Unplugged ft. Shailendra Saraswati | Life of Osho | The Unfiltered Truth
वो हीरो है जिनमें विलेन वाले भी गुण है. या विलेन है जिनमें हीरो वाले गुण है या. यही उनकी खूबसूरती है? मैं आज भी उनका बहुत बड़ा प्रशंसा है।. ज्ञान है वो आंखों से झलक है।. कोई ऐसा कथा व्यास नहीं होगा।. गजनीश जी ने बुला लिया। छोड़ने के बाद. आप उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। या तो आप. पक्ष में हो जाओ या विपक्ष में हो जाओ।. ओशो की छवि एक सिर्फ सेक्स गुरु की है। ये. वो स्थान है जहां पर तो अय्याशी का फ्री. लाइसेंस ही मिल जाता है आपको। ओशो की 650. किताबें हैं। सबसे मोटी किताब गीता पर. करीब इतनी मोटी। एक दर्जन से ज्यादा. उपनिषदों पे बोले हैं। इसकी तो कहीं चर्चा.
नहीं करते मीडिया के लोग। वैसे चाय इश्क. है और इश्क में सेक्स है और सेक्स ओशो के. नाम पे चिपका हुआ है। ओशो प्रेम के पक्ष. में है। प्रेम का कमल काम की कीचड़ में. खिलता है। अगर ये कांसेप्ट खत्म कर दिया. जाएगा शादी का तो फिर कुत्ते बिल्ली जानवर. और इंसान इनमें अंतर क्या रहेगा? अभी जो विवाह व्यवस्था है जहां पति पत्नी. दोनों दुखी आ रहे हैं। दोनों दिन रात रहते. हैं। मैं खूब अच्छे से जानता हूं। दुनिया. मैंने खूब घूमी है। बहुत घरों में रुका. हूं।. आपकी शादी हुई है? हां, मेरी शादी हुई है।. आपकी पत्नी खुश नहीं है आपसे? बहुत खुश है।. क्या अपने अतीत को छोड़ने के लिए रजनीश.
चंद्र मोहन ओशो बन गए? पहले मैं आपको रजनीश नाम बताऊं कैसे आया? क्या समस्या थी गांधी जी से? से ओशो जी. को।. एक तो गांधी जी द अनुसी हैं। परंपरावादी. हैं। रूढ़िवादी हैं। विज्ञान और तकनीक के. विरोध में हैं।. ओशो भगवान थे। इस पे डिपेंड करता है आपका. भगवान शब्द का मीनिंग क्या है? मैंने ओशो. का एक कोट पढ़ा था कि तुम्हारा ईश्वर अगर. डर पैदा करता है तो वो ईश्वर नहीं झेल. रहा। इस्लामिक टीचिंग पर उन्होंने क्यों. स्टेटमेंट नहीं दिए? इस बारे में कभी किसी ने कोई सवाल पूछे. नहीं।. आज वाले कह देंगे कि वहां बोलने में थोड़ा. डर रहता है। ओशो की साधना मजेदार नजर आती.
है। डायनेमिक मेडिटेशन क्या था? उसके पांच चरण हैं।. रजनीशपुर अमेरिका जाना ये आत्मरक्षा की. योजना थी या विस्तार की योजना थी? ओशो की सुरक्षा का सवाल नहीं था। ओशो. विदेश नहीं जाना चाहते थे।. ओशो जी की जो डेथ थी वो नेचुरल डेथ थी या. जो मार्केट में खबर फैलती है कि स्लो. पोइजन दिया गया था।. ओशो को बिना वारंट के गिरफ्तार कर लिया. गया।. ओशो को आने वाली पीढ़ियां जो है वो कैसे. याद रखेंगी? एक गुरु के तौर पर, एक लेखक. के तौर पर, एक विद्रोही के तौर पर उनप कोई.
लेवल नहीं लगता।. प्रेम की मर्यादा कहां तक है? पूर्ण स्वतंत्रता तक।. ऐसा लगता है कि ओशो का प्रेम विचार आज की. जो ऑनलाइन डेटिंग दुनिया है उसमें. प्रासंगिक है। जिसको. जी नहीं बिल्कुल नहीं। 100% नहीं।. ओशो एक ऐसा नाम जो किसी तूफान की तरह आया. और इंसान के जीवन जीने और जीवन को देखने. के नजरिए को हमेशा के लिए बदल कर चला गया।.
रजनीश से ओशो बनने वाला यह शख्स ना धर्म. का ठेकेदार था ना समाज का न्याय। वो एक. ताजी हवा का झोंका था। जो रूढ़ियों से आ. रही परंपराओं को उड़ाता चला गया। प्रेम. पर, सेक्स पर, ध्यान पर, विद्रोह पर ऐसी. ऐसी बातें रखी कि दुनिया अचंभित रह गई।. ओशो ने ना सिर्फ सवाल उठाए बल्कि जवाबों. को भी चुनौतियां दी। उनके शब्द कभी हंसी, कभी आग तो कभी गहरे मौन की तरह थे। हर बार. कुछ नया सोचने को मजबूर करते। ओशो को.
नापसंद करने वाले भी उनके तर्क को लेकर. अचंभित हो जाया करते थे। हालांकि ओशो. विवादों में भी गिरे। फिर भी लाखों दिलों. में बसे रहे। ओशो का जीवन एक खुली किताब. की तरह रहा जो हमें खुद को पढ़ने की. हिम्मत हौसला देती है। और इसीलिए हमें लगा. कि आज ओशो के जीवन को समझा जाए। ओशो के. नजरिए को समझा जाए। अब ओशो तो है नहीं। तो. हमने उनके भाई स्वामी शैलेंद्र सरस्वती जी. को आज आमंत्रित किया। बहुत-बहुत स्वागत है. सर आपका। जैसा कि.
आपका आपने यहां पर आमंत्रित किया। जैसा कि. हमने परिचय कराया कि उनके भाई हैं, स्पिरिचुअल टीचर हैं। क्वालिफाइड एमबीबीएस. डॉक्टर हैं और ओशो जी के छोटे भाई हैं।. सबसे पहला सवाल तो सर यही ओशो जैसी. शख्सियत का भाई होने का अनुभव कैसा लगता. है आपको? देखिए मैं आपको बताता हूं। मैं उनसे 24. साल छोटा हूं। तो मुझे भाई होने जैसा. एहसास कभी हुआ नहीं। जब मैं जन्मा उसके. तीन साल पहले ही उनको बुद्धत्व. एनलाइटनमेंट हो चुका था। 1953 में मेरा. जन्म 55 में हुआ है। जब मैं बड़ा हुआ कुछ.
सोचने समझने लायक है ना छ सात साल की उम्र. का तब तक वो ऑलरेडी एक विश्व विख्यात. हस्ती हो चुके थे। है ना? तो मैंने उनको. गुरु रूप में ही जाना है। भाई रूप में. नहीं जाना है। यद्यपि उनकी तरफ से बड़े. भाई का स्नेह मुझे बराबर मिला। सबको मिला. हमारे पूरे परिवार को। लेकिन मेरी तरफ से. कभी ऐसा मुझे नहीं लगा कि मैं उनका भाई. हूं। मैं हमेशा ही उनका शिष्य रहा हूं।. आपके परिवार में कितने लोग हैं? देखिए हम. तो 11 भाई बहन थे। है ना? सभी लोग ओशो के.
सन्यासी हुए। यहां तक कि आश्चर्यजनक बात. मेरे माता-पिता भी ओशो से इतने प्रभावित, इतने प्रभावित हमारे सारे रिश्तेदार मेरे. जितने भी जीजाजी हैं, भाभी हैं सब चाचा. चाची वो सब ओशो के शिष्य हुए, सन्यासी हुए. हैं।. मध्य प्रदेश में जन्म हुआ। आपका परिवार. वहीं था।. ओशो का जन्म हुआ। एक छोटा सा गांव है. कुचवाड़ा रायसेन जिला में।. वो मेरी ननिहाल थी। है ना? फिर गाडरवाड़ा. एक जगह है नरसिंहपुर जिला में जबलपुर से.
लगभग दो घंटे दूर। वहां पर ओशो की शिक्षा. दीक्षा हुई। बचपन से ले मैट्रिक तक की।. हम. उसके बाद फिर वो जबलपुर पढ़ने गए तो. जबलपुर एरिया में ही यह सब आता है।. हम. ओशो एक ऐसी शख्सियत है सर जिसे कुछ लोग. बहुत पसंद करते हैं और कुछ बिल्कुल ना. पसंद करते हैं।. कुछ के लिए वो हीरो हैं। कुछ के लिए विलेन. है।. इससे पहले मैं स्पेसिफिक सवालों पर जाऊं।. में कुछ जेरिक सवाल मैंने रखे हैं शुरू के. लिए ताकि दर्शक थोड़ा ओशो को समझ सके।. क्या ओशो खास बनाता है? वो हीरो हैं.
जिनमें विलेन वाले भी गुण हैं या विलेन है. जिनमें हीरो वाले गुण हैं या यही उनकी. खूबसूरती है जो उन्हें औरों से अलग कर. देती है। और इसीलिए वो शो आज भी प्रासंगिक. है। उनका सौंदर्य, उनकी महिमा, उनकी गरिमा. इसी में है कि यू कैन नॉट बी इनडिफरेंट टू. हिम। आप उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। या तो. आप पक्ष में हो जाओ या विपक्ष में हो जाओ।. या तो उनके दोस्त बनो या दुश्मन बनो। आप. चुपचाप खड़े नहीं रह सकते। आपको एक पक्ष. लेना ही होगा क्योंकि वो सारी पारंपरिक. मान्यताओं को चुनौती दे रहे हैं।. हर चीज पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जिनको. हजारों हजारों साल से अंधविश्वास किया गया.
है। उन सबको उन्होंने विवेक की अग्नि में. निखारा तपाया तो निश्चित रूप से या तो आप. उनके दुश्मन हो जाएंगे या आप उनके भीतर का. सत्य देख पाएंगे तो आप उनके पक्षधर हो. जाएंगे। उनके प्रेमी हो जाएंगे। पर एक ऐसा. शख्स है जो अपने सवालों पर भी कई बार सवाल. खड़ा कर देता है। वो नहीं चाहते कि हम. उनके भी विचार से बंधे। इसलिए वो अपने. विचार को भी हमसे छीन लेते हैं। वो. कंट्राडिक्टरी बातें इसलिए कहते हैं। आज. उन्होंने जो कहा है कल कुछ और कहेंगे, परसों कुछ और कहेंगे। यही एक जीवित. व्यक्ति का लक्षण है।.
समझिए आज मैं आपसे कुछ कह रहा हूं। जो. मुझे ठीक लग रहा है। अपने पूरे होशो हवास. में, विवेक से मुझको जो ठीक लग रहा है वो. मैं आपसे कह रहा हूं। ठीक बात है।. लेकिन साल भर बाद हम जब मिलेंगे क्या मैं. वही बात कहूंगा दोबारा? अगर मैं वही. कहूंगा तो इसका मतलब मेरा कोई विकास नहीं. हुआ। मेरी बुद्धि का मेरे विवेक की कोई. उन्नति नहीं हुई। मैं वहीं के वहीं अटक. गया। मैं मर गया एक साल पहले ही।. जहां था वहीं के वहीं अटका हूं। नहीं एक. साल में मैं जीवन के विभिन्न अनुभवों से. गुजरूंगा और हो सकता है मुझे अपनी ही. पुरानी बात में से कुछ ठीक ना लगे। और अब.
मेरे अंदर एक नई सोच पैदा हुई है।. तो ओशव समय के साथ एक जैसे सरिता बहती. जाती है प्रवाहमान। ऐसे ही ओशो एक प्रवाह. मानसिता की भांति है। वो कोई डबरा या. तालाब नहीं है बंद. कि जहां थे वहीं वैसे ही रहेंगे। तो. निश्चित रूप से 58 साल की उम्र में 58,000. बार बदल गए। अच्छा एक चीज और आती है जैसे. जो ओशो को पढ़ते हैं वो तो उनके बारे में. गहनता से जानते हैं। जिन्होंने नहीं पढ़ा. या जिन्हें सिर्फ उतना पता है जितना सोशल.
मीडिया पर कहीं झलक पाते हुए निकल गया।. उनके जेहन में ओशो की छवि एक सिर्फ सेक्स. गुरु की है। Netflix से फिल्में भी आई. जिसमें भी मूलत जो वायरल हुआ वो वही. कंटेंट वायरल हुआ जिसको दिमाग में डाल. दिया गया कि एक ऐसा व्यक्ति जो सेक्स को. लेकर बड़ा ओपन था। आजादी दी और उनको लेकर. धारणा ये बनाई गई। अब ये जानबूझकर उन्हें. बदनाम करने के लिए थी। प्रायोजित थी या ये. उनके जीवन शैली या उनकी बातों का एक बड़ा. हिस्सा था या जो शायद सबसे रोचक हिस्सा.
था। देखिए जीवन तो बहुत बहुआयामी है।. हजारों उसके पहलू हैं। निश्चित रूप से. उसमें एक पहलू काम वासना भी है।. और ओशो ने जब ध्यान सिखाया ध्यान का मतलब. होशपूर्ण होना, संवेदनशील होना, प्रेमपूर्ण होना तो जीवन के सभी आयामों. में तो उनकी ध्यान विधियां ऐसी नहीं है कि. आपको बैठ के आंख बंद करके बैठ जाना है और. किसी चीज पे एकाग्र करना है। जब आप चाय पी. रहे हैं तो होश पूर्वक पीजिए। जब स्नान कर. रहे हैं। एक-एक बूंद का स्पर्श शावर का. मजा लीजिए। पूरी संवेदनशीलता के साथ। जब.
पैदल चल रहे हैं तो पैदल चलना ध्यान है।. जब किसी से बातचीत कर रहे हैं तो वह. बातचीत ध्यान है। तो जीवन के सभी आयामों. में होश अवेयरनेस को जोड़ना है। साक्षी. भाव को जोड़ना है। निश्चित रूप से सेक्स. ही उसमें से एक हिस्सा होगा जीवन का।. तो ओशो ने उसको स्वीकारा है। उसकी सहजता. में उसकी नैसर्गिकता में। अब इस बात को. कोई एंपलीफाई करके बताए तो ये उसकी. मानसिकता को बताता है। उसकी मानसिकता में. कहीं रुणता है।. ओशो के पहले तक.
सेक्स का सदा से दमन किया गया है। उसकी. आलोचना की गई है। उसकी निंदा की गई है।. उसको पाप बताया गया है। जैसे हमें भूख. लगती है, प्यास लगती है, नींद आती है, होश. खुल जाता है। सुबह नींद खुल जाती है। ठीक. ऐसे ही सेक्स भी एक प्राकृतिक घटना है।. पाप और पुण्य की परिभाषा हम उसको क्यों. मानना? उस पर लेवल क्यों लगाना? तो ओशो ने. यहां पर सवाल उठाया कि वह गलत नहीं है। वह. पाप नहीं है।. लेकिन लोगों ने इस बात को पकड़ लिया कि. जैसे वो सेक्स को प्रमोट कर रहे हैं।. प्रमोट नहीं कर रहे हैं। एक हजारों साल से.
जो अंधविश्वास चला आ रहा था।. एक सामान्य जैविक घटना के प्रति एक. बायोलॉजिकल फेनोमिनन है। उसके प्रति जो. निषेधात्मक रुख लोगों ने अपनाया था। ओशो. ने उसको साफ किया और कहा कि इसके प्रति भी. तुम होशपूर्ण हो जाओ। साक्षी हो जाओ। यह. भी साधना का हिस्सा हो सकता है। ओशो की. 650 किताबें हैं। सबसे मोटी किताब गीता पर. है। करीब इतनी मोटी।. उससे छोटी महागीता हो गई। चीन के संत ला. सुपर जो ताऊ उपनिषद के प्रवचन माला है।.
बहुत लंबी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं. में संत कबीर पर बोले हैं।. एक दर्जन से ज्यादा उपनिषदों पे बोले हैं।. इसकी तो कहीं चर्चा नहीं करते मीडिया के. लोग। सिर्फ एक किताब सिर्फ उसको पकड़ लिया. और उसको भी किताब को नहीं पकड़ा है। सिर्फ. टाइटल को जो लोग ओशो की आलोचना निंदा करते. हैं उनमें से किसी ने वह किताब पढ़ी नहीं. जिसकी वो आलोचना कर रहे हैं। पहले पढ़ तो. लो फिर आप निंदा करना अगर उसमें निंदा. योग्य. मैं डिटेल में जाऊंगा क्योंकि वो पूरा. टॉपिक मैंने रखा है। लेकिन ओशो की जो.
शिक्षा है सर अगर मैं संपूर्ण शिक्षा की. बात करूं. तो वो पढ़ना पर्याप्त है या उसको अनुभव. करना जीना जरूरी है? पढ़ना प्रारंभिक कदम है। आरंभिक कदम है।. है ना? लेकिन उससे वह ज्ञान नहीं मिलेगा. जो ओशो हमें देना चाहते हैं।. एक ज्ञान शब्द का हम दो प्रकार से उपयोग. करते हैं। एक जानकारी है इनफेटिव नॉलेज और. एक है विज़डम, प्रज्ञा, विवेक जो हमारी. अंतरात्मा में उत्पन्न होता है। वह बाहर. से नहीं आता। तो ओशो की बातें सुनकर पढ़कर.
हम अपने पुराने अंधविश्वासों से विचार. प्रणालियों से मान्यताओं से मुक्त हो. जाएंगे और तब हमारे भीतर वह सहज ज्ञान. उत्पन्न होगा जो प्रकृति से परमात्मा से. हमें मिला है। तो ज्ञान ज्ञान शब्द के. यहां दो अर्थ हो गए। एक जानकारी वाली. ज्ञान उधार जो दूसरों ने हमारे भीतर भरा. है और हमने उसको पकड़ लिया है। उसको हम. अपना समझने लगे। ओशो कह रहे हैं यह. तुम्हारा नहीं है। तुमने कहीं से पढ़ा है, कहीं से सुना है। कहीं अनकॉन्शियसली अपने. वातावरण से अब्सॉर्ब कर लिया है। तुम्हारा.
ज्ञान तुम्हारे भीतर से आएगा। तो ओशो हमें. ज्ञान नहीं दे रहे हैं। वास्तव में उनकी. शिक्षा को हम शिक्षा नहीं कह सकते।. अंग्रेजी का जो शब्द है ना शिक्षा के लिए. एजुकेशन उसका मतलब होता है किसी चीज को. भीतर से बाहर लाना। जैसे कुएं से हम रस्सी. डाल के बाल्टी में पानी खींचे। एजुकेशन का. मतलब है खींचना। बाहर। अभी हम जिसको. शिक्षा कहते हैं वो है बाहर से भरना। जैसे. किसी टंकी में हम पानी भरते हैं तो ओशो. पानी वाली टंकी के खिलाफ हैं। वो चाहते. हैं तुम्हारे भीतर से तुम्हारी अंतरात्मा.
से झर ना फूटे। वहां से जो आएगा वो. वास्तविक ज्ञान होगा। तो ओशो की शिक्षा को. हम साधारण शिक्षा जैसा नहीं कह सकते। वो. हमको कुछ थोप नहीं रहे। हमें कुछ दे नहीं. रहे। बल्कि हमारे भीतर से जो चट्टानें आ. गई हो जिनकी वजह से अवरोध पैदा हो गया।. हमारे भीतर का झरना नहीं फूट रहा है। वो. उन चट्टानों को हटा रहे हैं। सो इट इज़ नॉट. एजुकेशन इन ऑर्डिनरी सेंस। है ना? उससे. ठीक विपरीत है। वो हमारी चट्टानों को हटा. रहे हैं ताकि हमारे भीतर जो झरना का पानी. भरा पड़ा है वो बह सके। तो ओशो की शिक्षा.
ऐसी है। सुंदर। मैं क्योंकि कहते हैं ना. किसी व्यक्ति को समझना है तो वहां समझो. जहां से उसकी शुरुआत हुई है।. जी।. अब आपने जो बताया ये ओशो को उनके जीवन. विचार को आपने सम कोशिश की समराइज करने. की। लेकिन मैं उस पहले बीज को पकड़ता हूं।. कुवाड़ा प्रदेश में वो स्थान जहां पर उनका. जन्म हुआ।. अब यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड. आमतौर पर सर यहां लोग पैदा होते हैं तो. उनको नौकरी चाकरी चाहिए होता है। एक जीवन. चाहिए होता है जहां पर आसानी से परिवार सा.
रह सके। मुझे ये जानना है कि एक बच्चा ओशो. कैसे बन गया? क्या ऐसा हुआ कि वो सवाल. करने लगा? क्योंकि ये साधारण नहीं है। जो. सवाल पूछे गए वो साधारण नहीं थे। हजारों. साल से एक परंपरा चली आ रही थी। उस परंपरा. में हर चीज से प्रश्न करना, वो विद्रोही. भावना होना, हर चीज पे सवाल कर देंगे। और. जैसा मैंने पहले भी कहा अपने सवालों पर. फिर सवाल कर देंगे।. ये आपके परिवार में पहले नहीं हुआ होगा।. ओशो जी से शुरुआत हुई शायद यही वजह रही कि. उनके माता-पिता भी उनके शिष्य बन गए। ये.
भी अपने आप में रोचक है।. तो ये कहां से आप जब उनको पढ़ते हैं, समझते हैं। आप परिवार के सदस्य हैं।. कैसे ओशो बनने की शुरुआत हुई? देखिए अगर. हम ट्रेस आउट करें पीछे. तो एक तो इस जन्म की कहानी होती है। उस. संदर्भ में मैं थोड़ा सा प्रकाश डालूंगा।. लेकिन एक्चुअली जो आत्मा है उसका तो. जन्मजनम की कहानी है पीछे है ना। ओशो ने. अपने पिछले चार चार जन्मों की चर्चा की. है।. कुछ ग्लिंसेस जो उनको दिखी उनको उन्होंने. बताया है। और उन्होंने बताया कि मैं जितना. भी पीछे देखता हूं मैं हमेशा ही अपने आप. को भगवा रंग के वस्त्रों में देखता हूं।.
मैं एक सन्यासी हूं। सत्य का खोजी हूं।. सदा से तो अब हम वहां से अगर ट्रेस आउट. करेंगे तब हमें समझ में आएगा कि इस जन्म. में अचानक ऐसे कैसे हो गए। अचानक कुछ नहीं. होता। सब चीजें पीछे से चली जाती हैं। अब. तो मनोवैज्ञानिक भी इस बात से राजी हैं कि. एक बच्चा छोटी से छोटी उम्र से ही. संगीतकार हो जाता है। सुरताल की उसकी गहरी. पकड़ कभी बेसुरा नहीं होता। कभी बेताल. नहीं होता। ये कहां से आया है? इस जन्म के. माता-पिता ने या माहौल ने तो उसको नहीं. सिखाया था। अभी इतनी छोटी उम्र में कहां. से उसको ये कला आ गई? पिछले जन्मों से कुछ.
ले आया है जिसको हम कहते हैं हिडन टैलेंट।. तो ओशो के अंदर वो जो विद्रोही आत्मा है. रेवेलियस स्पिरिट वो इस जन्म की अकेली. नहीं है। पिछले कई जन्मों का उसमें योगदान. है। उनके चिंतन मनन सोच विचार तर्क क्षमता. ये जन्मों जन्मों में विकसित हुई है। एक. जन्म में कोई कर भी नहीं सकता। और जब हमें. उतनी छोटी उम्र में वो लक्षण दिखाई देते. हैं तो निश्चित रूप से अभी तो कोई शिक्षा. दीक्षा हुई नहीं। किसी ने बताया नहीं है।. तो एक तो वो कहानी हो जाती है लेकिन वो तो. काफी मिस्टीरियस है। उस बारे में कोई.
प्रमाण भी नहीं है। लेकिन इस जन्म की. कहानी जो आपने पूछा वो कहूं. हां ये तो फिर वैसे ही हो जाएगी जैसे हम. बाकी धर्मों. फिर अंधविश्वास करना पड़ेगा।. जिस पर आप सवाल उठा रहे हैं।. हां जी उसको हम छोड़ देते हैं। इस जन्म की. घटना लेते हैं। मेरी मां. मेरे नाना नानी की इकलौती संतान थी।. हम. वो छोटे से गांव कुवाड़ा में रहते थे। और. मेरी मां को अचानक ही ससुराल जाना पड़ा।. पुराने जमाने में बाल विवाह हुआ करते थे।. तो मेरी मां जब 13 साल की थी तब मेरी दादी. की डेथ हो गई।.
हम. मतलब मेरी मां की सास है ना और तब अचानक. उस परिवार में और कोई महिला थी ही नहीं जो. संभाल सके। मेरे पिताजी सबसे बड़े भाई थे।. तीन भाई दो बहनें थी उनकी। वो सबसे बड़े. थे। तो मेरी मां को ससुराल जाना पड़ा। उस. छोटी उम्र में अब 13 साल की उम्र में वो. सबसे बड़ी थी। मां घर संभालने वाली, गृहस्ती संभालने वाली।. तो मेरे नाना नानी को बहुत लगता था कि. हमारी छोटी सी बेटी जिसको इतने लाड़ प्यार. से पाला और अचानक उसके ऊपर इतनी. जिम्मेवारियां और काम आ गए है ना जब 17 18.
साल की उम्र में वो प्रेग्नेंट हुई तब. नाना नानी ने कहा कि बच्चा हमारे यहां ही. पैदा हो औरकि हम अकेले हो गए गांव में. इकलौती बेटी थी वो चली गई ससुराल तो वह. बच्चा हम ही पा लेंगे तो उन्होंने मेरे. पिताजी से ये आग्रह किया वो पिताजी राजी. हो गए कि ठीक है क्योंकि हमारे घर में और. कोई है भी नहीं और मेरी मां का पहला बच्चा. है। उनको भी अनुभव नहीं है। मां होने का. संभालने का तो अच्छा है कि बड़े बुजुर्ग. लोग पालें।.
पुराने जमाने में भेजा भी करते थे।. ऐसा होता था।. तो मेरी मां की जो फर्स्ट डिलीवरी हुई वो. ननिहाल में हुई और नाना नानी ने वह बच्चा. मांग लिया कि इसको हम ही पालेंगे।. तो अब वहां पे एक अलग माहौल मिला।. माता-पिता क्या करते हैं? बच्चे को. डिसिप्लिन करते हैं। आपने देखा होगा।. लेकिन जो दादादी या नाना नानी है वो लाड़. प्यार बहुत करते हैं। उनको डिसिप्लिन करने. की नहीं पड़ती। है ना? बल्कि हमेशा. माता-पिता कंप्लेन करते हैं कि तुमने. बच्चे को बिगाड़ दिया। बहुत ज्यादा लाड़.
प्यार कर दिया। है ना? तो नाना नानी की लाड़ प्यार की छांव में. ओशो बड़े हुए। तो उन्होंने खूब छूट दे रखी. थी कि तुमको जो करना हो करो। हर चीज में. वो सपोर्ट करते थे। है ना? वो कुछ उपद्रव. भी करें, शरारत भी करें, किसी को तंग भी. करें। तो नाना नानी उनके साथ खड़े हैं।. उन्हीं का पक्ष लेंगे वो। तो इस प्रकार से. उनका अर्ली लाइफ जो थी उसमें उनकी. विद्रोही प्रवृत्ति को पूरा समर्थन दिया. गया। उनको प्रोटेक्ट किया गया उसके लिए और.
बड़ी उम्र तक वो उस स्थिति में रहे। जब वो. सात साल के हुए तब नाना जी की किसी बीमारी. से डेथ हो गई। तब फिर नानी को भी शिफ्ट. होना पड़ा। दाढ़ा जहां. हमारे. माता-पिता के वहां पर है ना? क्योंकि उनका. और कोई था ही नहीं। कोई रिश्तेदार नहीं. था। मेरी नानी का भी कोई रिश्तेदार नहीं. था। कोई भाई बहन नहीं थे। कोई भी नहीं था।. तो वो वहां पहुंची। तो ओशो भी उनके साथ. वहां पे आया। तब वो ऑलरेडी सात साल के हो. चुके थे। अच्छा हमारे पिताजी का कहना था. कि बचपन जो है खेलने कूदने के लिए। पढ़ाई.
