूरा एक फेज आया। धीरे.
धीरे धीरे धीरे स्वतंत्रता के समय एक फेज. आया। जब धर्म और राजनीति ने जोड़ी बैठाई।. पहले नहीं थी। देश का सबसे बड़ा. राजनीतिज्ञ महात्म ही हुआ है।. धर्म गुरु होने के साथ-साथ जो गीता पर भी. टीका करते हैं। आज नोटों में भी वही छपते. हैं और इस देश को स्वतंत्र भी वही करते. हैं। राज महात्मा की उपाधि. कॉन्स्टिट्यूशनली उनको दी गई है। हम लोगों. ने नहीं दी है। महात्मा की उपाधि दी गई. है। एक बड़ा भारी ट्रेंड आया जहां राजनीति.
और धर्म बिल्कुल गु्थमग्था हो गए और वो. उसका इन्फ्लुएंस अभी तक हमारे सामने. प्रतीत होता है। इस प्रकार गुरुवाद चला।. पूरी दुनिया में गुरुवाद ग्रंथ भी गौण हो. गए। संप्रदाएं भी गौण हो गई। व्यक्ति. प्रधान हो गया। ओशो जाकर सब जगह बोलते हैं. तो उनकी बात मान्य हो जाती है। विवेकानंद. जी जाकर सब जगह बोलते हैं। योगानंद जी. जाकर के सब जगह बोलते हैं। एक इसी बीच में. एक और बीच में एक फेस मैं भूल गया था।. भक्तिकाल का भी आया था। जहां पर सब गौण.
होकर सिखिज्म आकर के इन्वॉल्व हुआ। उसका. भी इन्फ्लुएंस हुआ। वो भी हमारे इस प्रकार. छह फेसों से फिल्टर होते होते. जिसमें वैदिक काल पौराणिक काल समराइज कर. रहा हूं। वैदिक काल, पौराणिक काल। उसके. बाद में बुद्धिज्म और जैनिज्म का। उसके. बाद में दर्शनों का काल, संप्रदाय काल, संप्रदाय के पश्चात फिर मुगल साम्राज्य. फिर उसके बाद में क्रिश्चियन इन्फ्लुएंस.
या इंग्लिश इन्फ्लुएंस आई वुड रेदर से. स्कॉटिश भी आए थे। फॉरेन इन्फ्लुएंस इज़ अ. बेटर वर्ड। फॉरेन इन्फ्लुएंस हम सबके. सामने आया। इसके बाद में इसी क्रम में. भक्ति काल का प्रभाव पड़ा। उसी ने सिखिज्म. गोरक्षनाथ जैसी इत स्थानों का निर्माण. किया। उसका भी स्लो स्लो इन्फ्लुएंस आकर. शुरू हुआ। उसके बाद में फिर स्वतंत्रता की. बात आई। तो राजनैतिककरण उसके साथ-साथ. गुरुवाद इन सब फसेस से होता आज हमारे.
सामने धर्म खड़ा है। इन्हीं सबके. थोड़ा-थोड़ा कुछ ना कुछ लेकर यह सुंदर खीर. बनी है। स्वादिष्ट. ये मतलब. जैनिज्म, बुद्धिज्म, सिखिज्म ये सब कहीं. ना कहीं इन्फ्लुएंस रहे हैं। वो भी हमसे. इन्फ्लुएंस रहे और हम भी या यूं कह लीजिए. हमारी कुछ चीजें उन्होंने लेकर अपना नाम. दिया है।. और वो उनके साथ हमारी सिमिलरिटी खाती है।.
हम. उनके साथ उस चीज में हमारी सिमिलरिटी खाती. है। और हम भी उस चीज से इन्फ्लुएंस्ड नजर. आते हैं। और वह हमारी ही सारी चीजों में. से एक चीज को लेकर के एक स्वतंत्र धर्म का. निर्माण करते हैं और सबका खंडन कर देते. हैं। जैसे कोई कहता है कि मूर्ति होती ही. नहीं है। तो हम भी मानते हैं पर हम यह भी. मानते हैं कि मूर्ति भी होती है। जैसे. बहुत सारे लोग कहते हैं नतस प्रतिमा. अस्ति। वेद कहते हैं कि ये इस्लाम में.
बहुत कोट किया जाता है।. हम. कि वेदी तो कह रहे हैं नतस प्रतिमा अस्ति।. जो उनको बैन किया गया ना बड़े फेमस स्पीकर. थे वो तो इसको ठोक बजा बजा के बोलते थे न. तस प्रतिमा वेद की श्रुतियां अरे आप थोड़ा. संस्कृत के जानकार हैं प्रतिमा शब्द के. बहुत अर्थ होते हैं प्रतिमा शब्द का एक. अर्थ होता है बराबर लाइक नो वन लाइक हिम. उनके जैसा कोई नहीं हो सकता उनकी तुलना. किसी से नहीं हो सकती उनके बराबर का कोई. नहीं हो सकता तो हमारे यहां तो दोनों.
स्थितियों का वर्णन है एक तरफ वही. शंकराचार्य अद्वैतवाद की रचना कर रहे हैं. और वही भी देश के सरे प्रमुख मंदिरों का. निर्माण भी कर रहे हैं। तो भगवान सगुण रूप. में भी स्वीकार है, निर्गुण रूप में भी. स्वीकार है। पर एक इन्फ्लुएंस निकल के आया. जो कहता है हम तो केवल निर्गुण मानेंगे और. ये कहेंगे सगुण होता ही नहीं। अब वेद. विरुद्ध बात हो गई तो वो परधर्म हुआ। कुछ. चीजें हमारी उनसे इन्फ्लुएंस हुई और हमारी. थोड़ी सी ही चीज को लेकर जैसे एक बहुत. बड़ा बुफे लग रहा हो।.
आज के हिसाब से बात करूं। बहुत बड़ा बुफे. लग रहा हो जो मल्टीीनेशनल क्वज़न हो। हम. बहुत जबरदस्त. अब एक कोई आदमी तो हो ही नहीं सकता जो सब. खा गया हो। फिर भी हम आप थोड़े दिनों पहले. एक शादी में भी साथ में थे। एक जना तो. मुझे मिला मैंने सब एक-एक चीज टेस्ट करी. है। एक-एक चीज एक-एक बाइट सबकी ली है।. मैंने कहा बड़ा तू तो बड़ा पुरुषार्थी. आदमी है। पर कोई है जो थोड़ा रशियन खाया।. थोड़ा जो इटालियन ले आया। थोड़ा सा एक. व्यक्ति था जो मैक्सिकन ले आया। एक. व्यक्ति था जिसने साउथ इंडियन टेस्ट किया।.
एक इंडियन एक ने गढ़वाली एक ने गुजराती. ऐसे ही सनातन धर्म में क्योंकि मानवीय. सभ्यता से शुरू हुआ एक पूरा बुफे लगा हुआ. था जिसमें सब कुछ था शरीर से संबंधित इस. दुनिया से संबंधित और दुनिया बनाने वाले. से संबंधित एक व्यक्ति आया उसने एक उसके. छोटे से हिस्से को लिया और कहा ये मेरा. धर्म है इसके अलावा कुछ नहीं है।. यहां से डिवीजंस एंड डायवर्जंस बनने शुरू. हुए। रस्ते अलग-अलग अलग अलग अलग-अलग बनाते.
चले गए। मूलभूत वो भी सनातन धर्म से. कोरिलेट करेंगे। इसलिए कोई भी आपसे आकर कह. देगा एक शक्ति थी। वही आदम है, वही मनु. है, वही एडमम है, वही मनु इसलिए तो आपको. एक सिमिलरिटी जैसी प्रतीत होगी। तो हम कुछ. उनसे इन्फ्लुएंस होते गए। उनकी उन एक-एक. चीजों को लेकर के और कुछ और हमारे ही कुछ. हिस्सों को लेकर उन्होंने स्वतंत्र धर्म. की रचना कर ली। इस प्रकार से धार्मिक. संचेतना बढ़ती चली गई, बढ़ती चली गई और. वर्तमान समय में आकर के खड़ी हुई। संपूर्ण.
जीवन शैली इस समय बड़ी सिंपल बात मैं एक. अंतिम बात कह दूं। अपने आपको खूब स्वस्थ. रखिए। किस प्रकार से आप हेल्दी रह सकते. हैं। दूसरी बात कहूं इस दुनिया को बहुत. अच्छा बनाइए। हम. और अंतिम बात आपसे कहूं कि दुनिया में. अच्छे से रहिए पर सब इस दुनिया तक ही है।. इस तक मत रहिए। इस दुनिया को बनाने वाला. भी कोई है। ये तीन चीज आपके भीतर इस समय.
है। किसी भी फॉर्मेट में तो आप एक बड़े. श्रेष्ठ हिंदू हैं। ठीक है? बुद्धिज्म का. बीच में जिक्र हुआ। अब बुद्ध को मानने. वाले खासतौर पर जो हिंदुस्तान में लोग हैं. वो. सनातन. से अक्सर तुलना करते हैं और कई बार जब यह. आरोप लगता है कि कुछ खोदिए वहां पर नीचे. मंदिर है तो कहते हैं थोड़ा और खोदेंगे तो. नीचे आपको बौद्ध मठ मिल जाएंगे।. शंकराचार्य जी का भी बीच में आपने जिक्र. किया शंकराचार्य जी का मंडन मिश्रा जी से.
वो जो संवाद था अद्भुत संवाद उस वक्त. बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार जारा था. हिंदुस्तान में बौद्ध धर्म का इतिहास कैसे. रहा? क्यों खत्म हुआ? और यह जो मौजूदा दौर. में राजनीतिक काल भी चल रहा है धर्म का. क्योंकि इसमें ब्राह्मणों को बड़ी गालियां. पड़ती है। कश्यप ने काफी कुछ कहा बाद में. माफी मांग ली।. वाकई में ब्राह्मणों ने इतना अनुचित किया. है और ब्राह्मणों की क्या भूमिका रही? दो. सवाल मेरे मुख्य हैं। एक बौद्धों को लेकर.
और दूसरा बौद्धों से जो ब्राह्मणों को. गालियां पड़ती हैं। मौजूदा राजनीतिक काल. में जिसमें कहा था कि कुकर्म सारे किए. हैं। मनुवाद को लेकर बात होती है। जातिवाद. के हमने बनाया। अभी मोहन भागवत जी ने भी. कहा कि अब जातिवाद से हमें ऊपर उठना. पड़ेगा। तो ये दोनों मैं समझना चाहता हूं।. देखिए बुद्धिज्म की पूरी डिटेल तो कोई. बुद्ध का जो एक्सपर्ट होगा वो कहेगा। फिर. भी जितनी मेरी ज्ञान है मैं उससे निवेदन. करूं कि. अब आपने कहा कि मंदिर है उसको खोदोगे तो. नीचे बुद्ध मिले और खोद लो।.
वहीं तक क्यों सीमित रहोगे? मैं एक बात. जरा बढ़ा के कह रहा हूं। उन्होंने. मस्जिदों को खोदा तो कह रहे मंदिर. निकलेगा। और कह रहे मंदिरों को खोदो तो. कोई बौद्ध विहार निकलेगा और भी तो खोदो।. उसको फिर खोदोगे तो कोई ना कोई कृष्ण. मंदिर ही निकलेगा। राम मंदिर ही निकलेगा।. कोई ना कोई शिव मंदिर ही निकलेगा। बड़ी. सेंसिटिव बात मैंने कही है। इसको. इतिहासकार बड़ी सावधानी से समझ सकते हैं।. जी। क्योंकि जिस शब्द के साथ सनातन जुड़ा.
हुआ है। आज हमारे पास त्रेता तक की. रेफरेंसेस हैं। राम ने पुल बनाया है।. साइंटिफिकली प्रूव्ड है कि ये पुल जा रहा. है दो समुद्र के बीच से। प्रधानमंत्री. द्वारिका के. ऊपर जाकर मोर पंख लगा के आ जाते हैं। तो. हम बात कर रहे हैं अन्य युगों की।. जिन गौतम सिद्धार्थ को बोधत्व की प्राप्ति. हुई है। जिनको प्रमुखता से लोग सब हालांकि. आदि बुद्ध दूसरे हैं। हम तो बड़े सम्मान. से कहते हैं बुद्धस्त पाखंड गणात प्रमादात.
और दशावतारों में बुद्ध को प्रणाम भी करते. हैं। यह सनातन धर्म का विस्तार है।. उनकी जन्मतिथि उनका इतिहास, उनके भीतर का. परिवर्तन, उनको कैसे बोधि की प्राप्ति हुई. यह सब लिखा है। हमारे यहां निर्वाण शब्द. भी गीता में खूब प्रयोग में आया है।. बुद्ध शब्द भी शास्त्रों में प्रयोग में. आया है। हमारे यहां एक एनलाइटन बीइंग. जिसने ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो उसको. भी बुध शब्द से पुकारा जा सकता है। जिसकी. बुद्धि विकसित हो गई हो। बुद्धि युक्त जो.
है वो बुद्ध है और निर्वाण की व्याख्या. बड़ी सुंदर की गई है। आज हालांकि निर्वाण. शब्द को बुद्धिज्म से जोड़ लिया गया है पर. उसका संस्कृत से संबंध है। तो और खोदेंगे. तो मंदिर निकल आएगा। एक समय ऐसा आया था जब. बहुत ज्यादा कर्मकांड प्रधान हो गया। जब. मैं आपको पूरे काल का वर्णन कर रहा था. उसमें जब वैदिक काल और पौराणिक काल आया तो. अलग-अलग प्रथाएं चली। जैसे कभी सती प्रथा.
चल गई थी, कभी कोई प्रथा चल। एक समय ऐसा. आया था जिसमें इस सनातन धर्म में अतिक. कर्मकांड होने लगा था। और जो कि प्रथा ही. मैं कहूंगा जिसमें बलि शब्द भी जुड़ा।. हमारे यहां हम लोग उससे अलग-अलग अलग. अलग-अलग उपासना की पद्धति है। तो एक. पद्धति होती है वामाचार्य। वहां पर कई बार. बलि देने के विधान आ जाते हैं। हालांकि. उसको ले मतभेद है। कई लोग कहते हैं कि. नहीं धर्मशास्त्र की आज्ञा है पर हम लोग. जो वैष्णवीय परंपरा में और जो विशुद्ध रूप.
से वेद को मानने वाले हैं वो उस चीज को. स्वीकार नहीं करते और उसकी अनेकों और. व्याख्याएं करते हैं शब्द की। उस तरफ हम. नहीं जाएंगे। और इसीलिए मंदिरों से. धीरे-धीरे उसको मुक्त भी कर दी गई। तो. इतना हैवी रिचुअलिज्म तैयार हुआ। यह हर. फेज में होता है। क्रिश्चियनिटी में बहुत. रिस्म है। थोड़े दिन पहले मैं पढ़ रहा था।. एक आदमी ने अपनी मेंटली गाड़ी जमीन के. नीचे दबवा दी क्योंकि उसको ये बताया गया. कि अगर तू कोई भी चीज चाहता है तो अगर.
अपनी कब्र के पास गढ़वा दे तुझे हेवन में. मिल जाएगी। तो उसको बेंटली चाहिए थी हेवन. में तो उसने उसी को गढ़वा दिया। मैंने. किसी को दिलवा देता बैटर यही भेज देता. मिश्रा जी कि हमारे खूब काम में आती. पडकास्ट कर लेते उसमें। तो रिचुअलिज्म सब. जगह इन्फ्लुएंस करता है। तो हिंदूइज़्म में. एक फज़ आया जहां हैवी रिचुअलिज्म हुआ।. कर्मकांड की प्रधानता होने लगी। और हमारे. यहां ना चार पुरुषार्थ है। धर्म, अर्थ, काम मोक्ष, अर्थ का कोई विरोध नहीं है।.
रजवाणों का वैभव, अर्थ की सीमता, अर्थ को. श्रेष्ठता ये सब विद्यमान थी। उस बीच में. एक लहर लेकर आए जिसको हम ध्यान त्याग योग. इससे जुड़ी जैसे एक स्थिति आती है चरम हो. जाए तो आदमी सोचता है यार अब हो गया. एक्सट्रीम. टाटा भी डिसाइड करता है 60% 65% बांटना. शुरू करो. एक स्थिति आती है तो वैदिक काल में ही. वैदिक परिवार में ही एक राजवंश में ही. पैदा होने वाले गौतम सिद्धार्थ के हृदय.
में अत्यंत वैराग्य और करुणा उत्पन्न हुई. और उन्होंने धीरे-धीरे इस देश में अब. क्योंकि वो राजवंश से थे। दुनिया में. ऑलवेज. लीडर जब इन्फ्लुएंस होता है तो बात नीचे. तक पहुंचती है। ये तो हम पिछले 101 वर्ष. में ही देख रहे हैं।. ऑलवेज देख रहे हैं। एक राजवंश का बालक. त्याग, करुणा और सत्य के मार्ग पर चला. गया।. तो इसका प्रभाव तो पड़ेगा ही ना। अशोक से. ले बड़े-बड़े रजवाड़े स्तब्ध रह गए।.
बड़े-बड़े रजवाड़े। अब अगर शुभांकर मिश्रा. जैसा मोस्ट रेप्यूटेड जर्नलिस्ट. और बैठकर के एक सामान्य से धर्म गुरु के. प्रति संवाद करेगा तो इससे धर्म को. प्रबलता मिलेगी कि नहीं सब इन्फ्लुएंस. होंगे कि वाह धर्म को लेकर भी संवाद हो. सकता है। सबकी इस तरफ दृष्टि पड़ेगी जो. दृष्टि भी नहीं जाती थी आज से बहुत साल. पहले तक। ऐसे ही राजवंश जो केवल विलास भोग. और युद्ध तक सीमित थे और उनके यहां धर्म.
पूजा विशेष तक सीमित था। एक स्थिति ऐसी आ. गई थी। बहुत समय तक आई है। तब उस समय. बुद्ध ने दुनिया में यह बात फैलाई और. राजवंश से थे तो रजवाड़ों तक बात पहुंची. तो नीचे तक बात पहुंच गई। ऐसे देश में. उसका इन्फ्लुएंस तैयार हुआ। पर आदि. शंकराचार्य ने सनातन धर्म के उसी स्वरूप. को पता है त्याग हमारे यहां भी है। इसलिए. एक युवा व्यक्ति सन्यास लेकर निकल पड़ा।.
करुणा हमारे भीतर भी है। हम किसी का खंडन. नहीं कर रहे।. क्षत्रियों को कमजोर मत करो। इतनी ज्यादा. करुणा और अहिंसा की बातें होने लग गई थी. कि हमारे यहां के योद्धा और क्षत्रिय ढीले. पड़ गए। इसलिए तो बाहर के लोगों ने घुसकर. अटैक करने शुरू कर दिए। पहले किसी की. हिम्मत थी जो घुस जाए। तांडव मचा देता था. यहां का योद्धा।. परंतु इतनी ज्यादा अहिंसा की बात हो गई कि. नपुंसकता फैलने लग गई।. तब एक धर्म योद्धाओं की तरह अखाड़ों की.