लिखाई बाद में हो जाएगी। कोई जल्दी नहीं. है।. हम. तो 10 साल तक उन्होंने स्कूल नहीं भेजा।. तो एक तो सात साल वो उस छोटे गांव में रहे. जहां सब प्रकार की स्वतंत्रता नाना नानी. की प्रेम की छाया में उनको मिली थी। हम. जिसको दूसरे लोग कहेंगे कि बिगाड़ दिया. और फिर पिताजी ने भी तीन साल तक स्कूल. नहीं भेजा। उन्होंने कहा खेलो कूदो मजा. करो। अभी मजा करने के दिन है। पढ़ाई लिखाई. बाद में हो जाएगी। ओशो ने कई बार प्रवचनों. में इस बात का जिक्र किया है कि वो आरंभ.
के 10 साल जो मैं अपने स्वतंत्र ढंग से जी. सका। मेरे ऊपर कोई आदेश नहीं था। कोई. डिसिप्लिन नहीं था। कोई अनुशासन नहीं था।. उससे मेरी फ्री थिंकिंग कैपेसिटी डेवलप. हुई। एक स्वतंत्र सोच है ना वो जो सोचना. चाहे वैसा सोच सकते हैं वैसा कर सकते हैं।. निश्चित रूप से उस उम्र में ही उनकी. विद्रोही प्रवृत्ति खूब उजागर हो गई। है. ना? आसपास के लोगों को उनको बर्दाश्त करना. भी मुश्किल हो गया। लेकिन एक बात थी जो. जिसको दूसरे लोग कहेंगे कि शरारत करते.
हैं। उस शरारत में भी एक तर्क होता था। एक. लॉजिक और आर्गुममेंट होता था। और आप ये. नहीं कह सकते कि इस लड़के ने कुछ गलत किया. है क्योंकि वो सिद्ध करेंगे कि मैंने जो. किया है वो सही है। जैसे आप आप अपने. परिवार में तो बाद में पैदा हुए. लेकिन आई एम श्योर इस किस्से कहानियां भरे. पड़े होंगे और आप छोटे होंगे तो आपसे. तुलना भी की जाती होगी तो कभी कोई जिक्र. किया माता जी ने या किसी और परिवार सदस्य. ने कि. देखो किस्से सुनने आते थे कि. उनके विद्रोहियों के बारे में कि लोगों को. इरिटेट कैसे कर दिया उन्होंने यहां सवाल. से कैसे लोग झुझलाते थे.
झुंझुलाते थे लोगों खासकर साधु संतों को. समाज के ठेकेदारों को जो समाज के नियम. कानून बनाते हैं कि ऐसा होना चाहिए वैसा. होना चाहिए उन्होंने हर चीज पे प्रश्न. खड़ा किया और उसके उसके विपरीत करके. दिखाया। प्लस उसके तर्क दिए कि ऐसा क्यों. कर रहे हैं? कोई उदाहरण याद है आपको? कोई किस्सा याद. है? जैसे एक उदाहरण मैं दूं।. हम. इस धर्म से कोई लेना देना नहीं। लेकिन. कैसे इरिटेट करते थे लोगों को? गांव में. एक नया डॉक्टर आया था। उसका नाम था डॉ. हीरालाल गोत्रे। तो उसने अपना बोर्ड लगाया.
डॉ. हीरालाल गोत्रे एमबीबीएस और सुबह. मिलने का समय इतने बजे से इतने बजे तक शाम. का इतने बजे। अब ओशो को सूझा कि अपन देखते. हैं इसको कंकर. ओशो वहां खड़े होकर उसका बोर्ड पढ़ रहे. आराम से धीरे-धीरे डॉक्टर हीरालाल गोत्री. अभी स्कूल में नए-नए जाना शुरू किए हैं. पूरा एकदम से पढ़ भी नहीं सकते जोर से बोल. के पढ़ रहे हैं फिर इनके पीछे इनके मित्र. आएंगे उनके फॉलोवर तो हमेशा से वो आके. खड़े हो के पढ़ेंगे तो दो चार के लोग तो.
डॉक्टर साहब ने सुना फिर वो कहने लगे तुम. लोग खड़े होकर क्यों पढ़ते हो बार-बार तो. कहा कि हमारे माता-पिता कहते हैं कि जो भी. पढ़ने की चीज मिले पढ़ो। स्कूल में. शिक्षकों ने सिखाया कि नहीं तो पढ़ना. सीखेंगे कैसे? तो हम लोग हर चीज जोर-जोर. से पढ़ते हैं ताकि हम सीख जाए ठीक से। अब. ये सिलसिला शुरू हुआ। डॉक्टर साहब चिढ़ने. लगे थोड़े दिनों में। वो भगाने के लिए आए।. इवन गाली गलौज करने लगे। मारने पीटने के. लिए दौड़े। अब गांव के लोग उनसे पूछेंगे. भाई आप नाराज क्यों हो रहे हो? वो लड़के.
कह रहे हैं कि हम वोट पढ़ रहे हैं। तो. आपने बोर्ड लगाया किस लिए? उष का कहना था. आपने बोर्ड किस लिए लगाया? तो वो कहेंगे. पढ़ने के लिए तो हम पढ़ ही तो रहे हैं। आप. नाराज क्यों हो रहे हो? अगर आप नहीं चाहते. पढ़ने तो आप हटा लो बोर्ड। अब डॉक्टर साहब. बड़ी मुसीबत में इस लड़के का कोई जवाब भी. नहीं दे सकते। अच्छा ये बात पूरे स्कूल. में फैल गई। अब लोग वहां से गुजर रहे हैं. ऐसे लड़के। सुबह शाम स्कूल जाते हुए आते. हुए सैकड़ों लड़के पढ़ रहे हैं। डॉक्टर. हीरालाल गोत्रे एमबीबीएस. बेचारे का दिमाग खा लिया। वो बार-बार कहीं.
पत्थर ले दौड़ रहा है, कहीं डंडा ले दौड़. रहा है। वह मोहल्ले के लोग हंस रहे डॉक्टर. साहब आप क्यों बच्चों के पीछे दौड़ रहे. हो? कुछ गलत तो नहीं कर रहे पढ़ रहे हैं।. दो-तीन महीने बाद वो. बोरिया बिस्तर बांध के चले गए वहां से।. ओशो के एक मित्र थे कंचेदी लाल शुक्ल।. मैंने उनसे सुना बहुत बाद में कि अगर वो. नहीं जाता छोड़ के डॉक्टर तो हम लोग एक. दूसरी ट्रिक अपनाने वाले थे और छोटे. बच्चों को हमने समझाया था बिल्कुल फर्स्ट.
पहली क्लास के बच्चों को तुम लोग हिज कर. करके पढ़ना इसकी स्पेलिंग। ह में इ की. मात्रा ही र में आ की मात्रा र हीरा ल में. आ की मात्रा ला छोटा ल लाल हीरा लाल पांच. मिनट लगेंगे पूरा बोर्ड पढ़ने में पांच. मिनट में उसका खून खोल जाएगा. तो ओशो कई प्रकार से मेरे को लगेगा कि. शरारत कर रहे हैं लेकिन वो तर्कपूर्ण. शरारत है। किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा. रहा है। कोई वायलेंस नहीं कर रहे हैं।.
या तो आप उनकी बात का जवाब दो. यह बोर्ड किस लिए लगाया था? पढ़ने के लिए. हम पढ़ ही तो रहे हैं। क्या गलत कर रहे. हैं? और हमको पढ़ना सीखना है। हम तो स्कूल. के बच्चे हैं। अभी हम तो ये तो चलिए बहुत. ही शुरुआती बात हो गई कि आपने ऐसा कई. बच्चे करते हैं जो इरिटेट करते हैं, परेशान करते हैं, लॉजिकल होते हैं। फैमिली. में कब रियलाइज होने लगा कि नहीं यार ये. बच्चा थोड़ा अलग है। डिफरेंट है। ये वैसा. नहीं है जैसा बाकी बच्चे देखते हैं हमारे. खानदान में या स्कूल में या जो बाकी बच्चे. हैं।. खासकर जब वो स्कूल गए वहां से उनका. विद्रोही स्वभाव और भी उजागर हुआ। क्योंकि.
बार-बार पिताजी के पास फिर शिकायत आती. शिक्षक आकर कहते कि उसने ऐसा किया, उसने. ऐसा किया। जब बुला के पिताजी पूछते तो ये. अपने पूरे लॉजिक देते कि हमने ऐसा क्यों. किया? हम. है ना? मान लीजिए कि शिक्षक ने उनको. छुट्टी नहीं दी। इन्होंने कहा कि मेरे पेट. में दर्द है।. हम. मैं छुट्टी चाहता हूं। तो शिक्षक ने कहा. कि दर्द दिखाओ कहां है? कोई ऐसी चीज बताओ. जिसको हम जान सकके। अगर बुखार चढ़ा है तो. हम टच करके समझ जाएंगे कि बुखार चढ़ा है।. दर्द का कोई प्रमाण नहीं इसलिए हम दर्द को. मानते ही नहीं। इसकी कोई छुट्टी नहीं.
मिलेगी। उसने कहा ठीक है।. उस एक पेड़ पर चढ़ गए जहां से वो शिक्षक. गुजरता था। है ना? आम का पेड़ था। एक खूब. बड़ी साइज का आम उन्होंने तोड़ा और जब वो. शिक्षक वहां से गुजरा तो उसके सिर पर दे. मारा जोर से। अब वो करा है तो वो बेटा सिर. में चोट लग गई उसको जोर से। है ना? चक्कर. खा के वो गिरा। अन्य सब लोग दौड़े दौड़े. आए। देखा ओशो ऊपर बैठे हुए हैं। मारा है।. ओशो नीचे तो उन्होंने कहा है दर्द कहां. है? आप बताइए क्या मैं छू सकता हूं आपके. दर्द को? टीचर समझ गया कि इस लड़के से.
पंगा लेना ठीक नहीं। उन्होंने कह दिया कि. तुमको जब आना हो आओ जब जाना हो जाओ। मुझसे. पूछने की भी जरूरत नहीं। जब तुम्हें. छुट्टी लेना हो ले लो। तुम्हारा दर्द हमने. मान लिया। बहाना बनाने की जरूरत नहीं।. ओके। आपके परिवार में जो माता-पिता थे. उनका नाम क्या था पूरा सर? मेरे पिताजी का नाम था श्री बाबूलाल जैन. और मेरी मां का नाम था सरस्वती बाई जैन।. यह सवाल मैंने इसलिए पूछा ताकि ओशो तो. धर्म को नहीं मानते थे। धर्म के खिलाफ. सवाल किए लेकिन पारिवारिक जो जड़े थी उनको.
समझने की मेरी कोशिश थी। अब सवाल ये है कि. एक मिनट इस बारे में थोड़ा सा बता दूं।. जी. जैन धर्म से सामान्यतः लोग ख्याल आता है. श्वेतांबर जैन और दिगंबर जैन दो से एक्ट. बड़े हैं। हमारा जो परिवार था इन दोनों. कैटेगरी में नहीं था। हम. आज से करीब 500 600 वर्ष पहले शायद गुरु. नानक के समकालीन. हम. बुंदेलखंड इलाके में जो मध्य प्रदेश और. यूपी में फैला हुआ है उस इलाके में एक संत. हुए संत तारण तरण. हम. तो वो जैन परिवार से थे लेकिन उन्होंने एक.
बिल्कुल ही नए ढंग की सूत्रपात किया वो भी. काफी विद्रोही थे ना वो श्वेतांबर हुए ना. वो दिगंबर हुए एक नई ही परंपरा उनसे. शुरुआत हुई तो उनके जो मंदिर होते हैं. तारणपंथी कहलाते हैं उनके मानने वाले तो. हमारा परिवार तारणपंथी परिवार था तो वहां. पर भगवान महावीर की भी मूर्ति नहीं होती।. किसी तीर्थंकर की मूर्ति नहीं होती। वहां. केवल किताबें होती हैं शास्त्र पढ़ने के. लिए जो मंदिर में आए वहां पूजा पाठ करने. को कुछ नहीं है। अध्ययन मनन कीजिए, चिंतन. कीजिए, विचार कीजिए। है ना? और साधना.
कीजिए। ये तारण तरण का संदेश था। तो तारण. तरण का साहित्य उन मंदिर में होता है।. पूजा पाठ जैसी कोई चीज नहीं होती। कोई. मूर्ति भी वहां पर नहीं होती। किसी. तीर्थंकर की मूर्ति नहीं होती। तो हमारा. परिवार उस परंपरा से आता था। जैसे गुरु. नानक देव जी के गुरुद्वारे में कोई मूर्ति. नहीं है। हम. गुरु ग्रंथ साहब हैं। पढ़ो समझो साधना. करो। है ना? कुछ मानने की जरूरत नहीं समझो. और साधना करो। तो एक प्रयोगशाला जैसी तो.
ठीक ऐसा ही तारण पंथ में था। हम. तो यह थोड़ी भिन्न सिस्टम है. हम. जैन परंपरा से और यह भी समझना उपयोगी होगा. कि ओशो ने आरंभ में उससे प्रभावित वो रहे. हैं।. हम. आपको जानकर. शायद आश्चर्य होगा जबलपुर में तारण समाज. का एक बहुत बड़ा वर्ग है।. हम. और वहां पर संतारण तरण जयंती मनाई जाती. है। साल में एक बार एक बहुत बड़ा समारोह. होता है। जिसमें विभिन्न देशों प्रकार के. वक्ता अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग.
संप्रदायों के सबको बुलाया जाता है। वो. केवल जैन धर्म तक लिमिटेड नहीं है।. सब प्रकार के वक्ता विद्वान वहां आते हैं. और भाषण देते हैं अपना। ओशो उस समिति के. अध्यक्ष रहे करीब-करीब 12 साल तक। ओशो की. जो आरंभिक किताबें हैं वह संत तारण तरण पर. हैं। उस समय जो प्रकाशित हुई है वहां. उन्होंने जो प्रवचन दिए संत तारण तरण के. ऊपर और उस समिति के अध्यक्ष वो 12 साल रहे. हैं। उस मंच के अध्यक्ष रहे हैं 12 साल. तक।. ठीक है। अब जैसे ओशो जी का एक स्टेटमेंट. था कि मैं धर्म के खिलाफ नहीं हूं। मैं.
झूठ के खिलाफ।. जी।. अब. झूठ आपको तब समझ में आएगा जब उस चीज का आप. अध्ययन करेंगे। आपने कहा कि तारण जी को वो. पढ़ते थे, समझते थे। अ तो जो धर्मों पर या. धर्म की कुरीतियों पर उनकी टिप्पणियां थी. उसका अध्ययन हुआ था। जी उन्होंने खूब. अध्ययन किया है। स्कूल तो गए वो 10 साल. में लेकिन दो-तीन साल पढ़ने के पश्चात ही. जब वो पढ़ने योग्य हो किताब पढ़ सकते हैं।. वहां से उनकी फास्ट स्पीड स्टडी शुरू हुई।.
इतनी किताबें इतनी किताबें पढ़ी हैं। मैं. आपको एक दो उदाहरण बताता हूं। आप अभी. जाएंगे आप गार्डरवारा वहां की जो पब्लिक. लाइब्रेरी है सार्वजनिक पुस्तकालय अभी भी. वो कार्ड उस समय के प्रिजर्व उन लोगों ने. किए हुए हैं जहां ओशो के दस्तखत हैं जहां. उन्होंने किताब इशू कराई हैं। लाइब्रेरी. का नियम था एक व्यक्ति एक बार में दो. किताब इशू करा सकता है। आप देखेंगे वहां. तीन कार्ड हैं जिन पर ओशो के साइन है। एक. खुद के नाम का, एक छोटे भाई के नाम का और. एक चाचा जी के नाम का। तो छह किताबें एक. दिन में ले जा रहे हैं वो पढ़ने के लिए।.
आश्चर्य होता है उस छोटी उम्र में छह. किताबें गंभीर गंभीर विषयों की है ना किसी. बच्चे को जिसमें कोई इंटरेस्ट नहीं हो. सकता अपने को भरोसा नहीं आता कि इसमें. किसको इंटरेस्ट होगा बच्चे को. उन्होंने कितनी पढ़ाई की जिसका हिसाब नहीं. उनकी पढ़ाई की रुचि देख के मेरे पिताजी ने. एक कमरा बनवाया है. जिसमें केवल अलमारी अलमारी और कुछ नहीं. ताकि उनकी किताबें रखी जा सके और इतनी. किताबें उन्होंने खरीदी इतनी किताबें. खरीदी जब मैट्रिक में वो गढ़वाड़ा छोड़ के. गए जबलपुर वह पूरा कमरा लबालब भरा हुआ था.
किताबों से। वह सारी किताबें फिर उन्होंने. वहां की सार्वजनिक पुस्तकालय में डोनेट कर. दी।. जब उनका यह विद्रोही स्वभाव बढ़ रहा था. शुरू में तो परिवार में कोई असहज हुआ था।. आरंभ में थोड़ी असहजता थी। खासकर पिताजी. को मां को उतनी असहजता नहीं थी क्योंकि. पिताजी को आसपास की सब शिकायतें सुननी. पड़ती। तुम्हारे बेटे ने ऐसा किया वैसा. किया। और उनके खतरनाक काम जोखिम भरे जिसको. कहे हम खतरे की खिलाड़ी वाली चीजें वो सब. पता चलती थी कि ऐसा किया है जान जोखिम में.
डाल के है ना तो पिताजी पहले उनको समझाते. थे डांटते भी थे कभी एक बार थप्पड़ भी. मारा लेकिन फिर समझ में आएगा कि. ये जो कह रहा है वो सही है और मैं जो कह. रहा हूं वो झूठ है वो गलत है. जब उनको यह समझ में आ गया कि इससे आप तर्क. नहीं कर रखते है ना इसके पास अद्भुत तर्क. क्षमता है। एक छोटा सा उदाहरण दूं जब. उन्होंने चांटा मारा था। ओशो को शौक था. लंबे बाल रखने का हम.
घुंघराले उनके लंबेलंबे बाल थे खूब और. कपड़े भी वो पहनते थे कुछ. चमकदार से है ना तो अक्सर वैसे कपड़े. लड़कियां पहनती और लंबे बाल भी लड़कियों. के होते थे गांव में कोई लड़का लंबे बाल. उस समय नहीं रखता था। तो दुकान में जो. ग्राहक आते वो पिताजी से पूछते बेटी किसकी. है? अब पिताजी को बड़ा संकोच लगता है। उस. जमाने में बहुत भेद भेदभाव था बेटा और. बेटे में। शायद आज आप उस चीज को अप्रिशिएट. नहीं कर पाएंगे। पुराने जमाने में बड़ा.
भेद था। बेटे का होना बड़ा गर्व माना जाता. था और बेटी का होना बड़ी इनफीरियर बात हो. गई। शर्म की बात हो गई। अब बेटा है और सब. लोग समझ रहे हैं कि बेटी है। तो उन्होंने. डांटा एक दिन जोर से कि तुम ये बाल कटवा. के आओ।. है ना? बहुत नाराज हुए। तो वो चले गए बाल. कटवाने। एक नाई की दुकान पर गए। कई नाई की. दुकान कई दुकानें थी। उसमें एक था जो. अक्सर भांग पी के काम करता था। अफीम खाता. था वो। ये ओशो उसके पास गए और उससे कहा कि.
मेरा सिर पूरा मुंडन कर दो। हमारे गांव. में वो जो कल्चर है वहां का सिर मुंडन तब. किया जाता है जब पिताजी का देहांत हो जाए।. सभी जगह मतलब ऐसे ही होता है ना।. हां।. तो अब वो तो नसलची था। ना ही उसने पूछा ही. नहीं। देखा ही नहीं कौन है क्या है। सोचा. कि पिताजी खत्म हो गए होंगे। उसने सिर. पूरा मुंड दिया। ओशो वापस जब घर पर आए अब. पिताजी को देख के बहुत दुख हुआ कि हमने. बाल कटवाने कहा था ये पूरा सिर मुंडन करवा. के आया। अब एक नई मुसीबत और खड़ी हो गई।. अब जो ग्राहक आए वो कहे अरे अरे रे.
बेचारा लड़का इतनी छोटी उम्र में बताओ. इसके पिता चल बसे।. अब उनको पिताजी को बताना पड़े चल बसे नहीं. हम यहां जिंदा बैठे हैं। मैं हूं इसका. पिता। फिर पिताजी को बहुत गुस्सा आया। जब. दो तीन बार ऐसा हुआ लोगों ने बड़ी. सहानुभूति प्रकट की कि इतना छोटा बच्चा. बताओ अनाथ हो गया तब पिताजी ने एक झापड़. मारा. फिर उनको यह समझ में आ गई कि इसके साथ ना. तो हिंसक व्यवहार कर सकते आप क्योंकि. हिंसा का ये कोई प्रत्युत्तर नहीं दे रहा.
लेकिन यह जो कर रहा है ना और एक्सट्रीम पे. चला जाएगा ये है ना इसके पास अपनी चीजों. के तर्क है आपने कहा था बाल कटवा के आओ अब. मैं पूरे कटवा के आ गया अच्छे से ताकि. लड़की जैसा ना लगूं. फिर पिताजी ने कुछ भी कहना बंद कर दिया और. यह भी समझ में आया कि यह जो कर रहा है. यही वास्तव में सही है। है ना? और हम. परंपरागत रूप से जो कर रहे थे, मान रहे थे. समाज की मर्यादाओं को उस. ये शुरू में हार मान ली होगी कि भाई अब. छोड़ दो इसे।. छोड़ दो।. इसे अपने हिसाब से रहने दो। क्योंकि हम.
धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। सर एक ओशोस जी. ने सागर यूनिवर्सिटी में पढ़ाया भी था।. पढ़ाया नहीं था। पढ़ा था।. पढ़ा था वहां पे। लेकिन ओशो की टीचिंग आज. दुनिया भर में पढ़ी जाती है। उसके लोग. चिंतन मंथन करते हैं। हिंदुस्तान की. यूनिवर्सिटीज के पाठ्यक्रम में कहीं ओशो. का जिक्र नहीं मतलब पढ़ाया नहीं जाता है।. सच. जी पढ़ाया जा रहा है। जबलपुर यूनिवर्सिटी. में पढ़ाया जा रहा है।. अच्छा ये गुजरात में दो यूनिवर्सिटी है. जहां पढ़ाया जा रहा है।. इंटरेस्टिंग। एक सन 1923 में ओशो चेयर की. स्थापना हुई भावनगर यूनिवर्सिटी में और. फिर भावनगर में ही एक दूसरा कॉलेज है जो.
ऑलमोस्ट यूनिवर्सिटी का रूप ले चुका है।. पिछले नहीं पिछले साल नहीं इसी साल जनवरी. में वहां पे ओशो चेयर की स्थापना हुई. और अभी दिल्ली में जो इंदिरा गांधी ओपन. यूनिवर्सिटी है उसमें आज सुबह ही मैंने वो. प्रपोजल तैयार किया है कि जहां पे छ महीने. का ओशो फिलॉसफी का कोर्स लागू किया जाएगा।. उसकी तैयारी चल रही है और हो सकता है आपको. कुछ ही दिनों में मैं शुभ समाचार सुनाऊं. कि दिल्ली में भी वह शुरू हो चुका है ओशो. फिलोसफी. इंटरेस्टिंग बट फिर भी इतने लंबे समय तक.
ओशो की टीचिंग्स को इंडिया में उस तरह से. इंप्लीमेंट नहीं किया कि लोग जो स्पेशली. यंग यूथ है वो उनको पढ़े समझे जाने और. उनसे वाद विवाद शुरू करें।. देखिए जहां से शुरुआत हुई है भावनगर से. अपन मान के चलें। हम. आपको हैरानी होगी जानकर 700 बच्चे हैं जिस. जिनको सेलेक्ट करना था उनके पास करीब 10. ऑप्शन थे वो कोर्स चुनने में 700 में से. 650 ने ओशो को चुना है.
केवल 50 विद्यार्थियों ने अन्य 10. अल्टरनेट्स में से चुना है। अब आप इससे. समझ सकते हैं कितना आकर्षण है ओशो में और. उसी से प्रभावित होके भावनगर की दूसरी. यूनिवर्सिटी ने भी इस साल कोर्स शुरू कर. दिया। तो ये जो उनकी टीच अभी शुरुआत हुई. है छोटे-छोटे स्टेप लिए गए लेकिन एक लंबे. समय तक स्टेप्स नहीं लिए गए या उनकी. टीचिंग्स को इंप्लीमेंट नहीं किया गया और. एक कॉमन माइंडसेट है अभी भी देश में कि. ओशो की टीचिंग जो है वो जो हिंदुस्तानी. सभ्यता संस्कृति है उसके खिलाफ है।.
ओशो हर वो चीज सिखा रहे हैं जो हमारी. सभ्यता का हिस्सा नहीं है। हमारे कल्चर का. हिस्सा नहीं है। और एक ऐसा वक्त जब लोग. कहते हैं कि अपने कल्चर पर आप प्राउड. होइए। अपने कल्चर को आप ओन कीजिए। तो ओशो. की टीचिंग उसके खिलाफ जाती है।. देखिए ओशो एक भविष्य की दृष्टि हमें दे. रहे हैं। निश्चित रूप से अतीत से वो बंधे. हुए नहीं है। जो भी व्यक्ति भविष्य की. संभावनाओं को उजागर करेगा ग्रोथ के लिए, विकास के लिए उसको अतीत के खिलाफ होना. होगा। देखिए हम एक सीढ़ी पे अगर चढ़ रहे. हैं और मुझे ऊपर वाली सीढ़ी पे पैर रखना.
है तो नीचे वाली सीढ़ी से पैर उठाना होगा।. हम्म. अगर नीचे वाली सीढ़ी पे मेरे पैर को चिपका. दिया जाए फेविकॉल से फिर मैं ऊपर वाली. सीढ़ी पे जा ही नहीं सकूंगा। तो ये विकास. का इवोल्यूशन का एक हिस्सा है कि हमें. अपने अतीत से मुक्त होना होता है। तभी हम. आगे जा पाते हैं।. हम देखते हैं पिछले 300 350 साल में ही. विज्ञान जन्मा और कितना विकसित हो गया।. सरप्राइज मिरेकुलस क्यों? क्योंकि. वैज्ञानिकों के गिरोह नहीं है। उनके.
संप्रदाय नहीं है। उनके संगठन नहीं है और. वो हमेशा अतीत को छोड़ने राजी हैं। नई चीज. के लिए। मान लीजिए न्यूटन ने बताया था. गुरुत्वाकर्षण कि कोई दो भी पदार्थ होंगे. आपस में वो एक दूसरे को खींचते हैं। 300. साल तक हम मानते रहे। फिर आइंस्टीन आया. उसने कहा कि नहीं ये बात गलत है और उसने. स्पेस टाइम थ्योरी बताई कि उसमें कर्वेचर. बन गया है। इसलिए ऐसा लगता है कि दो चीजें. पास आ रही हैं। खींच रही है। एक दूसरे को. खींच नहीं रही। कर्वेचर ऑफ स्पेस टाइम और.
आइंस्टीन की बात के सारे प्रमाण मिल गए।. तो हम न्यूटन को छोड़ दे तुरंत तैयार हो. जाते हैं। कल को आइंस्टीन से आगे कोई और. नई बात आएगी तो हम आइंस्टीन को भी छोड़ने. तैयार हो जाएंगे। हम सत्य के पक्षधर हैं।. हम किसी व्यक्ति के अनुयाय नहीं है।. हम. हम धन्यवाद देंगे कि न्यूटन को 300 साल तक. हम उसकी बात मानते रहे। है ना? आज हमें. पता चला कि वो बिल्कुल भ्रम था।. है ना? कोई किसी को खींच नहीं रहा है।. वास्तव में हमें वो शब्द अब बदलने देना. चाहिए। गुरुत्वाकर्षण उसमें आकर्षण कहीं. है ही नहीं। एक तिरछा सरफेस है। उसमें एक.
लुढ़क के उसके पास आ रही है। लुढ़क के. आकर्षण कहीं नहीं है। तो विज्ञान में हम. हमेशा नए को स्वीकारने तैयार हो जाते हैं।. अगर वह प्रमाणित हो जाए तो और निश्चित. नहीं होते।. है ना? धर्म विकास नहीं कर पाया 10,000. साल में। उसकी वजह है उसमें लोगों ने अपने. गिरोह जमा लिए हैं। संगठन बना लिए हैं और. अंधविश्वास थोप दिया। आपको यही मानना. होगा। आप इससे हट ही नहीं सकते। फिर हट. नहीं सकते। तो फिर विकास कैसे होगा? ठीक है? विकास तो तभी होगा जब हम कुछ.
उसमें कुछ गलत साबित होगा तब हम आगे का. कदम उठाएंगे। तो क्या अपने अतीत को छोड़ने. के लिए रजनीश चंद्र मोहन ओशो बन गए? हां वो अतीत से सदा मुक्त रहे. कि ये नाम जो है रजनीश चंद्र मोहन हटा. दिया जाए ताकि पुरानी पहचान गायब हो जाए।. या इससे धर्म ना पता लगे ये भी एक वजह हो. सकती है. कि धर्म मुक्त हो जाए। क्योंकि रजनीश. चंद्र मोहन सुनकर एक धारणा बनती है। शायद. सर्व समाज नहीं जुड़ेगा। बट ओशो एक ऐसा.
नाम है जिसके साथ सब जुड़ जाएंगे।. देखिए ऐसी कोई बात नहीं जोड़ने फोड़ने का. सवाल नहीं है। एक व्यक्तिगत अनुभव की घटना. से यह नाम आता है। पहले मैं आपको रजनीश. नाम बताऊं कैसे आया? शायद आपको नहीं पता. होगा।. जी. जब ओशव का स्कूल में नाम लिखाने जा रहा था. तो इसके पहले उनका कोई नाम नहीं था। नाना. नानानी उनको राजा कहकर पुकारते थे। वो कोई. नाम नहीं था। ऐसे ही संबोधन जैसे प्यार से. पुकारते हैं। राजा. अब सवाल उठा कि इनका नाम क्या? तो ओशो ने. जिद्द की कि पहले मेरा ऐसा नाम चुनो जो आज.
तक किसी का नहीं रहा। यानी वो डिक्शनरी. में होना नहीं चाहिए शब्द। अब बड़ी. मुश्किल हो गई। नाम तो सबके वही रखे जाते. हैं जो परंपरागत रूप से चले आ रहे हैं। वो. उनका नहीं। परंपरा से चले आ रहे हैं। वो. नाम मुझे पसंद नहीं। बिल्कुल नया शब्द. होना चाहिए। मेरे चाचा जी एक कवि थे, साहित्यकार थे। है ना? उन्होंने कई दिन तक. मेहनत की एक नया शब्द गढ़ने की और फिर. उन्होंने एक नया शब्द गाढ़ा रजनीश। ये. आपको कहीं डिक्शनरी में नहीं मिलेगा और. इसका एक मीनिंग उन्होंने निकाला। फिर रजनी.
यानी रात और ईश रजनी का ईश रात का देवता. चांद। तो इनडायरेक्ट वे में चंद्रमा और. फिर वो अलंकार प्रिय थे कवि थे। रजनीश फिर. चंद्र भी उसने उन्होंने जोड़ दिया। तो. लंबा नाम रजनीश चंद्र मोहन इस प्रकार ओशो. का नामकरण हुआ। तो पहले ही नाम सब. परंपराओं को तोड़ने वाला है अपने आप में. नया। इसलिए आप देखेंगे ओशो के पहले 1931. के पहले किसी का भी नाम रजनीश कभी नहीं. था। ना हिंदी डिक्शनरी में ये शब्द ही.
आपको नहीं मिलेगा। हां अब होने लगे नाम. सुनसुन के लोग अपने बच्चों के नाम रखने. लगे।. अब तो काफी लोग रजनीश मिल जाएंगे।. हां।. तो रजनीश एक नए व्यक्तित्व का उसमें. इरेबिलिस स्पिरिट वहीं से आ गई कि नाम भी. उनको स्वीकार नहीं। दूसरे का उधार. हम दूसरे का ज्ञान तो स्वीकार है ही नहीं।. नाम भी स्वीकार नहीं जो पहले किसी का हो. चुका है। वह बिल्कुल नए हैं। फ्रेश एक. न्यू बिगिनिंग। फिर नामकरण ऐसे हुए कि जब. वो पढ़ाने लगे तो प्रोफेसर को हिंदी में.
आचार्य कहते हैं तो सब लोग उनको आचार्य जी. कहने लगे। आचार्य रजनीश. आचार्य रजनीश हो गए। तो कई सालों तक वही. नाम चलता रहा। फिर जब उन्होंने सन्यास. दीक्षा देनी शुरू की, शिष्य बनाने शुरू. किए। अब एक नया फेस शुरू हुआ। आचार्य तो. होता है स्टूडेंट एंड प्रोफेसर का रिलेशन. विद्यार्थी के साथ। शिष्य एक नई घटना है।. है ना? शिष्य के लिए वो भगवान हो गए।. लोगों ने उनको भगवान कह के पुकारना शुरू. किया। वो संबोधन करना शुरू किया। वहां से. भगवान श्री रजनीश हो गए। फिर इस बीच में. उनके दो-तीन नाम और बदले। एक बार गौतम.
बुद्ध की आत्मा उनकी शरीर में प्रवेश की।. कुछ दिनों तक रही। तब उन्होंने अपने नाम. में बुद्ध शब्द जोड़ा।. शायद आपको नहीं पता होगा।. नहीं ये मैंने पढ़ा। लेकिन जब मैं पढ़ रहा. था तब मुझे मेरे मन में एक सवाल आया।. सवाल यह आया कि जिन बातों का ओशो जी खंडन. करते हैं या सवाल करते हैं और वो कहते हैं. कि धर्म का विरोध नहीं है। पाखंड का विरोध. है। सवालों का विरोध है। धर्म में जब आप. लॉजिक की जगह आस्था लगा देते हैं कि आपको. मानना पड़ेगा तो उसका विरोध है। अब ये.
भगवान बुद्ध वाली जो बात थी ये मेरे मन. में सवाल थे कि ये तो रिलीजियस बात हो गई।. बिलीफ वाली बात हो गई। प्रैक्टिकल बात. नहीं हुई जिसके लिए मैं ओशो को जानता हूं।. चलिए पहले मैं ओशो ने हम तक आ जाऊंगा फिर. आपका इस प्रश्न को लूंगा दोबारा तो ओशो ने. वह नाम रखा अपना नाम चेंज किया उन्होंने. फिर वह भी हटा दिया उन्होंने फिर एक समय. उन्होंने सिर्फ वापस रजनीश रखा भगवान. संबोधन हटा दिया आचार्य संबोधन सब हटा. दिया बाद में फिर ओशो रजनीश नाम हुआ ओशो. कहां से आया उन्होंने अपने शिष्यों से कहा.
कि मेरे लिए कोई नया संबोधन खोजो है ना. इसके पीछे की कहानी फिर बताऊंगा मैं तो. विलियम जेम्स एक कवि हुए हैं। बहुत. प्रसिद्ध आध्यात्मिक कवि थे वो। है ना? मनोवैज्ञानिक भी रहे वो। तो उन्होंने एक. वर्णन किया है ओशिक एक्सपीरियंस सागरीय. अनुभव। जैसे कोई सरिता जब सागर में समझ आए. तो फिर वो सरिता तो नहीं रही। वो तो स्वयं. ही सागर हो गई। है ना? गंगा थी, नर्मदा. थी, ब्रह्मपुत्र थी, कि अमेजान रिवर थी।. उसकी एक कहानी थी, एक उद्गम था। कहां-कहां.
से वो गुजरी? कैसी यात्रा की, किन-किन. शहरों से? कैसे-कैसे तट बनाए? है ना? लेकिन जब सागर में गिर गई तो ना तो अमेजान. अमेजान रही ना गंगा गंगा रही अब तो वो सब. समुद्र हो गई ठीक ऐसे ही रजनीश एक. व्यक्तित्व उनका अपना कृतित्व उनका अपना. मन उनकी सोच एक पर्सनालिटी उसकी एक कहानी. है कहां से आए क्या-क्या हुआ पूरी जीवन की. कथा है लेकिन जब वो शरीर छोड़ के उनकी. आत्मा परमात्मा में विलीन होने जा रही है.
अब वो नाम तो कोई मायने नहीं रखता वो तो. गया है ना तो वहां पर ओशव वर्ल्ड ओशिक. एक्सपीरियंस की तरफ इशारा करने वाला है।. बाद में पता चला कि जापान में जैन परंपरा. में भी इस शब्द का इस्तेमाल होता है।. अपने सद्गुरु को सम्मान पूर्वक ओशो कहा. जाता है। यह बाद में पता चला। ओशो ने जो. लिया था वो विलियम जेम्स की कविता से लिया. था। ओशो कि अब मैं शरीर छोड़ने वाला हूं।. फिर रजनी शब्द भी उन्होंने ड्रॉप कर दिया. कि उसकी कोई जरूरत नहीं। अब व्यक्तित्व.
समाप्त होने जा रहा है. लेकिन वो चैतन्य तो रहेगा वो कहां जाएगा. लेकिन उसका कोई नाम रंग रूप सीमा नहीं है. तो ये ओशो के पीछे की कहानी अब मैं आपके. दूसरे सवाल पर आता हूं मुझे ये बताइए कि. वो भगवान बुद्ध उनके अंदर कैसे समाए. क्योंकि मुझे ये रिलीजियस बिलीफ लगता है. प्रैक्टिकल थॉट नहीं लगता मुझे लगता है कि. ये भावना में कह कर कहा बात है जैसे हम. बाकी धर्मों मानते हैं कि ये बता दिया गया. आपको ये मान लेना है। ओशो को जब पढ़ता हूं. मैं उन विचारों से अलग विचार इसमें नजर.
आता है। मुझे. ओशो कभी मानने के लिए नहीं कहते कोई भी. चीज लेकिन उनको जो हो रहा है वो तो. बताएंगे कि नहीं बताएंगे. वो ये नहीं कह रहे कि आप मानो लेकिन. उन्होंने अपना एक्सपीरियंस शेयर किया है. ना इसके पहले भी आप पुरानी किताब में भी. पढ़ेंगे जहां उन्होंने बताया कि ये. कृष्णमूर्ति के ऊपर भगवान बुद्ध की चेतना. को अवतरित कराने के प्रयोग किए गए थे।. शायद आपको पता हो थियोसोफिकल सोसाइटी के. द्वारा एक बहुत बड़ी संस्था बनी थी स्टार. ऑफ द ईस्ट जिसके हेड जय कृष्णमूर्ति थे और. कोई 25 30 साल तक वह प्रयोग चलता रहा कि.
जब बुद्ध की आत्मा उनमें प्रवेश कर जाएगी. वो विश्व गुरु हो जाएंगे वर्ल्ड टीचर हो. जाएंगे उसके लिए पूरी ट्रेनिंग उनको दी गई. लंबे समय तक लेकिन जिस दिन वो फाइनल. डिक्लेअ करना था उनको मंच पर खड़े होकर. हॉलैंड में वह सभा बैठी थी पूरी दुनिया के. थियोसफिस्ट इकट्ठे हुए थे कोई 6000 लोग कि. आ जाए महा घटना घटेगी बुद्ध अवतरित होंगे।. भगवान बुद्ध ने वचन दिया था कि मेरा. सूक्ष्म शरीर मेरे संकल्प शक्ति से करीब. 2500 साल तक अस्तित्व में रहेगा और नया.
जन्म ले सकेगा। लेकिन 2500 साल होने के. करीब आ गए। और सूक्ष्म शरीर जो होता है. एस्ट्रल बॉडी अंधविश्वास की बात नहीं कर. रहा हूं। मैं आपसे नहीं कह रहा कि आप मानो. लेकिन आप खुद एक्सपीरियंस कर सकते हो अपनी. खुद की एस्ट्रल बॉडी। उसकी भी एक आयु होती. है। उसके बाद वो डिटेशन होने लगेगा।. डिसइीग्रेशन होने लगेगा। तो थियोसोफिस्ट्स. को बड़ी चिंता थी कि 2500 साल पूरे होने. के पहले पहले अब क्योंकि वो जन्म नहीं ले. पा रहे हैं। वैसी सुविधा नहीं बन रही है।. तो किसी योग्य व्यक्ति की काया में अवतरित.
हो जाएं। उसके माध्यम से वह काम करें। तो. ये बहुत बड़ा प्रयोग इंटरनेशनल लेवल पर. किया गया था। लेकिन वह सफल नहीं हुआ। ये. कृष्णमूर्ति मंच पर खड़े हुए और उन्होंने. डिक्लेअ किया कि मैं मैं हूं। है ना? मेरे. अंदर और कोई अवतरित होने की आवश्यकता नहीं. है। और क्योंकि मैं इस संस्था का हेड हूं।. मैं घोषणा करता हूं इस संस्था को डिॉल्व. करने की। ये संस्था आज से खत्म होती। इसकी. कोई जरूरत भी नहीं आगे। एक बहुत बड़ा शॉक. लगा थियोसोफिकल सोसाइटी को और वो मूवमेंट.
खत्म ही हो गया। लेकिन ओशो ने इस बात की. पूरी जिक्र किया है। अंधविश्वास करने के. लिए नहीं कह रहे। लेकिन जो हुआ है तथ्य वो. तो बताएंगे वो। है ना? फिर. वह सूक्ष्म शरीर इंतजार कर रहा है। और ओशो. जब अमेरिका से लौट के आए तब उनको वहां जो. पोइजनिंग दी गई थी उन्होंने कहा कि मेरा. शरीर इंप्य्यूिफाइड हो गया था।. तो कोई सात हफ्ते वो काफी तकलीफ में रहे।. फिर उन्होंने एक दिन वो सात हफ्ते तक.
प्रवचन देने नहीं आए। उसके बाद जब वो आए. तब उन्होंने ये वाली घटना बटाई कि पिछले. सात हफ्ते में क्या हुआ है। मैं विटनेसिंग. कॉन्शस में रहा। शरीर में बहुत पीड़ाएं थी. और धीरे धीरे धीरे अचानक एक दिन सारी. पीड़ाएं खत्म हो गई। वह जो फुट पोइजनिंग. हुआ था या रेडिएशन पोइजनिंग जो कुछ भी हुआ. था उसका सारा असर खत्म हो गया। मेरी बॉडी. अब प्यूरीिफाइड हो गई। शुद्धिकरण उसका हो. गया और एक विचित्र घटना घटी।. अनएक्सेक्टेड। रात को मुझे लगा जैसे किसी.
ने दरवाजे पर नॉक किया है। ये ओशो के. दरवाजे पर कौन नाक कर सकता है रात को? और. आंख खोल के देखा तो दरवाजा तो बंद था. लेकिन कोई भीतर प्रवेश कर आया एक स्वर्णिम. प्रकाश मंडल और फिर रिकग्नाइज हुआ कि ये. तो भगवान बुद्ध हैं। ओश ने उनका स्वागत. किया और कहा कि आपने जो वचन दिया था बुद्ध. ने कहा कि मैं वही वचन पूरा करने आया हूं।. अब तुम्हारी देह में मैं रहूंगा। तो बुद्ध. उनकी देह में समा गए। ओशो ने उनको अंगीकार.
किया स्वीकार किया और तब ओशो ने अपना नाम. बदला। यह उन्होंने प्रवचन में समझाया पूरा. और इसका. स्वीकार करने का स्पेशल मोहल लगाने के लिए. जापान से एक प्रसिद्ध गुरु महिला आई। उसको. स्वप्न में यह दर्शन हो गया कि ऐसा-सा. भारत में हुआ है और भगवान बुद्ध की आत्मा. किसी व्यक्ति में प्रवेश की है और वो खोज. करते-करते यहां पहुंची। उसने बताया कि. मुझे ऐसा सपना आया था। ओशु ने कहा कि हां.
ठीक आया था तुम्हें।. अब इसके बाद कुछ दिनों के बाद ओशो ने. बताया कि भगवान बुद्ध को मेरे संग रहना. अच्छा नहीं लग रहा क्योंकि उनका जो रंग. ढंग था जीने का वो बैरागी थे तपस्वी थे. त्यागी थे और मैं सारी सुख सुविधाओं में. झोरवा वाली जीवन जी रहा हूं एयर कंडीशन. भवन में रहता हूं. खूबसूरत कपड़े पहनता हूं सब कुछ अच्छा. भोजन करता हूं वो भिक्षाटन करते थे तो. उनकी वह जो टेंडेंसी है वो कहते भिक्षाटन.
कब कब चलना है? भिक्षाटन करने हैं। मैं. कहता हूं भिक्षाटन करने की जरूरत नहीं।. भोजन यही आ जाएगा।. उनको अच्छा नहीं लगा। वो कंफर्टेबल नहीं. है मेरे संग रहने में। तो फिर मैंने उनसे. निवेदन किया है कि आपका वचन पूरा हो गया।. अब आप विदा हो सकते हैं जो आपने कहा था कि. 2500 साल में आऊंगा। हां। उन्होंने कहा था. मैत्रेय रूप में आऊंगा। तो ओशो ने अपने. नाम में मैत्रेय वर्ड भी जोड़ा था। जब. नामकरण चेंज हुआ। फिर वो भगवान चले गए और.
उसने कहा कि अब आप डिॉल्व हो जाइए. अस्तित्व में। है ना? आप जो काम कर रहे हो. वो मैं कर ही रहा हूं।. अब मैं इसमें मेरे मन में कई सारे प्रश्न. मुझे पूरा कर लेने दीजिए। है ना? है ना? आप जो काम करना चाहते थे मैं वही कर ही. रहा हूं। मैत्रेय का मतलब है मित्रवत एज ए. फ्रेंड। तो उसने कहा मैं एज ए फ्रेंड ही. काम कर रहा हूं। है ना? वह जो पुरानी. परंपरा थी गुरु शिष्य की कोई ऊपर है कोई. नीचे है हायरार्की की वो मैंने सब तोड़ दी. है। सब मेरे मित्र हैं। मैं उनका मित्र. हूं। ज्यादा से ज्यादा एक सीनियर कह लें.
है ना जिसको कुछ ज्यादा जानकारी वो आपको. थोड़ी गाइड कर देगा। इससे ज्यादा कुछ भी. नहीं। गुरु शिष्य परंपरा को उन्होंने तोड़. दिया।. अब आप विदा हो सकते हैं। आपका काम चल रहा. है। यह ओशो ने फिर प्रवचन में कुछ दिन बाद. बताया। मेरे ख्याल से 15 20 दिन के बाद ही. यह बात हुई। फिर ओशो ने वह नाम भी अपना. हटा दिया। मैत्रे वर्ड भी हटा दिया, बुद्ध. वर्ण भी हटा दिया।. तो यह घटना ओशो ने अपनी कही। वह यह नहीं. कह रहे कि आप मेरी बात मानो। है ना? लेकिन. अपना अनुभव कैसे नहीं बताएंगे? अगर नहीं.
बताएंगे, तो वो भी एक हो जाएगा कि सत्य को. छुपा लिया।. मतलब जहां आप अंधविश्वास वर्ड यूज़ कर रहे. हैं। मैं थोड़ा सा क्लियर कर दूं। नॉर्मली. हम क्या सोचते हैं कि एक आदमी भूत प्रेत. और आत्मा को मानता है वो अंधविश्वासी है. और दूसरा आदमी अपने आप को बड़ा साइंटिफिक. समझता है। वो कहता है कि मैं नहीं मानता।. नहीं मैं इस पे जो क्वेश्चन कर रहा हूं वो. ये कर रहा हूं कि क्योंकि ये अधिकार भी. ओशो जी ने अपने जीवन भर दिया कि हर चीज पे. प्रश्न करो।. तो मेरे मन में दो तरह के प्रश्न आते हैं।. एक प्रश्न आता है कि जो बातें ये पूरी.
आपने बताई ये प्रैक्टिकली साउंड मुझे नहीं. लगती क्योंकि ओशो जी का बाकी जीवन जो. दर्शन है वो प्रैक्टिकल साउंड लगता है. मुझे। दूसरा जितनी फिल्में मैंने देखी या. जितने ओशो जी को लेकर कुछ प्रचार कुछ. दुष्प्रचार देखा मैंने वो ये देखा कि वहां. पर एक जीवन जीने का स्तर अलग था।. कई बार मतलब मैं इस बात को अन्यथा मत. लीजिएगा आप इसलिए क्योंकि मैं ओशो जी ने. ये अधिकार दिया है इसलिए मैं अधिकार के. दायरे को बढ़ाकर ही मैं सवाल पूछ रहा हूं।. कई बार जैसे कई लोग बहुत हाई होते हैं।. अलग-अलग तरह का सेवन करते हैं। कई तरह की. बातें करते हैं कि ये चीजें हो गई, ऐसा हो.
गया। एक सेक्रेट गेम्स आई उसमें भी कई. चीजें दुष्प्रचार के तौर पर भी दिखाई गई. होंगी या प्रचार के तौर पर तो ये. प्रैक्टिकल साउंड कैसे हो सकती है बातें. क्योंकि इन्हीं बातों के विरोध में तो. अशोक का अस्तित्व आता है. देखिए विरोध में नहीं है आत्मा परमात्मा. को स्वीकार करते हैं हां ये नहीं कह रहे. कि आप मानो वो जानने की विधि बता रहे हैं. कि आप कैसे जान सकते हो मानने की वो नहीं. कह रहे. मैं एक छोटा सा उदाहरण ले लूं सामान्यता. हम समझते हैं एक आदमी जो भूत प्रेत में.
भरोसा करता है वो अंधविश्वासी है और हम. मानते हैं कि एक व्यक्ति साइंटिफिक है जो. भरोसा नहीं करता। वो कहता है भूत प्रेत. नहीं होते। मैं कहता हूं दोनों. अंधविश्वासी हैं। एक मानता है कि होते. हैं। एक मानता है कि नहीं होते? दोनों ही. मानते हैं। जाना तो किसी ने नहीं।. दोनों अंधविश्वासी हैं। लेकिन अक्सर क्या. हो जो नहीं मानने वाला है वो दूसरे पे. लेवल लगा देता है कि यू आर ब्लाइंड. बिलीवर।. है ना? तो ओशो कहते हैं कि तुम स्वयं. जानो। पहले पता लगाओ। यू हैव टू सर्च।. अज्ञयवादी बनो कि मैं नहीं जानता हूं।. एग्नोस्टिक ना आस्तिक बनो ना नास्तिक बनो।.
खोज में लगो तलाश करो। जब तुम्हें पता लग. जाए तब तुम डिक्लेअर करना कि क्या सच्चाई. है। अगर तुम्हें ना मिला कहीं कोई भूत. प्रेत पहले खोजबीन तो करो। अभी तुमने. खोजबीन कहां की? घर बैठे-बैठे तुम सोचने. लगे कि भूत प्रेत नहीं होते। ऐसे थोड़ी. होता है। और ना ही तुम्हारे भूत प्रेत. होने कहने से भूत प्रेत हो जाते हैं। खोज. करो। तो ओशो ने जो भी कहा है अपने. एक्सपीरियंस से कहा है।. वो अंधविश्वास नहीं है। 1960 की शुरुआत. में उन्होंने प्रवचन करना शुरू किया था।. लोगों से संवाद करना। देखिए प्रवचन तो वो. बहुत छोटे थे तभी से शुरू हो गया था। मैं.
आपको बचपन की उनकी बताऊं हाई स्कूल के. वहां एक बहुत बड़ा प्लेग्राउंड था। ओशो. अक्सर शाम को वहां बैठते थे और एक मित्र. मंडली आ जाती थी और ओशो उनको बताते थे कि. मैंने कौन-कौन सी किताबें आज पढ़ी हैं और. अपना कमेंट करते थे उस पे कि उसमें फला. लेखक ने ये वाली बात गलत कही है। मैं इससे. राजी नहीं हूं और ये वाली बात सही कही है।. उसको अप्रिशिएट करते थे, तारीफ करते थे।. तो धीरे-धीरे वो ग्रुप बड़ा होने लगा।. लोगों को बड़ा मजा आता कि कहां-कहां की. किताबों में से क्या-क्या ढूंढ के लाए हैं.
और उसमें से बता रहे हैं और अपना कमेंट भी. कर रहे हैं क्या सही क्या गलत मेरी दृष्टि. में उस लेखक ने ऐसा लिखा लेकिन मैं ऐसा. समझता हूं तो बच्चों को खूब इंटरेस्ट आने. लगा यहां तक कि सीनियर बच्चे आने लगे. क्योंकि ओशो की उम्र के बच्चों को शायद वो. बात उतनी अच्छी ना लगे उनके तो खेलने. कूदने के दिन थे सीनियर क्लास के बच्चे. आने लगे सुनने के लिए कि ये तो बड़ी गजब. गजब की बातें बताता है छोटा सा बच्चा तो. एक प्रकार से उनके जो फॉलोअरशिप थी वो तो. खूब छोटी उम्र से हो गई थी उनको सुनने.
वालों की है ना और उसके बाद स्कूल के लेवल. पे वो वाद-विवाद प्रतियोगिताएं उस जमाने. में बहुत होती थी. तो ओशो किसी खेल कूद में तो भाग नहीं लेते. थे लेकिन डिबेट में भाग लेते थे और डिबेट. में उनका रिकॉर्ड था कि वो ही हमेशा फंस. पाएंगे और कोई आ ही नहीं सकता। तो स्कूल. वाले भी उनको जगह-जगह भेजते थे कि स्कूल. का गांव का नाम भी प्रचारित होगा। फिर जब. वो कॉलेज में गए तो वही चीज वहां शुरू हो. गई। इंटर कॉलेज डिबेट कंपटीशन फिर इंटर. यूनिवर्सिटी तो उनकी तर्कों का जो कहना.
चाहिए प्रतिष्ठा थी. तोड़ नहीं था कोई. कोई तोड़ नहीं था. तो शुरुआती दौर में जो उन्होंने अपने. व्याख्यान किए हैं. हमारे घर में कौन सी बातें बड़ी प्रसिद्ध. हुई थी. हमारे घर में एक अलमारी थी जो मुझे बचपन. की याद है उसमें केवल मेडल ही मेडल रखे थे. और जहांजहां से जीत के लाते थे वाद विवाद. प्रतियोगिताओं में. लेकिन शुरुआती कौन सी बातें थी कौन से. व्याख्यान थे जो चर्चा एक केंद्र में रहे. बड़े होने पर खास पर बात कर जाता हूं मैं. जैसा मैंने कहा आरंभिक वो जैन परिवार में. थे. है ना तो जब लोगों को लगा कि लड़का बहुत.
अच्छा बोलता है है ना इसकी ज्ञान बहुत. अद्भुत है तो स्वाभाविक रूप से जैन जो. बुलाएंगे वो महावीर जयंती पे बुलाएंगे. है ना कि परिवषण पर्व में बुलाएंगे कि तरण. तरण जयंती की बुलाएंगे कि उस परिवार के उस. समाज के थे तो तो उस प्रकार से वहां से. उनकी शुरुआत हुई सिलसिला फिर अन्य लोगों. को समझ में आने लगा कि यह किसी धर्म में. बंधा हुआ नहीं है ना इसके विचार बिल्कुल. स्वतंत्र हैं और यह जैन धर्म की भी कुछ. कुरीतियों की निंदा कर सकता है और दूसरे. धर्म में कुछ अच्छा उसकी भी तारीफ कर सकता. है। तो धीरे-धीरे उस कटघरे के वो बाहर आए।.
वो लेवल उनके ऊपर से हट गया जैन का। अन्य. लोग बुलाने लगे। आचार्य के रूप में फिर. उनकी बहुत प्रसिद्धि हुई। उनकी बोली हुई. चीजें किताब रूप में छपने लगी। उस समय. उन्होंने जो लिखते थे। इस बीच में. उन्होंने नवभारत अखबार जबलपुर में. प्रकाशित हुआ करता है। उसमें उन्होंने जॉब. भी किया उपसंपादक के रूप में और उस जॉब के. दौरान उन्होंने खूब लिखा क्योंकि वही. मालिक थे तो खूब लिखा उन्होंने तो वो सब. चीजें अखबारों में आने लगी, पत्रिकाओं में.
आने लगी, वाद-विद विवाद प्रतियोगिताओं में. खूब प्रसिद्ध हो गए। है ना? और खूब. प्रसिद्धि उनको मिली जब कॉलेज के प्रोफेसर. उनसे तंग हो गए और उनको कॉलेज से. निष्कासित करवाया। क्योंकि उनके सवालों का. जवाब प्रोफेसर नहीं दे पाते थे।. और ओशो का कहना था भाई मैं फिलॉसफी. सब्जेक्ट मैंने लिया है। इसमें लॉजिक. तर्कशास्त्र एक विषय है। अगर मैं तर्क. यहां नहीं करूंगा नहीं सीखूंगा तो फिर. कहां सीखूंगा? मैं तर्क सीखने तो आया हूं।. तो आप मेरी बात का जवाब दो।.