स्थापना की गई। योद्धाओं की स्थापनाएं की. गई और धीरे धीरे धीरे धीरे फिर से देश में. जो मूल सनातन वैदिक धर्म का स्वरूप है वो. स्थापित होने लगा।. भारत में हुआ तो बुद्ध ने फिर एशियन. कंट्रीज के भीतर जाकर के अपना स्थापित्व. किया। उनके साथ भी एक अलग प्रकार का. इतिहास उपस्थित है कि वहां भी मंदिरों को. लेकर के द्वंद चलता रहा है। कई स्थानों पर. यही कहते हैं कि मंदिर ही उन्हीं के.
द्वारा कई मंदिर तोड़े। वो कहते कई बौद्ध. विहार मंदिरों ने तोड़े। ये बद्रीनाथ को. लेकर के दो-दो थॉट लोग कहते हैं। आपको. आश्चर्य भी होगा। बोले मूर्ति इस मुद्रा. में बैठी है। तो ये तो बुद्ध की मूर्ति. है। हम कह रहे हैं नर नारायण की मूर्ति. है। तो ये दो विषय यहां आकर खड़े होते. हैं।. वेद का जो मूल सिद्धांत है वहां से वो बात. विपरीत चली जाती है। बहुत सारे पुनर्जन्म. आदि जैसे कई अस्तित्वों पर हालांकि जो. बुद्धिज्म का एक्सपर्ट है वो तो कभी ना.
कभी आपके सामने आएगा। तो थोरली डिटेल्ड तो. वही बात कर सकता है। ऐसे ऐसे धीरे-धीरे. हुआ। बहुत सारी चीजें प्रैक्टिकली पॉसिबल. नहीं है और वेद के जो विरुद्ध जो सनातन. वस्तु के विरुद्ध जाएगी वो तो कभी लंबी. टिक ही नहीं सकती ना।. थोड़ी देर हवा की तरह तो आएगी पर टिक तो. सकती नहीं है।. और आपने एक दूसरा प्रश्न और कर रखा था. मेरे साथ।. ब्राह्मणों को लेके. हां जातिवाद को मैं इस बात से सहमत हूं।. ये तो बहुत समय से बात हुई। भक्ति काल के. समय से बात हुई है।. एक एक सवाल महाराज जिसमें आया था। मैंने.
कहीं किसी ने एक मीम बना के डाला था। हां. कि ब्राह्मण श्रेष्ठ है।. हम. तो किसी ने पूछा किसने कहा? कहा लिखा गया. है। पूछा किसने लिखा? कहा ब्राह्मणों ने।. तो फिर यह आया कि ब्राह्मणों ने ही खुद को. श्रेष्ठ बना के बाकी सबको छोटा बना दिया. और वो परंपरा चली आ रही थी। अब लोग मुखर. हो रहे हैं। इसलिए कई बार गेहूं के साथ. घुन भी पिस रहा है। तो हम एक निवेदन. करेंगे. हम. हम तो प्रणाम करते हैं पर महर्षि वाल्मीकि. को. हम. वैसे तो जाति में नहीं बांधना चाहिए। फिर.
भी कोई अगर जाति में बांध रहा है तो वह. क्या लिख रहे हैं यह भी देखना चाहिए. रामायण में बड़े आराम से देखना चाहिए. देवर्षि नारद को हम ही भागवत में कहते हैं. कि दासी के लड़के थे और वो क्या कह रहे. हैं भागवत आदि सूत्रों में यह भी विचार. करना चाहिए यह केवल राजनैतिक उद्देश्य है. इसके साथ मैं निश्चित रूप से मानता हूं.
हूं। किसी हद तक वर्णन जरूरी है। हम. पर उसकी भी एक लिमिटेशन है। जैसे कि. आदरणीय मोहन भागवत जी ने कहा जब. राष्ट्रवाद की बात आती है, जब देश की बात. आती है, जब धर्म की बात आती है, जब धर्म. रक्षा की बात आती है। ऐसी स्थिति में. निश्चित रूप से हर जाति हर संबंध से ऊपर. उठ जाना चाहिए। एक छोटा सा मैं निवेदन.
करूं।. एक डॉक्टर है, एक कंपाउंडर है। कंपाउंडर. डॉक्टर की हेल्प बहुत समय से करता रहता. है। थोड़ा बहुत तो वो जानता है। एक. एक्सीडेंट हुआ और इमरजेंसी में एक पेशेंट. पहुंचा. और बड़ी जोर से उसका घुटना फूटा और बाय. चांस डॉक्टर अनुपस्थित है।. हम. अब ऐसी स्थिति में वो अपनी पोजीशन देखेगा।. पोस्ट देखेगा तो मर जाएगा वो तो आदमी।. डॉक्टर साहब जब तक पहुंच रहे हैं तब तक. मैं फर्स्ट एड तो कर दूं।. हालांकि मुझे आती नहीं है पर मैं अरे एक. तो डॉक्टर का वॉचमैन भी रोज देखतेदेखते.
इतना सीख ही जाएगा। मैं कहता हूं रोज आप. ही की टीम आपको सुनती है। दो चार प्रश्न. तो वो भी पूछ ही लेगी इतने दिन सुन सुन. के। मेरे साथ ही जो श्रोता हैं जो 10-10. साल से चल रहे हैं मेरी कैमरा टीवी होगी. या जो मेरी कथाओं में चलती है कभी झंझट. पड़ जाए 10 पांच मिनट तो वो भी प्रवचन दे. ही देंगे।. ये तो हो ही जाएगा।. जब स्थिति ऐसी होती है. तब हमें जाति पाती पद्धति सबसे ऊपर उठ. जाना चाहिए। और येल के समय से बात आई है.
ना मीरा का वर्ण देखा गया है। जब जब देखा. गया भगवान ने उसको चैलेंज किया है।. महाराष्ट्र में देखा जाए। चाहे रैदास हो. चाहे रविदास हो, चाहे वाल्मीकि हो। अरे. हमारे यहां तो कितनों कितनों को यमन. हरिदास हुए हमारी गौ परंपरा में जो. मुसलमान घर में पैदा हुए उनका भी सम्मान. किया। चैतन्य महाप्रभु की पद्धति है. बिल्कुल स्पष्ट रूप से कही है कि किम्बा. न्यासी किम्माबा विप्र किंबा शूद्र हो. कृष्ण तत्व वेता जिन त गुरु होय तो मैं दो. बात आपके सामने रख रहा हूं कि इसका एक.
प्रोटोकॉल डिसाइड हो जाना चाहिए. अगर धर्म को बचाना है स्टेटमेंट्स तो बहुत. आसान है मैंने इस बहुत मंथन किया मिश्रा. जी एक प्रोटोकॉल डिसाइड हो जाना चाहिए. और बहुत स्ट्रिक्टली डिसाइड हो जाना चाहिए. हम. कि जाति पाती वर्ण से तो ऊपर उठना ही. पड़ेगा पड़ेगा। एक प्रोटोकॉल डिसाइड हो. जाए। अच्छा उससे मुक्त होना भी कठिन है।. तो यह भी विचार है कि यह वर्ण जो है यह. किस लेवल तक फॉलो हो सकता है? वो फॉलो हो.
सकता है निज उपासना में। वो फॉलो हो सकता. है हमारी अपनी सेवा में, हमारे अपने पूजा. में। हमारे अपने प्रोफेशन में कि हमें किस. प्रोफेशन पर ज्यादा जाना चाहिए? अगर मैं. एक ब्राह्मण घर में पैदा हुआ हूं तो मुझे. इस पर महत्व देना चाहिए पहले एक बार कि. मैं शिक्षा की तरफ बात करूं। इंटेलेक्चुअल. आइडियाज को क्रिएट करूं। मोटिवेशन समाज को. दूं। एज अ गाइड, एज अ कोच इस तरफ मैं काम. करूं तो शायद काम हो सकता है। मैं. प्रोफेशन की तरफ विचार कर सकता हूं। मैं.
उपासना पद्धति की तरफ विचार कर सकता हूं।. जैसे और और ये सारी जातियां विश्वामित्र. का चरित्र आकर के खड़ा होता है। जन्मजत है. तो कर्मगत भी है।. अगर कोई कर्म करेगा राम जी स्वयं जाकर के. रावण का वध कर रहे हैं। एक तरफ वो. ब्राह्मण है पर कर्म से उसको राक्षस की. उपाधि दी गई है। तो कर्मगत विचार करके भी. तो जातियों का भेद आ करके खड़ा हुआ है।. इसीलिए हम राजनैतिक पुट डाल के हर समय. जाति जाति जाति जाति कहकर बात करेंगे तो.
गड़बड़ हो जाएगी।. जैसे नहीं इसमें दो तीन पॉलिटिकल क्वेश्चन. है लेकिन इसको मैं धर्म से जोड़ के चल रहा. हूं। जैसे कावड़ यात्रा को लेकर आता है।. हां।. अब कावड़ यात्रा को लेकर हर बार ये सोशल. मीडिया पर आता है कि सिर्फ छोटी जातियों. के लोग वहां जाते हैं। ब्राह्मण समाज के. लोग आपको नहीं मिलेंगे या बड़े लोग जो है. वो नहीं मिलेंगे। बेरोजगारों को भ्रमित. करके डाल दिया जाता है। मंदिरों को लेकर. अक्सर आरोप लगता है कि मंदिरों में. ब्राह्मणों का पूरा कब्जा है। अगर कोई. दूसरी जाति से आना चाहे तो उसके लिए जगह. नहीं है। ये सत्य है दोनों चीजें? देखिए.
कावड़ यात्रा के लिए तो मैं ये नहीं. कहूंगा। मैं भी कई ब्राह्मणों को निजी रूप. से जानता हूं। नाम भी ले सकता हूं। अगर आप. बताएंगे कई वो कई राजनीति और व्यापार से. भी जुड़े लोग हैं और अच्छे साधक भी हैं।. मेरे से ही परिचित लोग हैं जो ब्राह अच्छे. व्यापारी भी हैं और ब्राह्मण भी हैं हर. प्रकार से हैं जो कि कावड़ यात्रा में. क्योंकि इसका बहुत ज्यादा चलन मध्य प्रदेश. की तरफ थोड़ा सा विशेष है वैसे तो पूरे. देश में हो गया है इस समय. और वो मध्य प्रदेश से ही जुड़े लोग हैं।. वैश्य भी हैं। तो मुझे नहीं लगता कि कहीं.
किसी छोटे गांव में या कहीं किसी जगह बात. उठी होगी। आज के समय कोई यह विचार करके. नहीं जा रहा कि मुझे कावड़ यात्रा कई. हमारे यहां होने वाली चीज जो है ना वो. स्टेट वाइज क्रिएट हुई थी। जैसे गणेश. चतुर्थी गणेश चतुर्थियां सब जगह होने लग. गई है।. महाराष्ट्र. हां इसकी उत्पत्ति दो कारणों से हुई। पहले. तो इसको नेशनलाइज मूवमेंट से जोड़ा गया।. अंग्रेजों के समय इस बहाने से मीटिंग हो. जाती थी स्वतंत्रता सेनानियों की। तो तिलक. ने इसको बढ़ावा दिया। दूसरी महत्वपूर्ण.
बात आपसे कहूं। उत्सव होता था ये दक्षिण. में।. क्योंकि पौराणिक कथा कहती है कि शिव ने एक. पुत्र को उत्तर दिया, एक पुत्र को दक्षिण. दिया। तो छोटा भाई बड़े भाई से मिलने जाता. था उतने दिन।. तो दक्षिण में गणेश का उत्सव किया जाता था. और बाद में गणेश का विसर्जन।. अब गणेश जो कि प्रॉफिट लाभ इसका विसर्जन. करना चाहोगे। आपको. प्रॉफिट नहीं चाहिए। प्रोग्रेस नहीं. चाहिए। अब इसका तो उत्तर पता नहीं किसी. को। अब बात फैल गई सब जगह।.
खूब जमकर फैल गई। पता तो है नहीं बहुना सब. जगह शुरू हुआ। फिर इसके बाद में बंगाल में. महाकाली की उपासना थी। वहां भी दुर्गा. पूजा में दूसरी वाली दुर्गा पूजा मानी. जाती है। उसके पीछे वहां का कल्चरल. इन्फ्लुएंस है। उसके पीछे वहां की कल्चरल. चीजें जुड़ी हुई है। और धीरे धीरे धीरे. धीरे धीरे धीरे आप देखिए दुर्गा उत्सव. दिल्ली में जो उसका अर्थ भी नहीं जानते वो. भी शुरू हो गया। ऐसे सैकड़ों चीजें हैं।. तो कावड़ उत्सव भी जो है मां अहिल्याबाई.
के क्रम से वो ले जाती थी और इसके पीछे. बहुत सारे इतिहास हैं। तो वो एक कल्चरल. बेसिस से शुरू होता है। जैसे मैं वृंदावन. में. हम. मैं तो रोज गणेश जी की पूजा करता हूं।. हम. हमारे पंचायतन है। हम तो हर मंत्र से पहले. गणेश की विशेष गणेश चतुर्थी के दिन उनका. विशेष अर्चन भी करते हैं। पर हम ये नहीं. करते कि लाके बिठा रहे और बाद में विसर्जन. कर दे रहे हैं। मैं भी नवरात्रियों के समय. देवी को भी प्रणाम करता। पर यह नहीं कि. पंडाल लगाया, सजाया और बाद में उनको भी. जाके विसर्जन कराए। तो क्योंकि कल्चरल और.
किसी न किसी इतिहास से शुरू हुई चीजें. हैं। उसी प्रकार से कावड़ यात्रा भी किसी. एक परंपरा पद्धति से शुरू हुई है। उसको. देखकर के तो रेस्ट्रिकशंस नजर में आ सकते. हैं। जैसे साउथ इंडिया में कोई नहीं करता।. हम. साउथ इंडिया में कोई इनफ्लु वहां भी नॉर्थ. इंडियन लोग ही करते होंगे। हम्।. साउथ इंडिया और बहुत सारे इस देश के ऐसे. स्थान हैं जहां पर कोई कावड़ यात्रा लेकर. के जाएं इसका प्रभाव नहीं है। क्योंकि वो. एक स्टेट से एक रीजन से एक इन्फ्लुएंस से. शुरू हुई चीज है। एक इन्फ्लुएंस से शुरू.
हुई चीज है।. हर जगह की शादी अलग-अलग होती है। फिर भी. हिंदू शादी है।. हम. मणिपाल में बहुत फेमस शादी हुई। आपके यहां. भी हुड्डा जी पॉडकास्ट करके गए थे।. हम. उनकी शादी आप देखिए वो तो ट्रेडिशनल धोती. होती पहन के बैठे। तिलक लगा करके बैठे है. तो वो भी हिंदू शादी पंजाबियों की शादी. अलग है गढ़वालियों की शादी अलग है. गुजरातियों की शादी अलग है तो हर एक-एक. जगह जब शादी का इन्फ्लुएंस अलग है ऐसे ही. हर एक जगह उपासना का भी इन्फ्लुएंस अलग है. अब अगर वो सफल हो तो तो अंडरस्टैंड होगा.
ही नहीं ना ठीक है मणिपाल के लोग मणिपली. ब्याह करें समझ में आवे उनको दामाद बाहर. का मिला पर लड़की वहां की है वो भी समझ. में आवे या हो सकता है लड़की लड़का मणिपाल. का लड़की बाहर की हो तो भी समझ में आवे अब. अगर दोनों हरियाणा के हो और मणिपली शादी. करें तो थोड़ा तो प्रश्न उठेगा ही। तो इसी. प्रकार से कई उत्सव ऐसे हैं जिनका वहां की. मूल परंपरा से कोई संबंध नहीं है।. हम. अब जैसे आप जाइए शिवालय पे हर-हर महादेव.
ही होगा। आप वृंदावन जाइए तो राधे-राधे ही. होगा। तो दोनों ही तो हिंदू हैं। ये तो. डायवर्सिटी है हमारे यहां। हमारे बुक थोड़ी. ना हमारे लाइब्रेरी है हम. दोनों ही तो है क्योंकि वो वहां के कल्चर. से इन्फ्लुएंस होके एक तत्व की उपासना की. गई. नारायण नारायण भी बोला जाएगा ओम नमो. नारायण भी बोला जाएगा नमो ऐसे ये पद्धति. शुरू और अब हम इसमें यह बात कहें कि. ब्राह्मणों का कब्जा है बात ऐसी है मंदिर.
में कोई नहीं जा सकता मंदिर में उस देवता. का पुजारी जा सकता एक परंपराएं चली आ रही. है मंदिर की उपासना की उस मंदिर की उपासना. के अनुसार जिसने उस परंपरा के प्रति. शिक्षा ली है, कार्य किया है। एक मंदिर तो. सबका पोषण करता है। हमारा टारगेट केवल. अंदर देवता की पूजा तक ही क्यों सीमित है? मंदिर में तो कोई और भी नहीं जा ब्राह्मण. भी नहीं जा सकता अगर वो पवित्रता का ध्यान. नहीं रखे।. ब्राह्मण भी नहीं जा सकता। अगर वो ठीक से. आहार व्यवहार विचार का ध्यान नहीं रखे तो।.
और अगर उसके बाद भी वह जाता है तो हो सकता. है हमें तो बुरा लगे पर उसको भी तो उसको. भुगतना पड़ेगा। उसके ऊपर तो उससे ज्यादा. पाप आकर के खड़ा होगा। मंदिर तो देश में. कौन सी ऐसी वस्तु नहीं है जिसका पोषण नहीं. करता। वहां कपड़े की भी जरूरत है। वहां. भोग की भी जरूरत है। वहां अन्न की भी. जरूरत है। वहां तो सुरक्षा की भी जरूरत. है। व्यापारियों की भी जरूरत है।. पुजारियों चारों वर्ण की जरूरत है मंदिरों. को। पर चारों वर्ण में मंदिर में चारों.
वर्णों का अपना-अपना दायित्व वितरित किया. हुआ है। सबसे बढ़िया एग्जांपल जैसे. जगन्नाथ पुरी जाइए। पूरी में क्या है? हर. दायित्व के लिए एक मुखिया है। जो भोजन बना. रहे हैं वो पिछले 5000 साल से भोजन बना. रहे हैं। जो रथ बना रहे हैं आती है लकड़ी. वो 5000 साल से वही कर रहे हैं। जो कलेवर. जब बदलता है जगन्नाथ जी की मूर्ति बदली. जाती है जब तिथि आती है वो जो कर रहे हैं. वो तब से वही कर रहे हैं। मैं एक व्यक्ति. से मिला। उसकी पीढ़ियां भगवान को सुलाने.