अब प्रोफेसर में तो वो तो रटी रटाई बातें. कह सकता है जो किताब में लिखी हैं। और ये. बिल्कुल नए-नए प्रश्न है। इनके उत्तर तो. उसको भी नहीं पता। आखिर में उनको. प्रिंसिपल से कह के वहां से निष्कासित. करवा दिया गया रेस्टिकेटेड। वहां पर ओशो. की खूब प्रसिद्धि हो गई। अन्य कोई भी. कॉलेज एडमिशन देने तैयार नहीं। सब जगह. उनकी बदनामी पहुंच चुकी थी। इस लड़के को. एडमिशन नहीं देना उससे दर्द हो जाएगा सबके. लिए।. तो इस प्रकार उनका प्रचार प्रसार उस छोटी. उम्र से होने लगा था। और सागर.
विश्वविद्यालय में जब उन्होंने प्रथम. श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया एमए. में फिलॉसफी का गोल्ड मेडल हासिल किया फिर. उनका खूब नाम हो चुका फिर आचार्य के रूप. में तो खूब प्रसिद्ध हो गए।. फिर यहां से मुंबई और पुणे की यात्रा. क्यों शुरू हुई थी? देखिए जब प्रोफेसर के रूप में वो थे सम. 1958 से लेके 1967 तक करीब-करीब 9 साल है. ना इस बीच में उनको इतनी जगह से आमंत्रण. आने लगे मतलब महीने में 10 दिन तो ट्रेन. में गुजरते थे उस समय फ्लाइट्स इतनी नहीं.
चलती थी हमारे देश में 10 दिन तो ट्रेन. में जाते थे तो मुश्किल से 10 दिन ही वो. कॉलेज में पहुंचते होंगे अटेंड करने बाकी. तो जगह-जगह जगह-जगह उनके प्रवचन हुआ करते. थे हर जगह हंगामा खड़ा होता था तहलका का. मस्ता था क्योंकि वो इतनी नई बात कहते थे. और नए ढंग से कहते थे कि एक जिसको कहें. रेवेलियस डाइजेस्ट करना. डाइजेस्ट करना बहुत मुश्किल है ना तो खूब. अखबारों में छपती थी है ना बिना विज्ञापन.
दिए उनकी बात छपना ही छपना होती थी हर. अखबार में हर मैगजीन में छपनी होती थी. क्योंकि इतनी उसमें आग होती थी एक दम होता. था जो कभी किसी ने सुनी नहीं सुनने तो. रोंगटे खड़े हो जाए सुन के और विरोध भी. नहीं कर सकते वो जो कह रहे हैं सही कह रहे. इस प्रकार उनका प्रचार प्रसार खूब होता. गया। लेकिन इतनी व्यस्तता हो गई फिर बंबई. के कुछ लोगों ने आग्रह किया किकिकि मुंबई. एक कल्चर का केंद्र है। है ना? अपन कहते. हैं दिल्ली राजधानी है। ये तो पॉलिटिकल. राजधानी है। पर एक्चुअल इंडस्ट्रियल. राजधानी और इंटेलेक्चुअल और आर्ट्स की.
राजधानी मुंबई है।. आर्ट आर्ट की तो है। क्रिएटिव लोगों की. राजधानी है।. फाइनेंसियल राजधानी है।. तो वहां के लोगों ने आग्रह किया क्योंकि. वहां के बहुत लोग अशोक के शिष्य हो गए। हम. है ना कि आप इतनी बार जबलपुर से आते जाते. हो इतने समय खर्च होता है आप यहीं रहने. लगो हम लोग इंतजाम कर देंगे आपके रहने का. नौकरी छोड़ दो तो उन्होंने. सर्विस छोड़ दी लेकिन उसके बाद तीन साल और. जबलपुर ही रहे वहीं से जगह-जगह उन्होंने. यात्रा की सर्विस छोड़ने के बाद फिर उनके.
पास पूरा समय हो गया कि लगातार उस समय. इतने व्यस्त थे कि सुबह बंबई में प्रवचन. है। शाम को अहमदाबाद में अगले दिन दिल्ली. में है। अगले दिन जालंधर में है। बहुत. ज्यादा व्यस्त उनका शेड्यूल हो गया और. लाखों लोग उनको सुनने लगे। इस बीच में. उनकी खूब किताबें छप गई। दो पत्रिकाएं. उनकी छपा करती थी। उस समय एक का नाम था. ज्योतिषिका, एक का नाम था युक्रांत।. युक्रांत फुल फॉर्म था युवक क्रांति दल. का। क्योंकि युवक ही उनसे सबसे ज्यादा.
जुड़ रहे थे।. हम. तो इस प्रकार ओशो की लहर पूरे देश में. व्याप्त हो गई। 1970 में फिर जबलपुर छोड़. के बंबई गए। वहां लोगों ने निवास उनका बना. दिया था। एक बहुत बड़ी बिल्डिंग थी। उस. शायद उस जमाने की सबसे ऊंची बिल्डिंग थी. मुंबई की वो वुडलैंड्स अपार्टमेंट। उसमें. ओशो का रहने का इंतजाम किया और साथ में. 810 लोग और उनके साथ रह सकते हैं जो काम. करें। पत्रिका छापे किताब छापने का काम. वहां पर सब ये होने लगा।. संयोग की बात लगभग उसी समय.
हिप्पी मूवमेंट अमेरिका में चला था।. यूरोप के कुछ देशों में चला था। तो पश्चिम. के बहुत लोग मुंबई आ रहे थे। ओशो उनके लिए. एक आकर्षण का केंद्र हो गया। क्योंकि ओशो. की बात में एक आग थी। है ना? और वो जो जिन. परंपराओं को तोड़ के आ रहे थे। ओशो भी. उसके खिलाफ थे। उनको काफी लगा कि कुछ. सिंक्रोनिसिटी बैठ रही है इस क्रांतिकारी. विचारक के साथ। तो पश्चिमी लोगों का बहुत. बड़ा हुजूम आने लगा। अब यहां से एक नया.
सिलसिला शुरू हुआ। इसके पहले तक वो केवल. हिंदी में बोल रहे थे।. उनकी किताबें अंग्रेजी में ट्रांसलेट होने. लगी। अन्य देशों में छपने लगी। जर्मनी में. छप रही है। इटालियन में छप रही है।. अंग्रेजी में छप रही है। अब वहां से फिर. दूसरा वर्ग वहां से आने लगा और धीरे-धीरे. बंबई की जगह छोटी पड़ने लगी। तो सन 70 से. लेके 74 तक 21 मार्च 74 को उसे वहां से. फिर शिफ्ट हुए। कोई बड़ी जगह तलाश करने के. लिए तो पुणे में बड़ी जगह मिली कोरेगांव.
पार्क में जहां पे कुछ हजार आदमी रह सकते. हैं इकट्ठे क्योंकि इतने लोग आ गए वो सब. चाहते हैं हम हमेशा आपके साथ रहें तो इतने. लोग कहां रहेंगे मुंबई के अपार्टमेंट में. तो फिर पुणे में वही इंतजाम हुआ उसे वहां. शिफ्ट हो गए तो जैसे-जैसे जरूरत पड़ी बड़ी. जगह की वहां शिफ्ट होना पड़ा फिर एक दिन. पूना में भी ऐसा आया कि अब समा ही नहीं. सकते इतने लोग आ गए. प्रवचन सुनने के लिए कहां बिठा लें इतना. बड़ा हाल ही नहीं. फिर शिफ्ट होने की चली कच्छ में जाने का. प्लान था लेकिन उस जमाने की सरकार ने नहीं.
होने दिया। फिर मजबूरी में अमेरिका जाना. पड़ा।. ओशो का विरोध कहां से शुरू हुआ था? यहां. पे पुणे के आसपास विरोध शुरू हो गया था।. नहीं विरोध तो बिल्कुल पहले दिन से शुरू. हो रहा है।. नहीं व्यापक पैमाने पर जैसे आपने कहा कच्छ. में उनको जाने को नहीं दिया गया। सरकार ने. इजाजत नहीं दी।. प्रसिद्धि जब बढ़ती गई पहले रूम में सात. लोग थे। अब हजार शिफ्ट हो गए।. तो जब ये पुणे का आश्रम बना. इस बीच कैसा विरोध था? नहीं विरोध तो समझिए. और पहले से शुरू हो गया। मैं समझता हूं. 1969 से शुरू हो गया। वो उस समय था.
महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी थी और ओशो. ने गुजरात में पोरबंदर में वह प्रवचन माला. दी जो बहुत खतरनाक थी। वो थे अस्वीकृति. में उठा हाथ भारत गांधी और मेरी चिंता और. ओशो ने जो महात्मा गांधी की फिलॉसफी का. विरोध किया। याद रखिए गांधी व्यक्ति से वो. बहुत प्रेम करते हैं। जिस दिन गांधी की. मृत्यु हुई थी ओशो तीन दिन तक रोए तीन दिन. तक भूखे रहे थे। खाना नहीं खाया था। इतना. दुख उनको हुआ था। व्यक्ति से बहुत प्रेम. है। व्यक्ति बहुत प्यारा है गांधी। लेकिन.
जो फिलॉसफी वो देश को दे रहा है। वह देश. के विकास में बाधा बन।. मैंने गांधी जी को लेकर एक बड़ा फेमस कोट. है उनका जिसमें गांधी जी की सरलता पर ओशो. जी टिप्पणी करते हैं। और उसको समझने के. बाद मुझे आता है कि गांधी की विचारधारा. ओशो को प्रभावित नहीं करती थी। वो उसके. विपरीत खड़े थे। नापसंद करते थे। जो उनके. शब्दों से मुझे समझ में आता है। 100%. हां। है ना? कोई एक दो बातें नहीं गांधी. जी की तो ओशो ने बहुत विस्तार से एक-एक. चीज. क्या-क्या समस्या थी गांधी जी से ओशो जी. को. एक तो गांधी जी द तकियानुसी हैं.
परंपरावादी हैं रूढ़िवादी हैं विज्ञान और. तकनीक के विरोध में है वो कह रहे हैं बस. चरखा चला के सूत का रहो इसके आगे कोई. टेक्नोलॉजी नहीं नो फैक्ट्री इवन स्कूल के. भी विरोध में है बस चार क्लास प्राइमरी. स्कूल तक पढ़ो इससे ज्यादा पढ़ाई की जरूरत. नहीं सब प्रकार से विकास विरोधी है अगर. उनकी बात मान के चलें तो हम 5000 साल पहले. पहुंच जाएंगे जिसको वो राम राज्य कहते. हैं।. महात्मा गांधी कहते हैं। ओशो नहीं कहते. हैं। है ना? ओशो की बात वैज्ञानिक है।.
टेक्निकल है। हमें आगे जाना है। पीछे नहीं. लौटना है। बड़ी सरलता पे भी टिप्पणी की. थी। वो एक ट्रेन वाली कि वो थर्ड एसी की. कम जनरल डब्बे में ट्रेवल करते थे। वो. बड़ा एक वायरल वीडियो है गांधी जी पर. उनका।. उन्होंने हर छोटी-छोटी घटना को लेके भी. अपना विरोध जाहिर किया और उसके पूरे. आर्गुमेंट्स दिए। अब जैसे गांधी जी सबको. दुनिया को दिखाना चाह रहे हैं कि मैं गरीब. आदमी हूं। सिर्फ एक धोती पहनता हूं। ऊपर. भी कुछ नहीं पहनता हूं। गरीब है ना गरीब. आदमी बकरी का दूध पीता है। बकरी का दूध उस. समय बहुत सस्ता हुआ करता था। ओशो ने पूरी. बात बताई है कि गांधी थर्ड क्लास के डब्बे.
में चलने के लिए कितना महंगा पड़ता है। एक. डब्बे में 75 आदमी जा सकते थे। जब गांधी. जी जा रहे हैं तो अकेले जाएंगे। उनके साथ. एक दो उनके सहयोगी होंगे सेवा करने वाले. पूरा डब्बा खाली रहेगा ताकि गांधी जी. सुविधा पूर्वक उसमें रह सकें। कितना महंगा. पड़ रहा है। बकरी के लिए एक अलग डब्बा. जिसमें बकरी है और बकरी को काजू, किशमिश, बादाम, अखरोट ये सब खिलाए जा रहे हैं ताकि. वो खूब गाढ़ा दूध दे जिसमें प्रोटीनंस और. फैट्स अच्छे हो। अब बकरी का दूध तो गरीब. आदमी का दूध था। उस जमाने में गाय भैंस की.
तुलना में आधी कीमत चौथाई कीमत में बिका. करता था। तो ऊपर से तो आप दिखा रहे हो कि. बकरी का दूध पी रहे हैं। गरीब आदमी हैं।. गरीबों के प्रतिनिधि हैं। वो दूध इतना. महंगा पड़ रहा है जिसका कोई हिसाब नहीं।. उतने में तो 10 भैंस पाल लेते हैं।. ये दिखावट और पाखंड के ओशो के खिलाफ है।. तो क्या इसी वजह से कच्छ में जमीन नहीं. मिली थी? गांधी जी का तरफ विरोध कर दिया. था।. इसके पहले 68 में. गुजरात की सरकार ने ओशो को 600 एकड़ जमीन. देने का आश्वासन दिया था सरकार ने कि जहां.
आप अपना आश्रम बना सको। है ना? और 69 में. ओशो ने ये प्रवचन दिया। उसके बाद तुरंत. गुजरात की संसद में. एमएलए ने कानून पास किया कि ओशो को जो. हमने ऑफर दिया था वो तुरंत रद्द किया जाता. है। ओशो ने इस पर कमेंट भी लिखा कहा था।. फिर वो पत्रिका में भी छपा है। मेरे पास. अभी भी वो पत्रिका है कि मैं अपना सोच. विचार नहीं बदल दूंगा तुम्हारी इच्छा सोहे. करने में इनके पीछे।. मुझे जो कहना है मैं वही कहूंगा। है ना?
तुम मुझे किसी प्रकार का प्रलोभन या भय. नहीं दे सकते।. कैसी राजनीतिक विचारधारा थी ओशु की उस दौर. के हिसाब से।. देखिए ओशो राजनीतिक नहीं थे। है ना? वो. दूर से खड़े होकर एक साक्षी की भांति देख. रहे हैं और उनको जो ठीक और जो गलत लग रहा. है वो वैसा कह रहे हैं।. नापसंद करने वालों को तो बता दिया गांधी. जी को लेकर उनकी नापसंद सामने आ गई। उस. दौर के कोई राजनेता उनको पसंद भी थे।. नहीं राजनेताओं को अक्सर उन्होंने पसंद. नहीं किया क्योंकि राजनेता होता ही चालाक. है।. किसी एक को लेकर भी टिप्पणी अच्छी नहीं. आई।. वो राजनीति के ही खिलाफ है। देखिए पहले आप.
यह समझ लीजिए अध्यात्म और राजनीति एक. दूसरे से जस्ट अपोजिट है। 180 डिग्री. अध्यात्म है अपने भीतर डूबना आत्मा में. हम. और राजनीति है दूसरों को मैनपुलेट करना. दूसरों को मैनेज करना. दूसरों का शोषण करना दूसरों को बदलना. और अध्यात्म है आत्म रूपांतरण सेल्फ. ट्रांसफर।. चलिए मैं उसको नए सिरे से फ्रेम करता हूं।. तो जो व्यक्ति भी आध्यात्मिक होगा वो कभी. राजनीतिक हो ही नहीं सकता। मैं इसको नए. सिरे से फ्रेम करता हूं।. ओशो ने विरोध किस-किस चीज का किया ये तो.
हम सब जानते हैं।. ओशो ने समर्थन किस-किस चीज का किया? इसको किस जैसे मान लीजिए उन्होंने समाजवाद. का विरोध किया। एक समय था इंदिरा गांधी के. जमाने में जब हमारा देश रूस और चीन के बाद. नेक्स्ट साम्यवादी होने जा रहा था।. हम. है ना? ओशो ने इसका घनघोर विरोध किया। उस. समय की उनकी किताब है समाजवाद से सावधान।. एक किताब और है जिसमें पुनः समाजवाद के. ऊपर उन्होंने चर्चा की। समाजवाद अर्थात. आत्मघात ये उसका टाइटल है और ओशो ने इतना. लॉजिकल ढंग से पेश किया और कार्ल मार्क्स.
की सारी चीजों को उन्होंने गलत साबित कर. दिया कि उसके फिलॉसोफी से कभी विकास नहीं. हो सकता विकास विरोधी है। तब यहां पे. उन्होंने पूंजीवाद का समर्थन किया कि. पूंजीवाद जो है इससे विकास होगा क्योंकि. व्यक्ति की पर्सनल प्रॉपर्टी है। वो अपनी. पर्सनल प्रॉपर्टी को बढ़ाने के लिए सुख. सुविधा में जीने के लिए वो संपन्नता पैदा. करेगा। ही विल क्रिएट मनी। समाजवाद में. साम्यवाद में उसके हाथ में कुछ नहीं है।. सब कुछ समाज का है, सरकार का है। उसके. अंदर जो मोटिवेशन है वो खत्म हो जाएगा। वो. काम ही नहीं करेगा। और उसका हम परिणाम देख.
सकते हैं जो सोवियत रूस में वो चाइना में. हुआ। 60- 70 साल बाद के साम्यवाद के. प्रयोग के बाद आखिर फिर वापस उनको लौटना. पड़ा। साम्यवाद को छोड़ना पड़ा। ये वाली. बात तो पहले कह गए थे कि साम्यवाद टिकेगा. नहीं। चीन में भी नहीं टिकेगा। रूस में भी. नहीं टिकेगा। क्योंकि इससे गरीबी खत्म हो. ही नहीं सकती और भी गरीब हो जाएंगे। वर्ग. भेद खत्म नहीं होगा। सब गरीब हो जाएंगे।. पहले कम से कम कुछ लोग अमीर थे। कुछ गरीब. थे। अब सभी एक से गरीब हो जाएंगे। समान. रूप से गरीब होंगे। ईर्ष्या नहीं होगी।. लेकिन देश का पतन हो जाएगा। तो ओशो ने.
सारे तर्क दिए पूंजीवाद के पक्ष में और. समाजवाद के साम्यवाद के खिलाफ में। तो. आपने पूछा ना किस चीज के पक्ष में थे? साम्यवाद के खिलाफ थे। पूंजीवाद के पक्षधर. थे। रूढ़िवादीिता के खिलाफ थे। विज्ञान और. तकनीकी विकास के पक्षधर थे। वो शुभ भगवान. थे।. इस पर डिपेंड करता है आपका भगवान शब्द का. मीनिंग क्या है? पहले मैं बता दूं हमारे. देश में दो संस्कृतियां हैं। एक ब्राह्मण. संस्कृति, एक श्रवण संस्कृति है। ब्राह्मण. संस्कृति में भगवान स्रष्टा है। दुनिया का. संचालक है। दुनिया उसने बनाई चला रहा है,
संभाल रहा है वो भगवान है। दूसरी है श्रवण. संस्कृति जिसमें बौद्ध धर्म और जैन धर्म. आते हैं। यह नास्तिक धर्म है। ये ईश्वर को. इंकार करते हैं। अर्थात स्रष्टा को संचालक. को इंकार करते हैं। कि ऐसा कोई व्यक्ति. नहीं है। ये दुनिया कहीं से शुरू नहीं हुई. और ना ही इसको कोई संभाल रहा है। एक नियम. से चल रही है। इनकी बात वैज्ञानिक है।. विज्ञान भी यही कहता है कि प्रकृति एक. नियम से चल रही है। विज्ञान नियम की खोज. करता है। वो नियम क्या है?
बुद्ध और महावीर की दृष्टि वैज्ञानिक. किस्म की है। है ना? इन्होंने अतीत के. सारे धर्मों को इंकार कर दिया। और एक नई. सोच विकसित की जिसमें ईश्वर की कहीं कोई. जगह नहीं है। इसलिए बुद्ध भी नास्तिक हैं।. महावीर भी नास्तिक हैं।. लेकिन इनके शिष्यों ने इनको भगवान कहा। अब. यहां पर भगवान का मीनिंग अलग हो जाता है।. यहां भगवान का अर्थ है भाग्यवान. सौभाग्यशाली द ब्लेसड वन जो ध्यान में. समाधि में डूबा हो जिसकी सारी जीवन की. समस्याओं का समाधान मिल गया। उस समाधि में.
उसने परमानंद को सच्चिदानंद को जाना और. उसका पूरा जीवन परम आनंद से ओतप्रोत है।. उसे भीतर अपने शांति का खजाना मिल गया है. और दुनिया की कोई चीज अब उसे विचलित नहीं. करती। उसने अपने अमृत चैतन्य को इटरनल. कॉन्शसनेस को जान लिया। इस तन मन से उसका. तादात्म आइडेंटिफिकेशन टूट गया। अब उसे. पता चला वो कोई और ही है। बहुत विराट असीम. और अनंत यह महा सौभाग्य की घटना है।. और ऐसे भाग्यशाली व्यक्ति को भगवान कह के.
पुकारा तो हम कहते हैं भगवान महावीर भगवान. बुद्ध। यहां पर वो अर्थ नहीं है जो. मुसलमानों का और ईसाइयों का है। दुनिया. बनाने वाला भगवान महावीर ने दुनिया नहीं. बनाई और ना ही बुद्ध दुनिया को चला रहे. हैं। इससे कोई लेना देना नहीं है। यहां पे. अर्थ है भाग्यवान। तो भगवान शब्द के दो. अर्थ हो गए। तो ओशो ने जो स्वीकार किया वो. ये दूसरा वाला अर्थ स्वीकार किया भगवान. का। जब लोगों ने उनको भगवान पुकारना शुरू. किया उन्होंने एक्सेप्ट किया। उन्होंने. पारंपरिक धर्मों की इतनी आलोचना क्यों की?
जो भी धर्म चले आ रहे हैं उनकी खुलकर. आलोचना की। इसका उद्देश्य क्या था उनकी. नजर में? उसमें दो चीजें हैं।. है ना? महावीर की आलोचना नहीं की है। जैन. धर्म की कुरीतियों की आलोचना की है।. अब ये बारीक डिस्टिंग्विश आपको करना. पड़ेगा अपने विवेक से। भगवान बुद्ध की. आलोचना नहीं की है। लेकिन बौद्ध धर्म में. जो क्रियाकांड चल रहे हैं उनकी आलोचना की. है। क्योंकि वो जो कर्मकांड है वो खुद ही. बुद्ध की फिलॉसफी के खिलाफ है।. हम. महावीर के जो अनुयाई कर रहे हैं जैन धर्म. में ये महावीर की बात से मैच नहीं करता।.
ओशो ने वो बातें बताई कि तुम खुद ही. महावीर की नहीं मान रहे हो। महावीर की बात. सुनो तो पहले तो उन्होंने एक एक चीज का. तर्क दिया है। आर्गुममेंट दिया है। ठीक. ऐसे ही कृष्ण के भक्त जो हैं वो कृष्ण की. बात का पालन ही नहीं कर रहे हैं। कृष्ण ने. जो कहा था. ठीक इसी प्रकार ईसाइयों के बारे में. उन्होंने कहा कि तुम ईसा मसीह के असली. शिष्य नहीं हो। ईसा मसीह ने जो कहा वो यह. है। उसने खूब विस्तार से चर्चा की ईसा. मसीह के उपदेशों की और उसके कंट्रास्ट में. सिद्ध किया कि ईसाई जो कर रहे हैं पोप और.
पादरी जो कर रहे हैं ये तो बिल्कुल खिलाफ. है। तो अब यहां पे धर्म धर्म दो बातें हो. गई। एक धर्म के जो मूल जहां से शुरुआत हुई. थी। है ना? वह व्यक्ति एक ओशो जैसा ही. विद्रोही व्यक्ति था वह। चाहे वो महावीर. हो, चाहे ईसा मसीह हो, चाहे बुद्ध हो, चाहे कृष्ण हो, बिल्कुल विद्रोही व्यक्ति. थे। उन्होंने अपने पीछे की किसी परंपरा का. पालन नहीं किया।. अगर हम गौर से देखें तो कृष्ण ने किसका. पालन किया है? सब मर्यादाएं तोड़ दी।. उन्होंने भगवान बुद्ध ने किसका पालन किया?
किसी का भी नहीं। है ना? महावीर ने किसका. किया? अगर ईसा मसीह ने किसी का पालन किया. होता अपने पूर्वजों का तो उनको सूली पर. क्यों चढ़ाते? उन्होंने कोई पालन नहीं. किया। ही वाज अ रेवेलियस स्पिरिट।. उन्होंने अपने भीतर अपनी आत्मा को जाना।. है ना? और वही कहा जो उनको ठीक लगता है।. निश्चित रूप से जब वो कहेंगे ठीक क्या. लगता है उसमें बहुत सारी चीजें गलत अपने. आप उन पर लेबल लग जाएगा कि ये गलत है। तभी. तो उनको सूली लगाई गई। ओशो इंडिया टू. अमेरिका दोनों जगह रेलेवेंट थे। इसमें.
हिंदूज़्म भी आ गया, कृष्ण जी आ गए, महावीर. जी भी आ गए, गौतम बुद्ध भी आ गए और इसमें. जीसस क्राइस्ट भी आ गए। ओशो सबसे करीब. किसको पा रहे थे अपने आप को? ओशो सबसे. करीब पाते हैं दो लोगों को। एक भगवान. कृष्ण को और एक चीन के संत लाउत्सू को जो. तावात के जनक हैं। ओके कैसे दोनों थोड़ा. समझाइए हमें. जब आप की वाणी पढ़ेंगे जैसे सबसे लंबी. व्याख्यान माला जो उन्होंने दी है वो है.
भगवान कृष्ण पर और उनकी गीता पर सबसे लंबी. व्याख्यानमाला आज तक जितने भी विद्वानों. ने गीता के ऊपर टीका टिप्पणी लिखी है ओशो. की टीका उनसे डेढ़ गुनी दो गुनी चार गुनी. छह गुनी बड़ी नहीं है 20-25 गुनी बड़ी है. इतने डिटेल में और गीता को पूरा साइंटिफिक. और साइकोलॉजिकल टर्मिनोलॉजी में उन्होंने. प्रस्तुत किया। मतलब ऐसा कहो कृष्ण को आज. के युग में लाकर उन्होंने खड़ा कर दिया।. उनकी भाषा तो 5000 साल पुरानी हो गई। उस.
समय की उपमाएं उदाहरण हमारे लिए वो. हम रेलेवेंट. रेलेवेंट नहीं हम समझ भी नहीं आएंगे उस. समय की बात समझाने के लिए। ओशो ने उनको. वैज्ञानिक तरीके से मनोवैज्ञानिक तरीके से. प्रस्तुत किया कि जो हम आज का आधुनिक आदमी. समझ सकता है।. एक पढ़ा लिखा तार्किक व्यक्ति बौद्धिक. व्यक्ति. ऐसे समझो कि कृष्ण को उन्होंने पुनः. अवतरित कर दिया अपनी वाणी से और ठीक ऐसा. ही उन्होंने. लाहोत्सु के संग किया लासु पे तो उन्होंने. दोनों भाषाओं में बोला कोई सवा सौ प्रवचन.
दिए हिंदी में और सवा सौ प्रवचन अंग्रेजी. में भी दिए मतलब इतना गहन प्रेम कि दो-दो. भाषाओं में उन्हीं सूत्रों को समझाना. अद्भुत है और उसने स्वयं इस बात को कहा है. कि महावीर पर मैं बोला हूं हूं क्योंकि. मेरे ऊपर एक नैतिक जिम्मेवारी बनती थी।. मैं जैन परिवार में पैदा हुआ हूं। तो. महावीर की वाणी दुनिया तक पहुंचा सकूं।. मेरा कर्तव्य था इसलिए बोला हूं। अन्य.
संतों का उन्होंने बताया कैसे बोला हूं।. लेकिन लाओसु जब मैं बोलता हूं तो ऐसा है. कि मेरे ही हृदय की बात मैं ही कह रहा. हूं। आई एम वन वि हिम। आपको एक बात और बता. दूं। ओशो जहां भी रहे उदाहरण के लिए पुणे. में वो जिस घर में निवास करते थे उसका नाम. लाओसु भवन था और ठीक ऐसा ही रजनीशपुरम में. वो जिस घर में रहते थे उसका नाम लाओसु भवन. रखा था तो इससे आप समझ सकते हैं कितनी. एकात्मयता है और अगर आप ओशो का साहित्य. पढ़ेंगे तो आपको ऐसा ही लगेगा जो उन्होंने. कहा है कि लाओत्सु को समझाते हुए मुझे ऐसे.
नहीं लगा किसी और को समझा रहा हूं मैं. अपनी ही बात जैसे दोबारा कह रहा हूं. लाओत्सु के बारे में थोड़ा बताइए. हमारे हमारे देश में लाओसु का नाम उतना. प्रचलित नहीं है। शायद ओशो ही पहली बार. लाए। हम. लाओसु चीन के एक संत हैं। ये भी उसी समय. हुए करीब ढाई हजार साल पहले जब भारत में. बुद्ध हुए थे, महावीर हुए थे। यूरोप में. उस समय पाइथागोरस हुए थे। हेरेकलाइटस हुए. थे। ढाई हजार साल पहले पूरी दुनिया में एक.
आध्यात्मिक शिखर जैसे आया था। उछाल. हम. एक ऊंची लहर है ना। सारी दुनिया में बड़े. आध्यात्मिक पुरुष हुए थे। उसी समय चीन में. हुए लाओत्सु फिर उनके शिष्य हुए चंग्स. लहतसू ये ये ताओवाद कहलाने लगा धीरे-धीरे. उनकी शिक्षा किसी पारंपरिक धर्म की किसी. संगठन की शिक्षा नहीं है। बिल्कुल ओरिजिनल. अपनी बातें उन्होंने कही जो उन्होंने. स्वयं जाना है। कोई उदार ज्ञान उसमें नहीं.
है।. उदाहरण के तौर पर किस तरह की बातें वो. करते थे जो इतनी आकर्षित कर गई। क्योंकि. ओशु जी को मैंने विद्रोह करते बहुत सुना. है। ये समर्थन वाली बात मुझे जिज्ञासा. पैदा कर रही है कि लाउत्त्सू किस तरह की. बातें कर रहे थे जो इतना उनका समर्थन चला. गया उनकी तरफ। लाओत्सु की बात ऐसी है कि. जैसे ओशो की बात है ना कुछ मानने की नहीं. है बल्कि जानने की तरफ इशारा है। और स्वयं. अपने विवेक से ही चलना है। वहां कोई आपका. लीडर नहीं हो सकता। कोई आपको हाथ पकड़ कर. नहीं ले जा सकता। आपको खुद ही जाना होगा।.
और एक अज्ञेय और अज्ञात में प्रवेश साहस. और हिम्मत चाहिए। ओशो ने अंग्रेजी में जो. टाइटल रखा है किताब कलाउत्सु की प्रवचन. माला का उसका नाम है ताओ द थ्री ट्रेजर्स. तो मैं इस पर आ जाता हूं ताकि आपको. संक्षेप में बात आ जाए। वो थ्री ट्रेजर्स. तीन खजाने ताऊ के तीन खजाने जिसको लाओसु. कहता है तो पहला खजाना है अभय. फियरलेसनेस. साहस। दूसरा है प्रेम लविंगनेस और तीसरा. है प्रथम होने की दौड़ नहींकांक्षा.
के विपरीत है ना किसी से कंपटीशन नहीं कोई. प्रतियोगिता नहीं है ना तुम स्वयं अपने आप. खिलो है ना किसी की नकल नहीं करना किसी के. आगे नहीं निकलना है अगर इन तीन बातों को. हम पकड़ ले लाओसु की मुख्य तीन बातें हैं. तो हम पाएंगे यही तीन बातें ओशो की भी है. खूब मैचिंग करता है ठीक इसी प्रकार भगवान. कृष्ण पर जो ओशो बोले हैं. आपको शायद पता ही हो अगर नहीं पता हो तो. मैं बता दूं कुल्लू मनाली में प्रवचन माला.
चल रही थी सन 1970 की बात है भगवान कृष्ण. की व्याख्या कर रहे थे उस किताब का नाम है. कृष्ण स्मृति. कृष्ण स्मृति बहुत मोटी किताब है वह भी सब. लोग सवाल पूछ रहे थे भगवान कृष्ण के बारे. में और एक एक चीज की व्याख्या कर रहे थे. उनके जीवन भी उसमें आ गया कृष्ण का और. उनके वक्तव्य भी आ गया फिलॉसफी भी आ गई. अंग्रेजी में उसका जो ट्रांसलेशन हुआ उसका. नाम रखा है कृष्णा द मैन एंड रिच फिलोसफी. तो उनका व्यक्तित्व और कर्तृत्व दोनों. उसमें खूब विस्तार में है। आज तक उन.
पहलुओं को किसी ने चर्चा नहीं की होगी।. ओशो ने पूरा समर्थन दिया और ओशो ने कहा कि. कृष्ण की बात. से मेरी बात बहुत कुछ मैच करती है और उस. प्रवचन माला के दौरान ही ओशो को ख्याल आया. कि भगवान कृष्ण ने जिस प्रकार का सन्यास. देना चाहा था. और वह समय तो नहीं हो सका लेकिन आज मैं. उसको करूं और वहां से सन्यास दीक्षा की. शुरुआत हुई पहला इनिशिएशन. भगवान कृष्ण किसको सन्यासी कहते हैं गीता. में वह कहते हैं हे अर्जुन.
कर्म का त्याग करना सन्यास नहीं है। कर्म. फलाकांक्षा का त्याग करना सन्यास है। अब. बड़ा सूक्ष्म डिफरेंस है। सामान्यत हम. जिसको सन्यासी कहते हैं जिसने कर्म का. त्याग कर दिया, घर परिवार छोड़ दिया, दुकान छोड़ दी, खेत खलियान छोड़ दिए, जंगल. में जाकर चुपचाप बैठ गया। है ना? हम इसको. कहेंगे सन्यासी हो गया। भगवान कृष्ण इसको. सन्यासी कहते ही नहीं है। अर्जुन तो यही. करना चाह रहा था। वो कह रहा था कि अपना. धनुष रख के बैठ गया था कि मैं छोड़ के. चला। मुझे नहीं लड़ना। क्या फायदा हिंसा.
करने से खून खराबा करने से मुझे नहीं. चाहिए सिंहासन जंगल में चला जाऊंगा कृष्ण. उसको रोक रहे हैं कि तुम अपना कर्म छोड़कर. नहीं जा सकते. तुम्हारा कर्तव्य है ना हां इसमें छोड़ना. क्या है फलाकांक्षा. फला शक्ति मैं जीत हूं यह तुम्हारी फला. शक्ति होगी इसको छोड़कर तुम अपना कर्म करो. अब यह बड़ी सूक्ष्म बात है ऊपर ऊपर से. आपको सारे कर्म करना है पलायन नहीं करना. है अर्जुन तो पलायनवादी है वह तो भगोड़ा.
बनने की कोशिश कर रहा है। पूरी गीता का. संदेश यही है कृष्ण का आप कर्म से पलायन. नहीं कर सकते। हां जो फल की आकांक्षा है. कि मेरी इच्छा अनुसार ऐसा ऐसा हो ये. ड्राफ्ट करनी है। ये ड्राफ्ट करनी है. तुम्हें और कर्म अपना पूरा करो मजे से। फल. की कोई आकांक्षा ना हो जो हो प्रभु की. मर्जी। अब अगर कृष्ण में ओशो को विश्वास. है कृष्ण की बातों में विश्वास है तो. कृष्ण तो भगवान है। तो मैं ओशो को आस्तिक. कहूं या नास्तिक. ना नास्तिक नास्तिक उनको कहिए वास्तविक हम.
वास्तविक. आस्तिक तो हमारी नजर. जहां वास्तविकता है उसका समर्थन है ना. कृष्ण की गीता का पूरा पूरा 100% समर्थन. लेकिन वास्तविकता भी तो नजरिया ही हो गया. कृष्ण की बातों से आप रिलेट कर पा रहे. ओशो ने किताब का शीर्षक ही रखा था कृष्ण. मेरी दृष्टि में बाद में उसका नाम चेंज हो. गया कृष्ण स्मृति ओरिजिनल जो है किताब. उसका नाम है कृष्ण मेरी दृष्टि में वो. अपना नजरिया दे रहे हैं महावीर के ऊपर और. जो बोले हैं उसका नाम है महावीर। मेरी.
दृष्टि में. नेचुरली उनकी दृष्टिकोण से है।. ओशो की नजर में चलिए मैं और रिफ्रेम करता. हूं। ओशो की नजर में आस्तिक और नास्तिक. कौन है? सिंपल वर्ड्स में. आस्तिक वर्ड बना है अस्तित्व से। दैट वि. एकिस्ट्स जिसका अस्तित्व है। जिसको इस. अस्तित्व में भरोसा है, प्रेम है, लगाव. है, वह आस्तिक है। और जिसको अस्तित्व में. भरोसा नहीं है, जो अन्तित्व पर अपनी नजर. लगा के रखता है, वह नास्तिक है। एक उदाहरण.
के लिए हमें यह प्यारा जीवन मिला है। एक. खूबसूरत भवन में हम बैठे हुए हैं। हमें एक. बात करने का सौभाग्य मिला है। दिस इज़. व्हाट एकिस्ट्स राइट नाउ।. हम. है ना? अगर इसके प्रति हमारा होश है, प्रेम है, लगाव है, इसके प्रति हमारा. सम्मान है तो हम आस्तिक हैं। हम. ट्रस्टिंग इन एकिस्टेंस है ना और अगर जो. चीजें नहीं है समझो. मेरे पास मेरे मन में ख्याल है कि ऐसीऐसी. कार होनी चाहिए और वो नहीं है और उसकी.
ईर्ष्या में मैं जला जा रहा हूं कि पड़ोसी. के पास है वो कार मेरे पास होनी चाहिए। अब. मैं उस चीज पर नजर रखे हूं जो नहीं है। हम. ये नास्तिक की दृष्टि है। तो संक्षेप में. हम कहें जो है उसको जो एंजॉय कर रहा है वह. आस्तिक है। उसमें जो आनंदित है, संतुष्ट. है। और जो नहीं में जी रहा है अभावग्रस्त. नजरिया है जिसका वो नास्तिक है। तो ईश्वर. से यहां कोई लेना देना नहीं है। है ना? किसी धर्म ग्रंथ से कोई लेना देना नहीं।. नहीं ओशो की दृष्टि में यह है। उदाहरण के.
लिए मान लीजिए हम एक भवन में गए और वहां. पर खूब अच्छे टाइल्स लगे हुए थे। लेकिन एक. टाइल मिसिंग था बीच में. और हमारी नजर उस पर पड़ी और हमारी नजर. वहां अटक गई मिसिंग टाइल। तो इसको कहते. हैं मिसिंग टाइल सिंड्रोम मनोविज्ञान की. भाषा में। जो नहीं है हम उस पे अटक गए। और. इतना कुछ था 500 टाइल लगी थी खूबसूरत। वो. हमारे लिए महत्वहीन हो गई। और जो नहीं है. उस पे हम अटक गए। तो ओशो कहेंगे ये. तुम्हारी नास्तिक दृष्टि है जो है उसमें.
तुम रस लो उसके प्रति संवेदनशील बनो उसको. एंजॉय करो यह आस्तिक है तो ईश्वर से कोई. लेना देना नहीं है किसी शास्त्र सिद्धांत. से कोई लेना देना देना नहीं है. ठीक है ये काफी इंटरेस्टिंग था ये जीवन. में दुख और सुख को लेकर भी बड़ा अच्छा. कांसेप्ट इसका. हमारे सारे दुख नास्तिकता की वजह से हैं।. हम. मेरे पास क्या नहीं है? मैं ये खोजता रहता. हूं। एक आदमी वो खोज रहा है कि उसकी पत्नी. में ये गुण नहीं है। ये गुण नहीं है। ये. गुण नहीं है। 50 अच्छे गुण हैं। वो नजर. नहीं आ रहे। दो-तीन उसको लग रहा है कि ये.
होने चाहिए थे और जिंदगी भर इसी की कलह चल. रही है कि वो तीन चीजें तुम में नहीं है।. अब जो चीज नहीं है तो नहीं है। वो कहां से. आ जाएंगी? जो है वो नजर नहीं आ रही है।. 50 अच्छी चीजें हैं वो नजर नहीं आ रही। और. हमारी पूरे दुख की वजह जो है वह हमारी. नास्तिकता है। भले एक आदमी मंदिर जाता हो, पूजा पाठ करता हो, तीर्थ यात्रा करता हो. लेकिन अगर उसके जीवन में दुख है ये प्रमाण. है कि वो नास्तिक है।. और एक आदमी कभी मंदिर नहीं जाता हो।. उदाहरण ले लीजिए संत कबीर का।.
ना कभी मंदिर गए, ना मस्जिद गए।. ना कोई शास्त्र पढ़ा, ना ग्रंथ पढ़ना ही. नहीं आता था।. पढ़ना ही नहीं आता था। उससे उनसे बड़ा. आस्तिक कौन? और याद रखिए कर्म छोड़कर नहीं. भागे थे। अपने परिवार का उत्तरदायित्व. संभाला था। अपना कामकाज करते थे। शाम को. बाजार जाते थे। पैसा कमाते थे। दुकान. लगाते थे।. ना गृहस्थ की कैटेगरी में फिट होते ना. सन्यस्त की कैटेगरी में फिट होते। उनसे. महा आस्तिक कौन होगा? यद उन्होंने कभी कोई.
पूजा पाठ ही नहीं किया। वो कहते हैं कि. मेरा उठना बैठना ही मेरी परिक्रमा है।. मेरा भोजन मैं लेता हूं। यही भोग लगाना. है। भगवान की मूर्ति थोड़ी भोग लगाते हैं।. वो खुद ही जब खाना खा रहे हैं तो इस भीतर. के भगवान को खिला रहे हैं। मैंने ओशो का. एक कोट पढ़ा था कि तुम्हारा ईश्वर अगर डर. पैदा करता है तो वो ईश्वर नहीं जेलर है।. बिल्कुल।. फिर मैंने इस्लाम पर एक पॉडकास्ट किया था।. अब जब मैं आपकी बात को सुन रहा हूं तो. मुझे लगता है कि इस्लामिक विचारधारा से तो. फिर तो काफी भिन्न है वो शो। बिल्कुल. भिन्न है।. मुझे लगता है जितने धर्मों की हमने बात की.
उसमें सबसे ज्यादा दूर वो इस्लाम धर्म से. है।. क्योंकि वहां पर उन्होंने इस्लाम धर्म पे. कभी कोई कमेंट किया नहीं।. है ना? तो उस बारे में कभी किसी ने कोई. सवाल पूछे नहीं।. एक आध दो जगह कहीं पूछे हैं। इस कुरान की. जो पहली आयत है उसको उन्होंने समझाया है।. हां। सूफी संतों के ऊपर बहुत प्रवचन. मालाएं दी हैं। ये इस्लाम से वो इस्लाम. इस्लामिक टीचिंग पर उन्होंने क्यों. स्टेटमेंट नहीं दिए? जैसे क्रिश्चियनिटी. पर वो गए। बाकी सारे धर्मों पर गए। चाइना. में भी उन्होंने एक व्यक्ति को पढ़ा,
समझा, जीवन दर्शन दिया। हिंदूज़्म में गए. वो कृष्ण जी पर। इस्लाम में क्यों नहीं. गए? कोई आया ही नहीं था इस प्रकार के लोग।. यदा कदा कोई मुसलमान उनके पास आया। यदा।. अब देखिए आज वाले कह देंगे कि वहां बोलने. में थोड़ा डर रहता है।. नहीं डर। कोई उनके पास आया ही नहीं। तो. जिसने सवाल उठाया। मान लीजिए मैंने कहा कि. कृष्ण मेरी स्मृति में उन्होंने भाषण दिए।. लंबी प्रवचन माला चली तीन हफ्ते तक।. तो जितने लोग इकट्ठे थे वो हिंदू थे। तो. भाई जो सामने बैठे हैं वो जो सवाल पूछेंगे. उसका ही उत्तर तो देंगे। है ना? वो हिंदू. क्यों सवाल पूछेंगे कुरान के बारे में? ओशु जी तो है नहीं हम और आप उनकी.
विचारधारा से समझने की कोशिश कर रहे हैं।. तो जब ये लाइन जो मैं कह रहा हूं कि अगर. तुम्हारा ईश्वर डर पैदा कर इस्लामिक. टीचिंग में आपको पांच बार नमाज पढ़नी. होगी। आप ऐसा करेंगे। ये लिखा है। आपको. इसका पालन करना पड़ेगा। ओशो इस आइडियोलॉजी. के खिलाफ तो मुझे समझ में आते हैं कि इस. तरह की सोच के वो बिल्कुल विपरीत रहे हैं।. उनका कहना है किसी कर्मकांड के द्वारा. परमात्मा को नहीं पाया जा सकता। याद रखिए. परमात्मा को इंकार नहीं कर रहे लेकिन. हमारी कर्मकांडों से कि हम ऐसा ऐसा करेंगे. तो वो मजबूर हो जाएगा। उसको मिलना पड़ेगा।.
ये तो एक प्रकार की उसकी भी मजबूरी हो गई।. मतलब ईश्वर भी बंधन में है कि हम पांच बार. झुक गए कि हमने ये कर्मकांड कर लिया कि. मंदिर की परिक्रमा कर ली कि पूजा पाठ कर. लिया। 5000 बार राम राम राम जप लिया। अब. राम को आना पड़ेगा। राम भी बंधन में है।. वो भी एक नियम से बंधे हुए हैं। नहीं. परमात्मा का अर्थ है परम स्वतंत्रता। द. अल्टीमेट फ्रीडम। तो उसको पाने के लिए कोई. भी चीज काम की नहीं होगी।. हम. यहां ओशो की दृष्टि बहुत अलग है। सभी. धर्मों के क्रियाकांडों के खिलाफ है।. सिर्फ इस्लाम के नहीं सब धर्मों के.
क्रियाकांडों के खिलाफ है।. कबीर ने क्या किया था जिससे उनको परमात्मा. मिल गया।. क्या किया था? ऐसा तो कुछ नहीं किया था।. बस मिल गया। गुरु नानक ने क्या किया था? अचानक एक दिन पाया कि वो परमात्मामय हो. गए। किया तो कुछ नहीं था। वो भी सब धर्मों. के खिलाफ हैं। सब क्रियाकांडों के खिलाफ. हैं। तीर्थ यात्राओं के खिलाफ हैं। मूर्ति. पूजा के खिलाफ हैं। फिर उनको कैसे ये घटना. घट गई? तो निश्चित रूप से हम जो सोचते हैं. हमने अपनी धारणा ईश्वर पर भी लगा दी कि वह.
भी किसी नियम कानून से बंधा हुआ है कि हम. ऐसा ऐसा करेंगे तो उसको हमारे पास आना. पड़ेगा।. फिर तो ईश्वर भी गुलाम हो गया भक्त का।. नहीं ऐसा नहीं हो सकता। वह परम स्वतंत्रता. है और जब हम सब हम भी सब चीजों से जब. स्वतंत्र हो जाएंगे तो हमारा मिलन हो. जाएगा।. कुछ समान गुण तो होना चाहिए मिलने के लिए।. एक परम स्वतंत्र तो फिर पूजा की जाए या. कर्मकांड किया जाए ना किया जाए? जैसे.
क्रिश्चियंस चर्च जाते हैं। मुसलमान नमाज. पढ़ने आते हैं। हम मंदिर जाते हैं, जल. चढ़ाते हैं। हमारी अपनी सोच है।. चलिए मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं। ईसा. मसीह कौन से चर्च गाते हैं? आप मुझे बता. दीजिए। उनको परमात्मा कैसे उनके फॉलोअ गए? मैं मुझे यह बताइए ईसा मसीह किस चर्च में. गए थे? उस जमाने में तो चर्च होते ही नहीं. था।. उस समय कोई पादरी था ही नहीं और उस समय. कोई ईसाई धर्म भी नहीं था।. हम. ये तो 300 साल बाद बना। ईसा मसीह के मरने. के 300 साल बाद ईसाई धर्म बना।. तो ईसा मसीह ने तो खुद ही ईसाई धर्म का. पालन नहीं किया।. हम. तो उनको तो परमात्मा मिल गया।.
हम. और आज तक का इतिहास गवाह है। ईसाई धर्म को. जो पालन कर रहे हैं। किसी को नहीं मिला।. हम तो अब मुझे और कुछ कहने की जरूरत है. क्या? तो फिर क्या करें? मैं अब ओशो के. विचार समझना चाहता हूं मैं। अगेन हम वही. सोचते हैं करने की भाषा में। यहां पे मैं. आपको. तो अगर मान लीजिए मैं किसी ईश्वर पर. विश्वास रखता हूं। मुझे जरूरत नहीं मंदिर. जाने की।. जैसे ओशो पे कोई विश्वास रखता है।. नहीं ओशो पर विश्वास क्यों करें? मैं एक बात कह रहा हूं। व्हाई? कि वो उनको पढ़ रहा है, समझ रहा है, जान. रहा है।. समझ का? विश्वास वर्ड यूज़ नहीं करिए। जब.
आप साइंस की कोई किताब पढ़ते हैं, फिजिक्स. की या केमिस्ट्री की आप विश्वास करते हैं. क्या? आप समझते हैं। आपने गणित समझा हम. स्कूल में थे। आप टीचर ने समझाया कि ऐसा. ऐसासा ये गणित है।. है ना कि हम टीचर में विश्वास कर तो फिर. ये क्या था जो उन्होंने कहा कि मैंने. ईश्वर को नहीं देखा लेकिन एक शून्य देखा. है जो सब कुछ से अधिक पूर्ण है।. ये तो विश्वास ही हो गया ना। तो वो. विश्वास करने की नहीं कह रहे। वो अपना. एक्सपीरियंस बता रहे हैं कि मैंने परम. शून्य को महाशून्य को जाना।. जो परिपूर्ण है। द जीरो एक्सपीरियंस फिल्ड.
विद एवरीथिंग।. इट इज नथिंगनेस एंड फिल्ड विद. एवरीथिंगनेस। है ना? शून्यता में पूर्णता. को मैंने जाना। यह अपना एक्सपीरियंस कह. रहे हैं। पर यह नहीं कह रहे कि आप मानो।. हां वो विधि बता रहे हैं कि किस विधि आप. इसको जान सकते हो।. आप भी शून्य हो जाओ। और शून्य होने की. विधि क्या है? जो खोपड़ी में विचार भरे. विचार शून्य हो जाओ। बी थॉटलेस। तो क्या. ये सिर्फ कल्पना हमारी है कि हम ये मानते. हैं कि भगवान को हमने याद किया, मंदिर गए, पूजा पाठ किया या नमाज पढ़ी या चर्च गए और.
ईश्वर ने हमारे दुखों को हर लिया? भले. पुरुषों की नजर में क्या है फिर क्योंकि. हमारी तो आस्था है. भाई दुख देने वाला कौन था. किसने दुख दिया था देखिए यहां पे भगवान. बुद्ध और भगवान महावीर की फिलॉसफी बिल्कुल. अलग हो जाती है वे कहते हैं तुम अपने. दुखों के स्वयं जिम्मेवार हो. हम ये भी सच बात है हमारा नजरिया सोच होता. है. अभावग्रस्त है हमारी. कई बार स्थिति ऐसी होती है. तो बुद्ध और महावीर की बात लॉजिकल है और. इससे हमको एक रिस्पांसिबिलिटी भी मिलती है. और फ्रीडम भी मिलती है अगर मैं अपने नजरिए.
की वजह से दुखी हूं तो मैं अपना नजरिया. चेंज कर सकता हूं।. हम तो मेरा दुख सुख में हो जाएगा। बदल. जाएगा।. कई बार नजरिए के अलावा भी दुख होते हैं।. जैसे मान लीजिए कभी किसी की तबीयत खराब हो. गई। अब तो विज्ञान भी कहता है, डॉक्टर्स. भी कहते हैं कि कई बार चमत्कार की. आवश्यकता होती है और कई बार चमत्कार होते. भी हैं। जहां पर डॉक्टर हाथ खड़े कर लिए. फिर वो कहता है अरे अचंभित की चीजें बेहतर. हो गई। तो वहां तो लोग आस्था को मानते. हैं।. या कई बार भी डॉक्टर हूं।. है ना? प्लीज इस बात को खूब अच्छे से समझ.
लीजिए। चमत्कार जैसी कोई चीज नहीं होती।. हम. चमत्कार का क्या मतलब होता है? इफेक्ट. विदाउट एनी कॉज।. हम. साइंस का क्या मतलब होता है? फॉलोइंग द. कॉज एंड इफेक्ट रूल। कार्य कारण का एक. सिद्धांत है। है ना? हम पानी इतना गर्म. करेंगे, इतने टेंपरेचर, इतने प्रेशर पर. वहां जाकर वो भाव बनेगा। एक नियम है। इस. नियम का कोई अपवाद नहीं हो सकता।. हम. है ना? काज एंड इफेक्ट रूल। पूरी साइंस. इसी पे खड़ी है। और हम देखते हैं 300 साल. में साइंस ने कितनी प्रगति की। क्योंकि. काज एंड इफेक्ट को फॉलो करती है। हम.
जो चमत्कार की बात कर रहे हैं वो कह रहे. हैं कि. इफेक्ट कैन बी प्रोड्यूस्ड विदाउट एनी. काज। है ना कि हम पानी को गर्म नहीं. करेंगे और बस वो भाव बन जाएगा। ऐसा नहीं. हो सकता आज तक कभी नहीं हुआ। है ना? सब. बकवास है। इस प्रकार के किस्से कहानियां. लोग फैलाते रहते हैं। अपनी बात से. प्रभावित करने के लिए, लोगों को. अंधविश्वासी बनाने के लिए, उनका शोषण करने. के लिए। और जो कहते हैं कि विज्ञान के आगे. भी एक जहान है जिसको अभी भी हम डिस्कवर कर. रहे हैं। धीरे-धीरे. निश्चित रूप से जहान. डिस्कवर कर रहे हैं। तो कुछ तो होगा जिससे.
हम अनजान है। सब कुछ नहीं समझ पा रहे।. जैसे जैसे. मैंने कब कहा कि हम सब कुछ समझ गए।. जैसे उन्होंने आप अगर आपकी बात मानो कि. बुद्ध जी को महसूस किया।. वो आंखों से दिखाई नहीं पड़े। उनका कोई. सबूत तो है नहीं। पर वो एक एहसास था. जिन्होंने महसूस किया। अगर मैं उन बातों. को सत्य मानू तो ऐसे ही अगर मानने के लिए. तो कर रहे हैं।. मानने के लिए नहीं कह रहे हैं। देखिए आपको. किसी से प्रेम हो गया।. ठीक है? आप उसके बिल्कुल दीवाने हो गए और. आप अपना अनुभव एक्सप्रेस कर रहे हैं। आपने. गीत लिखा, कविता लिखी.
अपना प्रेम जाहिर करने के लिए और हम. कहेंगे ठीक है आपका पोस्टमार्टम करके. देखते हैं हृदय में कहां है प्रेम। आप. बहुत दिल की बातें करते रहते हैं।. हम. पोस्टमार्टम में तो प्रेम नहीं निकलेगा।. हम. हार्ट मिल जाएगा, चार चेंबर मिल जाएंगे।. प्रेम भर नहीं मिलेगा। तो जो सूक्ष्म. अनुभव हैं. उनका कोई ठोस प्रमाण तो नहीं होता। हम. मेरे अंदर विवेक है। मेरे अंदर अवेयरनेस. है। कॉन्शियसनेस है। आपके भीतर भी आप. जानते हो कि है. हम. मन है आप जानते हो. क्या किसी फिजिक्स वाले के आगे कि.