का काम करती हैं। परंपराएं चली आ रही है।. उस परंपराओं के अनुसार से देवता का विधान. है। चारों वर्णों की हर मंदिर को आवश्यकता. है। और उसकी व्यवस्था उसके अनुरूप चलती. चली जाती है। जहां ब्राह्मण की जरूरत है. वहां ब्राह्मण की। जहां क्षत्रिय की वहां. क्षत्रिय की जहां वैश्य की वहां वैश्य की. जहां चतुर्थ वर्ण की वहां चतुर्थ वर्ण की।. पर बीच में एक समय ऐसा आया। इसकी. मिसअंडरस्टैंडिंग होने की वजह से देश में. मुगल साम्राज्य जाकर खड़ा हुआ। क्रिश्चियन.
इंग्लिश साम्राज्य जाकर खड़ा हुआ। हम इतने. ज्यादा उसमें व्यस्त हो गए कि इसके अभ्यास. को फ्री होकर इसकी मूलभूत परंपराओं से. मुक्त हो गए। एक ही सरनेम हर राष्ट्र में. अलग-अलग जाति का है। जैसे ओझा आप मध्य. प्रदेश की तरफ जाएंगे तो कोई और वर्ण है।. गुजरात की तरफ जाएंगे तो कोई और वर्ण है।. अंग्रेजों के समय जब जनसंख्या गणना की गई. तब सरनेमों में घपला हुआ। कौन सा सरनेम.
किस आदमी को दिया जाए? शर्मा सरनेम को. लेकर के भी मैनपुलेशन है बहुत सारी. ब्राह्मण भी ओबीसी भी है. बस दोनों चीजें आगे श्रमणम से वो शब्द बना. है। बहुत सारी जगह आगे पीछे सिस्टम है। तो. इतनी आसानी से नहीं है। मैं ये कह रहा हूं. जरूर सबको अपनी तरफ से सेवा करने का चारों. लोगों को अपने-अपने दायित्व में सेवा करने. का अधिकार है। हम इसको थोड़ा राजनैतिक. इन्फ्लुएंस से फ्री होकर धर्म शास्त्र का. विधिवत अवलोकन करते हुए इसका आचरण करेंगे.
तो इससे श्रेष्ठ बात कोई नहीं हो सकता।. महाराज जी हमारे धर्म में झूठ बोलने की. इजत भी है।. यही तो धर्म की विशेषता है। एक हमारे नींद. बोलना अलाउड है।. शुक्र नीति का श्लोक है।. हम. जिसमें लिखा है कि जज को झूठ बोलने से दोष. वकील को वकील को झूठ बोलने से दोष नहीं. लगता क्योंकि वो बचाएगा कैसे क्लाइंट को।. हालांकि इसके कहने का मतलब ये नहीं है कि. झूठ को बढ़ावा देने लग जाए। वकील मैं तो. नहीं कहूंगा। वैल्यू सिस्टम तो सत्य का ही. है।.
यहीं पर किसी की प्राण रक्षा करनी हो।. दूसरी बात आई किसी की प्राण रक्षा करनी. हो। आपके सत्य से अगर दूसरे की प्राण जाते. हो तो आपको झूठ का सहारा लेना चाहिए। आप. सत्य बोल दोगे. एक. मर्डरर आके आपसे पूछे बताओ वो आदमी कहां. है? आप बोलते हां वहीं बैठा है। तो बताने. का तो दोष हमें लगेगा। हम. किसी की प्राण रक्षा करनी हो।. किसी को कानूनी संदर्भों में लगना हो.
तीसरी बात वैद्य। वैद्य को तरीके से बताना. होगा। वह तुरंत ही आज आपके सामने खोल देगा. कि भाई आप तो दो-चार दिन में. जाने वाले हो। तो बेचारा जो तीन दिन और. जीने वाला होगा वो आज ही चला जाएगा। इस. प्रकार सिचुएशनल पद्धति से हमको झूठ कहने. की सुविधा दी गई है। पर उसको आदत नहीं. बनाएं।. हम. वो सिचुएशनल है। वो स्वभाव नहीं बन सकता।.
स्वभाव तो सत्य का ही बनना चाहिए।. ये हमारे धर्म में उपासना तक सीमित नहीं. है। हमारा धर्म जो है वो जीवन जीने की. पद्धति है। पूरी जीवन धन सुख किस चीज को. सुख कहेंगे? आपके पास छह चीजें हैं। आपको. सुखी कहा जा सकता है।. ये विदुर का श्लोक है महाभारत का। बड़ी. सुंदर बात उन्होंने कही। आपके पास अगर. अर्थागमो आपकी रिक्वायरमेंट्स पूरी हो रही. हैं। डिजायर्स नहीं रिक्वायरमेंट अर्थगमो. आप रोज हेल्दी हैं। नित्यम रोगिता च. प्रियाच भार्या पतिपत्नी में स्वीट टॉक भी.
है और प्रियवादनी च मतलब शादी नहीं है. प्रेम भी है और प्रियवादनी मतलब आपस में. वो केवल लड़ते नहीं है। जरा थोड़ी बहुत. रोमांटिक टॉक भी करते हैं। अर्थगमो नित्य. मरोगिता च प्रियाच भार्या प्रियवादनीच वस. पुत्रो आपकी संतति आज्ञाकारी है और अर्थ. करीच विद्या आपके पास कोई ऐसा टैलेंट है. जो आपकी मुसीबत में आपको पैसा कमा के दे. सकता है जैसे पांडवों के पास टैलेंट था. अज्ञातवास में भीम ने रसोई बनाई.
अर्जुन ने वाद्य बजाए सबके पास एक टैलेंट. था तो विपत्ति में वो टैलेंट काम में आ. जाता है म्यूजिक पेंटिंग ये कोई भी कला. आपके पास होगी तो वो सब कुछ खत्म हो. जाएगा। तो उस कला के जरिए आप अपना पैसा. कमा सकते हैं। ये छह चीज अगर आपके पास है. तो विदुर कहते हैं आप सुखी हैं।. पंचविजती वित्त पांच जगह बांटना चाहिए धन. को हम सबसे पहली बात कही धर्मा धर्माय.
धर्म के लिए ड्यूटीज के लिए बढ़िया तरह. सेवा के लिए यश सेधाय आपको जानकर आनंद आ. जाएगा। भागवत का श्लोक है यश के लिए. शास्त्र ने आज्ञा दी अच्छे व्यक्ति की. प्रतिष्ठा समाज में होनी चाहिए उसके लिए. भी अर्थ खर्च करिए धर्माय यशधाय. कामाय अब आपकी कोई इच्छा है कि मेरे पास. बढ़िया एक घर होना चाहिए लीजिए ना धर्माय. यशस्थाय.
यश धर्म यश काम अर्थ का मतलब होता है यहां. एसेट. टू क्रिएट योर एसेट्स बढ़िया स्वर्ण लीजिए. या भूमि लीजिए जो विपत्ति में काम में आए. और स्वजनायचा अपने मित्र मंडली दोस्त यार. परिवार पंचविद विवजति वित्त अपने वित्त को. इन पांच हिस्सों में बांट कर चलिए. उठना सोना पैसा काम तक को लेकर के.
अर्थ को लेकर धर्म इस सबको अगर हम शास्त्र. का अनुसंधान करेंगे तो केवल ये उपासना फूल. तक सीमित नहीं है। एस्ट्रोनॉमी. एस्ट्रोलॉजी लिटरेचर. आप देखिए बड़े से बड़ा लिटरेचर कभी किसी. ने कालिदास को पढ़ा है? कालिदास जो एक. शब्द लिखता है अगर मानो एग्जांपल दे रहा. हूं। उसने कहीं जल लिख दिया तो उसकी पूरी. किसी बुक में दोबारा जल का यूज़ नहीं. होगा। उसका पर्यायवाची शब्द निकलेगा।.
संस्कृत का वो लिटरेचर है। एक से एक अक्षर. के भीतर लिटरेचर, मैथमेटिक्स, सोशियोलॉजी, एस्ट्रोनॉमी, एस्ट्रोलॉजी, साइंस कौन सी. ऐसी वस्तु नहीं है जहां कि हमारे यहां. शास्त्रों में विमर्श नहीं किया। पूरी. लाइफ स्टाइल आपके सामने रख के दी है।. तो हमारे शास्त्र एक एक विषय को लेकर. हमारा मार्गदर्शन करते हैं। हम मैं. वृंदावन जब अभी आपके यहां गया था तो राधा.
रमण मंदिर में हम गए। फिर कुछ तस्वीरें. आपने दिखाई थी जिसमें भगवान कई बार दांत. दिख रहे थे मुस्कुराते हुए।. अलग-अलग तस्वीरें आ रही थी। क्या प्रभाव. है राधा रमण मंदिर का? अरे राधा रणमण. मंदिर में तो हमारे यहां कहते राधा रमण जी. का दर्शन करने के बाद यह नहीं कहना चाहिए. कि मैंने कृष्ण को नहीं देखा।. जैसे श्री कृष्ण है जैसे जितनी भी. मूर्तियां हैं वो बनाई हुई है किसी कलाकार. ने या भक्ति की भावना से पर मैं उनको छोटा.
नहीं कह रहा. क्योंकि हमारे यहां उनको अर्चा अवतार कहा. जाता है। भगवान उस विग्रह के रूप में आपके. घर में प्रकट हुए। इसलिए हर मूर्ति की. अपनी लीला है।. पर राधा रमण जी किसी ने बनाई नहीं है। और. जिस तरीके के भगवान के वंशज थे वज्रनाव. वज्रनाव को श्री कृष्ण ने ब्रज क्षेत्र. में अपनी लीला के बाद भेजा। सब जगह का. राज्य तो पांडवों को दे दिया। पांडव ने. परीक्षित को गद्दा राज्यगद्दी पर बैठाया।. पर ये जो ब्रज था इसका राजा द्वारिका डूब. गई। तो अपने वंशज वज्रनाव को बनाया। तो.
वज्रनाव जब वृंदावन में थे तो कृष्ण को. याद करते थे और श्री कृष्ण की पत्नियां भी. उनके साथ में थी। तो उन्होंने तीन. मूर्तियां बनाई। गोविंद, गोपीनाथ और मदन. मोहन जिसमें एक जयपुर में भी हैं क्योंकि. मुगलों के आक्रमण से वहां चली गई थी। तीन. मूर्ति बनाई। पहली मूर्ति बनाई तो. पत्नियों को दिखाया। बोले ऐसे ही लगते हैं. क्या? बोले पैर बिल्कुल ऐसे ही है। तो ऊपर. में कुछ काम बाकी है। फिर दूसरी बनाई हां.
पैर और शरीर तो ऐसा है पर मुख में काम. बाकी है। तीसरी बनाई गोविंद की और एकदम. सबने घूंघट खींच लिया। यही तो हमारे कृष्ण. है। तो ये तीन मूर्तियां अभी भी एक यात्रा. होती है। इसी के बहाने आपको बताऊं पहले. लोग करते थे कि सूर्योदय से सूर्यास्त के. बीच में तीन मंदिरों का कोई दर्शन करे तो. उसे कृष्ण दर्शन करने का पुण्य मिलता है।. ऐसा शास्त्रों में वर्णन है। तो हमारे. पूर्व आचार्य गोपाल भट्ट गोस्वामी जी रोज. इनका दर्शन करते थे और वही मेडिटेट करते. थे। क्योंकि एक मूर्ति में चरण बिल्कुल. कृष्ण जैसे थे। दूसरे में बीच का शरीर और.
तीसरे में मुख रोज ये दर्शन करते थे और. उसी को मेडिटेट करते थे और शालिग्राम जी. में से वही तीन विग्रहों का मिक्सर राधा. रमण जी के रूप में प्रकट हुए इसलिए साइज. छोटा है पर श्री कृष्ण जैसे दिखते थे. श्याम सुंदर उसी रूप में राधा रमण जी. प्रकट हुए और स्वयंभू विग्रह शालिग्राम तो. वैसे भी आपको पता है जैसे नर्मदेश्वर होते. हैं सब जगह पूज्य होते शालिग्राम की तो. प्रतिष्ठा भी नहीं करनी पड़ पड़ती। हां।.
किसी भी मंदिर में मूर्ति प्रतिष्ठा होती. है। शालिग्राम की प्रतिष्ठा नहीं होती।. उसमें पहले से ही भगवान बैठे हैं। हम. तो वो भगवान शालिग्राम से प्रकट हुए। और. मैं तो एक बात बताऊं मश्वरी अभी सबके. सामने वैसे मैंने कही नहीं कभी। भगवान तो. भीतर दौड़ते भागते खेलते कूदते रहते हैं।. वो तो हम लोगों को मालूम है। ज्यादा रहस्य. नहीं बता सकते हम। पर सबके सामने सबकी. मर्यादा बची रहे। इसलिए सीधे-सीधे खड़े हो. जाते हैं। फिर भी आप रोज उनकी फोटो देखो।. आपको लग ही नहीं सकता कि यह एक ही भगवान.
की है। रोज नए होते हैं। और आप जैसा कोई. प्यारा आ जाए तो मुस्कुरा के अपने दांत भी. दिखा देते हैं।. मैंने तस्वीर देखी आपके ही. और आपके साथ तो क्या रंग डाले हैं भगवान. ने। उस दिन आपके साथ जो लाड किया है। ऐसा. हुआ कि जैसे उनको आनंद आ गया हो कि अपना. कोई व्यक्ति आया और ध रंग पर रंग लाल पीले. नीले गुलाबी सब अपने रंग में रंग डाला।. काफी वायरल हो गई वो वीडियोस। हां बहुत. ज्यादा आप मतलब दुनिया का रंग उतार दिया. अपना रंग चढ़ा दिया।.
अभी भी मेरे पैर में गुलाबी वाला रंग है।. आय हाय हाय हाय शरीर से मन तक, मन से. बुद्धि तक और बुद्धि से आत्मा तक रंग चढ़. जाए। यही तो हम लोगों की उद्देश्य है।. वृंदावन बहुत सारे लोग जाते हैं। जैसे मैं. कभी वहां नहीं गया था। वृंदावन की यात्रा. कब पूरी होती? कहां-कहां जाएं? तो यह माने. कि वृंदावन की यात्रा मथुरा वृंदावन की. सफल हो गई।. देखिए पहले तो मथुरा और वृंदावन दो. स्वतंत्र एंटिटी हैं।. तो अगर आप मथुरा जा रहे हैं तो मथुरा में. भी बड़े सुंदरसंदर दर्शन है। लोग ज्यादा. जाते नहीं है।.
ये भी एक बात रहस्य की बता दूं। जैसे. विश्राम घाट. जैसे द्वारिकाधीश द्वारिकाधीश का मंदिर है. मथुरा में बड़ा अद्भुत। उसके बाद में. कृष्ण जन्मभूमि तो प्रसिद्ध है ही है। वही. सबको ज्यादातर पता है। उस कृष्ण जन्मभूमि. के पीछे एक और मंदिर है आदि केशव। बड़ा. बहुत पुराना. कहते कृष्ण जन्मभूमि में पहले वही मंदिर. होता था। एक बात मैं बताऊं यह बात तो. जानकर सबको आश्चर्य हो जाएगा। एक तो कंस. किला भी है वहां। कंस का भी किले का एक.
हिस्सा बचा है। यमुना जी का घाट है। एक. स्थान है। जब भी आप पूजा करते हो किसी. मंदिर में जाओ। तो पंडित जी आपके हाथ में. संकल्प कराते हैं। उसमें संकल्प में जो. मंत्र बोलते हैं उसमें एक शब्द आता है. श्वेत वाराह कल्पे वस्वत मनवंतरे ये. मनवंतर कौन सा है? और ये कल्प कौन सा है? तो जो श्वेत वाराह कल्प है सफेद रंग के. वाराह उसका मंदिर मथुरा में है। शत्रुघ्न.
जी के द्वारा स्थापित है। शत्रुघ्न जी इस. क्षेत्र में आए थे उस समय लड़ने के लिए।. तो राम जी के यहां वाराह भगवान का विग्रह. था। वो लेकर आए थे। तो वृंदावन की तो. चर्चा सबको मालूम है। जैसे आपने मथुरा. वृंदावन बोला तो मैंने कहा ये बात चूकनी. नहीं चाहिए हमें। मथुरा में आदि वाराह और. श्वेत वाराह यह दो स्थान है और जैसे. वृंदावन की परिक्रमा लगती है ऐसे मथुरा की. भी परिक्रमा लगती है और एक दिन वर्ष में. एकादशी आती है उस दिन तो दोनों की मथुरा. वृंदावन की लोग परिक्रमा लगाते हैं और.
विश्राम घाट जहां श्री कृष्ण सबसे पहली. बार जाकर विश्राम करते हैं। ये मथुरा के. कुछ प्रमुख स्थान है। ऐसे अब वृंदावन हम. चले आते हैं। वृंदावन में ज्यादातर लोग एक. दो मंदिरों पर चले जाते हैं और धीरे-धीरे. अब नए-नए मंदिर बनते जा रहे हैं। पहली बात. तो एक आपसे बड़ी दूसरी कहूं जो कई लोगों. को पता भी है। कई लोग उसको हो सकता है कि. लेफ्ट राइट भी ले। वृंदावन जो है वह. वृंदावन की परिक्रमा के भीतर है।.
पंचकोसीय वृंदावन की परिक्रमा है। जो जाने. वाले व्यक्ति हैं वो भी ध्यान दें। ये. जितना डेवलपमेंट है ना ये सब बाहर हो रहा. है। टेक्निकली ये वृंदावन में है ही नहीं।. वो तो दूसरे गांव हैं। जैसे अब दिल्ली का. कितना भी दायरा बढ़ता चला जाए। गुड़गांव. का कितना भी दायरा बढ़ता चला जाए।. छोटे-छोटे गांव के नाम लिख रहे हैं ना बीच. में। चाहे कह दो सबको गुरुग्रामी। अब कहने. को तो कोई एक जमाना ये आ जाएगा कि वृंदावन. दिल्ली तक पहुंच जाएगा या दिल्ली वृंदावन. तक पहुंच जाएगा पहुंच ही रहा है। पर. शास्त्र की दृष्टि से पहले भी जो संत थे.
वो एक वृंदावन की परिक्रमा है। हम. पूरी एक परिक्रमा है। हम आप भी जब बाइक. में घूम रहे थे जब सब लोगों ने देखा आपका. भी वो स्वीट पार्ट देखा और मेरा भी मुझे. अच्छा लगा। वो बाइक में भी हम उस परिक्रमा. मार्ग में गए थे। जो लोग पैदल जहां. परिक्रमा देते हैं। टेक्निकली उस परिक्रमा. के भीतर का हिस्सा ही वृंदावन है।. फिर तो उन गांव के नाम भी अलग हैं कि यह. पानी गांव है, यह टहरा गांव है। जहां से. लोग मुड़ते हैं छटी करा तो वह गांव ही.
दूसरा है। ये सब अलग-अलग गांव हैं जहां. अलग-अलग लीला है। पर वृंदावन वो जगह है. जहां श्री कृष्ण ने अपनी मुख्य रास लीला. की थी। वो पांच कोस के भीतर आती है। उस. पांच कोस के भीतर जो मंदिर हैं. उनको हमारे यहां सप्त देवालय कहा जाता है।. तो आपके पास पूरा समय तो गोविंद देव. गोपीनाथ मदन मोहन श्याम सुंदर गोकुलानंद. श्री दामोदर जी और श्री राधा रमण जी फिर. इसके साथ-साथ श्री राधावल्लभ जी, श्री.
बांके बिहारी जी और श्री जुगल बिहारी जी. ये तो प्रमुख वृंदावन के मंदिर हो गए।. इसके बाद में सेवा कुंज और निधिवन जी ये. दो वन अभी दर्शनीय है। ऐसे तो 12 वन है. ब्रज के पर ये दो वनों का दर्शन करें।. उसके बाद में केशी घाट में जाकर जमुना जी. को प्रणाम कर लें। मुख्य मुख्य्य तो यह. स्थान ही है। इसके साथ-साथ मैं कहूंगा. भागवत निवास जैसी जगह एक टटिया स्थान जैसी. जगह जहां संत विराज थे। इस प्रकार से कुछ. बड़े प्रमुख प्रमुख छोटी-छोटी कुंजे हैं. संतों की जहां पुराने पुराने सब महात्मा.
रहा करते थे। बड़े श्रेष्ठ धुरिया वाली. कुंज है। नैनानंद जो महाराज है। वन महाराज. विराजते थे। यह संतों के छोटे-छोटे स्थान. है। और समय हो तो इतना भी सब डिटेल में. नहीं जाना हो और मिनिमम करना हो तो मेरा. आपसे निवेदन है कि कम से कम जाकर सबसे. पहले वृंदावन में जाकर उसकी रज को प्रणाम. कीजिए। यह पद्धति है। रज को प्रणाम कीजिए।. गैया को प्रणाम कीजिए। एक पेड़ को प्रणाम. कीजिए। क्योंकि वृंदावन के वृक्ष को मर्म.
न जाने को और डाल डाल और पात पात पर. राधे-राधे होए। उसके यमुना जी को प्रणाम. कीजिए। ये चार चीज करने के पश्चात आप श्री. राधा रमण जी, बांके बिहारी और राधावल्लभ. जी ये तीन भी अगर आप कर ले कम समय हो तो. भी पर्याप्त है। और इनमें से भी एक करना. हो और मुझसे पूछोगे तो मैं तो अपने वाले. के पास ही ले जाऊंगा।. अच्छा आपने निधिवन का जिक्र किया क्योंकि. आपका जो पुराना घर है वो निधि आपको दिखाया. था. के बिल्कुल ठीक सामने है और हम रात को.
वहां गए थे और निधिवन जब कभी हम जाते हैं. तो बड़ी कहानियां आती है। अब धर्म विज्ञान. इन दोनों में बड़ी बहस भी होती रहती है।. निरंतर बहस होती है। आजकल के लोग जो है वो. कई बार सवाल उठाते हैं। निधिवन को लेकर जो. किस्सा सुनाया जाता है क्योंकि आप. ऑक्सफोर्ड ही पड़े हैं और आप वृंदावन मूल. वृंदावन असली वृंदावन में जन्मे भी हैं तो. आपसे बेहतर आदमी कोई है नहीं जो मुझे इस. बारे में बता सकता है। निधिवन की जो कहानी. है वो उतनी सत्य जितना हम सुनते हैं।.
देखिए. हम इन आंखों से सब कुछ नहीं देख सकते।. हम सही बात है आपसे। सही बात है। तो. विज्ञान को भी चीजें प्रमाणित करने के लिए. हम. यंत्र बनाने पड़ते हैं। श्री कृष्ण सामने. बैठे थे अर्जुन के पर अर्जुन नहीं देख पा. रहा था। तो कृष्ण ने एक शब्द कहा कि मैं. तुझे दिव्य चक्षु देता हूं। उससे देख. अगर इन आंखों से देखोगे तो कुछ नहीं. दिखेगा। फिर तो मैं भी आपसे कहूंगा कि कुछ. नहीं है। ये तो नजरिए की बात है भाई। ठीक.
है? वृक्ष है, सुंदर वन है और बड़ी अच्छा. किया जो यह कह दिया। इसलिए एटलीस्ट वो. एरिया प्रोटेक्टेड तो हो गया। नहीं तो. वहां के पेड़ भी कट जाते थे कप के।. ये भाव जोड़ दिया।. ये भी सत्य बात है।. देखिए वैज्ञानिक बात आप पूछ रहे हो ना तो. सोशियोलॉजिकल सोसाइटी की बात मैं आपसे कह. रहा हूं। जब किसी वस्तु में श्रद्धा जोड़. दो तो सुरक्षित हो जाती है।. हां मतलब वहां फिर आप लॉजिक नहीं लगाते।. नहीं लगाते। नहीं पेड़ काट देते। काट दिए।. वृंदावन था तो वन के नाम में तो कंक्रीट.
वन होता जा रहा है। पर एटलीस्ट यह दो-तीन. जगह जब यह भाव जोड़ दी कि ये पेड़ कृष्ण. हो जाते हैं, गोपियां हो जाते हैं तो. लोगों ने उसको प्रोटेक्ट किया इस भावना. से, इस श्रद्धा से चाहे कितना भी. डेवलपमेंट हो जाए ये पेड़ नहीं काटेंगे हम. क्योंकि इसमें राधा रानी है, कृष्ण है। तो. एक आप वैज्ञानिक तर्क मैं आपके सामने. रखूं। तो ये दोनों तीनों चीज सोसाइटी को. हैंडल करना कितना आसान हो गया कि पेड़. सुरक्षित हो गए। पुराने वृक्ष जो वृंदावन. के पुरानेतम वृक्ष थे इतने वर्षों से उनका.
संरक्षण हो गया। दूसरी बात यह कह दी कि भ. रात में नहीं जानो अंधे हो जाओगे। इससे. बड़ी सिक्योरिटी और की जा सकती है किसी भी. जगह की। नहीं तो रात में बैठा आदमी वहां. क्या-क्या करेगा? आज रात के समय पार्कों. में क्या-क्या दुराचार लोग कर रहे हैं।. दिल्ली में, नोएडा में क्या-क्या नहीं हो. रहा। श्रद्धा और भय के साथ में भय बिनु. होए ना प्रीति। तुलसीदास जी ने लिखा है. उससे उस जगह का मेंटेनेंस होती है। यह बात. बिल्कुल सही है। ये तो रही इन बेचारी छोटी.
सी आंखों की बातें।. हम. अब अगर दूर की विषय को देखना है तो. टेलिस्कोप चाहिए।. हम. और पास की चीज को देखना है तो. माइक्रोस्कोप चाहिए। वृंदावन के किसी रसिक. वैष्णव संत के पास बैठकर आप प्रेमोस्कोप. ले आइए। यह दिव्य चक्षु ले आइए। वह नजर ले. आइए जिससे देखा जाता है वृंदावन को। तब. वृंदावन फिर वैसा नहीं दिखेगा जैसा हम देख. रहे हैं। यह कमरा हमारी आंखों से अलग दिख.
रहा है। इस कैमरे में अलग दिख रहा है।. स्क्रीन्स पे अलग दिखेगा।. अभी यहां कोई एक तीसरा यंत्र लगा दीजिए तो. कुछ और ही दिखेगा। वो दिखाएगा कि यहां. कितने. बैक्टीरिया वायरस घूम रहे हैं। ये भी दिखा. सकता है कौन सी फ्रेगरेंस है। ये तो. लेंसेस है ना अलग-अलग। ऐसे अगर आप असली. लेंस से देखेंगे तो वृंदावन पूरा ही कृष्ण. में दिखेगा। श्री निधिवन का मुख्य स्थान. जो है क्योंकि स्वामी हरिदास जी ने वहां. श्री बांके बिहारी जी का दर्शन किया। उनकी.
नजर से देखोगे जैसे कृष्ण ने अर्जुन को दी. तो वहां का एक एक वृक्ष गोपियां है जो. रात्रि होते ही दिव्य भाव से रास करती है।. उसके लिए उन आंखों की दृष्टि चाहिए। जैसी. दृष्टि होगी वैसी सृष्टि आपके सामने होगी।. इस रूम में हम साउंड स्पेशलिस्ट को लाएंगे. तो वो देखेगा कि यहां साउंड सिस्टम कैसा. चलेगा। ये इंटीरियर डिजाइनर को लाओगे तो. कहेगा कि ये इंटीरियर कैसा है? वास्तु. वाले को ले आओगे तो कहेगा ये दिशा आपके. बैठने की ये ठीक नहीं है। ये ठीक है। लाइट. स्पेसलेस को ले आओगे तो अलग बात कहेगा।.
कैमरा स्पेसलेस को ले आओगे तो अलग बात. कहेगा। एनर्जी स्पेसलेस को ले आओगे तो. कहेगा कहां आप हो? अभी मेरे से बात हुई तो. किसी ने मुझे कहा कि बेसमेंट है। मैंने. कहा नहीं उपलब्धि तो तभी होती है जब आदमी. कुछ नीचे होता है। कुछ ऊपर होता है।. ये ऐसा स्थान बन जाता है जहां कुछ नीचे. कुछ ऊपर है। इसलिए जमीन से भी जुड़ा रहता. है और आसमान को भी देखता रहता है। ऊपर ही. व्यक्ति चला जाता है फिर आसमान ही आसमान. देखता है। नीचे नीचे रहता है तो जमीन ही. जमीन दिखती है। मेरा तो अपना दार्शनिक.
व्यू है। हर व्यक्ति का अपना-अपना नजरिया. है। अपनी-अपनी सोच है। ऐसे ही वृंदावन को. अगर प्रेमी भक्ति की दृष्टि से देखोगे तो. वो निधिवन कृष्ण और राधा रानी है। आज. प्रैक्टिकल बात तो मैं आपसे यही कहूंगा।. गनीमत है कि हमारे बड़े लोगों ने यह बात. कह दी। नहीं तो वह पेड़ भी नहीं बचने थे।. वहां भी कोई फ्लैट बना के और डुप्लेक्स. बना के इस जमाने में 2020 करोड़ के बेच. रहा होता है। वैसे ये अच्छी चीज है कि इस. विज्ञान और धर्म को जोड़ा गया। कई सारे. विषय जब मैं देखता हूं जैसे बिल्ली को मत.
मारो।. सोने की बिल्ली दान करनी होगी।. बृहस्पतिवार को बाल धोने से नुकसान होता. है। कई सारी चीजें जोड़ दी गई जो मुझे. लगता है अलग-अलग कैंपेन का हिस्सा थी। कोई. सेफ वाटर का हिस्सा थी, कोई सेफ बिल्ली का. हिस्सा हो गई या अलग-अलग कि बिल्ली रास्ता. काट रही है तो रुक जाओ। हां। ये आपको लगता. है कि ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सारी. चीजें हैं? हां ये ये मनोविज्ञान है। एक. शब्द है ना मनोविज्ञान।. मन को संचालित करने के लिए डराया जाता है. ना। कई बार डराया जाता है, उत्साहा जाता.
है, खड़ा किया जाता है। एक मैंने प्रयोग. सुना था। नाम तो मैं उसका भूल गया।. इंग्लिश टर्म का प्रयोग था।. एक व्यक्ति व्हीलचेयर पर था। आलसी था।. शरीर में ऊर्जा कम थी। इस कारण से पिछले 5. साल से चलता ही नहीं था। उसको एक मूवी. दिखाई गई कि सांप काटता है तो क्या होता. है? सांप काटता है तो क्या होता है? तो. प्रयोग करने के लिए उन लोगों ने क्या किया. कि जिस कमरे में वो बैठा था। सपेरे को. बुला के बिना विषला एक सांप छोड़ा और. हल्ला मचाया। सांप आए भाग। 15 दिन उसको.
मूवी दिखाते रहे। उसके दिमाग में तो बैठी. थी। जब सांप काटता है तो क्या होता वो उठ. के खड़ा हो के भागने लगा। 5 साल बाद. दौड़ा। हालांकि उसके बाद उसको दवाई दी, ट्रीटमेंट किया तब जाके ठीक हुआ। एक. मनोवैज्ञानिक प्रोसेस था ना भय। भय ने. उसको जागृत किया। अनुशासन ने उसको जागृत. किया। चीजों ने उसको जागृत किया। आज रेड. लाइट से चालान कटता है। इससे मैनेजमेंट. क्रिएट किया जाता है। ऐसे कई बार. मनोवैज्ञानिक तरीके से स्थापित की गई इन. चीजों के द्वारा वस्तुओं का संरक्षण किया.
गया। हमारे यहां हर वस्तु में भगवान को. देखा गया। यही सनातन धर्म है। किसी को. नहीं छोड़ा। शेर का दर्शन करो तो नरसिंह. और देवी का दर्शन हो जाता है। सुकर का. दर्शन करो तो वराह का स्मरण हो आता है।. कितनी अद्भुत वो मूवी बनी थी वराह के ऊपर।. कितनी हर एक एक वस्तु में हमने परमात्मा. का छिपकली तक में कुबेर का कई लोग स्मरण. करते हैं। कैसी स्थिति. तो हर चीज को बड़ी विधिवत रूप से स्थापित. किया गया। यह भी एक प्रोसेस है। आज हम जिस.
शब्द को विज्ञान कह रहे हैं, हमारी को यह. भी जानना पड़ेगा मिश्रवर्य कि विज्ञान. क्या है? ये भी तो जानना जरूरी है। क्या यंत्र. विज्ञान है? क्या लैबोरेटरी विज्ञान है? क्या एक इंग्लिश टर्म विज्ञान है? कई बार किसी चीज का इंग्लिश टर्म होता है. तो हमको लगता है साइंटिफिक है।. लॉजिकल होना और साइंटिफिक होने में भी. डिफरेंस है।. हम.
कई बार कई चीजें लॉजिकल लगती हैं। कई बार. कई चीजें साइंटिफिक लगती हैं।. ज्ञान पाने के दो तरीके होते हैं। एक. पद्धति होती है मकड़ी की और एक पद्धति. होती है मधुमक्खी की।. मधुमक्खी सब जगह से रस छीनती है और एक जगह. इकट्ठा कर लेती है। तो आज की जो साइंस है. वह रेफरेंसेस को इकट्ठा करती है और. डेफिनेशन को क्रिएट करती है।. यह ऐसा हुआ था। हवा बदली थी इसलिए उड़ गया.
या क्योंकि CO2 छोड़ते हैं रात में। पेड़. इसलिए कह देते हैं। पेड़ के नीचे ना सुनो. भूत है। बिल्ली का मतलब यह है कि वहां कोई. ना कोई जंगली जानवर हो सकता है। इसलिए ऐसा. किया गया। बहुत सारी चीजें हैं।. यह तो रेफरेंसेस के साथ मधुमक्खी ने शहद. बनाया।. दूसरा है मकड़ी। मकड़ी बाहर से रेफरेंस. नहीं लेती। अपने अंदर से जाला पैदा करती. है। उस पर चलती है उसे खा लेती है। तो. विज्ञान का मतलब क्या है? रेफरेंसेस को.
इकट्ठा करके डेफिनेशन क्रिएट करना। और. ज्ञान का अर्थ क्या है? रियलाइजेशन को. सामने व्यक्त करना और उसके ऊपर चलना।. सुंदर. मकड़ी और मधुमक्खी की तरह दो रास्ते दोनों. पहुंचते एक ही जगह समस्या कुछ नहीं है।. विज्ञान भी अल्टीमेटली ढूंढ तो ये रहा है. कि चला कौन रहा है।. धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे चाहे. किसी चीज को गॉड पार्टिकल का नाम दे दे वो. तो जस्ट केवल एक नाउन है। ढूंढ तो वो भी. ये रहा है कि कौन चला रहा है? ये सिस्टम.
क्या है जो मैकेनिज्म चल रहा है।. किस आप क्षमा को कैसे देखते हैं आप? क्षमा. हां क्षमा किन-किन अपराधों में हो सकती. है? क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल. हो। उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल. हो। क्षमा करने का भी अधिकार सबको नहीं. है। मतलब कौन क्षमा करे? सबल को क्षमा. शोभा देती है। बेचारे सांप के दांत ही.
नहीं है। जहरी नहीं है। वो कह मैं तुझे. काटने आ रहा हूं तो काट ले। क्या बिगाड़. लेगा? क्षमा सबल को शोभा देती है। कई बार क्षमा. हमारी दुर्बलता नहीं बननी चाहिए।. हम अपनी वीकनेस को फॉरगिवनेस तो नहीं बना. रहे। ये विचारशील बात है। हमारी स्ट्रेंथ. फॉरगिवनेस होनी चाहिए। आई कैन डू इट बट आई. एम नॉट डूइंग इट। बिकॉज़ आई एम फॉरगिविंग. यू। आई कैन नॉट डू इट। दैट्स व्हाई आई एम.
फॉरगिविंग यू।. यह कोई स्थिति नहीं है। तो जीवन में पतन. है। आपको काम करना चाहिए क्योंकि आप क्षमा. के अलावा कुछ कर ही नहीं सकते।. आपको क्षमा ही करना पड़ेगा। आपके पास दम. ही नहीं है लड़ने की। इसलिए सबल को क्षमा. शोभा देती है। जीवन में प्रत्येक व्यक्ति. क्षम्य है। पर मुझे ऐसा लगता है जो इस देश. का बुरा चाहे वो कभी क्षम्य नहीं है। जो. कभी स्त्री के ऊपर अत्याचार करे वो कभी. क्षम्य नहीं है। राम जी ने छोड़ा नहीं.
रावण को। चाहे कुछ हो जाए वह कभी क्षम्य. नहीं है।. किसी के अधिकार को कोई छीनने के लिए सब. कुछ कर ले। कहीं भी कहीं भी आप देखो. द्रोपदी जब तक इनवॉल्व नहीं हुई थी तब तक. महाभारत कूल डाउन थी। श्री कृष्ण यह बात. तो सहन ही नहीं करते। राम ने सहन ही नहीं. करी। भाई सब ठीक है। मेरा तेरा मामला था. लड़ लेता। पर यह मेरी पत्नी कहां से ले. आया? द्रोपदी को भरी सभा में अब श्री.
कृष्ण बोले अब तो फिर युद्ध के मैदान में. तांडव मचेगा ही। स्त्री के ऊपर किया गया. अत्याचार जो करे वह कभी क्षम्य नहीं है।. इस राष्ट्र के अहित के विषय में जो कोई. विचार करे वो किसी भी हद तक कभी क्षम्य. नहीं है। और मैं इसमें कुछ चीजें अपने. अनुभव से जोड़ रहा हूं। गैया के ऊपर और. मैया के ऊपर जो अत्याचार करे वो भी कभी. क्षम्य नहीं होगा। और मैया के ऊपर जो. टिप्पणी करे वो कहा जब टिप्पणी अत्याचार. में ही आती है। टिप्पणी टिप्पणी अत्याचार.