केमिस्ट्री वाले के आगे आप अपने मन को. सिद्ध कर सकते हो कि मन है।. नहीं।. यद्यपि वह जो वैज्ञानिक है वह भी मन का. उपयोग करके वैज्ञानिक बना है।. वह भी जानता है कि मन है। लेकिन उसको. प्रमाणित नहीं कर सकता। हम. है ना प्रेम है. ठीक. है ना तो ठीक ऐसे ही आत्मिक अनुभव है तो. हम मेंटल एक्सपीरियंस को स्वीकार कर रहे. हैं कि हैं और उनका फिजिकल प्रमाण नहीं हो. सकता हम अपने इमोशनल एक्सपीरियंस को महसूस. करते हैं.
है ना पर्सनली एक्सपीरियंस्ड एक हमको किसी. से सील मॉल लगवाने की जरूरत नहीं है कि. किसी नोटरी के पास जाके हम कहें कि मुझे. प्रेम हो गया इस सर्टिफिकेट बना के दे दो. कि इसका एफिडेविट करा दो. कौन कैसे एफिडेविट वेट करेगा। उसको क्या. पता है? ठीक है।. ओशो जी ने ऐसे ही स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस. है।. बिल्कुल सही बात है। और वही हमारा अगला. टॉपिक है। ओशो जी ने मेडिटेशन पर काफी. बातें की है।. और. उनका ये मानना था कि ध्यान मेरे अंदर ही. था।. अब उनका जो मेडिटेशन का हिसाब किताब है वो. पुराने वालों से बड़ा अलग है।.
आमतौर पर साधना एक बड़ी एक तपस्या होती. थी। लेकिन ओशो की साधना मजेदार नजर आती. है।. क्या यही ओशो की सफलता का राज है? पहले. मैं एक छोटी सी घटना सुना दूं आपको। फिर. हम इस बात पर आ जाएंगे। हम. रविंद्र नाथ टैगोर ने एक गीत लिखा है। उस. गीत में एक छोटी सी कहानी है जिसमें वो. कहते हैं कि भगवान बुद्ध जब बहुत प्रसिद्ध. हो गए। वो अपनी राजधानी भी आए हैं जगह-जगह. जा रहे हैं अपना उपदेश देने के लिए। तो. वहां उनकी पत्नी भी उनसे मिलने आती है और.
वह एक सवाल पूछती है कि आपने हजारों लोगों. के हजारों सवालों का जवाब दिया। मेरा भी. एक प्रश्न का उत्तर दीजिए। क्या आपने जंगल. में जाकर तपस्या करके जो पाया क्या वो घर. में महल में मौजूद नहीं था. और बुद्ध की आंखें नीचे झुकी रह जाती हैं. उत्तर नहीं देते यहां रविंद्र नाथ की गीत. खत्म हो जाता है. तो रविंद्र नाथ ने अपनी बात कह दी बुद्ध. को निरत्तर खड़ा कर दिया. उत्तर तो मिल गया कि जिसको पाया परमात्मा.
को वह तो सर्वव्यापी है तो ऐसा थोड़ी कि. घर में नहीं है और मंदिर में है कि शहर. में नहीं है और जंगल में है। और फिर आप. गौर से देखिए भगवान बुद्ध ने छ साल घनघोर. तपस्या की। जितने कष्ट दे सकते थे अपने आप. को दे दिए। इस बीच में उन्होंने 99 गुरु. बदले।. जिसने जो बताया वही साधना की और किसी से. भी कुछ हासिल नहीं हुआ। गुरु बदलते गए।. बदलते गए शायद यहां मिले कुछ। अंत में. गुरु ही उनके हाथ जोड़ते भैया अब तुम जाओ।.
तुम्हारी वजह से हमारी बदनामी होती है।. क्योंकि तुम इतनी निष्ठा पूर्वक करते हो।. हम जो कहते हैं और तुम्हें कुछ घट नहीं. रहा। एक्चुअली हमको भी बस इतना ही आता है।. हमको भी आज तक नहीं घटाया वह। तुम्हारी. वजह से हमारी बदनामी होती है। अन्य लोग जो. हैं वो निष्ठावान नहीं है। वह साधना करते. ही नहीं। तो हम हमेशा उनको ब्लेम कर सकते. हैं कि तुमने ईमानदारी से नहीं किया।. तुमसे हम ये कह ही नहीं सकते कि ईमानदारी. से नहीं किया। हमने जितना कहा तुमने उससे. भी ज्यादा कर दिया।. 99 गुरु बदले। उस जमाने की जितनी साधनाएं. हो सकती थी सब कर ली और बुरी तरह से सब.
कुछ विफल हो गया। फिर एक दिन की बात है।. शाम का समय है। उन्होंने तीन महीने से. उपवास का व्रत लिया था कि केवल चावल का एक. दाना प्रतिदिन खाएंगे। चावल का एक दाना. प्रतिदिन तीन महीने से चल रहा था ये। उनका. शरीर सूख के. कांटा हो गया था। हड्डियां हड्डियां नजर. आती थी। उस जमाने की एक प्रतिमा उनकी कहीं. किसी मंदिर में है। हड्डियां हड्डियां गिन. लो। आप कितनी हड्डियां है आदमी में। नदी. में स्नान करके बाहर निकलने की कोशिश कर.
रहे हैं और इतने कमजोर हो गए हैं कि निकल. नहीं पा रहे हैं। यद्यपि वो नदी जिसका. वर्णन है कोई नदी जैसी भी नहीं छोटा सा. नाला है। घुटने घुटने पानी होगा उसमें एक. पांच साल का बच्चा भी निकल जाएगा और बुद्ध. इतने कमजोर हो गए कि नहीं निकल पा रहा। एक. पेड़ की जड़ पकड़ के थोड़ी देर उन्होंने. विश्राम किया। बाम मुश्किल किसी प्रकार. बाहर निकले।. एक वृक्ष वहां लगा हुआ था। उसके नीचे आकर. वो बैठे और तब उन्हें अचानक ख्याल आया कि. मैंने ये क्या कर लिया?
कोई आध्यात्मिक ज्ञान तो हुआ ही नहीं।. केवल शरीर नष्ट हुआ।. कुछ भी हासिल नहीं हुआ छ महीने में और तब. उन्हें अचानक एक ग्लिं्स आई कि सब व्यर्थ. है। बकवास है।. 29 साल महल में रहे थे। राजमहल के सुख भो. गए थे। एक दिन वो त्याग दिया था। समझ में. आया था कि बकवास है। कोई सार नहीं है. इसमें। छ साल में यह समझ में आ गया कि. जिसको हम धार्मिक साधना कह रहे हैं यह भी. 100% बकवास है। इसमें भी कोई सार नहीं है।.
तो उस दिन जिसको हम कहे त्याग का भी त्याग. हो गया। सूफी फकीर कहते हैं ना तर्क तर्क. त्याग का भी त्याग। ही रनाउंस द रनंसिएशन. है ना। वो सन्यास भी छूट गया जो इतने साल. से ढो रहे थे वो। और. तीन महीने पुरानी भूख थी और कहते हैं. कहानी कि कोई गांव की एक महिला एक कटोरा. खीर वहां रख गई थी पेड़ के नीचे। उसने कुछ. मनोति मानी वृक्ष से और उसको विश्वास था. कि वृक्ष के देवता ने पूरी कर दी है तो. खीर एक रख गई थी। बुद्ध ने देखा सामने खीर.
रखी है और पेट में इतनी जोर की भूख थी. उन्होंने खीर खाई वो व्रत भी तोड़ दिया. तीन महीने का। उनके चार शिष्य थे. जिन्होंने देखा कि अरे गौतम ने तो व्रत. तोड़ दिया। भ्रष्ट हो गया। योग भ्रष्ट वो. लोग त्याग के छोड़ के चले गए इनको कि हम. तुम्हारे शिष्य नहीं आज से।. बुद्ध ने कहा जाओ ये भी अच्छा हुआ इनका भी. झंझट छूटे चार लोग पीछे लगे थे कई सालों. से उनको महान त्यागी समझ के बुद्ध ने कई.
बार कहा कि मुझे खुद ही कुछ अभी नहीं मिला. मैं तुम्हें क्या बताऊं मेरे पीछे मत चलो. आज वो खुद ही छोड़ के चले गए बुद्ध. रिलैक्स हुए पेट भर गया. खूब थके हुए थे खूब कमजोरी लग रही थी पेट. भर के खूब अच्छा लगा खूब गहरी नींद आई हो. सकता है तीन महीने से वो सोए भी नहीं थे. अच्छे से भूखे पेट अद्भुत नींद लगी और आज. नींद में कोई स्वप्न भी नहीं आया।. स्वप्न तो हमारे अधूरी वासनाओं के आते.
हैं। कोई संसार में जी रहा है उसको संसार. की वासनाएं हैं। वो वहां के सपने देखता. है। सपने में हम वो चीज पूरी कर लेते हैं. जो हम करना चाह रहे थे वो नहीं कर पाए।. पिछले छ सालों से बुद्ध के मन में धार्मिक. सपने आते थे कि देवी देवता से मिलन हो गया. कि स्वर्ग पहुंच गए कि ये हो गया कि वो हो. गया। धार्मिक सपने कि मोक्ष पहुंच गए, निर्वाण पहुंच गए हैं। वो भी सपने थे।. अधूरी वासना इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो. कामना संसार की है कि धर्म की है। कामना. तो कामना है। आज कोई भी स्वप्न नहीं आया।.
निर्विचार निस्वप्न अवस्था में गहरी नींद. लगी। गहन सुसुक्ति में पहुंच गए। और सुबह. जब नींद खुली अब तो ये कहना भी ठीक नहीं. कि बुद्ध ने आंखें खोली।. वो तो अपनी तरफ से सब कुछ करने वाले नहीं।. नहीं वो तो सब छोड़ चुके हैं। आंखें खुल. गई। प्रकृति ने खोलनी कहो। प्रकृति ने. नींद खोली और वो जो जागरण आया और सुबह. पंछियों की आवाज सुनाई पड़ी। वृक्ष दिखाई. पड़ा और एक तारा आखिरी तारा जो सुबह का.
डूब रहा था उस पर नजर पड़ी और धीरे-धीरे. धुंधला होते वो तारा विलीन हो गया और. बुद्ध के भीतर से कुछ विलीन हो गया जिसको. अहंकार कहते हैं। अहंकार होता है कर्मठता. में। दो प्रकार के अहंकार होते हैं। मैं. करता हूं और मैं जानता हूं। ज्ञाता है ना. दो प्रकार के ईगो हमारे हैं। बुद्ध के. भीतर से कर्ता भाव तो खत्म हो गया था। वो. त्याग छूट गया था। ज्ञाता भाव भी खत्म हो. गया। है ना? वो तारे को देख रहे थे। आंखें.
खुली थी। तारा विलीन हो गया। भीतर से भी. जैसे सब कुछ विलीन हो गया। कोई विचार. नहीं, कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं, कुछ भी नहीं। और उस क्षण उन्हें परम. बुद्धत्व घटित हुआ। उस दिन गौतम सिद्धार्थ. भगवान गौतम बुद्ध बने। किस क्रिया के. परिणाम से बने? किसी क्रिया से नहीं बने।. टोटल रिलैक्सेशन विद अवेयरनेस।. त्याग त्याग को त्याग करके। तो बुद्ध ने. सिद्ध कर दिया कि किसी त्याग से, किसी. कर्मकांड से, किसी पूजा पाठ से, किसी व्रत.
उपवास से परमात्मा नहीं मिलता।. क्या हम फिर से वही रिपीट करें? कहानी जो. उन्होंने की थी। विज्ञान में तो हम ऐसा. नहीं करते। जिस व्यक्ति ने बिजली का बल्ब. बनाया उसने सैकड़ों प्रयोग किए। ढाई तीन. साल उसके बर्बाद गए। उसके मन में एक कहीं. से सूझबूझ आई थी कि किसी चीज से बिजली. बहाने से उ प्रकाशित हो जाएगी। अब वो चीज. कौन सी पता नहीं। उसने सूअर की पूंछ के. बाल से लेकर घास के पत्ते तक से विद्युत. प्रवाह कर करके देखा। असफलता असफलता.
असफलता अंततः एक दिन टंगस्टन के तार से. किया और प्रकाश पैदा हो गया। अब हमको. प्रकाश जलाना है कि हम फिर से सूअर के बाल. से शुरू करेंगे कि घास के पत्ते से शुरू. करेंगे। वो तो सिद्ध हो चुका कि वो असफल. है। है ना? तो विज्ञान में हम हमेशा आगे. बढ़ते जाते हैं। हम वैज्ञानिक के द्वारा. की गई गलतियों को नहीं दोहराते। वो तो. साबित हो गया कि गलत था। जो सही हो गया है. हम उसको पकड़ते हैं और उसके आगे हम चलते. हैं। नेचुरली बिजली का बल्ब बनने के बाद.
टंगस्टन वाला बल्ब के बाद कितने प्रकार के. बल्ब बन गए। आज जो लगे हैं। बिल्कुल दूसरी. टेक्नोलॉजी आ गई। सब कुछ बदल गया।. आगे और बदलता जाएगा। है ना? विज्ञान का. विकास क्यों होता है? क्योंकि हम पुराने. वैज्ञानिक की गलतियों को नहीं दोहराते।. धर्म में क्या होता है कि वो जो बौद्ध. अनुयायी बनेंगे वो वही करेंगे जो बुद्ध ने. छ साल किया था। जिससे कुछ भी नहीं मिला. था।. यहां पे हम अटक जाते हैं। धर्म का कोई. विकास नहीं हो पाता। तो ओशव हमें वहां से.
शुरू कर रहे हैं जहां बुद्ध ने छोड़ा। वो. कहते तुम उस अवस्था में अब भी इसी क्षण. क्यों नहीं आ जाते? इट टोटल रिलैक्सेशन. विद अवेयरनेस। दैट्स ऑल। सो सिंपल ना तो. कोई त्याग की जरूरत है, ना परिवार को. छोड़ने की जरूरत है, ना अपना आजीविका. उपार्जन का साधन छोड़ने की जरूरत है।. बात है ना? और रवंद्र नाथ टैगोर की कहानी. याद रखिएगा। उन्होंने अपना पूरा व्यंग कर. दिया। उसमें बुद्ध को निरुत्तर खड़ा करके।. मतलब वही कहानी आप पी बैठ शराब मस्जिद में. या वो जगह बता जहां खुदा नहीं। यह थोड़ी.
ना कि सोमवार को नहीं खाएंगे। तो ओशो ने. अध्यात्म का विकास किया है। अब यहां से. शुरुआत होती है कि तथाकथित बौद्ध उनसे. नाराज हो जाएंगे। हम. वो बुद्ध की उन चीजों का पालन कर रहे हैं. जब वो अज्ञानी थे।. हम और जहां से उनको ज्ञान मिला वो बात. उनको पता ही नहीं है। उसके आगे वो बढ़ ही. नहीं पा रहे हैं।. ठीक है? ये डायनेमिक मेडिटेशन क्या था? क्योंकि अभी भी हम भारत में योग देखते. हैं। देश विदेश से लोग आते हैं। वह ऋषिकेश.
जाते हैं, साधना करते हैं। शांति से ध्यान. लगाते हैं। हम जैसे प्रोफेशनल्स को भी कई. बार एडवाइस किया जाता है कि आप सुबह थोड़ी. देर ध्यान लगाइए। फिर जब हम ओशो को सुनते. हैं, पढ़ते हैं तो उसमें आता है डायनेमिक. मेडिटेशन जहां पर नाचने, चिल्लाने इसके. जरिए दिमाग शांत करने की प्रक्रिया होती. है। तो ये क्या जरूरत थी? ये तो क्योंकि. योग साधना तो अभी भी उतनी ही रेलेवेंट है।. देखिए पुराने जमाने का मनुष्य जो था और आज. का जो मनुष्य है इसमें जमीन आसमान का फर्क. है। अभी थोड़े दिन पहले किसी साइकोलॉजिस्ट. ने अध्ययन किया था। बड़ी स्टडी थी उसकी और.
उसने बताया निष्कर्ष उसका कि आज से 600. वर्ष पहले एक व्यक्ति को दिन भर में जितनी. सूचनाएं मिलती थी इंफॉर्मेशन। आज के पढ़े. लिखे सुशिक्षित व्यक्ति को उससे 600 गुनी. अधिक सूचनाएं मिलती हैं। हम. बमार्डमेंट ऑफ इंफॉर्मेशन हमारा मस्तिष्क. उतना सब सहन करने के लिए बना भी नहीं है।. हम. सो मच इंफॉर्मेशन विशेषकर ये इंफॉर्मेशन. टेक्नोलॉजी के विकास के बाद आदमी पगलाने.
की हालत में पहुंच गया। इतनी चीजें उसको. पता है और अभी आ गया चैट जीपीटी और Google. और इंटरनेट. आदमी पागल हो जाएगा इतना सब जान के. है ना इस पगलाई हुई हालत वाले मनुष्य को. अगर शांत करना है तो इसके लिए वो उपाय काम. नहीं आएंगे जो पतंजलि के जमाने में आए थे. कि भगवान शिव के जमाने में आए थे कि भगवान. बुद्ध के जमाने में आए थे वो आदमी बहुत. सरल था भोला वाला था गांव का ग्रामीण था. दिन भर बड़ी मेहनत करता था लकड़हारा था. थका मांदा घर आता था अब उसने सिर्फ इतना.
ही कहा कि चुपचाप बैठ जाओ अपनी सांस को. देखो व्यपसना और तुम शांत हो जाओगे वो हो. जाता था. हम बट अभी भी लोग कैसे करते हैं मैं. अरविंद केजरीवाल से मिला उन्हें कहा वो. कहते हैं बड़ी शांति मिली उन्हें इस चीज. से अब उनसे सारा बिजी कौन पूरी दिल्ली. संभाल के बैठे थे अब तो हार गए उससे पहले. जीते थे और बहुत सारे और भी लोग बोलते हैं. मोदी जी यही बात कहते हैं. कुछ लोगों के लिए हो सकता है लागू हो. जनमानस के लिए जनरल प्लेटफार्म पे लागू. नहीं होगा आदमी इतना अशांत इतना बेचैन है. आपको शायद पता होगा पिछले 10 साल साल पहले.
हमारे देश में जितने स्टूडेंट सुसाइड करते. थे. इन 10 सालों में वह संख्या 200% बढ़ गई हम. सुसाइड करने वालों की ये आदमी कितने. डिप्रेशन में कितनी परेशानी में कितनी. व्यथा में है कितनी एंग्जायटी कैसे शांत. करें मन को. तो अब नई तरकीब लानी पड़ेगी ना वो तो सांस. वाली विधि काम नहीं करेगी तो वो सब कहते. हैं पहले अपनी बेचैनी को उजागर करो उसको. विसर्जित करो निकाल के. कैसे. समझो मेरे अंदर क्रोध दबा है. और मैं उसको दबा के बैठा हूं मैं एक नौकरी.
करता हूं। ऑफिस ने मुझे बॉस ने डांट दिया. ऑफिस में। मेरी कोई गलती नहीं थी और मैं. समझता हूं कि यह आदमी गलत है जो मुझे डांट. रहा है। लेकिन मैं उससे कुछ कह नहीं सकता।. मेरा बॉस है।. मेरी नौकरी मेरी आजीविका उसके हाथ में. नौकरी से निकाल दे, ट्रांसफर कर दे। मेरी. रिपोर्ट बिगाड़ दे, प्रमोशन रोक दे। बहुत. कुछ उसके हाथ में है।. मैं उस पर नाराज नहीं हो सकता। दिल तो. मेरा होता है कि उतार के दो जूते मारूं. उसको। लेकिन मैं कह रहा हूं यस सर। यस सर. आप ठीक कह रहे हैं।. क्रोध तो मेरे भीतर आ गया।. है ना? क्रोध सिर्फ इमोशन नहीं है। इट हैज़.
अफेक्टेड माय फिजिकल बॉडी।. हम. मेरी हाइपोथैलेमस में गया। वो विचार. पिट्यूटरी में आया। वहां से संदेश एड्रिनल. ग्लैंड को पहुंच गया। वहां से एपिनेफिन. हार्मोन निकल गया। उसने हृदय की धड़कन तेज. कर दी। ब्लड प्रेशर बढ़ा दिया।. मांसपेशियों में खून आ गया। फाइट और. फ्लाइट की सिचुएशन के लिए बॉडी पूरी तैयार. हो गई। और ऊपर से मैं पाखंड कर रहा हूं कि. जैसे कुछ नहीं हुआ है। लेकिन भीतर तो बहुत. कुछ हो गया। ज्वालामुखी फट गया है।. इसका क्या होगा? कहां जाएगा? अब मैं शांत. होने की कोशिश करूंगा। मैं पाऊंगा मेरे.
अंदर भूकंप चल रहा है। क्रोध का है ना? उथल-पुथल मची हुई है। ज्वार भाटा आया हुआ. है। मैं शांत हो ही नहीं पाऊंगा।. तो इसका कुछ निष्काशन का उपाय करना होगा।. मैंने लकड़हारे की बात कही पुराने युग की. जो दिन भर लकड़ियां काट रहा था। कुल्हाड़ी. चला रहा था। उसकी हिंसा विसर्जित हो गई।. हिंसा की जो भावना थी वो विसर्जित हो गई. कुल्हाड़ी चलाने में। अब वो घर आके मारपीट. नहीं करेगा। किसी की लड़ाई झगड़ा नहीं. करेगा। वो शांत और शिथिल होना चाहेगा।. उसके लिए ध्यान बिल्कुल आसान है। लेकिन आज.
का आदमी जो दिन भर टेंशन ही टेंशन में है।. यानी कई लोगों से मैं सुनता हूं कि घर में. ऑफिस से ज्यादा टेंशन है।. हां मतलब ये सच है कि लोग घर ऑफिस से. मैंने भी देखा है कई लोगों को कि जो घर. जाने के बाद थोड़ी देर कहीं रुक जाते हैं. कि अभी घर जाएंगे चिकचिक होगा। है ना? तो. जब टेंशन ही टेंशन है, ऑफिस में भी टेंशन. है, दुकान में भी टेंशन, फैक्ट्री में भी. टेंशन है, घर में भी टेंशन है। ये इस आदमी. से आप कैसे उम्मीद करते हैं कि आंख बंद. करके बैठेगा और शांत हो जाएगा।. सशन क्या है फिर इसका? ओशो की नजर में. ओशो वही सलूशन दे रहे हैं कि आज की.
परिस्थिति में हमें जो भीतर दबा हुआ है. इसको उभार के इसको सबमिट सब्लीमेंट करना. होगा। इसको विसर्जित करना होगा।. कैसे? डायनेमिक मेडिटेशन उसकी विधि है।. इसमें क्या होता है? उसके पांच चरण हैं।. है ना? अगर आपको समय हो तो फिर मैं पूरा. बताऊं। शॉर्ट श में सुना दीजिए।. पहला चरण है ऊर्जा का जागरण प्राणायाम के. द्वारा।. यहां पे ओषो का प्राणायाम पारंपरिक योग के. प्राणायाम से बिल्कुल भिन्न है।. वे कहते हैं केओटिक ब्रीथिंग. हम. अराजक स्वास कोई विधि विधान से नहीं खूब.
तेजी से खूब गहरी सांस लो जितनी ले सको।. ताकि तुम्हारी पूरी लाइफ एनर्जी जाग जाए।. हाइपर ऑक्सीजनेशन जब होता है हम खूब. एनर्जेटिक महसूस करते हैं। क्योंकि ऊर्जा. की हमको जरूरत पड़ेगी विसर्जन करने के. लिए। हम. तो शुरुआत का फर्स्ट स्टेप है कटिक. ब्रीथिंग फास्ट एंड डीप. कस के सांस लो. कस के सांस लो कोई विधिविधान नहीं है. उसमें कि बाएं से लेना है दाएं से छोड़ना. इतने सेकंड में लो कुछ नहीं सब नियम तोड़. के सांस लो है ना हाइपर ऑक्सीजनेशन सिंपल. वर्ड में उसको कह लें सो यू फील.
फुल ऑफ लाइफ एनर्जी प्राण शक्ति आपकी खूब. बढ़ गई है ना अब आप जो चाहो वो कर सकते हो. फेफड़े तंदुरुस्त हो गए. अब दूसरा चरण आता है कि आपके भीतर इस समय. जो चल रहा है मन में हृदय में. उसको तो आप एक्सप्रेस करो। किसी के ऊपर. एक्सप्रेस नहीं करना है। अपने एकांत में. अपने अकेले में या ग्रुप में कर रहे हैं. तो सब दूरूर खड़े होंगे। किसी को किसी की. चोट ना लग जाए। सबकी आंखें बंद रहेंग।. आंखों पे पट्टी बंधी रहेगी। कोई किसी को. देखेगा नहीं। और प्रत्येक व्यक्ति अब. स्वतंत्रता पूर्वक जो वो करना चाहता है.
कहना चाहता है कोई अचानक हंसने लगेगा कोई. रोने लगेगा कोई जमीन पर बच्चों की तरह. लोटपीट होने लगेगा कोई गाली देने लगेगा. कोई गाना गाने लगेगा कोई हवा में घूसे तान. रहा है कोई लातें फटकार रहा है 10 मिनट. पूरा पागलपन निकल जाने दो है ना इसमें. अपने को अपनी तरफ से थोपना नहीं है उस. मोमेंट में स्पॉनटेनियसली जो हो रहा था तो. आप पाएंगे वो जो प्राण शक्ति जागी थी उसके. के साथ-साथ भीतर जो दमन था सप्रेशन. रिप्रेशन वो सब विस्फोट कर गया.
बिना आइडेंटिटी रिवील किए. हां और हम उसको पूरी फ्रीडम दे रहे हैं वो. निकल जाए बाहर है ना गालियां देना है. चिल्लाना है चीखना है घूसे चलाना है चला. लो. जितना अंदर था बाहर निकाल. बाहर निकाल दो पूरी इंटेंसिटी से. धीरे-धीरे नहीं इतना इंटेंसिटी है तो हम. ऑफिस में जो बाहर से उसको ऊपर भी नहीं. निकाल सकते थे हम अपने एकांत में तो निकाल. सकते हैं क्योंकि हम किसी को डैमेज नहीं. कर रहे किसी का कोई नुकसान नहीं कर रहे. हैं अपना बंद कमरा है हमारा साउंड प्रूफ. कम रहा है। उसके अंदर हम चीख रहे हैं, चिल्ला रहे हैं। किसी को कोई परेशानी. नहीं।.
10 मिनट में हम पाएंगे हम एग्जॉस्ट हो गए।. वो जो दबा पड़ा था। है ना भीतर से जो. बार-बार ज्वालामुखी बन के फूटता था हमने. सब निकाल के फेंक दिया। पूरी अग्नि उसकी. चली गई। सारी गर्मी निकल गई। अब इसके बाद. तीसरा चरण आता है डायनेमिक मेडिटेशन का. जिसमें एक मंत्र का प्रयोग करते हैं हु की. ध्वनि ये सूफियों के मंत्र अल्लाहहु का. आखिरी हिस्सा है हु सूफी जब प्रयोग करते. हैं वो शुरुआत करते हैं अल्लाहहु अल्लाहहु. अल्लाहहु फिर बाद में लाहु लाू लाहु और.
अंत में सिर्फ हु. ये रह जाता है तो ओशो ने इस मंत्र को चुना. है यह हमारी जीवन ऊर्जा को उर्धगामी करता. है नॉर्मली हमारी ऊर्जा जिनको कहते हैं. योग की भाषा में नीच के चक्र मूलाधार चक्र. चक्र स्वाधिष्ठान चक्र मणिपुर चक्र वहां. पे है। तो प्रकृति ने उन चक्रों को सक्रिय. कर दिया है। ऊपर के जो चक्र हैं अनाहत. चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्त्रार चक्र यहां हम ऊर्जा लाएंगे तो. ये एक्टिवेट होंगे नहीं तो नहीं होंगे।. प्रकृति का काम नीचे के चक्रों से चल जाता.
है। है ना? यू सर्वाइव मैनेज योर फूड. एंड रिप्रोड्यूस। तो मनुष्य जाति सर्वाइव. होती रहे। दो चीजें हैं। वहां तक काम खत्म. हो जाता है। सारे पशु पक्षियों के वो नीचे. के चक्र सक्रिय हैं कि आप जिंदा रहो। अपना. भोजन पानी अपनी सुरक्षा करो। लड़ाई लड़ाई. झगड़ा करो। सुरक्षा करो और अपनी जाति को. पुनः उत्पादित करके कृपा करके विदा हो. जाओ। ऊपर के जो चक्र हैं ये साधना का. हिस्सा हैं। यहां जब हम ऊपर चलाएंगे तब हम. को ध्यान लगेगा। समाधि लगेगी। तो हु जब हम.