में ही आती है। कभी क्षम्य नहीं हो सकता।. हां. मैया पर अत्याचार करने वाला कभी क्षम्य. नहीं हो सकता। हां हां हां मैं जोड़ रहा. हूं बार-बार। मुझे पता है आप कहां तक जा. रहे हो।. मुझे पता है. दो चीजें होती है।. जी एक होता है. स्वभाव।. एक होता है प्रभाव।.
ये शास्त्र का विचार है। एक होता है. स्वभाव। कि मेरा स्वभाव है कि मैं गलती. करूंगा।. एक होता है सामने खड़ी हुई संगति के कारण. व्यक्ति के ऊपर पड़ा हुआ प्रभाव।. इन दोनों विषयों में अंतर है। प्रभाव से. तो बहुत सारे लोग बहुत कुछ कर सकते हैं।. भागवत में प्रसंग आकर खड़ा हुआ। परीक्षित. ने जब भागवत कहां से शुरू होती है? परीक्षित ने गला मृत सर्प डाल दिया ऋषि के.
गले में श्रमिक के। उसका पुत्र उठा. श्रृंगी और लेकर श्राप दे दिया। सात दिन. बाद सर्पों के राजा तक्षक के दर्शन से. मृत्यु हो जाए।. तो कहते श्रमिक ने अपने पुत्र का शासन. किया कि बेटा लगता है कलयुग का प्रभाव. तुम्हारे ऊपर भी आ गया है। इतने ज्यादा. क्रोधित हो गए। तुमने को पता किया तुमने. कि एक भूल की किसने थी? परीक्षित ने की।. अब तुम्हें यह पता है कि क्या वो ये कार्य. कर सकता है?
उसके ऊपर कलयुग के प्रभाव ने उससे यह. कार्य कराया। सेम परिस्थिति खड़ी हुई जब. भरत जी आ रहे थे चित्रकूट। लक्ष्मण जी चढ़. गए पेड़ के ऊपर। भैया ले जाओ छोडूंगा नहीं. इसको मैं। लगता है मां बेटे को अभी भी. फुर्सत नहीं मिली। अब हमें जंगल में मारने. आ गए क्योंकि सेना लेकर आए थे। डिम घोष हो. रही थी। निषाद को भी यही संदेह हुआ।. जहांजहां भरत जी गए सबको यही संदेह हो रहा. था कि ये मारने जा रहे हैं। तो राम जी ने. यही बात लक्ष्मण को कही।. तुम्हारे सामने पिक्चर तो यही क्रिएट हो. रही होगी कि यह मुझसे लड़ने आ रहा है। पर.
तुम जानते नहीं हो क्या भरत कौन है? प्रभाव से किया जाने वाला कार्य एक अलग. विषय है। स्वभाव से किया जाने वाला कार्य. अक्षम्य है। हर स्थिति में अक्षम्य है। हर. स्थिति में अशम्य है। कई बार ग्वाले को भी. दूध काढ़ने के लिए पांव तो बांधना पड़ता. है।. हालांकि वो भी अत्याचार है। गैया एकदम. हाकने पर आ जाए तो उसको भी चारा खिलाने के.
लिए बंधन तो करना पड़ता है। हम. वह भी अनुचित जैसा ही है। वो उसका अनुशासन. है। फिर भी मैं आपसे यह बात कह रहा हूं कि. ये कुछ बिंदुएं ऐसे हैं जो सदा के ऊपर. प्रभाव पड़ जाए तो उनको कभी कहीं ना कहीं. वो ऊपर ऊपर से क्षमा हो जाए। पर वो चोट तो. बनी रहेगी। वो चोट तो बनी ही रहेगी। कितना. भी हो जाए. कितना भी हो जाए.
जिसने गैया पर अत्याचार किया हो, मैया पर. अत्याचार किया हो, राष्ट्र पर अत्याचार. किया हो, स्त्री पर अत्याचार किया हो, 50ों क्षमा भी मांग ली कि मैं प्रभाव में. आ गया। पर वो वो ब्लैक डॉट तो उसके जीवन. में सदा रहने ही वाला और उसको उस पश्चाताप. के साथ जीवन जीना चाहिए और सावधान रहना. चाहिए। चलिए हमने घर पर आके एक बात की थी. दया को लेकर। आपने कहा दया भी सात प्रकार. की होती है।. मुझे याद आ गया। मैं सोचता रहा दो दिन तक. क्या चर्चा थी वो।.
इसमें आपने बताया कि एक दया जैसे चींटी को. देखकर आती है।. हां. कद को देखकर, साइज को देखकर कितने प्रकार. की दया होती है? दया बहुत मैं एक बात कहूंगा कि कभी-कभी. सामने की सामने व्यक्ति की अयोग्यता. उसकी अयोग्यता है।. जैसे. चींटी जैसे मैंने आपसे विषय छेड़ा कि. चींटी अरे ये तो बड़ी छोटी है। वो नहीं. ठीक है। उसका कद छोटा.
पर जब चुपचाप भीतर कुर्ते में घुस जाती है. ना कभी. तो वो बताती कि मेरे एक छोटा कद भगवान ने. हर व्यक्ति को एक सफलता और एक दुर्बलता दी. है। हर व्यक्ति को मनुष्य के पास भी सफलता. और दुर्बलता है। चींटी के पास भी सब हाथी. के पास भी इतना बड़ा शरीर है पर नाक का. छेद इतना छोटा है कि चींटी मार सकती है।. तुरंत काट दे हाथी मर जाएगा। सिंह के पास. भी सफलता दुर्बलता है। हर व्यक्ति के पास. सफलता और दुर्बलता है। तो मेरे मैं आपसे.
वो कई बातों की एक सार बात निवेदन कर दूं।. दुर्बलता दया की बात नहीं हो सकती। हम. किसी व्यक्ति में सबलता हो पर. परिस्थितियों से. वो अपनी सबलता पर खड़े नहीं हो पा रहा। हम. अपनी सफलता को प्रमाणित नहीं कर पा रहा।. वो व्यक्ति दयावान दया का पात्र हो सकता. है। है तो उसमें योग्यता पर उसके सामने. परिस्थिति ऐसी खड़ी हो गई है कि वो अपनी. योग्यता पर चल नहीं पा रहा है। वह व्यक्ति.
दया का पात्र हो सकता है। एक एक दया होती. है. दूसरे के गुण को देखकर एक दया होती है. दूसरे की दुर्बलता को देखकर एक दया होती. है दूसरे की परिस्थिति को देखकर अरे यार. कितना कैपेबल है पर कहां पड़ा हुआ है. दूसरे की परिस्थिति को देखकर एक दया होती. है वो होती है आलस्य को देखकर. कि यह.
स्थिति पर भी ऊंचा है और योग्य भी पूरा है. फिर भी कुछ नहीं कर रहा. फिर भी कुछ नहीं कर रहा है। यह भी एक द और. उस समय जो मन में झुझुलाहटपन होता है हर. परिस्थिति में कहीं ना कहीं ये खड़ी है।. वो झुंझलाहटपन जो होता है वो कई बार या तो. उस व्यक्ति से दूर कर देता है या उस. व्यक्ति से कुछ ना कुछ कह के उसे जागृत कर. देता है।. कुछ सवाल हमने रखे थे जो छोटे-छोटे सवाल. हमारे पास आए थे। लोगों ने भेजे थे। जैसे.
एक सवाल था कि अ हिंदू धर्म के अनुसार. जीवन का उद्देश्य क्या है? और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष कैसे परिभाषित किया जाता है? ये चारों चीज ही हिंदू धर्म के अनुसार. जीवन का उद्देश्य है।. अगर आप एक पूरी लाइफ में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थों को पूर्ण कर रहे. हैं तो आपने एक सक्सेसफुल जीवन जिया है।. हम. जिसमें आप अगर बचपन में है, ब्रह्मचर्य. में हैं। इन चार के लिए चार आश्रम दिए गए।. ब्रह्मचर्य में तो आपके जीवन में धर्म. प्रधान होना चाहिए। फिर आप जब गृहस्थ में.
प्रवेश करते हैं तो धर्म के साथ अर्थ और. काम को भी जगह दीजिए। फिर आप वानप्रस्थ. में जब प्रवेश करते हैं तो काम को गौण. कीजिए। अर्थ को परमार्थ में लगाइए और धर्म. के साथ थोड़ी सी मोक्ष को जगह दीजिए। और. जब सन्यास में प्रवेश करते तो अर्थ, काम. और धर्म का भी परित्याग करके मोक्ष के लिए. प्रयास कीजिए। इस प्रकार अगर आपने पूरे. जीवन में इन चारों पुरुषार्थों को किया।. कुछ काम अर्थ के लिए, कुछ काम धर्म के. लिए, कुछ कार्य काम के लिए और कुछ कार्य. मोक्ष के लिए तो सनातन धर्म के अनुसार.
आपने एक सफल जीवन जी। ठीक है। हिंदू धर्म. में दुख और दर्द को कैसे समझाता है? ये. कर्म का हिस्सा होता है या ईश्वर की. योजना? जीवन में हमारा प्रारब्ध ही ईश्वर तो उस. सिस्टम को अप्लाई करता है। हमारे जीवन में. दुख के कारण दो ही होते हैं।. प्रारब्ध हमारे सामने परिस्थितियां लाता. है। पर हमारी सोच ही हमारी दुख के कारण. है। उस परिस्थिति को अगर हम कष्ट में देख. रहे हैं कि यार ये तो बड़ी प्रॉब्लम हो.
गई। मैं तो कितनी बार बोला हूं राम बन गए. तो बन गए। अब बैठा-बठा आदमी रोता रहता है. कि भाई बड़ी झंझट हो गई। अरे जंगल जाना. है। अरे क्या करना है? तो बड़ी मुश्किल हो. जाती।. इतने बड़े राजवंश में चाणक्य का अपमान. हुआ। उसने उसको अवसर ढूंढा। एक भेड़ चराने. वाले व्यक्ति को देश का राजा बना दिया।. तो हम. हमारे मूलत हमारी आशा और हमारे विचार में. दुख है। फिर इसके बाद प्रारब्ध हमारे जीवन.
में परिस्थिति लाता है। ईश्वर तो सदा हर. परिस्थिति में सहयोग का साधन।. प्रारब्ध की परिभाषा क्या है? ये शब्द कई. बार मेरे कानों में गुजरा। डेस्टिनी कई. लोग मानते हैं। कई प्रारब्ध क्या होता है? एक व्यक्ति ने एक तीर छोड़ा।. हम. वो लगा निशानी पर।. हम दूसरा छोड़ा वह हवा में है। अभी निशाने. पर लगा नहीं। तीसरा उसके धनुष पर है। और. चौथा.
उसके लगने के बाद घूम कर उसके तरकश में आ. रहा है। ठीक है? ये सिस्टम है। चढ़ा छोड़ा. हवा में लगा फिर लेकर वो अपने जा रहा है।. निकाल के रखता जा रहा है। फिर छोड़ रहा. है। चार प्रोसेस समझिएगा। एक कर्म वो है. जो अपनी तरफ से पूरा कर चुका है। मतलब. टारगेट हिट हो गया। दूसरा कर्म वो है जैसे. पडकास्ट अभी चल रहा है। इन द प्रोसेस है।. अभी पूरा भी नहीं हुआ इन द ईयर है। तीसरा.
वो कर्म जो इस समय कर रहा है। पडकास्ट चल. रहा है। और कर्म क्या है? कभी आपके धनुष. पर तीर जाता है। कभी मेरे जब आप प्रश्न. पूछते हैं तो आप परफेक्टली पूछें और जब. मैं उत्तर दे रहा हूं तो मैं परफेक्टली. दूं। हम. यह कर अब आता है तरकश।. तरकश में वह तीर घूम के आ रहा है। अब अगर. वह तीर ठीक से लगा है, टारगेट पे लगा है, तो ना तो उसकी एज टूटी है, ना वो. टेढ़ा-मेढ़ा हुआ है, बिल्कुल स्वस्थ है। तो. स्वस्थ तरकश में जाएगा, स्वस्थ धनुष पर.
चढ़ेगा और स्वस्थ छूट जाएगा। अब अगर वो. इधर-उधर लगा है, वो टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है, टारगेट पर नहीं लगा है, उसकी शार्पनेस. खराब हो गई है, एज टूट गया है, वो धनुष. टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है, तो वो टेढ़ा-मेढ़ा. पीछे आएगा और आपको टेढ़ा-मेढ़ा ही धनुष पर. चढ़ेगा और टेढ़ा-मेढ़ा ही छूटेगा। तो, तरकस. डेस्टिनी है।. वहां से जब टेढ़ा-मेढ़ा तीर आपके सामने आता. है, इसका मतलब आपकी लाइफ डिफरेंट सिचुएशन. से तैयार होती है। अब आपको टेढ़े-मेढ़े तीर. पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी टारगेट पे.
लगाने के लिए। और आपने ज्यादा मेहनत करके. टेढ़े-मेढ़े तीर पर टारगेट लगा दिया तो. न्यूज़ बुक खुल सकता है।. और और कई बार क्या होता है? बहुत सारे लोग. ऐसे भी हैं। तीर तो उनके पास बड़ा स्वस्थ. है। जन्म बड़े अच्छे घर में हुआ। व्यवस्था. बहुत अच्छी मिली है। सब कुछ सुख सुविधाएं. पर बेचारे निशाने ही नहीं लगा रहे। तीर. चूक रहे हैं उनके जीवन में से। यह जो तरकश. है किए गए कर्म का स्टोर हो रहा है और फिर.
सामने आ रहा है। यह आपके हाथ में नहीं यही. प्रारब्ध है। अगर टेढ़ामेढ़ा तीर आता है उसी. को दुख कहते हैं। सही आता है उसी को सुख. कहते हैं। उसको टेक्निक से छोड़ना ही. विवेकपूर्ण कर्म होता है। और ठीक टारगेट. पे लग जाए। यही सफलता होती है। नाइस।. हिंदू धर्म में दुख सहने और सीखने की. प्रक्रिया क्या है? दुखी तो वैसे हर आदमी. आजकल है। जिसके पास है वह भी दुखी है।. जिसके पास नहीं है वह भी दुखी है। वो भी.
रो रहा है। जो सब कुछ पा लिया है।. अरे कई तो इसलिए दुखी है कि दुखी नहीं है. कोई।. हां जिनके पास नहीं है उनको इस बात का दुख. है। हमारे पास कोई दुख नहीं है। दुखी नहीं. है। बड़े अच्छे हैं।. दुख दुख होता क्या है? चलो यही समझ लेते. हैं हम। आशा दुख होती है। उम्मीद आशा आशा. और उम्मीद अलग चीज है। उम्मीद तो जगाती. है।. आशा. हम. उम्मीद उम्मीद जो होती है ना वो अपने.
हिस्से पर होती है।. हम. मैं बेटर परफॉर्म करूं ये उम्मीद है।. सामने वाला मुझसे अच्छा बोले ये आशा है।. हम. दोनों चीजों में फर्क है। मैं अच्छा आंसर. दूंगा। यह मुझे मुझसे उम्मीद है। मैं अपनी. तरफ हूं पर आप मुझसे अच्छे से ही पूछेंगे. यह आशा है। इसमें गड़बड़ हो सकती है। अब. मैंने तो यह सोचा कि आज मिश्रा जी मुझसे. बहुत अच्छे आप तो पूछ ही रहे हैं। मेरी. आशा के अनुरूप ही चल रहा है। कई बार आप भी.
तो सरप्राइज कई लोगों को देते हैं।. कईयों को देने भी वाले हैं। कईयों को दिया. भी हुआ है।. तो सियासी विषयों पर हां. वही कह रहा हूं। सियासी विषयों पर ही वो. आपका इतिहास था। अब ये भी अब एक चीज मैं. कहूं। यह पानी मेरी प्यास बुझाएगा। इस जब. आपने पिया तो मुझे अनुभव हुआ। ये पानी. मेरी प्यास बुझाएगा। बिल्कुल सही। इतनी.
आशा मेरी उससे रखना ठीक है। अब अगर मैं. सोचूं पानी मुझे स्वाद भी देगा।. अब ये पानी मुझे विविध प्रकार की और अनुभव. भी देगा।. यह ओवर है। गड़बड़ हो जाएगी।. तो मूलभूत दुख का कारण हमारे जीवन में. खड़ी हुई आशा ही है।. आप परिस्थिति को नहीं बदल सकते। अपनी आशा. को चेंज कर सकते हो।. ठीक से काम बन जाएगा। दुख को अपने आप को.
तराशने का अवसर दीजिए। सोना. हम. जितना पकता है उतना बढ़िया आकार लेता है।. दुख जीवन में जगाता है।. इन महलों को वो बना पाए हैं जो कांटों से. रास्ते निकाल पाए हैं। इन महलों को वो बना. पाए हैं जो कांटों से रास्ते निकाल पाए. हैं। फूल धोखा है बस सुलाता है। रहमत तो. कांटे हैं जो जगाते हैं।.
तो जैसे कोई व्यक्ति पूजा पाठ करता हो, धार्मिक हो, स्पिरिचुअल हो, रिलीजियस हो, अलग-अलग में शब्द कोट कर रहा हूं तो वो इस. आशा इस उम्मीद से मुक्त हो आता है। वो. स्ट्रेस फ्री हो रहा है या यह जरूरी नहीं. है कि अगर आप धार्मिक है, रिलीजियस है, स्पिरिचुअल हैं तो आप शांत हैं। हर चीज की. एक प्रोसेस है।. जब वो इस स्टेज तक पहुंचता है, अपनी. उपासना की मैच्योरिटी तक पहुंचता है, तो. वो यह भी अचीव करता है।. ध्यान दीजिएगा। हम.
जब भी सुख मिलता है तो कामना की निवृत्ति. में ही सुख मिलता है।. हम. कामना की पूर्ति में नहीं। जैसे. मुझे. ये कप चाहिए।. हम. मुझे मिल गया। मिलते ही क्या हुआ? मुझे. अंदर ये जो चाह थी ये खत्म हुई। तभी मुझे. उसका सुख मिला।. मुझे कप मिल भी गया। पर मेरी अगर चाह बनी. हुई है तो मैं तो उसका सुख ही नहीं ले. पाऊंगा। तो जीव को सुख की प्राप्ति तो तभी. होती है जब उसकी कामना निवृत्त होती है।.
जब तक कामना खड़ी रहेगी तब तक वस्तु की. प्राप्ति नहीं हो सकती। तो पूजा पाठ. प्रोसेस में एक स्टेज ये आती है। ऐसे नहीं. कि आज ही पूजा शुरू की और कल ही आदमी. बैरागी बन जाएगा।. और जो कली बन रहा है तो आपको संदेह करना. चाहिए।. उसको भी करना चाहिए। अपने आपको एनालिसिस. और दूसरों को भी करना चाहिए। कहीं ऐसा तो. नहीं मसान वैराग्य जैसे श्मशान पर आप जाइए. बड़े से बड़े लोग कहेंगे अरे ये सब दुनिया. नाटक है ये तो सपना चल रहा है सब बर्बाद.
हो गया और बाद में जाते बढ़िया गजब आलू. पूरी खाते हैं सब ये तो मसान वैराग्य है।. उसकी एक प्रोसेस है। एक समय ऐसा आ जाता. है। फिर व्यक्ति यह अनुभव करता है कि अब. भगवान मेरे मुझे आपके सुख के अलावा क्या. चाहिए? मीरा चल पड़ी थी रजवाड़ों को. छोड़कर. जिसके पास कोई जरूरत नहीं थी उसको वो अगर. रानी बनकर के भी रहती तो उससे ज्यादा. प्रतिष्ठा कमाती और उसने वो सुख पा लिया.
उसको पता चल गया ये सब सुख तो होते हैं. मैं मांगने तो कुछ और गया था. हम. भागवत में कथा आती है ध्रुव की. हम. पिता से अपमानित हुआ तो तपस्या करने क्या. किया कि मेरा अपमान हुआ है मैं तो पिता की. गोदी में बैठना चाह रहा था और जो मेरी. सौतेली मां थी उसने समझ लिया कि मैं. सिंहासन पर बैठना चाह रहा हूं और बड़ी जोर. से फटकार दिया। तो ध्रुव जंगल में तपस्या. करने गया। बड़ी घोर तपस्या करी। नारद जी. ने उस पर उसको आशीर्वाद दिया। भगवान प्रकट.
हो गए। अब आश्चर्य की बात यह है मिश्रवर. जब भगवान सामने प्रकट हुए तो एक ही क्षण. में उसे अनुभव हुआ कि मैं मांगने तो आया. था राज्य पर इन्हें देखकर जो मुझे आनंद. मिल रहा है ऐसे हजारों राज्य इन पर. न्योछावर हो सकते हैं। तो भागवत का श्लोक. है वो कहता है भक्ति मोह प्रभता मांगने तो. बैठा तो था कामना से पर अब कहता है कि. भगवान मुझे ऐसी कृपा करो कि आपकी भक्ति. मिले आप संग रहो आपकी प्राप्ति हो सब चौक.
गए तो ये करने बैठा था इसलिए उनको भक्तों. की श्रेणी में इतना ऊपर दिया गया तो पूजा. पाठ प्रोसेस इसमें एक स्थिति ये आ जाती है. कि व्यक्ति सब कामनाओं से ऊपर उठ जाता है. भक्ति और पूजा पाठ में अंतर क्या होता है. पूजा प्रोसेस प्रोसेस है। भक्ति इमोशन है।. जैसे कई बार शादी में भूख नहीं होती।. फॉर्मेलिटी में खाना पड़ता है।. तो ऐसा हो सकता है कि पूजा पाठ करने वाला. व्यक्ति भक्त ना हो।. हो सकता है।. दिन भर बैठ के पाठ कर रहा है लेकिन वो. भक्त नहीं है।.
हां हो सकता है उस उस नियम का अदति हो गया. हो। प्रोसेस का आदिति हो गया हो।. तो ऐसे में पुण्य मिलता है। मिलता तो है. ही। अब अब आप अब आप अह बिना किसी इमोशन के. जहर खा लो तो मरोगे तो सही।. और इमोशन के साथ खाओ तो भी मरेगा। अरे मैं. बहुत सैड हूं। मुझे छोड़ के चली गई। मेरी. संपत्ति लुट गई। ल जहर से तो भी मरेगा और. बिना इमोशन के खा लेगा तो भी मरेगा। दवाई. तो असर पूजा पात्रता तो देखिए कभी ना कभी.
उसको करते हुए अनुभव हो गया। जैसे कई बार. होता है शादी ब्याह में अपन गए। तो एक. फॉर्मेलिटी है ना बुके देना है फोटो. खिंचानी है फिर खाना है चाहे भूख हो चाहे. नहीं है हम तो पूजा एक प्रोसेस है एक. प्रोसेस है जिस हिसाब से हम उन टेक्निक के. द्वारा ईश्वर से कनेक्ट होते हैं एक. प्रोसेस है अब पेट तो आपका भरा था पर. फॉर्मेलिटी कहती है कि थोड़ा सा टेस्ट. करना चाहिए शादी ब्याह में जाओ एक. व्यवहारिक दुनिया में अब वो शादी ब्याह.
में खाने गया उसने एक चीज खाई पर उसको. बड़ी स्वादिष्ट लग गई भरे पेट में भी वो. तीन बोल गाजर का हलवा खा गया। इस समय तो. आम का सीजन है तो बढ़िया कोई मैंगो बर्फी. खा गया तो ऐसा हो सकता है। पूजा करते करते. करते कभी एक अनुभव ऐसा हो सकता है कि वाह. ये मुझे आनंद की अनुभूति हो गई और उसकी. भक्ति जुड़ जाए और ऐसा बहुतों के साथ हुआ. है जो केवल टेक्निकल काम करते आए थे और. उनकी इमोशनैलिटी जुड़ गई। तो पूजा प्रोसेस. है और भक्ति रिलेशन है। मैं तो यू कहूंगा.
बिना रिलेशन के इमोशन भी तो नहीं हो सकता।. हम. आप सड़क पर जा रहे हो। एक आदमी गिर जाए. आपका मन तो करेगा मैं हेल्प करूं पर चार. लोगों ने उसको उठा लिया आप पूछ भी लोगे. भैया ठीक आप अपने रास्ते चल दोगे और वो. सामने वाला व्यक्ति अगर आपका नोन है. रिलेशन है तो छह लोग आ भी जाए फिर भी आप. नहीं जा सकते तो डिवोशन का मतलब ही होता. है रिलेशन और जब डिवोशन में रिलेशन होता. है तो इमोशन भी होता है और तब भजन करने. में मोशन भी होता है और यह सब मिलाकर के.
डडीिकेशन भी होता है और फिर तो मैं यह. कहूंगा फिर साथ में आपके सामने साक्षात. ईश्वर खड़ा होता है। फिर यह प्रोसेस ही. मजा दे देती है। फिर तो फिर इस प्रोसेस. में इतना मजा आने लगता है कि व्यक्ति को. भगवान भी नहीं चाहिए। कहता भगवान आप आप. रहने दो। आपकी तड़पने में ज्यादा मजा आ. रहा है मुझे। आप आ गए तो तो मेरा मजा ही. खत्म हो गया। एक संत रहते थे ब्रज में गॉड. पाद।. संत कथा सुना। दिन में 10 बार श्री कृष्ण.
आ जाते थे। 10 बार राधा रानी आती थी। तो. अपनी कुटिया के बाहर एक बार बाउंड्री बना. रहे हैं। तो लोगों ने पूछा बाबा जी तू. बाउंड्री क्यों बना रहा है? ऐसी क्या बात. हो गई? तो बोले नहीं नहीं तो एक दिन राधा. रानी आई बाबा तू दुखी दिख रहा है। तो बाबा. बोला राधा रानी मैं यह प्रार्थना कर रहा. हूं कि मेरा भाग्योदय कब होगा? राधा रानी. तो चौक ही गई। दिन में 10 बार कृष्ण आ रहे. हैं। दिन में 10 बार मैं आ रहा हूं। और तू. किस भाग्योदय की प्रतीक्षा कर रहा है इसके. बाद? तो बाबा रोता हुआ कहता है कि जितनी.
देर कृष्ण आते हैं उतनी देर आपको उनका. इंतजार करना पड़ता है। जितनी देर वह आते. हैं आपको उनका इंतजार करना पड़ता। जितनी. देर आप आते हो उनको आपका इंतजार करना. पड़ता है। और मैं आप दोनों के लिए थोड़ी. तड़पने की कोशिश करता हूं उतनी देर में आप. दोनों खड़े हो जाते हो। तो मेरा तो भाग्य. उदय यही होगा कि ना तो आप आओ ना कृष्ण है।. और मैं खूब प्रेम से आपके विरह में रोता. हुआ आपको पुकारता रहूं। भक्ति तो यहां तक. ले जाती है जहां उनकी भी प्राप्ति नहीं. चाहिए।.
वह प्राप्त हो गए तो प्रवाह रुक जाएगा।. इसको तो जैसे यह तो ऐसी स्थिति है कि भूख. ही नहीं खत्म हो। ये तो वो स्थिति है कि. पेट ही ना भरे कभी।. और है भी स्थिति. हर रोज नया है। जब रामायण पढ़ो नई है। जब. कथा सुनो नई है।. अध्यात्म ऐसे ही तो है। दुनिया पुरानी. होती जाती है। भक्ति नई होती जाती है।.
जितने पुराने मंदिर में विग्रह होंगे उतने. आकर्षण भरता जाएगा। जितनी पुरानी डायरी. होगी नई पुराना ग्रंथ होगा श्रद्धा. बढ़ेगी। जितनी बार राधा रमण जी का दर्शन. करोगे नए। जितनी बार हम और आप में नहीं है. नए भाव हो जाएंगे। यह तो प्रवाह है। इसमें. बहते चले जाइए। यह तो लक्ष्य तक सुख नहीं. देता। प्रवाह में सुख प्रोसेस का आनंद है।. अद्भुत. श्रीमद् भगवत गीता और भगवत कथा।.
श्रीमद् भागवत।. भागवत ये बीच का एक चैप्टर इतना फेमस. क्यों हो गया जिससे किताबें बन गई? क्योंकि मैंने पढ़ा कहीं कि दो-दो किताबें. निकल आई।. कृष्ण जी की संपूर्ण लीलाओं से दो किताबें. ऐसी निकली जो ज्यादा वायरल हो गई। खासतौर. पर वो अर्जुन के साथ जो उनका संवाद रहा।. यह क्या वजह आपको लग सकती है? जीवन पद्धति. उसमें सीखने को मिला।. देखिए श्रीमद् भागवत सारे शास्त्र श्रीमद्. भगवत गीता ये ग्रंथ कृष्ण ने अर्जुन से. बातचीत करी। ज्ञान दिया कुरुक्षेत्र के. मैदान में।. छोटी 700 श्लोक जिसमें सब कुछ है।.
इसको शंकराचार्य जी ने पहली बार स्वतंत्र. किया। आपको एक बात जानकर आश्चर्य होगा।. कि गीता इंडिविजुअल बुक नहीं है। वो. महाभारत के चैप्टर्स है। हां शंकराचार्य. जी ने उसको अलग करके एक गीता नाम से. पुस्तक बनी या जैसे समझिए ना कि हम जैसे. सुंदरकांड अलग कर दें। हम. सुंदरकांड तो पूरी राम रामचरितमानस का. हिस्सा है। पर लोगों ने सुंदरकांड को अलग.
ही मान लिया। पर माना तो जाएगा मेन कहीं. ना। ऐसे गीता महाभारत का अंश है और उसमें. सारे जीवन का सार है और आनंद की बात यह है. कि बैटल फील्ड पर बातचीत हो रही है। तो. मानव भी तो हर समय युद्ध के स्तर पर ही. खड़ा हुआ है।. हम. युद्ध के स्तर पर ही खड़ा है। कुछ भी आपको. करना हो एक बैड इमोशन है। एक गुड इमोशन. है। एक डीमोटिवेशन है, एक मोटिवेशन है। एक. स्वार्थ है, एक परमार्थ है। एक सेल्फ.
बेनिफिट है, एक सबका बेनिफिट है। सत्य है, स्वार्थ है। यह दो पार्टीशंस ऑलवेज खड़े. रहेंगे। मैं अपना हित सोचूं, दूसरे का. सोचूं। अपनी जेब भरू, दूसरे की भरूं। तो. बीच में आदमी आता है कि यार कुछ मेरा भी. हित होना चाहिए, कुछ दूसरे का भी। ठीक है? मुझे मिलना चाहिए, दूसरे को भी मिलना।. इसलिए गीता बीच में बातचीत कर रही है।. बिल्कुल सेंटर में ले आए कृष्ण। ना उससे, में ना उस हिस्से में। तेरा भी हित होना. चाहिए, सबका भी हित होना चाहिए। सर्वे. भवंतु सुखिन सर्वे संत निरामया.
ठीक बीच में बात करी और 700 श्लोकों में. उपनिषद उपनिषद वेदों का एक हिस्सा है. जिसमें पूरी की पूरी नॉलेज वेदों के चार. हिस्से हैं अरण्यक ब्राह्मण ब्राह्मण एक. वेद के हिस्से को भी कहते हैं। हां केवल. जाति से उसका संबंध नहीं है। वेद के एक. हिस्से को ब्राह्मण कहते हैं। उसे जो. जानता उसको भी ब्राह्मण कहा जाता है।. ऐसे एक हिस्सा है अरण्यक ऐसे एक हिस्सा है.
उपनिषद उन उपनिषदों में पूरी फिलॉसफी है. उस फिलॉसफी का जूस गीता है दूसरा ग्रंथ. आपने कहा श्रीमद् भागवत श्रीमद् भागवत. कृष्ण कथा नहीं है उसका मेजर पार्ट कृष्ण. कथा है कृष्ण कथा तो महाभारत है महाभारत. में है कृष्ण हीरो जैसे रामायण में राम. हीरो है श्रीमद् भागवत का मेजर पार्ट. श्रीमद कृष्ण है और श्री कृष्ण फिर इतने. प्रिय है कि और सारे विषय गौण हो जाते हैं. और भागवत में नंद घर आनंद भय जय कन्हैया.
लाल की होता रहता है। पर श्रीमद् भागवत. संपूर्ण कृष्ण द्वैपायन व्यास जो मैं. वैदिक काल की आपको बात बता रहा था।. पौराणिक काल की बात बता रहा था। ऐसे समझिए. जैसे टेक्नोलॉजी की दुनिया में मिश्वरीय. पहले मैं कुछ गूगल करता था तो पांच हिस्से. मिलते थे। पिछले 20 साल में इतनी. इंफॉर्मेशन फीड हो गई कि मैं केवल मानो. मिश्रा ही डालूंगा। तो पहले मुझे मिलते 50. मिश्रा जो फेमस थे और अब मैं अगर मिश्रा.
डालता दो-ती वर्ष पहले तो मुझे मिलते 5. लाख लिंक उसमें बहुत सारे सब फेमस भी मिल. जाते। मैं केवल शुभांकर मिश्रा भी डालता. तो भी बहुत कुछ मिल सकता था। या पुंडरी. गोस्वामी डालता तो भी बहुत कुछ मिल सकता. था। तो नॉलेज जो है वो माइक्रो से मैक हुई. और फिर से अब जो एआई की दुनिया आई है जो. फिल्टर्ड चैट बॉक्स हमारे सामने तैयार हो. रहे हैं वो सारी इंफॉर्मेशन को गैदर करके. एक पैराग्राफ में सबका एसेंस दे रहे हैं।.
इससे और सिंपल मैं नहीं समझा सकता। ऐसे ही. पहले बीज था जो ओम प्रणव. इतनी सी इंफॉर्मेशन थी माइक्रो माइक्रो से. मै बना कि पुराण बन गए कि वेद बन गए कि. उपनिषद बन गए कि शास्त्र अब इतने बन गए कि. पूरा कमरा भर जाएगा हिंदू शास्त्रों का. याद नहीं होंगे नाम मुझे ही नहीं याद. होंगे मैं कितना भी पढ़ लूं और पूरे जीवन. भर पढ़ लूं कि सारे ग्रंथ है कौन से फिर.
कृष्णदया व्यास ने जब इतना विस्तार किया. तो उसने फिर माइक्रो की इंफॉर्मेशन और. सारी इंफॉर्मेशन को दोबारा से रिकलेक्ट. करके एक ग्रंथ का निर्माण किया जिसका नाम. पड़ा श्रीमद् भागवत उसमें सांख्य भी है, वेदांत भी है, वैशेषिक भी है, ज्ञान भी. है, विज्ञान भी है, ज्योतिष भी है, कर्मकांड भी है, फिलॉसफी भी है, ज्ञान भी. है, वैराग्य भी है, योग भी है, भक्ति भी. है। उसमें राम की कथा भी है। रामायण भी. आती है भागवत के नवम स्कंध में। नृसिंम.
भी, वारा भी, कुर् भी, हयग्रीव भी, मत्स. भी उसके भीतर फिर दशम स्कंध में कृष्ण कथा. भी आती है। उसमें दत्तात्रेय की कथा भी. आती है। उसमें उद्धव का प्रसंग भी आता है।. उसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध का भी वर्णन. आता है। उसमें मार्कंडेय की कथा भी आती. है। उसमें शिव सती के विवाह का भी वर्णन. है। शिव पार्वती के विवाह का भी वर्णन है।. उसमें नारद जी के पूर्व जन्म की कथा भी. है। उसमें ब्रह्मा जी की उत्पत्ति का भी. वर्णन है। उसमें कपिल का सांख्य योग भी. वर्णित है। उसमें प्रह्लाद और दत्तात्रेय. का संवाद भी वर्णित है। उसमें जनक और.
नवगेश्वर. जिन्होंने वेदांत पर चर्चा की है। उसका भी. वर्णन है। श्रीमद् भागवत सारे शास्त्रों. के सार के रूप में फिर से भागवत का इसीलिए. उसकी प्रसिद्धि हो गई कि श्रीमद् भागवत. सारी इंफॉर्मेशन सारा सार सारं सारं. समुद्रतम. और फिर पूरे विश्व में उसकी प्रसिद्धि हो. गई कि श्रीमद् भागवत सात दिन मात्र श्रवण. कर लेने से हमारे जीवन में उस परम ज्ञान. की प्राप्ति हो सकती है। पर ठीक से करो और.
कहने वाला भी ठीक से करें। लिख तो बोर्ड. देता है श्रीमद् भागवत और सात दिन में कथा. के अलावा सब कुछ होता है।. जनता भी फंसा ले रही है। कहने वाला भी. नहीं करना चाह रहा। अरे कम से कम सात दिन. में सुनाने वाले को 500 श्लोक तो सुनाने. चाहिए।. कहने वाले को याद तो होने चाहिए।. श्लोक ही उल्टा सीधा बोल रहे हैं। सामने. वाले पहले दो धाराएं स्वतंत्र थी। म्यूजिक.