कहते हैं जोर से और उछलते हुए कहना है. दोनों हाथ ऊपर हवा में उछलते हुए पंजे. केवल और उस समय कहेंगे हु तो ये जो सारी. हवा बाहर निकली और इसके बाद करीब एक सेकंड. का गैप स्वाभाविक रूप से आएगा जोर से हु. कह के जब हम उछले फिर हवा भीतर जाएगी फिर. जोर से हू. इससे हमारी पूरी ऊर्जा उर्धगामी होगी। योग. की भाषा में अगर आप इसके लिए शब्द उपयोग. करना चाहे तो उसका नाम है मूल बंध जहां. मूलाधार जो बेसिक सेंटर है वहां बंध लग.
जाता है जैसे हमने किसी नदी में बांध बना. दिया और फिर एक नहर बनाई वहां से हम पानी. को ले गए हमको जहां उपयोग करना था कि. जनरेटर चलाना है कि खेतों में सिंचाई करनी. है हमने पानी का उपयोग कर लिया अब ये पानी. उस नदी में नहीं जाएगा जहां वो जा रहा था. वहां बंद लग गया तो इसको मूल बंद कहा जाता. है योग की भाषा में तो नीचे के चक्र हमारे. सिकुड़ रहे हैं जाओ हम हु कह रहे हैं पूरी. हवा बाहर निकाल रहे हैं और रीड की हड्डी. से हम महसूस करेंगे कोई शक्ति ऊपर की ओर. जा रही है। नीचे के चक्र हमारे निष्क्रिय. हो जाएंगे। शांत हो जाएंगे और हम पाएंगे.
हमारे ऊपर के चक्र विकसित होने लगे। तो. तीसरा चरण ये है हु मंत्र का उच्चार। इसके. बाद आता है सडन स्टॉप। म्यूजिक बंद हो. जाएगा। ओशो की आवाज आएगी। स्टॉप. हम. और आपको तब पत्थर की मूर्ति की तरह एक. पाषाण मूर्ति बन जाना है। फ्रोजन स्टचू।. हम. अब कोई हलन चलन नहीं। कोई मूवमेंट नहीं ना. कंठ का उपयोग करना है ना शरीर का उपयोग. करना है जैसे आप पत्थर की मूर्ति हो गए मर. गए समझो है ना कोई गिर जाए तो गिर जाए कोई.
लेटा है तो लेटा है बैठा है तो बैठा रह. जाए खड़ा था तो खड़ा रह जाए जैसा है वैसा. ही रह जाए अब वो सारी ऊर्जा कहां जाएगी जब. हम बिल्कुल स्थिर हो गए क्योंकि ऊर्जा का. स्वभाव है गति करना. ऊर्जा एक तरंग है विज्ञान की भाषा में अपन. समझते हैं वो लहर कहीं रुक नहीं सकती वो. मूव करेगी ही करेगी मूवमेंट उसका स्वभाव. है ठीक कैसी हमारी जीवन ऊर्जा है। अभी. हमारे मन में कुछ करने का बचा नहीं। कोई. कामना बची नहीं। जो हमारे भीतर था हमने 10. मिनट में कर लिया और हम उससे थक भी गए। और.
ये ऊर्जा जो ऊपर आ गई है अब ये अपना. फंक्शन करेगी और हम बिल्कुल पत्थर की. मूर्ति की तरह हम कुछ नहीं कर रहे। हम. साक्षी भाव से देख रहे हैं। इस साक्षी भाव. को ध्यान कहा जाता है। तो ये जो प्रथम तीन. चरण हैं ये ध्यान नहीं है। ये ध्यान की. भूमिका है। असली ध्यान ये है। जब हम कुछ. नहीं कर रहे टोटली पैसिव डूइंग नथिंग और. इतनी एनर्जी अटकेंगे सो भी नहीं सकते।. जागरण है खड़े हुए हैं तो खड़े हैं पत्थर. की तरह।.
सारी ऊर्जा जागरण में कन्वर्ट हो जाती है।. ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द एनर्जी। तो जो हमारी. बेसल एनर्जी थी बेसिक है ना वो. ट्रांसफॉर्म हो के कॉन्शसनेस में चेंज हो. जाती है। यह कॉन्शसनेस ये दृष्टाभाव होना. ये ध्यान है। दिस इज़ मेडिटेशन। तो. मेडिटेशन तो वही है जो बुद्ध ने कहा था जो. पतंजलि ने कहा था।. उसकी शुरुआत अलग है।. हां। लेकिन तीन भूमिकाएं हैं। है ना? और. फिर जैसे-जैसे आपको लगे कि अब जरूरत नहीं. है। कुछ दमन नहीं बचा भीतर। आप एक सहज सरल. व्यक्ति हो गए। उसको छोड़ देंगे। उसकी.
जरुरत नहीं है। दूसरा चरण छूट जाएगा।. धीरे-धीरे हम पाएंगे तीसरे चरण की भी. जरूरत नहीं। एक दो मिनट किया हू हू और बात. बन गई। उसको भी ड्रॉप कर देंगे। फाइनली. प्राणायाम का ही रह जाएगा। उसमें भी 10. मिनट करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। एक. व्यक्ति जो दो-तीन महीने कर चुका वो दो. मिनट भी करेगा तो बात बन जाएगी। उसी. स्थिति में पहुंच जाएगा जहां वो पहुंचता. था। आधा घंटा मेहनत करके। फाइनली हम. पाएंगे उतनी भी जरूरत नहीं। हमको बस याद. भर आ गई उस स्थिति की और हम वहीं पहुंच. गए। हम उस लकड़ी वाले की तरह बन जाएंगे जो. शांत हो गए। है ना? ठीक है।.
अब तो यह अभी एक पूरा खत्म नहीं हुआ।. नॉर्मली ध्यान साक्षी भाव पे खत्म हो जाता. है। पतंजलि का भी, भगवान कृष्ण का भी, महावीर का भी, बुद्ध का भी, संत गोरखनाथ. का भी, कबीर का भी। अब ओशो ने यहां एक नई. चीज और जोड़ी है। पांचवा चरण वो है भक्ति. भाव। वो है अहो भाव सेंस ऑफ ग्रेटट्यूड।. अब तुमने जो शांति जानी है और ये, आनंद. में रस विभोर हो गए हो, इसको अपने तक. सीमित ना रखो। अब करुणा भाव से भरो और भाव. करो कि यह सारे जगत में सबको मिले इसको.
बांटो शेयर इट सबके संग साझा करो अब पुनः. एक मधुर मधुर संगीत चलेगा उसके साथ अब. होलेहले नृत्य करना है अब ये दूसरा नृत्य. हुआ पहले तो तांडव नृत्य था उसमें केटिक. म्यूजिक था. विसर्जन करना था उसमें अब इसमें अहो भाव. में धन्यवाद के भाव में डूबना है यह. प्यारा जीवन हमें मिला ये अद्भुत शरीर. हमें मिला यह ऊर्जा मिली है और यह जो भीतर. शांति और आनंद का एहसास हुआ इसके लिए.
धन्यवाद दो इस अस्तित्व को। आपकी मर्जी है. परमात्मा कह लो मर्जी है अस्तित्व कह लो. जो एक ग्रेटट्यूड पूरे जगत के प्रति और यह. भाव की जो शांति मैंने जानी हे प्रभु सबको. मिले। तो यहां पर जाके समापन करना है। तो. ये नई चीज जोड़ी ओशो ने ध्यान में। तो जैसे. कोई किताब होती है ना तो एक तो उसका. टेक्स्ट है किताब लेकिन उसके पहले एक उपस. भूमिका होती है और एक बाद में एक उपसंहार. होता है। तो ओशो ने ध्यान में भूमिका और. उपसंहार जोड़े ताकि वो आधुनिक मनुष्य के.
लिए कारगर हो सके। रिलेटेबल हो सके।. यस। अब अगला टॉपिक जो है सर वो ओशो को. लेकर सबसे ज्यादा चर्चित विषय है। लव. सेक्स रिलेशनशिप क्योंकि हम भारतीय समाज. में कम से कम ओशो को लेकर एक परंपरा बनी. है कि ये वो स्थान है जहां पर. अगर मैं और एकदम बिना शुगर कोट करे कहूं. तो अय्याशी का फ्री लाइसेंस ही मिल जाता. है आपको कि आपको सारी सीमाओं को तोड़ दिया. गया। वो जो पारंपरिक रिश्ते हैं उनकी. मर्यादाओं को तोड़ दिया गया और ओशो ने.
आपको इतनी आजादी दे दी है। तो कई सारे मिथ. भी होंगे, कई सारी बातें होंगी। ओशो का एक. नजरिया होगा। उस सबको समझने की कोशिश हम. करते हैं। अब ओशो ने कहा था प्रेम एक. रिश्ता नहीं एक भावना है। हमको ये समझाइए. क्या है? सबसे पहले तो मैं कमेंट कर दूं. आपने जो एक जनरल स्टेटमेंट कहा पब्लिक की. तरफ से. है ना? वैसा सर 100% गलत है।. हम. वो जो प्रेम के पक्ष में है. और निश्चित रूप से प्रेम का कमल काम की. कीचड़ में खिलता है।. तो उसके भी पक्ष में है। अगर हम कीचड़ को.
ही इंकार कर देंगे फिर कमल कहां खिलेगा? कैसे खिलेगा? हम्. अगर हम जमीन को ही इंकार कर दें तो फिर यह. वृक्ष कहां खड़ा होगा? हम्. तो निश्चित रूप से वृक्ष में जड़े भी होती. हैं और फूल भी होता है। फूल और मूल दोनों. होते हैं। मूल बेसिक है। मूल के बिना फूल. नहीं हो सकता।. हम्म।. है ना? फूल के बिना मूल हो सकती है। तो जब. हम कहते हैं सेक्स, सेक्सुअलिटी, पार्श्विकता, शारीरिक संबंध तो वो जड़ के. समान है।. अगर इसको इंकार किया, इसका दमन किया तो हम.
फूल तक कभी पहुंच ही नहीं पाएंगे। तो ओशो. है प्रेम के पक्ष में कि हमारे हृदय में. प्रेम का फूल खिले। लेकिन इसकी जो जड़ है. वो वहां है। उसको इंकार नहीं किया जा. सकता। ओशो ने पहली बार ये बात उठाई। अगर. हम जड़ को ही काट देंगे तो फूल नहीं खिल. सकेगा। ठीक है ये जायज़ बात है लेकिन जैसे. हम जिस परंपरा को देखते आ रहे हैं जो. सुनते आ रहे है उसमें ये होता है कि शादी. सात जन्मों का बंधन है हिंदू धर्म में हम. यही बात करते हैं कि जन्मजनम का रिश्ता है. आप एक व्यक्ति के प्रति समर्पित होते हैं. व्हेन वुमेन मैन या वन मैन वुमेन हम इस.
कांसेप्ट को होते हैं ओशो को जब हम सुनते. हैं तो ये कांसेप्ट इससे विपरीत नजर आता. है। जी नहीं बिल्कुल विपरीत नहीं है। ओशो. भी चाहते हैं कि वैसा प्रेम फलित हो सके. कि जो जन्मजन्म का रिश्ता बन जाए लेकिन. उसको फलित होने के लिए एक साधना से गुजरना. होगा. हम. है ना उसके बिना वह नहीं हो सकता कई लोग. कहते हैं कि वो प्रेम विवाह के खिलाफ में. है। मैं कहता हूं विवाह के खिलाफ नहीं है।. झूठे विवाह के खिलाफ में है। जो धन पैसे. से दहेज से नौकरी देख के इनकम देख के घर. परिवार की इज्जत देख के किया जाता है। ये.
झूठा विवाह है।. अरेंज मैरिजेस तो ऐसी ही होती है सर ना।. तो उसको आप वैशागरी कह दे और क्या है आप. बताइए? लड़की वाले खोज रहे हैं। लड़का. क्या काम करता है? कितनी बड़ी नौकरी? ऊपर. से रिश्वत मिलती है कि नहीं मिलती है? कितनी बड़ी पोस्ट पर है? मतलब. घर में कितना कितना बड़ा घर है? जमीन. जायदाद कितनी है? हरियाणा में वो खोजते. हैं गाय भैंस कितनी है घर में।. अब ये तो हो गया कि आपको एक इंसान खोजना. है तो लड़का खोज रहा है कि लड़के वाले. दहेज कितना देंगे। ये तो व्यापार हुआ। ये. कोई विवाह हुआ। तो ओशो विवाह के खिलाफ.
नहीं। जैसे मैंने कहा धर्मों के बारे में. हम बात कर रहे थे। तो फिर विवाह धर्म के. नाम पे जो चल रहा है ओशो उसके खिलाफ है।. धर्म के खिलाफ नहीं है। ठीक ऐसे ही ओसो. सच्चे विवाह के पक्ष में है जो प्रेम पर. आधारित होगा।. अब प्रेम कैसे होगा? मैं मैं यहां काम कर. रहा हूं। आप जैसे इंटरव्यू कर रहा हूं। अब. मुझे समय ही नहीं मिल रहा। तो मेरे. मां-बाप खोजेंगे तो कुछ देके खोजेंगे वो।. तो उसको अगर आप वैश्यागरी कह दोगे तो कैसे. काम चलेगा फिर? देखिए तथ्य को आप कितना ही अच्छा लेवल. लगाएं। उससे कुछ नहीं होता।. मैं तो प्रैक्टिकल सवाल पूछ रहा हूं कि. मैं नौकरी कर रहा हूं। मैं 16 घंटे काम.
करता हूं। आठ घंटे सोता हूं। दो घंटे. ऐसा नहीं हो सकता। प्रकृति ने जो इंतजाम. किया है कहीं ना कहीं ऐसा होगा। किसी से. मिलकर आपके हृदय में प्रेम उपजेगा। यह हो. ही नहीं सकता कि. हो सकता है लेकिन वो किसी और का हो पहले. से।. देखिए प्रेम के लिए सब कुछ नछावर किया जा. सकता है। किया जाना चाहिए। वो हायर वैल्यू. है।. सेक्स इज वेरी लोअर। है ना? ओशो सेक्स के. खिलाफ है। इस अर्थ में कि वो सेक्सुअलिटी. को लव तक ले जाना चाहते हैं। वो प्रेम पे. भी रोकने की नहीं कहते। के प्रेम को और. ऊपर प्रार्थना तक परमात्मा तक ले जाना.
चाहते हैं। ऐसा समझे एक सीढ़ी है। उसका. सबसे नीचे का पायदान सेक्स है। शारीरिक. संबंध मध्य में हार्दिक इमोशनल लव है।. प्रेम है और इससे ऊपर स्पिरिचुअल. जहां एक आत्मीयता हो जाती है। आत्मा. परमात्मा से मिल जाती है। वो स्थिति है. समाधि की। तो नीचे से लेकर ऊपर तक की पूरी. रेंज पूरी सीढ़ी है। ये इसमें कहीं भी. अटकना नहीं है।. चलिए मैं इसको और थोड़ा फिल्टर करके सवाल. पूछता हूं। ऊपर वाली सीढ़ी जो है वहां तक. सब पहुंच नहीं पाते प्रेम तक। इसीलिए शायद.
कहते हैं. नहीं बीच तक नहीं आ पाते इसलिए ऊपर नहीं. पहुंच पाते। ऊपर जा ही नहीं पाते।. काश बीच तक आ जाए फिर बहुत आसान है।. तो ऊपर क्योंकि एक ही दो लोग तक पहुंच. पाते हैं। इसलिए हम कहते हैं जीवन में. प्रेम एक ही दो बार होता है। क्योंकि वो. एहसास जो चरम सीमा वाला होता है एक बार दो. बार होता है। ओशो की नजर में नीचे नीचे. वाली सीढ़ी जो है वो सिंगल टाइम अलाउड है।. मल्टीपल टाइम अलाउड है। देखिए ओशो किसी. नैतिकता के पक्षधर नहीं है। है ना? देखिए. ये संबंध जो बने थे परिवार जो बसे थे. विवाह जो बसे थे इसकी शुरुआत कहां से हुई. उस पे मैं थोड़ी सी बात करूं फिर आपको इस. वाली बात पे आ जाएंगे हम.
एक जमाना था मनुष्य जाति कबीलों में रहा. करती थी. ठीक बात. है ना एक कबीला यहां से वहां जाता था वहां. के जंगल में फल फूल खत्म हो गए फिर वो आगे. बढ़ेगा फिर आगे बढ़ेगा खाना बदोश थे ठीक. है उस समय तक विवाह नहीं था पूरा 300 400. लोगों का एक झुंड होता था सब इकट्ठे रहते. थे कौन किसका बच्चा है किसी को नहीं पता. था। पूरा एक कबीले के बच्चे थे। ठीक है? उसके बाद धीरे-धीरे एग्रीकल्चर की समझ. विकसित हुई कि हम एक जमीन साफ कर लें।. यहां के पेड़ काट दें और फिर यहीं पे. खेतीबाड़ी करेंगे। वहां से पर्सनल.
प्रॉपर्टी आई। जिन लोगों ने वो जमीन तैयार. की। गाय भैंस पाले। अब वो चाहते हैं कि. वहां पर रहें। अगले साल भी फिर यहीं खेती. करेंगे। जमीन अच्छी तैयार हो गई। नदी के. किनारे पानी भी है। अब यहां से पर्सनल. प्रॉपर्टी शुरू हुई और धीरे-धीरे कबीला. टूटा। अब जब पर्सनल प्रॉपर्टी आई। यहां से. एक भाव आता है कि मेरी संपत्ति मेरी ही. औलाद को मिले।. हम. अभी औलाद का कैसे पता चलेगा? डीएनए टेस्ट. तो उस समय होते नहीं थे। वहां से शादी का. सिस्टम आया कि मेरी पत्नी सिर्फ मेरी ही.
पत्नी हो। उसका किसी से कोई संबंध ना हो. ताकि मुझे पक्का हो सके कि उससे जो संतान. पैदा हुई वो मेरी संतान है। तब मैं चैन से. मर सकूंगा कि मेरा खेत, मेरा मकान जो. मैंने बनाया था मेरे गाय, भैंस जो भी. संपत्ति है मेरी मेरी संतान को मिले। यहां. से विवाह शुरू हुए। अब वो स्थिति बीते. हजारों साल हो गए। अब हम देखते हैं. धीरे-धीरे वो संयुक्त परिवार थे। पहले. कबीला था फिर संयुक्त परिवार आए। 20वीं. सदी आते-आते पश्चिम में संयुक्त परिवार. टूटना शुरू हो गया। और 20वीं सदी का मध्य. आते-आते भारत में वह स्थिति बनने लगी।.
क्योंकि लोग अब एक जगह रह नहीं रहे। बहुत. ज्यादा ट्रैवल कर रहे हैं। यातायात के. साधन हो गए। कोई इस देश में है, कोई उस. विदेश में है, कहीं लड़का यहां चला गया, लड़की वहां चली गई। विवाह. इंडिविजुअल परिवार पे आ गया। व्यक्तिगत हो. गए है ना एकल परिवार आ गया सिंगल सिंगल. यूनिट संयुक्त परिवार टूट गया उसमें रहना. किसी को पसंद नहीं हम कबीले में रहना भी. पसंद नहीं था क्योंकि उसमें हुकूमत एक बॉस. की चलेगी जो उस कबीले का सरदार है और सबको. उसका गुलाम की भांति रहना होगा संयुक्त.
परिवार में भी वही मुसीबत थी जो बड़ा. बुजुर्ग है मुखिया है वो अपनी दादागिरी. करेगा इसलिए उसको दादा कहते थे. बाकी सबको उसका पालन करना होगा किसी को. कोई फ्रीडम नहीं संयुक्त परिवार का दुख. आपको देखना हो कहीं चले जाइए जहां संयुक्त. पार होते हैं। सब लोग इतने दुखी होते हैं, प्रताड़ित होते हैं। किसी की कोई. स्वतंत्रता नहीं है। किसी की कोई अपनी. मर्जी से कुछ नहीं कर सकता। सब लोग तड़पते. हैं कहां कैसे भाग निकले इस जेल से। तो. जैसे कबीला टूटा, संयुक्त परिवार टूटा। अब.
स्थिति आई है एकल परिवार टूटने की।. अब पतिपत्नी भी क्यों साथ रहे? दोनों पढ़े. लिखे हैं। दोनों नौकरी करते हैं। दोनों. पैसा कमाते हैं। दोनों इंडिपेंडेंट हैं।. और परिवार समाज ने सरकार ने सुरक्षा के. इतने इंतजाम कर दिए हैं। चाहे हमारे देश. में अभी उतना नहीं हुआ। पश्चिमी मुल्कों. में हो गए हैं। है ना? कोई स्त्री अकेली. रह सकती है। उसको किसी से प्रेम होगा तो. उसके साथ रहेगी। नहीं होगा तो नहीं रहेगी।. और इसकी पूरी आजादी है। सोशल सिक्योरिटी.
है। सब प्रकार की सुरक्षा का इंतजाम है।. स्वीडन जैसे देश में अधिकांश लोग शादी. नहीं कर रहे। करीब 15 20 साल पहले सरकार. ने वो कानून ही खत्म कर दिया शादी का. क्योंकि कई साल हो गए कोई शादी करने आया. ही नहीं। लोगों की फ्रेंडशिप निश्चित रूप. से होगी। उनको प्रेम होगा, लगाव होगा।. उनका संघ के साथ रहने का मन है तो रहेंगे।. नहीं रहना होगा तो नहीं रहेंगे। कोई बंधन. किसी का नहीं। कोई कानूनी सामाजिक बंधन. उनके ऊपर नहीं है। ये परिवेश ओशो के सामने. आ चुका। ठीक है? जब ओशो बात कर रहे हैं तो. केवल भारत के लोगों से बात नहीं कर रहे. हैं। वो इंटरनेशनल ऑडियंस से बात कर रहे.
हैं। अब हम उन बातों को उठा के भारत के. परिप्रेक्ष में अगर हम लागू करेंगे तो वो. तो फिट नहीं बैठेगी।. हम. है ना? पहले इस बात को समझ लीजिए। ओशो की. बात लिमिटेड एक दायरे के अंदर नहीं है। वो. विश्व मानव से बात कर रहे हैं और उस मानव. से जो आने वाला है जो है उससे भी बात कर. रहे हैं और जो आने वाली संभावित समस्याएं. हैं उनका भी निदान कर रहे हैं।. एक प्रतिभाशाली व्यक्ति हम उसी को बोलते. हैं जो अपने समय के पहले आ जाता है। वो उन.
चीजों को भी बता जाता है जो होने वाली हैं. और उसका क्या समाधान हो सकेगा। तो ओशो इस. दूर दृष्टि से कह रहे हैं कि विवाह की. संस्था आगे नहीं चल सकेगी। विवाह और हम. जिसको परिवार कह रहे थे उसका बुनियाद. प्रेम नहीं था। उसका बुनियाद गरीबी थी।. मजबूरी थी। 25 लोग एक संयुक्त परिवार में. इसलिए रह रहे थे कि क्योंकि और कोई उपाय. ही नहीं था। एक ही घर था रहने का। गरीबी. थी और कोई उपाय नहीं था। छोटी सी जमीन थी।. उसको बांट लेंगे तो कुछ बचेगा ही नहीं।. किसी के हाथ में कुछ नहीं आएगा। सबको. मिलजुलकर साथ ही रहना पड़ेगा। सारे दुख.
कष्ट भुगतने पड़ेंगे। मगर मजबूरी साथ रहना. पड़ेगा। अब पिछले कुछ सदियों में शिक्षा. आई। शिक्षा के साथ हम अपने पुराने. पारंपरिक धंधे से अलग हो गए। पहले एक बढ़ई. का बेटा सिर्फ बढ़ई ही हो सकता था और कुछ. हो ही नहीं सकता था। लोहार का बेटा लोहार. हो सकता था। दुकानदार का बेटा दुकानदार हो. सकता था। फिक्स था सब कुछ। क्या काम कोई. करेगा? धोबी का बेटा धोबी होगा। चमार का. बेटा चम्हार होगा। कोई फ्लेक्सिबिलिटी.
नहीं थी। कुछ भी कोई स्वतंत्रता नहीं थी।. बंधन था। हम. जब शिक्षा आई यहां से एक नई चीज शुरू हुई. धोबी का बेटा भी. कलेक्टर बन सकता है. इंजीनियर बन सकता है डॉक्टर बन सकता है. फ्लेक्सिबिलिटी आई स्वतंत्रता आई. स्वतंत्रता के साथ-साथ अब वो पुरानी चीजें. नहीं रहेंगी है ना. हम. फिर स्त्री स्वतंत्रता आई 20वीं सदी में. लगभग मध्य में नारी स्वतंत्रता आंदोलन. वुमन लिबरेशन मूवमेंट पश्चिम में हुआ उसका.
धीरे-धीरे प्रभाव भारत में भी आया| आज. हमारे देश की नारी भी स्वतंत्र है। वो हर. क्षेत्र में अग्रणी हो रही है। पुरुष के. बराबर कंधे से कंधा मिला के वो नौकरी भी. कर रही है। वो विज्ञान भी पढ़ रही है। वो. अंतरिक्ष यात्रा पे भी जा रही है। वो सब. कुछ कर रही है। जो काम पुरुष करते थे. पहले इतना ज्यादा. काउंटर क्वेश्चन आता है सर। आता है।. बात पूरी कर लेने दीजिए। मुझे नहीं तो फिर. समझ नहीं आएगी बात। मैं इस बात पे लाना. चाह रहा हूं कि हमकि मजबूर थे। गरीब थे।. कोई उपाय ही नहीं था। स्त्री कुछ कर ही.
नहीं सकती सिवाय चौका चूल्हे के। उसको. मजबूरी में इस आदमी के संग निभाना ही. होगा। इस परिवार में जो भी जुल्म हो रहे. हैं सब सहने होंगे। कोई उपाय नहीं था उसको. बचने का। जैसे ही स्वतंत्रता आई, संपन्नता. आई और एक सुरक्षा समाज में आ गई। है ना? कि हम इंडिपेंडेंट रह सकते हैं।. भाई कोई भी किसी की अंडर मजबूरी और गुलामी. में क्यों रहेगा? हम. तो परिवार तो टूटेगा। हम जो सोच रहे थे. परिवार जुड़ा है प्रेम से। यहां हमारी. गलती हो गई। परिवार जुड़ा था गरीबी से.
दरिद्रता से और जैसे ही दरिद्रता खत्म. होगी संपन्नता आएगी परिवार बिखर जाएगा सब. लोग यहां वहां चले जाएंगे अपनी मर्जी से. अपना जीवन जिएंगे कोई किसी की नहीं सुनने. वाला. ठीक है अब यहां आते हैं इस स्थिति में. निश्चित रूप से पुरानी विवाह व्यवस्था. नहीं चल सकती. पश्चिम के कई देशों में आप पता लगा लीजिए. इंटरनेट पे कम से कम चार देश हैं जहां. कानूनी रूप से विवाह और तलाक की बात ही. खत्म हो गई कोई रजिस्ट्रेशन ऑफिस है ही. नहीं वहां क्योंकि कई सालों हो गए किसी ने. शादी नहीं की तो सरकार इस झंझट में क्यों.
पड़े कि हम रजिस्ट्री करेंगे विवाह की फिर. तलाक के लिए आओगे लड़के तुम जानो तुम्हारी. जिंदगी अपनी जिंदगी अपने ढंग से जियो तो. निश्चित रूप से प्रकृति ने हमको जो दिया. है प्रेम होगा मित्रता होगी कवि संग साथ. रहेंगे लड़ाई झगड़ा भी होगा कलह भी होगी. अलग भी हो सकते हैं. इसमें जो मैं आपसे पूछना चाहता हूं ये कि. भारत में जो इस सवाल को विरोध उठता है वो. ये उठता है कि. ये बातें भारत के लिए नहीं कही गई है. मैं भारत के दृष्टिकोण से पूछ रहा हूं कि. अब आप ग्लोबल कांटेक्ट से बात कर रहे हैं।. आप चार देशों को एग्जांपल दे रहे हैं और.