एंड फिलॉसफी. सदा म्यूजिक के साथ मीरा के भजन चले पर. कथा के पैटर्न दो स्वतंत्र थे। भजन एक अलग. चीज होती थी। कथा एक अलग चीज होती थी। कई. बार मिक्स भी किया जाता था। दोनों की एक. अपनी-अपनी पद्धति थी।. हमको भी बीच-बीच में इस समय पुट देना पड़. रहा है। क्योंकि लोगों को ही समझ लो अगर. हम खाली कथा सुनाए तो लोग कहते हैं भागवत. नहीं सुना रहे। प्रवचन सुना रहे हैं तो. मैं तो उस पर खूब काम कर रहा हूं कि. थोड़ा-थोड़ा सुनाता भी हूं। कीर्तन हमारे. यहां बचपन से होता है। बाबा बोलते थे,
परवाह बोलते थे। पर उसके साथ-साथ जो मूल. कथा का विषय अगर वो ठीक से सुनाया जाए तो. असंभव है कि सात दिन में व्यक्ति को ज्ञान. की प्राप्ति ना हो जाए। ठीक से सुने और. ठीक से सुनाए तो परीक्षित साक्षी य. श्रवणगत मुक्ति कथने सात दिन में परीक्षित. ने भगवत प्राप्ति कर ली। अभी हमारी इंडियन. क्रिकेट टीम है। आजकल क्रिकेट का. टूर्नामेंट चल रहा है और बड़ा जबरदस्त चल. रहा है और सारी दुनिया खोई हुई है। उसमें. क्रिकेट का लुत्फ उठा रही है।.
बट एक चेंज जो मैंने बीते कुछ सालों में. देखा है वो यह है कि क्रिकेटर्स का झुकाव. अध्यात्म की तरफ बहुत पड़ा है।. कई खिलाड़ी ऐसे हैं जो पहले कहते थे कि डू. आई लुक लाइक पूजा पाठ टाइप्स? और उनको फिर. वृंदावन की गलियों में हमने रोज सर झुकाते. हुए देखा है। आना ही पड़ता।. उसका असर भी देखा है कि सालों साल खराब. खेल रहे थे। फिर चमत्कार हो गया।. देखिए मिश्वरीय सबसे बड़ी बात.
क्रिकेट में रहते हुए स्पिरिचुअलिटी में. तो आना ही पड़ेगा क्योंकि अनुभव हो जाता. है।. क्यों? कैसे? यही मैंने जब एक बॉल. बाउंड्री के बाहर जाती है हम।. तो वो कैसे गई? खेलतेखेलते अनुभव हो जाता. है। केवल हिट करने से नहीं गई।. एक बॉल पर छह रन चाहिए थे। सामने वाले. आदमी ने जोर से घुमा के मारा और चला गया।. केवल इतना सा ही था क्या? फेंकने वाले ने.
कॉन्फिडेंस और ओवर कॉन्फिडेंस से फेंका।. ग्रिप उसकी कैसी थी? बॉल ने जहां टप्पा. खाया। वो जमीन कैसी थी? उसका मॉइस्चर कैसा. था? बैट्समैन का अजमशन प्रैक्टिस के द्वारा. फिर कैसा था? फिर उसने जहां से हिट किया. वो राइट जगह टैप हुआ। फिर हवा में गेंद. गई। और गेंद भी तो इतनी देर से पिटी है 20. ओवर 50 ओवर में। उस गेंद के भी उसी. परफेक्ट हिस्से में जाकर के बैट लगा.
जहां से वो बेस्ट फोर्स ले सकती थी। अब. हवा कैसी थी? जिसने उस बॉल को और फोर्स. दिया। और फिर जाते जातेते जैसे बाउंड्री. पर पहुंची उस समय प्लेयर उछल के लपकने. वाला था। वो जब कूदा तो घास कितनी गीली. थी। उसने जो जमीन पर फोर्स लगाया उतना. एजमशन हुआ कि हुआ नहीं हुआ और थोड़े से. हाथ के ऊपर से बॉल बाहर चली गई।.
खेलतेखेलते व्यक्ति अनुभव कर लेता है कि. हम सब कठपुतलियों का एक रचयता कोई बैठा है. जो हवा का रुख भी देख रहा है। मिट्टी की. गहराई भी देख रहा है। इन सारे सिस्टम को. रेगुलेट कर रहा है। अनुभव हो जाता है। एक. चीज का अभ्यास करते करते. व्यक्ति उस चीज के परे देखना शुरू हो जाता. है। यही हमारे यहां मंत्र जाप का ही तो. विज्ञान है। जपते जपते जपते जपते आपकी.
अवेयरनेस कंसंट्रेट होती है और फिर आप. अनुभव करने लग जाते हैं। एक व्यक्ति जो. 40ों वर्ष से एक ही क्रिया को करते जा रहा. है। करते जा रहा है। करते जा रहा है। तो. वो उसको. उसमें उसके अस्तित्व से परे देखना शुरू कर. देता है। इतनी सारी सिचुएशन जिस कारण से. क्रिएट हुई कितना आसान हो जाता है एक. व्यक्ति को श्रेय देना कि इसने बल्ला. घुमाया और पड़ गया।. अध्यात्म की अनुभूति तो उसके भीतर किसी ना. किसी में और वह यह समझता है कि यह जो काम.
हो रहा है ना एक रचयिता कर रहा है। इसलिए. इतिहास में कभी ना कभी कोई ना कोई समय और. यह भी देखा गया है जो जितना धर्म के साथ. जुड़ा है व्यक्ति वो उतना ही गंभीरता से. खेल पाया है। डिस्ट्रैक्शन है ना क्रिकेट. तो ऐसा खेल है। राजनीति भी है, सेलिब्रिटी. भी है, उसके साथ धर्म भी है, जीवन भी है।. कौन सा ऐसा खेल आगे तक पहुंचा? व्यापार भी. है, अर्थ भी है, प्रसिद्धि भी है, यात्रा.
भी है, आकर्षण भी है, जनता भी है, सब कुछ. है उसमें। पर धर्म का अभ्यास उसकी. अवेयरनेस को केंद्रित रखता है। और फिर यह. घटना घटती घटती है। वह समझ जाता है कि जो. गेंद बाहर गई या जो गेंद घूम के और बैट. मिस हुआ और विकेट गिर गया।. इसके पीछे केवल उस बॉलर का श्रेय नहीं है. या केवल उस बैट्समैन का श्रेय नहीं है।. पूरी की पूरी प्रकृति सूरज ने कितना घास. को ठंडा किया। हवा ने कितना रुख मारा।.
मिट्टी कितनी गीली थी। बहुत सारे चांसेस. क्रिएट हुए। तब एक जाके पड़ा। तब. जाके एक व्यक्ति आउट हुआ। करते-करते अनुभव. होने लगता है कि सारे सिस्टम को चलाने. वाला ना वो बैठा ऊपर से और तब व्यक्ति. अनुभव करके जब उससे जुड़ जाता है तो. परफॉर्म बेटर करता ही है। क्यों नहीं. करता? जितने भी इतिहास में श्रेष्ठ. बल्लेबाज हुए सचिन भी पहले अपने गुरु में. विश्वास करते थे। विराट कोहली भी कुछ समय.
पहले वृंदावन पधारे थे। मैं यह नहीं कह. रहा कि एक समस्या और हो जाती थी ना। एक. थॉट आ गया था मिश्वरी कि धर्म को दिखाओ मत. प्रदर्शन है। दिस इज माय पर्सनल थिंग।. ये क्या मतलब हुआ? सोने की चैन पहन के. दिखाते हुए मैं धनाड्य हूं तो तुलसी की. माला पहन के भी दिखा सकते हो कि मैं कृष्ण. भक्त हूं। वो प्रदर्शन नहीं है तो यह. प्रदर्शन कैसे हो सकता है? तो धीरे-धीरे. ये एक अनुभव भी समाज में आना शुरू हुआ है. कि हम जो स्वतंत्र रूप से केवल अपने वैभव.
का प्रदर्शन करते थे।. ऐसा नहीं है। हम स्वतंत्र रूप से अपने. धर्म का आचरण भी कर सकते हैं।. नाइस। यह समाज में परिवर्तन आकर खड़ा हुआ. है। हम उसका भी प्रदर्शन कर सकते। तिलक. लगाने में संकोच नहीं हो सकता जैसे पहले. होता था। क्योंकि उस व्यक्ति ने अनुभव. किया। टैटू बनाने में संकोच नहीं होता था।. क्यों? तो तिलक लगाने में कैसे हो सकता. है? अनुभव किया है कि हम इसको सामने. प्रस्तुत कर सकते हैं। क्रिकेट तो ऐसी. अद्भुत वस्तु है। पूरा जीवन की शैली दिखा. देती है। एक बॉलर एक बॉलर.
प्रारब्ध है।. बॉल बॉल परिस्थिति है और बैटिंग कर्म है।. प्रारब्ध आपके सामने बॉल पर बॉल फेंकेगा।. शिक्षा पहली क्लास में फेल हुए तो दूसरी, दूसरी क्लास में फेल हुए तो 10वीं, 10वीं. क्लास में फेल हुए तो बीए, इंटर, एमए. उसमें भी फेल हो गए तो फिर कोई ना कोई. बढ़िया आदमी से मिलाएगा। प्रारब्ध बॉल पर. बॉल फेंकेगा और चांसेस कि बॉल आपके पास. आती रहेगी। बस आपको कोई ना कोई बॉल तो हिट.
करनी पड़ेगी।. पूरे जीवन में आउट होने के लिए तीन ही. विकेटें हैं। हर सफल व्यक्ति के जीवन में. कोई ना कोई एक कमजोरी होती है। अगर उसको. हिट कर दो तो आदमी हार जाता है।. पूरे राम जी ने विभीषण को पकड़ लिया।. हनुमान जी यही खोज के लाए थे। अगर विभीषण. नहीं होता तो युद्ध इतनी आसानी से खत्म. नहीं होता और लंबा चलता। एक ही विकेट था. कि रावण एक नंबर का स्त्रण था और अपने भाई. के प्रति मोह नहीं कर सका। पूछा रावण ने.
राम जी से। मैं कुल में आपसे बड़ा, पुरुषार्थ में आपसे बड़ा, तपस्या में आपसे. बड़ा, राजा में आपसे बड़ा, मेरा किंगडम. आपसे बड़ा। ऐसी कौन सी चीज है जो आपसे आगे. मैं आप मुझसे आगे निकल गए? तो राम जी ने. उत्तर दिया तेने तेरे भाई को निकाल दिया. और मैंने अपने भाई को संभाल लिया। केवल एक. बिंदु ने तुझे हरा दिया और मुझे जिता. दिया। तब रावण कहता है कि हां विभीषण अगर. आपके पास नहीं गया होता. क्योंकि देश की जो अंतरंग चीजें जानता है. उसको तो कभी देश निकाला दिए नहीं जाता। तो. सबसे बड़ी कांस्परेसी है। उसको तो आप.
नजरबंद करोगे, कोर्ट मार्शल करोगे, बंदी. बनाओगे। छोड़ दोगे। जो भारत की अंतरंग से. अंतरंग चीज जानता है उसको दूसरे देश के. पास थोड़ी ना छोड़ा जाएगा। और विभीषण की. यही गलती हुई। रावण ने निकाला सो निकाला।. बंदी बनाता है। उसने जाने दिया। अभिमान. में कि मेरा कौन क्या बिगाड़ सकता है। इसी. विकेट ने पूरी लंका को आउट।. लेकिन रावण की बड़ी कहानी चलती है। कोई. कहता है कि वो उसको मोक्ष पाना था इसलिए. उसने कर दिया। तो ये सब तो अनगिनत अलग-अलग. ये सब ये सब एक कहानी के अंदर की और.
स्टोरी है।. आपके वृंदावन और हमारे नोएडा के बीच में. सब पड़ता है।. हां सुनी है मैंने। वहां की अलग ही कहानी. है। इतिहास के साथ चीजें जुड़ती जाती है।. पर मूल कथा नहीं ना। मूल में परिवर्तन. नहीं हो सकता।. देखिए जब चाय बनेगी स्वाद अलग बनेगा। पर. चाय बनती तो तीन ही चीज से है ना।. पानी, चाय पत्ती, दूध और चीनी।. पिछली वाली अलग थी, दूसरी वाली अलग अब. इसके बाद जो मिलेगी वो भी अलग होगी।. मूल कथा तो वही रहेगी ना। सही बात है।.
रावण राम विभीषण संबंध अच्छा बुरा वो तो. वही रहेगा ना। रावण तो बुरा ही है। कोई. अच्छा तो कह ही नहीं सकता। अब ये है कि. स्वाद कहानी के अलग-अलग परसेप्शन जिसके. नजरिए से देखें उसके नजरिए से अलग-अलग. होते रहेंगे।. ठीक है। आखिरी तीन सवाल मेरे छोटे-छोटे।. क्योंकि अगला सब्जेक्ट उठाऊंगा तो उसके. लिए एक नया पॉडकास्ट करना पड़ेगा। इसलिए. उसको नए पॉडकास्ट पे छोड़ देता हूं मैं।. हमारे आपके साथ चलते हैं।. एक नया पॉडकास्ट करेंगे। उसमें श्री कृष्ण. जी के बारे में बहुत सारी चर्चाएं करेंगे।. तीन आम आदमी के जीवन के सवाल। पहला मेंटल.
हेल्थ आजकल बहुत चर्चा में है। जो गरीब है. वो भी परेशान है। जो अमीर है वो भी है।. दुनिया मेंटल हेल्थ की बड़ी चर्चाएं कर. रही है। कुछ लोग कहते हैं कि बीते सालों. में नहीं था। बीते कुछ वर्षों में ज्यादा. निकल आया है। मेंटल हेल्थ पर कैसे काम. करें? क्योंकि आध्यात्मिक व्यक्ति समझना. ज्यादा आसान होता है। और कुछ लोग कहते हैं. कि विदेशों का दिया हुआ है। हमारे देश में. पहले नहीं था। पहले तो जाओ बाहर खेल आओ।. जब हम लोग छोटे थे हम और आप एक्सपोज़र ने.
प्रेशर क्रिएट किया। ध्यान से सुनिएगा।. एक्सपोज़र ने पहले चीजें दूर-दूर थी और. लोकलाइज थी। जब ग्लोबल होने लगी चीजें. ग्लोबल होने एक गांव का व्यक्ति ज्यादा से. ज्यादा कस्बे से तुलना करता था। भाई गांव. का आदमी सीधा मेनहटन से तुलना करेगा तो. एक्सपोज़र जो है वो प्रेशर क्रिएट करेगा।. प्रेशर है और एक्सपोज़र है पर आसपास. मैकेनिज्म नहीं है तो ए्जायटी क्रिएट होगी.
और उसके बाद वही प्रेशर धीरे धीरे धीरे. धीरे हमारी आदत बन जाएगा। जैसे हंसते रहना. एक आदत होती है। कई बार रोते रहना भी एक. आदत हो जाती है। हम. सुखी रहना एक आदत होती है। दुखी रहना भी. एक आदत हो जाती है। हर चीज की एक आदत सोना. भी एक आदत होती है। आप 21 दिन तक मजे से. सोइए आप सोते ही रहेंगे। आदत हो जाएगी। कम. सोना भी एक आदत होती है। कुछ दिन तक कम. सोने कम समय में गहरी नींद का अभ्यास कर.
लीजिए। योगी करते हैं। कम खाना ज्यादा. खाना इंटरमीडिएट कैटो कितनी-कितनी चीजें. चल रही है। हर चीजें एक अभ्यास है। तो यह. एक्सपोज़र ने की क्रिएट किए प्रेशर के. द्वारा जो स्ट्रेस बना वो हम हमारे भीतर. फीड होता गया होता गया होता गया होता गया. और वो आदत बन गया और हम मेंटल हेल्थ क्या. है मेरे हिसाब से मैं इतना उसका कोई ये. नहीं कह सकती कि क्लीनिकली एक्सपर्ट आदमी.
हूं या मेडिकलली एक्सपर्ट आदमी हूं पर हम. अपने भीतर ना ज्यादा नेगेटिविटीज को. इकट्ठा करना शुरू कर देते. बहुत सारी सब में अच्छा और बुरा दोनों. चीजें छुपी हुई है। पर वो आधा खाली क्यों. है? आधा भरा क्यों है? तो मेरे भीतर. इंप्रेशन आधे भरे का कम पड़ेगा। आधे खाली. क्या ज्यादा पड़ेगा और ये स्टोर होता. रहेगा। होता रहेगा होता रहेगा। तो अंधेरा. ज्यादा हो जाएगा। और वही मेरे एक स्वभाव. बन जाएगा। वही मेंटल हेल्थ का इशू बनेगा।.
एकमात्र स्पिरिचुअलिटी उपाय है और वही. उनके जीवन में है भी वह इशू ज्यादा जिनके. जीवन में स्पिरिचुअलिटी कम है। आप रोज. अपने शरीर को फीड कर रहे हो एक्सरसाइज. करके या चलो खिला के या चलो सेंस. ग्रेटिफिकेशन करके आप रोज अपने मन को. एंटरटेन कर रहे हो। आप रोज अपनी बुद्धि को. एंटरटेन कर रहे हो। अपनी सोल को तो. एंटरटेन ही नहीं कर रहे। जो आपकी सोर्स है. एनर्जी का पूरी एनर्जी का सोर्स है।.
नल में गंदा पानी आ रहा था। नल साफ किया. पाइप लाइन साफ कर दी। फिर टंकी भी साफ कर. दी।. उसके बाद की पाइप लाइन भी साफ कर दी। पर. पता तो चला कि बोरिंग जहां हो रही थी। अब. वहीं पर पानी खत्म हो गया था और मिट्टी आ. गई थी।. ऐसे ही शरीर ऑल्टर किया हमने शरीर के लिए. चीजें बदल दी यार सोफा बदल दो या रूम बदल. दो आप नहीं बदलना सोफा क्योंकि आपका ये.
सोफा वायरल सोफा है. ये तो ये तो बसंती ऐसा सब जगह छा जाता है. आना सब बदल जाए ये नहीं बदलिएगा मैं भी. आके यही नोटिस कर रहा था बस आसन बन गया ये. तो आपका ये ये पडकास्ट आसन है ये जैसे. व्यासासन होता है तो. मैं अपनी नजरिए से कहूं तो श्री कृष्ण तो. बसंती दुपट्टा डालते और माइक आप ऐसे लगाते. हो जैसे कृष्ण बंसी पकड़ते हैं और आनंद आ. जाता है देख के। सबके देखने का अपना. नजरिया है और शुभांकर बैठे हैं सामने तो.
क्या ही बात है।. तो हमारे जीवन में अध्या हमने शरीर में. बहुत कुछ बदला। मन को मनोरंजनों को बहुत. कुछ बदला। बुद्धि के विचारों को समय के. साथ बदला। पर बोरिंग जो आत्मा था उसको तो. हमने संबोलित किया ही नहीं। तो मतलब इसका. यह है कि जो दो साधन स्पोर्ट्स एंड. स्पिरिचुअलिटी इनमें जो लोग ज्यादा हैं. उनको इन कंपैरिजन में कम होगा।. कम होगा। जो केवल अपने आप के पैसे के पीछे.
दौड़ रहे हैं ना मैं निवेदन करूं और जिनके. जीवन में टैलेंट या कोई एक हॉबी नहीं है।. वो केवल उसी एक एक्सरसाइज में है कि जाएं. ऑफिस अर्न करें आ फिर पोज़ेशंस लें।. करते-करते ना आदमी के पास आ क्योंकि उसके. प्लेजर की एक सीमा है। आप कितनी चीजें. खरीद पाओगे दुनिया में? सही बात है। दो साधन इस ऐसे होने चाहिए।. थोड़ा सा भी आपको स्ट्रेस लगे तो दो ही. साधन है। या तो स्पोर्ट्स में चले जाओ या. स्पिरिचुअलिटी में आ जाओ। मुझे बड़ा अच्छा. लगा। आप रोज क्रिकेट खेलने जाते हैं। आपने.
बताया।. हां। मतलब मुझे उससे बहुत ही रिफ्रेशिंग. फील होता है। शरीर हिलता है ना? और वो 2 घंटे खेलने के बाद मैं अपना काम. बेहतर तरीके से कर पाता हूं। क्योंकि. चारों चीजें इन्वॉल्व होती हैं। आप जो. खेलते हैं तो इंटेलेक्ट लगता है. एक्सपीरियंस से। शरीर लगता है दौड़ा भागी. से। मन को अच्छा लगता है कि वाह भाई. क्योंकि हर बार नई बॉल आ रही है। मन को तो. नई चीज चाहिए ना। कभी ऑफ स्विंग है, कभी. इन स्विंग है, कभी बाउंसर है तो मन को तो. नई-नई बॉल चाहिए। ऑलवेज नई बॉल भी आ रही. है। इसके साथ जो आपका कंसंट्रेशन है वो.
आपको कहीं ना कहीं डीप मेडिटेशन पर ले जा. रहा है। ट्रू। आप चारों तरफ एक-एक व्यक्ति. को एनालिसिस कर रहे हैं। आपने पूरी जगती. से आप पूरे स्टेडियम से जुड़ जाते हैं जो. क्रिकेट खेलते हैं। आपको आप जब बैटिंग के. लिए खड़े होते होंगे मिश्रिय तो मुझे लगता. है कि आपकी कॉन्शियसनेस 20 लोगों पे होती. है। हम्।. आपकी तरफ के प्लेयर, आपके पहले जो खेल गए, आपके बाद जो खेलेंगे, चारों तरफ फील्डर्स, बॉलर, उसकी ग्रिप, उसका दौड़ना, उसके पैर,
उसका कद सामने वाले को ऊपर से नीचे तक आप. उसकी पर्ची लिख डालते हैं। फिर उसके बाद. जब वो फेंकता है। फिर जब उसके बाद वो. फेंकता है, तब आप घुमा के मारते हैं।. कितना इनवॉल्व हुआ। एक पूरी अवेयरनेस जुड़. गई उसकी। कई बार मैंने देखा है वो कहते ए. सामने से वो जो ब्लैक सामने स्क्रीन होती. है वो ब्लैक शेड लेफ्ट करो राइट करो कोई. सामने से लाइट भी मार दे तो बैट्समैन. डिस्ट्रैक्ट हो जाता था. अगर 400 आदमी भी स्टेडियम में बैठा है ना.
तो एक व्यक्ति की अवेयरनेस इतने ब्रह्मांड. से जुड़ जाती है। स्पिरिचुअलिटी भी तो यही. करती है। एक-एक रोम रोम से एक-एक रोम रोम. से जब एनलाइटनमेंट आता है तो पत्तों की भी. आवाजें आने लग जाती है। तो मतलब जो लोग भी. थोड़ा डिप्रेस्ड हैं या परेशान हैं अगर वो. किसी के स्पोर्ट्स को हॉबी बना लें या फिर. स्पिरिचुअलिटी इधर जाएं तो इन कंपैरिजन. में उन्हें फायदा हो सकता है। बाकी मेडिकल. इश्यूज तो एक अलग विषय है लेकिन वो. दवाइयां लें डॉक्टर को दिखाएं लेकिन इससे.
भी आप भी करें। यह दो चीज़ जरूर साथ में. जोड़ें और ध्यान रखिए लाइफ चेंजबल है।. दुनिया जो है ना यह कभी स्टेबल नहीं है।. चेंजबल दुनिया में हम जब कहीं स्टक होते. हैं तब प्रॉब्लम शुरू होती है। ठीक है? इसी में एक क्वेश्चन और कर देता हूं मैं।. वो जो नहीं मिलता है इंसान वहीं क्यों. अट्रैक्ट होता है? और जो मिल जाता है उसकी. कीमत कम क्यों हो जाती है? यह किसी भी. कॉन्टेक्स्ट में कहीं पर भी हो चाहे वह. नौकरी हो लड़की हो सामान हो कोई भी चीज हो. जो नहीं मिला मन वहीं भागता है और जैसे.
मिल जाता है थोड़े दिन में वो घर की. मुर्गी दाल बराबर इसी को तो भोगी कहते हैं. और जो मिल जाता है उसमें आनंद लेता है उसी. को तो योगी कहते हैं। यही तो व्यक्ति की. दो कैटेगरी है। इसका मतलब क्या है? अगर आप अपने लाइफ के केंद्र को आपने अपना. मन बना रखा है जो कि सबसे बड़ा खतरनाक. वस्तु है तो मन का यह स्वभाव है जो है कुछ. जो नहीं है वो उसे चाहिए पर अगर आपके जीवन.
का केंद्र आपका विचार आपकी बुद्धि आपकी. आत्माएं तो आप ऐसे विषय में कभी नहीं फंस. सकते जो आप है संतुष्ट हुए बिना सुखी हुए. ही नहीं जा सकता संतुष्ट हुए बिना सुखी. हुआ ही नहीं जा सकता जो पायो संतोष धन सब. धन धूर समान. यही इंसानी फितरत है। इसी को प्राकृतिक. इंसान जो है बराबर जो जमुना जी के किनारे. रहते हो जमुना जी में सबसे कम नहाते. होंगे।. हां ये हर शहर का दिल्ली वाले जमुना जी के.
किनारे हैं। पर कई बार यमुनोत्री नहा के. आते हैं। भाई मैंने कहा बगल में ही तो. तुम्हारे पर वो ऐसी छोड़ी नहीं। जिस वस्तु. जो हमारे पास है वो हमें छोटी लगती है।. इसके पीछे एक बात और मैं कह सकता हूं कि. हमें लगता है कि हमने इसको प्राप्त कर. लिया। भक्त यह सोचता है कि जो मेरे आसपास. है वो मुझे प्रसाद रूप में मिला है। जब आप. ओनर की तरह लेते हो तो ज्यादा भी छोटा. लगता है। मतलब आप प्रसाद की तरह लेते हो. तो छोटा भी ज्यादा लगता है। एक छोटी सी.
लड्डू मिलता है ना कभी मंदिर से तो ऐसा. लगता है कि साक्षात परमात्मा आ गया। और. व्यवहार में अगर आधी किलो का डिब्बा आपको. किसी ने गिफ्ट में दिया है तो यार यह तो. कम से कम बड़ा वाला बॉक्स तो दे रहा था।. इतनी तो अकल व्यवहारिक होनी चाहिए।. हां मतलब जैसे मैं वृंदावन जाता हूं तो. वहां के स्थानीय लोग जो है कई बार कहते. हैं साल भर के दर्शन नहीं किए। अयोध्या. जाता हूं स्थानीय लोग कहते हैं दो-दो. सालों के दर्शन नहीं किए। जो है हम उसका. महत्व छोड़ देते हैं। जो नहीं है उसके. प्रति आकर्षित है। इसी को तो माया कहते. हैं।. वो अयोध्या वाला जाके बनारस में जल चढ़ा.
है। माया का एक एग्जांपल दिया गया है। मृग. तृष्णा इसी का नाम माया है। इसी कोई माया. पैसा को नहीं कहते। माया आपके अच्छे कोट, अच्छी घड़ी हमारी या कोई अच्छी माला इसको. माया नहीं कहते। वो मिराज का एक कांसेप्ट. है ना कि रेगिस्तान में जाओ पानी लगता है।. फिर आगे जाते हो लगता है और आगे। फिर और. आगे जाते और आगे। तो ये इसी का नाम आया कि. सुख वहां है फिर और आगे जाओ नहीं सुख वहां. है नहीं और आगे जाओ और सुख वहां है जो है. वहां नहीं है वहां है वहां है एक आदमी.
रेगिस्तान रहा था एक बोतल पानी था उसको. लगा ये नहीं पऊंगा आगे देखो वो एक पोंड. दिख रहा है वहां तक मुझे पता चला और आगे. है पोंड यही इसी का नाम माया कहते हैं और. जिस दिन उसने अपनी हाथ में भरी बोतल का. पानी पी लिया होता वो संतुष्ट हो जाता. प्रेम माया भक्ति. प्रेम, माया और भक्ति. इन तीनों को कंपेयर करने की आवश्यकता नहीं. है। प्रेम और भक्ति मैं मैं मैं फिर भी. मैं प्रयास करता हूं। मैं फिर भी प्रयास.
करता हूं।. प्रेम प्रेम आत्मा के स्तर पर होता है।. उसके ऊपर नीचे हो ही नहीं सकता।. भक्ति मन के स्तर पर होती है और माया शरीर. के स्तर पर होती है।. [हंसी]. प्रेम. अगर सच में है तो सामने वाले के बेमन होने.
पर भी होगा। सामने वाले की. कुबुद्धि होने पर भी होगा। प्रेम है तो. शरीर के टूट जाने पर भी होगा। प्रभु आत्मा. से होता है। भक्ति सबसे पहले मन को खींचती. है।. निज मन मुकुर सुधार गोस्वामी जी ने लिखा. भक्ति का आसन मन है। भक्ति मन को पकड़ती. है। संबंध बनाती है। क्योंकि भक्ति में. संबंध चाहिए। मैंने कहा ना डिवोशन रिलेशन.
इमोशन ये आत्मा नहीं समझती। तो मन समझता. है। मन ही संबंधों का व्यवहार करता है।. इसलिए तो कृष्ण माखन चुराते हैं। माखन में. से ख निकाल दो तो क्या बचा? मन माखन ख निकाल दो तो मन कृष्ण कह रहे. हैं गोपी तू अपना तन किसी को दे देना जीवन. किसी को दे देना यौवन किसी को दे देना धन. किसी को दे देना मन नहीं देना मन मुझे. देना मैं उस मन को मोर पंख बना के धारण. करूंगा. भक्ति माया शरीर पर टिकती है.
आज अगर मैं आपके किसी लुक से अट्रैक्टेड. हूं तो आज कल तो वो वैसा वैसा नहीं रहेगा।. परसों तो वैसा नहीं रहेगा। 25 साल बाद तो. मेरा वो आकर्षण समाप्त हो जाएगा। इसलिए जो. माया में उनका बेचारे के संबंध तीन दिन से. ज्यादा नहीं चल रहे हैं। मैं तो सोचा. कितने कितने प्रकार के आ गए लिविंग इन और. एक मेरे को किसी ने बताया कि एक संबंध. होता है जो केवल कूल रिलेशन बोलते हैं. उसको। क्या बोलते हैं? कूल डाउन पीरियड।.
कूलडाउन पीरियड कि अभी कोई मिल नहीं रहा. है इसलिए हम दोनों साथ में हैं। ऐसा भी एक. एक हो गया वेकेशन रिलेशन कि भाई खाली है।. चलो दोनों ही घूम जाते हैं। सिर फिरे हैं।. भाई ये इंसानों का व्यवहार नहीं बंदरों का. व्यवहार है। कम से कम ठीक है।. दया आती है हमको। कुछ टिप्पणी हम नहीं कर. सकते। सबका अपना जीवन है पर थोड़ी दया आती.
है। अलग-अलग लेवल है ना। एक पीएचडी बैठा. हुआ व्यक्ति एक बच्चे को देख रहा था। वो. वो याद कर रहा था कि. 2 * 1 = 2 2नी 4 दो और लगा पड़ा था। छ. घंटे लगा दिए उसने। अब पीएचडी वाला. व्यक्ति हसेगी भाई मैं तो सूत्र याद कर. लिए तू इसी में लग रहा है पर वह दया करता. है किसी दिन यह भी समय आएगा तब तू अनुभव. करेगा कि 2 दूनी एक और दो दूनी चार करने. में कोई ज्यादा मेहनत नहीं लगती वो भी उस.
लेवल पर है कि किसी दिन भगवान कृपा करेंगे. उनकी चेतना जागृत होगी तब उन्हें एहसास. होगा और कई बार यह भी देखा गया है. मिश्वरीय विलासिताओं की चरम सीमा पर जाने. के बाद भी वो खाली हो जाते हैं और फिर. सोचते हैं अध्यात्म में आना पड़ेगा. क्योंकि उसके बाद तो खाली. दुनिया का बड़ा बड़ी पॉप स्टार हुआ माइकल. जैक्सन। सब कुछ होने के बाद भी कहते हैं. मृत्यु के समय उसके आंतों में कितने दिनों. से अन्न तक नहीं था। शायद कुछ गोलियां. मिली थी। इतिहास में बीटल्स नाम का बहुत.
बड़ा बैंड हुआ। फिर वो ऋषिकेश आया। बीटल. आश्रम फेमस है। चरम सीमा पर पहुंचने के. बाद भी जो इस पूरी दुनिया में जितनी. विलासिता है अर्थ के बाद उस चरम सीमा पर. पहुंचने के बाद भी आदमी ब्लैंक होता है और. फिर सोचता है यार लौट के तो यहीं आना. पड़ेगा। तो जो पहले से इसको सर्वाइव किए. हुए वो उसको भी अच्छे से जी पाता है। इसको. भी अच्छे से जीता है।. अच्छा ये चरम सीमा वाले अक्सर धार्मिक. क्यों आते हैं? किसी भी क्षेत्र में चाहे वो क्रिकेट हो. या हनी सिंह जैसे विराट कोहली क्रिकेट हो.
गए। हनी सिंह बॉलीवुड में हो गए। जो जो. चरम सीमा पे पहुंचे वो आध्यात्मिक हो गए।. क्योंकि एक सीमा है ना सुख की दुनिया में।. क्या करोगे? आप. दुनिया की जो वस्तु है उसका सुख चरम से. शुरू होता है। जैसे आपको भूख लगी हो। तो. पहली बाइट में जो टेस्ट आता है वो दूसरी. बाइट में नहीं आता। ट्रू तीस्तरी रोटी.
पहुंचने तक वही दाल वही रोटी पर वो. साधारण बात है। हां बड़ी सामान्य से. पेट भरने के लिए बात ये है। ऐसी दुनिया की. जितनी वस्तुएं उसका सुख अपने चरम से शुरू. होता है।. अब पहले पहली पहली कोई नई गाड़ी खरीद के. लाए ना तो बड़े से बड़ा लाला भी रात भर. खिड़की से झांक के देखता है और बाहर खड़ी. है। दिल्ली जैसी जगह पार्किंग नहीं है। है. ना? और 5 वर्ष के बाद पुरानी दिल्ली गाड़ी. भेजनी हो तो वही वाली भेजता है। अरे.
पुरानी हो गई यार। हर साल iPhone आता है।. पहले दिन मजा आता है। फिर धीरे-धीरे. और मैं समझूं सितंबर में ल्च होता है ना. तो और जुलाई होते-होते खामियां लगने लगती. है यार। बैटरी काम नहीं कर रही है।. स्क्रैच पढ़ रहे हैं। डिमिनिशिंग मार्जिनल. यूटिलिटी इकोनॉमिक्स का सूत्र है। तो जब. कोई वस्तु चरम से शुरू होगी तो कमी तो. होगी।. तो जिन वस्तुओं में प्रथम आकर्षण में. विलासिता में सुख मिलता है उन्हीं वस्तुओं. में कुछ वर्ष के बाद में दुख का कारण बन. जाता है। अद्भुत पर वही अध्यात्म दूसरी.
तरफ से शुरू होता है। बीज से शुरू होता. है। पहले दिन थोड़ी सी गुदगुदी करता है।. बस कुछ हुआ। पहले कई बार तो पहले हेट ही. देता है। ये सब क्या लग रहे हैं। लगता है. फुर्सत वाले आदमी है। इनके पास कोई काम ही. नहीं है। पर दिख रहा है काम नहीं फिर भी. मस्त बैठा है। एक आदमी बुरा भला कह रहा है. फिर भी बाबा जी मस्त बैठा है।. धीरे धीरे धीरे धीरे उसका आकर्षण. धीरे-धीरे कमल खिलता है खिलता है खिलता है. खिलता बंद कमल कैसा होता था धीरे धीरे. धीरे और फिर तो उस सीमा तक पहुंच जाता है.
कि बड़ी-बड़ी रानी और महारानियां चल देते. वृंदावन में रहती थी राजकुमारी बड़ी भारी. रानी. एक दिन दोपहर के समय और सड़क का डामर पिघल. जाए ऐसी गर्मी थी पैदल चली जा रही थी मुंह. ढक के बाबा जी पहचान ए महारानी कहां जा. रही है तो रोती हुई कहती है गर्मी दूती. गर्मी गर्मी रूपी दूती खबर लाई है कि. ठाकुर जी को गर्मी लगी है। पंखा जलने जा. रही है। इतनी बड़ी रजवाड़े की महारानी और. ठाकुर जी के मंदिर का पंखा जलने जा रही.
है। उसने मेवाड़ की महारानी मीरा एक बात. के ऊपर निकल पड़ी। फिर तो समझ लेते कि. इसके बाद है नहीं कुछ। तो या तो जीवन में. यही स्थिति आकर के खटी होती है कि चरम तक. पहुंचने के बाद विसर्जन हो जाता है।. अद्भुत. हमको लगता है पार्ट टू के लिए यहीं पे. हमें समाप्त करना चाहिए। पार्ट थ्री पार्ट. थ्री पार्ट थ्री अनेक अरे हम तो आपके साथ. हमारा रोम रोम हम कितने स्थानों पर गए.
सबसे प्रेम है सबसे सम्मान है पर एक. स्वाभाविक संबंध मेंश्वर्य. बिल्कुल घर जैसा पारिवारिक रूप से जहां हम. सहज भी हो जाते हैं और सहजता में गंभीर से. गंभीर बात कर लेते हैं। यह बहुत कम जगह ये. होता है और आपके भीतर वो गुण है। मैं अभी. आपसे कह रहा था और सारी वैश्विक और. विश्वस्तरीय बातें परिवर्तनशील हैं। बड़ा. घर, छोटा घर, नया घर, बड़ा स्टूडियो, छोटा.
स्टूडियो, यश, अपयश पर स्वभाव जीवन में. सबसे ऊंची वस्तु है। और वो आपकी सबसे बड़ी. संपत्ति है। और मेरा और आपके प्रति वही. आकर्षण है। तो भगवान आपको सदा यही श्रेष्ठ. स्वभाव का आशीर्वाद देते रहे। और मैं यह. भगवान से प्रार्थना करूं कि आप. यश के माथे पर चढ़े रहे पर रस का आस्वादन. करते रहे।. अद्भुत प्रणाम महाराज जी.
प्रणाम.