अब दुनिया मिल गई है। अब सब एक दूसरे के. एक्सेसबल है तो अब दुनिया बहुत अलग नहीं. है।. अब हर तरह से लोग एक दूसरे से मिलेजुले. हैं। यहां के लोग बाहर जा रहे हैं। बाहर. के लोग जा रहे हैं। और अब दुनिया. अभी आप दिल्ली में पता लगा लीजिए 40 साल. की कितनी लड़कियां और कितने लड़के हैं. जिन्होंने विवाह नहीं किया।. बहुत ह्यूज नंबर। ह्यूज नंबर बहुत सारे. होंगे। बहुत बड़ी गिनती हो गई है। मुंबई. और दिल्ली में बहुत बड़ी गिनती हो गई है।. और वो कभी शादी नहीं करने वाले। है ना? और. आज अगर उनकी गिनती लाखों में है तो 10 साल.
के बाद करोड़ों में पहुंच जाए।. नहीं इसमें जो मैं सवाल जो विरोध का सवाल. आता है वो आपसे पूछना चाहता हूं। मैं एक. सवाल ये आता है कि आधुनिकता की तलाश में. जो आपकी पारंपरिक जड़े हैं क्या आप उसे. खोना चाहते हो कि इंडिया में शादी. कांसेप्ट अलग था। दूसरा फिर कुत्ते मेरे. एक्सेप्ट नहीं कर रहे मेरी बात को।. मैं मैं एक्सेप्ट कर रहा हूं। मैं सिर्फ. जो सवाल पूछ रहे हैं उनके सवाल को आप तक. पहुंचा रहा हूं। और वो सवाल ये है कि अगर. ये कांसेप्ट खत्म कर दिया जाएगा शादी का. तो फिर कुत्ते, बिल्ली, जानवर और इंसान. इनमें अंतर क्या रहेगा? इधर-उधर घूमता है।.
मैं आपको फर्क समझा रहा हूं। ओशो ने इसको. तीन हिस्सों में बांटा है। मोटे-मोटे तीन. हिस्से कर लें। एक है एनिमलिस्टिक लव. पार्श्विक। दूसरा है इमोशनल लव ह्यूमन और. तीसरा है डिवाइन। है ना? तीन स्टेप. मोटे-मोटे आप समझ लीजिए सीढ़ी के। तो. प्रकृति ने हमको जहां पैदा किया है वहां. हमारे पास शारीरिक संबंध, शारीरिक आकर्षण, एनिमलिस्टिक लव है। इट इज इक्वल टू कुत्ता. बिल्ली के बराबर ही है। उसमें कोई फर्क. नहीं है मनुष्य का उससे। ठीक है? लेकिन हम. वहां रहने के लिए मजबूर नहीं है। वी कैन.
ग्रो टू इमोशनल लव। जिसको ओशो कह रहे हैं. ह्यूमन लव। है ना? हमें पशुता में जीना. नहीं है। निश्चित रूप से हमारा अतीत पशुओं. का है। डार्विन के विकासवाद को देखेंगे तो. मनुष्य पशुओं से ही आया है। उसके अतीत में. सब कुछ वही पड़ा हुआ है। उसके अचेतन में. वही वासनाएं मौजूद हैं। उसी प्रकार के. जैसे जानवरों में है। हम एक प्रकार से. जानवर हैं। लेकिन हम वहां होने के लिए. मजबूर नहीं हैं। हम इससे आगे बढ़ सकते. हैं। हम मेंटल और इमोशनल लव की स्थिति में. पहुंच सकते हैं। है ना? ये हमारी ग्रोथ. हुई। कोई पशु उस स्थिति में नहीं जाता।.
दिस इज ह्यूमन समथिंग वेरी ह्यूमन है ना. कि पशुओं को काम वासना में कोई सुख और. आनंद और रस नहीं आता हम. उनकी एक लाचारी है बायोलॉजिकल फोर्स उनको. वो करना है और करके हट जाना है. इंसानों में भी है. है ना. तो अगर इंसान वैसा कर रहे हैं तो पशु के. तल पे जी रहे हैं. चाहे उनका विवाह हुआ हो चाहे ना हुआ हो वो. पशु के तल पे जी रहे हैं विवाह का लेवल लग. जाने से ऐसा नहीं हो जाता कि पशुता से हट. गए वो. हम. ही इज़ डूइंग द सेम थिंग अधिकांश पति अपनी.
पत्नी पर बलात्कार ही कर रहे हैं उस पे. लेवल नहीं लगा बलात्कार का। समाज ने अलऊ. किया है। पत्नी कुछ कह नहीं सकती। मगर वह. बलात्कारी है। उसकी कोई मर्जी नहीं थी. इसमें जाने की संबंध में।. हम. लेकिन मजबूर है। करें क्या? है ना? तो इसको खूब अच्छे से देखिए। प्रकृति ने. जैसा मनुष्य को बनाया है निश्चित रूप से. इसका बड़ा हिस्सा पार्श्विक जगत से हमारा. आया है। हम वहीं से इवॉल्व हो के आए हैं. और हमें आगे बढ़ना है।. अब एक चैलेंज आता है आगे बढ़ना है।. हम उस मानसिक और भावनात्मक प्रेम तक पहुंच.
सकते हैं। हृदय के तल पे आ सकते हैं। अब. वहां पे फिजिकल अट्रैक्शन कोई मायने नहीं. रखता। वहां किसी की कितनी तनख्वाह है और. कैसा रंग रूप है यह कोई मायने नहीं रखता।. एक भावनात्मक जुड़ाव होता है। एक मैत्री. भाव फ्रेंडलीनेस जिसको कहें तो निश्चित. रूप दिस इज़ समथिंग हायर देन एनिमलिस्टिक. ठीक है. टेंडेंसी. अब यहां पे भी रुकना नहीं है और यहां पे. क्या है जब हम इमोशनल प्रेम में होंगे तो. वहां मित्रता भी होगी और साथ-साथ कलह भी.
होगी एक दूसरे के साथ मैच भी नहीं भी. करेंगे बहुत सी बातों में हमारे मतभेद भी. होंगे. तो एक तरफ हमारा मन मिल रहा है मन के. मिलने से दोस्ती हुई लेकिन मन का बहुत. हिस्सा नहीं भी मिल रहा है और वहां पर कलह. और क्लेश भी होगा। इस इमोशनल लव में दो. चीजें हैं। इससे सुख भी मिलेगा जो कि किसी. शारीरिक संबंध में नहीं मिल सकता। ऐसा सुख. मिलेगा।. एक डीप कंटेंटमेंट, एक संतोष मिलेगा और. साथ-साथ असंतोष भी मिलेगा। हमेशा ऐसा. लगेगा कि जो मैं चाह रहा हूं वो बात हो.
नहीं रही। समथिंग इज मिसिंग। कभी हो सकता. है हम दूसरे पे दोष लगाएं कि इसकी वजह से।. लेकिन धीरे-धीरे धीरे समझ में आएगा कि. नहीं। समथिंग इज मिसिंग। क्योंकि मेरे मन. में जो कामना है, कल्पना है कि क्या दूसरे. से मुझे मिले। शायद मैं कुछ अतिशय डिमांड. कर रहा हूं। तो प्रेम में संतोष भी होगा. और असंतोष भी होगा। तृप्ति भी होगी और एक. गहन अतृप्ति भी होगी। है ना? अब यहां से. हमको स्पिरिचुअल की तरफ ग्रोथ का मौका. मिला। वो जो अतृप्ति है वो तुमसे कह रही.
कि कुछ और खोजना होगा। इन संबंधों में भी. वह बात नहीं बन रही। तब हम भीतर जाते हैं. अपने ध्यानस्थ होते हैं समाधस्थ होते हैं।. तब जब हमारी आत्मा परमात्मा से मिल जाती. है। एक हो जाती है और एहसास होता है हम. ब्रह्मास्म तब पता चलता है कि अब हुआ. सच्चिदानंद परमानंद।. लेकिन इसमें उस इमोशनल प्रेम से गुजरना. आवश्यक है।. उसमें तृप्ति भी है और अतृप्ति भी है। है. ना? और वही अतृप्ति हमें कांटे की तरह.
चुभेगी और हमें लगेगा कि इतना प्रेम है. फिर भी दूरी बरकरार है। एक नहीं हो रहे और. वो एक होने के लिए फिर हमारी और आगे ग्रोथ. होगी और हम स्पिरिचुअल लव तक पहुंचेंगे।. तो ओशो की देशना ये है यहां से वहां तक. जाने की। है ना? ओशो के कितने प्रवचन है. जिनको मैंने संकलित किया है। एक सीरीज का. नाम रखा है मैंने ब्रह्मचर्य की साधना और. दूसरी सीरीज का नाम रखा है वासना मुक्ति. के उपाय। तो ओशो की दृष्टि यह है। वैसे. ओशो ने चाय पर भी कहा है सर.
जी. कि चाय सुख है. और ना यकीन हो तो ऊपर वाले वो सुना वो आप. बड़ा प्रसिद्ध कोट है कि ओशो कहते हैं कि. जब आप ऊपर वाले के पास पहुंचेंगे तो सबसे. पहले आपसे पूछेंगे चाय पिएंगे ओशो को मजाक. करने की आदत थी ना तो ऊपर वाला जब भी ये. शब्द आता है तो आप समझना चुटकुला सुना रहा. है. कोई ऊपर वाला कहीं है नहीं. लेकिन चाय में तो सुख है सर तृप्ति भी है. सुख भी है. यस चाय में सुख आनंद है। यह जागृति देती.
है, होश बढ़ाती है। ध्यान का एक रूप है।. जापान में जो झेन परंपरा है, हजार साल से. चलती आई है। उनके यहां तो टी सेरेमोनी. होती है। मंदिर में मठ में सब लोग बैठते. हैं सुबह उठ के। लकड़ी जलाई जाती है। उस. पर बर्तन रखा जाता है। पानी उबलता है।. सारे शिष्य चारों तरफ घेरा बना के बैठते. हैं। सद्गुरु आते हैं उस मठ के। उसमें चाय. की पत्ती डालते हैं। सब लोग आंख बंद करके. उसकी खुशबू लेते हैं। चाय की पत्ती की. खुशबू आने लगी। वो बुदबुदाहट की आवाज पानी. के खोलने की खूब संवेदनशील होकर सुनते.
हैं। ध्यान की एक प्रोसेस है कि जब चाय बन. गई सब लोग वो ऐसा पकड़ के बैठते हैं।. उसमें कुंदा नहीं होता. हम. ताकि आप फुल सेंसिटिविटी के साथ उसकी. गर्माहट को महसूस तो करो।. हम. कुंदा पकड़ने से हम कुछ चूक गए।. महत्वपूर्ण चीज। हम. सब लोग दोनों हथेलियों में इस प्रकार वो. कप पकड़ के बैठते हैं। फिर सद्गुरु आते. हैं। वह केतली से उनके शिष्यों की कप में. चाय डालते हैं। उनको प्रणाम करते हैं।. धन्यवाद का भाव। फिर सब लोग एक-एक घूंट. पीना शुरू करते हैं। शिप उसकी खुशबू, उसकी.
गर्माहट, उसका स्वाद और यह पूरा माहौल, मटका सब लोग बैठे हैं। ध्यान पूर्वक बड़े. अहोभाव में अपने गुरु के प्रति उन्होंने. चाय दी है। ये उनका मेडिटेशन है। टी. सेरेमनी इसको कहते हैं।. इंटरेस्टिंग।. है ना? अपने देश में तो चाय कॉफी को. अधार्मिक समझते हैं। ओशन कहा तुम हर चीज. को ध्यान बना सकते हो। तुम बीड़ी सिगरेट. पीते हो उसको भी ध्यान बना सकते हो।. प्राणायाम ही कर रहे हो। एक प्रकार का.
माना कि बेकल हो। पैसा खर्च करके धुआ भीतर. ले जा रहे हो। जबकि शुद्ध हवा मुफ्त में. मौजूद थी। हो नालायक मगर कर तो रहे हो. प्राणायाम। देखिए हमारे एक दो लोग. मुस्कुरा रहे हैं।. वैसे चाय इश्क है और इश्क में सेक्स है और. सेक्स ओशो के नाम पे चिपका हुआ है। तो ओशो. की नजर में क्या है सेक्स? सेक्स शरीर से शरीर का आकर्षण है। प्रेम. हृदय से हृदय का मन से मन का आकर्षण है।. और जिसको कहते हैं समाधि वह आत्मा का.
परमात्मा से आकर्षण है। तो तीनों के. अलग-अलग लेवल हो गए। और एक मनुष्य के रूप. में हम तीनों हैं। वी आर नॉट ओनली फिजिकल. बॉडी। है ना? वी आर मेंटल एंड इमोशनल. बीइंग आल्सो। एंड वी आर स्पिरिचुअल बीइंग. आल्सो। हमारे अंदर चेतना भी है।. चेतना को ही आत्मा कह सकते हैं आप।. कॉन्शसनेस है हम. तो निश्चित रूप से शरीर का आकर्षण शरीर के. प्रति है. हम. प्रकृति ने जैसा बनाया है लेकिन हमें वहीं. तक रुक नहीं जाना है हम उससे आगे भी कुछ. है पशुओं में ये क्षमता नहीं है उनका वहीं.
पर रुकावट है दैट्स ऑल है ना उसके आगे वो. नहीं जा सकते मनुष्य के पास एक संभावना है. तो आपने पूछा सेक्स क्या है तो अब मैं. उसको संभावना की दृष्टि से कहूंगा. सेक्स में. भावनात्मक प्रेम तक पहुंचने की संभावना. है। स्टार्ट तो वहीं से होगा। हो सकता है. किसी के चेहरे के आकर्षण से ही हो। लेकिन. हम पाएंगे बाद में चेहरा और रंग रूप सब गण. हो गए और एक भावनात्मक लगाव बन गया। गहरा.
प्रेम उत्पन्न हुआ। एक गहरी मित्रता. दोस्ती है ना वो उत्पन्न हुई। अब वो कहते. हैं यहां भी नहीं रुक जाना। ये बहुत अच्छा. यहां तक आ गए। मध्य में आप पहुंच गए सीढ़ी. के। अभी एक कदम और बाकी है। स्पिरिचुअल. जिसको आपने एक्सप्लेन किया था। जहां. व्यक्ति समष्टि से मिल जाता है।. इंडिविजुअल गेट्स डिजोल्व इनू द यूनिवर्सल. कॉनशसनेस। एक्चुअली वहां पर विलय हो. जाएगा। तुम बचोगे ही नहीं। है ना? प्रेम. में भी हम चाहते हैं खासकर इमोशनल प्रेम. में कि लोग गीत गाते हैं ना तू तू ना रहे,
मैं ना रहूं दोनों एक हो जाए। है ना? लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। सिर्फ एहसास होता. है कि हां एक होने वाले हैं, होने वाले. हैं और फिर लगता है कि नहीं दूरी बरकरार. है। नहीं ये सवाल मैं इसलिए पूछ रहा हूं. क्योंकि आजकल जो ऑनलाइन डेटिंग का. कांसेप्ट है या आजकल बड़े सारे शिप निकले. हैं। रिलेशनशिप तो पुराना हो गया। सिचुएशन. फलाना शिव धमाका शिव ये शिप वो शिप आजकल. बहुत लोग आते हैं इसका जिक्र करते हैं. ऐसा लगता है कि ओशो का प्रेम विचार आज की.
जो ऑनलाइन डेटिंग दुनिया है उसमें. प्रासंगिक है जिसको. जी नहीं बिल्कुल नहीं 100% नहीं. ओशो हमेशा इस बात के फेवर में है कम से कम. तुम एनिमलिस्टिक लव से उठ के ह्यूमन लव पे. तो आओ. जहां एक्सप्लइटेशन ना रह जाए एक दूसरे का. आप जिन विभिन्न प्रकार के शिप्स की बात कर. रहे हैं वहां तो एक म्यूचुअल एक्सप्लइटेशन. है।. वहां तो और कुछ नहीं है। कोई मित्रता भी. नहीं है। कोई दोस्ती भी नहीं है। कुछ भी.
नहीं है। तो वह तो बिल्कुल वो बर्दाश्त. नहीं करेंगे उसको। वो हमें हायर संभावना. की तरफ ले जाना चाह रहे हैं. ना कि नीचे की चीजों पर अटकने की कह रहे. हैं। प्रेम में मालिकाना हक होता है।. जिसको हम प्रेम कहते हैं उसमें तो होता. है। लेकिन ओशो जिसकी बात कर रहे हैं कि. धीरे-धीरे उससे मुक्त हो। यानी ओशो. स्वीकार कर रहे हैं कि हमारा जैसा है. वैसा। लेकिन इसमें कहां गलती है? हम दूसरे. को एक्सप्लइट कर रहे हैं। दूसरे का शोषण.
कर रहे हैं। उस पर हक जमा रहे हैं। किसी. और से प्रेम हो जाए तो हम ईर्ष्या से भर. रहे हैं। हम अपने आप को मालिक समझ रहे. हैं। पति शब्द का मतलब ही होता है मालिक।. प्रेसिडेंट को हम कहते हैं राष्ट्रपति।. पूरे देश का मालिक। पति शब्द का ही मतलब. मालिक होता है। हक अधिकार नहीं। जहां. प्रेम होगा वहां मित्रता होगी। वहां. अधिकार की भावना नहीं होगी। है ना? हम. किसी को अपना गुलाम नहीं बना लिए। किसी को. खरीद नहीं लिए हैं।. तो यह स्वतंत्रता इसका कोई दायरा है प्रेम. में या फिर यह अनलिमिटेड है?
नहीं प्रेम अपने आप में ही अपनी मर्यादा. होता है। इसको बाहर से कोई बांधने की. जरूरत नहीं है।. तो प्रेम की मर्यादा कहां तक है? पूर्ण स्वतंत्रता तक।. पूर्ण स्वतंत्रता मतलब मैं किसी से प्रेम. करता हूं लेकिन मुझे किसी और के प्रति. शारीरिक तौर पर आकर्षण है तो वो जायज है. प्रेम में।. देखिए जब गहन प्रेम होगा तो ऐसा नहीं. होगा। आप जो कह रहे हैं।. है ना? ये नहीं होगा। हम. ये प्रश्न आप वहां से उठा रहे हैं नीचे की. सीढ़ी पे खड़े होके और आप पूछ रहे हैं कि. ऊपर की सीढ़ी पे क्या ऐसा होगा. जो नीचे होता है भाई नीचे वाली चीज वहां.
नहीं होंगी डिफरेंट डायमेंशन जब आप किसी. के प्रति इमोशनल लगाव से भरे होते हैं. उसके प्रति डेडिकेशन मैं बहुत सारे लोगों. से मिला हूं. जो अपने हस्बैंड या अपने वाइफ के टुवर्ड. आत्मिक तौर पर बड़ा गहरा रिश्ता है. हम. और बहुत लगाव में उनके लिए वो किसी भी हद. तक जाकर कुछ भी कर सकते हैं। हम. लेकिन शारीरिक तौर पर वो कई और जगह भी. उनका आकर्षण है हम. और इस बात को वो सहज स्वीकार करते हैं। ये. कहते हुए कि मेरा लगाव यहां पर है। मेरी.
प्राथमिकताएं यहां पर है। ये सिर्फ शरीर. के सुख का हिस्सा है।. ये आजादी सही है ओशु की नजर में।. जी ऐसी आजादी सही नहीं है। जो व्यक्ति. इमोशनली ग्रो करेगा. उसके भीतर ऐसी कामनाएं वासनाएं पैदा नहीं. होंगी।. है ना? कभी नहीं पैदा होंगी। कोई सुंदर है. तो निश्चित रूप से वो कहेगा कि सुंदर है।. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मैं उससे. संबंध बनाऊंगा। हम. सौंदर्य के प्रति संवेदनशील होगा।. वो अपनी पत्नी से कहेगा कि फलाने स्त्री.
बाजार में आज मिली थी। बहुत सुंदर लगी।. अपनी पत्नी को बताएगा।. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि उसके प्रति. सेक्सुअली अट्रैक्ट हो जाएगा। जैसे आपने. कहा ना कि दिल्ली में कई लोग सिंगल हैं. दिल्ली मुंबई में ऐसे एक्स्ट्रा मैरिटल. अफेयर बहुत कॉमन हो गए हैं।. जिसको वो शारीरिक सुख की बात करते हैं। वो. मानसिक तौर पर अपनी शादी में खुश हैं।. लेकिन शारीरिक तौर पर खुश नहीं है. और वो आगे बढ़ते जा रहे हैं। और वो इसी. फ्रीडम का फायदा उठाने की बात. ये वाली बात फ्रीडम हुई नहीं। वह अपनी. सेक्सुअलिटी वह एनिमलिस्टिक लेवल पे जी. रहे हैं। पशुओं के तल पे जी रहे हैं और वह.
जबरदस्ती ओशो का लेवल चिप उस पे चिपका के. उसको कुछ फिलोसोफिकल बनाने की कोशिश कर. रहे हैं। ऐसे लोगों से हमेशा सावधान रहिए।. हम. ओशो ने हमेशा सच्चे प्रेम को सराहा है।. उसको महत्ता दी है। है ना? और उसके लिए. व्यक्ति डेडिकेट होगा अपने प्रिय व्यक्ति. के प्रति।. फुल डेडिकेशन होगा और तभी उसकी ऊपर ग्रोथ. हो पाएगी स्पिरिचुअलिटी की तरफ।. हम. है ना? और जो लोग नीचे के तल पे जी रहे. हैं वो तो ऊपर पहुंच ही नहीं पाएंगे। वो. बीच में भी नहीं आए। अभी बीच में भी नहीं. आए।. जैसे ओशो आत्मा की आजादी की बात करते हैं.
कि व्यक्ति स्वतंत्र होना चाहिए। प्रेम. आजाद होना चाहिए। ऐसे में शादी का फिर. मकसद क्या रह गया? क्या प्रेम शादी जैसे. बंधन में टिक सकता है? शादी करनी चाहिए।. अभी हम एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं।. ट्रांजिशनल फेज जहां पुरानी विवाह की जड़े. उखड़ गई हैं।. हम. और नई किसी व्यवस्था की जड़े अभी जमी नहीं. है।. हम. जैसे आपने कहा कि लाखों लोग आज भी. अविवाहित हैं और शायद वो कभी विवाह नहीं. करेंगे।. तो पुरानी जड़े तो उखड़ गई। उससे हमारा. मोह भंग हो गया।. उसके कष्ट हमने देख लिए, दुख देख लिए।. है ना? और नई कोई व्यवस्था अभी उजागर हुई.
नहीं। तो एक ट्रांजिशनल फेज है।. ओशो ने निश्चित रूप से इसके आगे की बात. कही कि कैसा हो सकता है भविष्य में।. हम. है ना? अगर दुनिया का हर व्यक्ति. फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हो जाए।. ये संभव आने वाले 20 साल में हो जाए।. टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो जाए। रोबोट. सारा काम करने लगे। आदमी के ऊपर काम का. बोझ भी ना रहे। है ना? सब लोगों को मुफ्त. में पैसा मिलता रहे कि आपको जो खर्च करना. हो करिए घर बैठे। सब काम एआई ने संभाल. लिया। आपकी कोई जरूरत नहीं है। हम.
अभी मैं पीछे. प्लेन से जा रहा था। वहां के पायलट से. मित्रता थी मेरी। उसने बताया कि आप लोग. समझते हैं कि पायलट हवाई जहाज चला रहा है।. पायलट कुछ नहीं करता। आकर बैठता है। एक. बटन है ऑटो पायलट की उसको दबा देता है।. ऑटोमेटिक सब कुछ होता है। हवाई जहाज उड़ती. है, लैंड करती है। सब कुछ करते हैं। हम. कुछ नहीं करते। में बैठ के कॉफी पीते रहते. हैं। कुछ नहीं करते हैं। लेकिन इसलिए बैठे. रहते हैं कि लोग डर जाएंगे कि बिना पायलट. का भाई जहाज जा रहा है। धीरे-धीरे सारा. काम मनुष्य का मशीन और एआई ले लेगी।.
मनुष्य के पास कोई काम नहीं रहेगा। वी विल. बी एबल टू लिव आवर लाइफ। वेरी जॉयसली. प्लेफुली। कोई सीरियसनेस नहीं रह जाएगी।. ऐसी स्थिति में हर व्यक्ति इंडिपेंडेंट. होगा, स्वतंत्र होगा। कोई किसी के बंधन. में रहना पसंद नहीं करेगा। निश्चित रूप से. शादी की तो बात फिर नहीं रह जाएगी। हां. मित्रता तो तब भी होगी।. कोई किसी को अच्छा लगता है वह संग साथ. रहना चाहेंगे। परिवार बसाना चाहेंगे। उनकी. स्वतंत्रता है। हां कोई बंधन नहीं होगा।.
जब चाहे जब छोड़ सकते हैं। जब नहीं मन मिल. रहे हैं किसी कारण से तो अलग हो सकते हैं।. अब दुख नहीं देंगे एक दूसरे को।. जब तक आप खुशी-खुशी रह रहे हो। प्रसन्नता. है एक दूसरे के संग साथ रहने में शांत. रहो। जब नहीं है प्रसन्नता तो विदा हो. जाओ। अलविदा कहो। मुशु ने सच शादी को कब्र. कहा था।. मुझे याद तो नहीं आता ऐसा शब्द कहीं. लेकिन कह भी सकते हैं कहने में क्या है. ओशव की टेंडेंसी है कटाक्ष करके चोट. पहुंचाने की एक्चुअली वो हमें जगाना चाहते.
झजखोर के झकझोर के और जब तक हम नहीं. जागेंगे तब तक कि हमें बुरी तरह से झजकोरा. ना जाए. कौशल ने शादी की थी. नहीं. तो जैसे. लेकिन हम सात सारे भाई बहनों की शादी. उन्होंने करवाई जैसे आप 11 भाई बहन हैं. टोटल 11 लोग हैं तो ये तो परिवार के आगे. की पीढ़ी आई. हां. तो यह आगे की पीढ़ी के लिए फिर क्या ओशो. की नजर में सोच रही है अगर शादी करना. बेवकूफी है या शादी का बंधन जो है. मैं आपसे कह रहा हूं नहीं है. वर्तमान परिस्थिति आज से 50 साल पहले की. स्थिति अलग थी आज.
50 साल पहले कासेप्ट में समझा दीजिए मुझे. तब मैं बता रहा हूं दोष उन्होंने हम सब. भाई बहनों की शादी करवाई वो बारात में भी. आए हैं. अपनी क्यों नहीं की उन्होंने फिर. उनको नहीं करना तो उन्होंने पहले ही बता. दिया था उन जब वो पढ़ाई लिखाई उनकी पूरी. हो गई तो नेचुरली घर में बातचीत चलने लगी. लड़की वालों के रिश्ते आने लगे ओशो ने. स्पष्ट कर दिया कि मैं विवाह नहीं करूंगा।. चलिए वो इंडिविजुअल केस हो गया। उनकी अपनी. चॉइस थी। बट अगर हर इंसान शादी के उस बंधन. में नहीं बंधेगा तो अगली जनरेशन वाला. हिसाब किताब कैसे होगा? फिर तो वही होगा. कि ये कबीला है। पता नहीं किसका लड़का या. फलाने का है कि धमाके का। तो पता लगा के.
करना क्या है? भाई ये होना चाहिए कि बच्चा. जो है वो बुद्धिमान हो, स्वस्थ हो, लंबी. आयु जिए तो फिरशाली हो।. फिर जिम्मेदारियां कैसे इससे क्या लेना? जिम्मेदारियां कैसे ली जाएंगी? धीरे-धीरे सारी जिम्मेवारी सरकार पे चली. जाएगी। आप चिंता नहीं करो। इंडिविजुअल की. कोई जिम्मेवारी होनी भी नहीं चाहिए। सरकार. तय करे जेनेटिक इंजीनियर्स की समिति हो जो. तय करे कि किसके डीएनए अच्छे हैं। किसके. क्रोमोसोम्स अच्छे हैं। केवल उसको ही. संतान पैदा करने का अधिकार हो। क्या जरूरत. है लंगड़े लूले पैदा करने की और जेनेटिक.
बीमारियां लिए हो कजेटल डिजीज ली। किसी के. हृदय में छेद है। किसी के किडनी खराब है।. व्हाई टू रिप्रोड्यूस दिस पीपल? भाई जो. स्वस्थ हैं. बुद्धिमान है। प्रतिभाशाली है। लेगसी जा. रही है आगे। विरासत जिसे कहते हैं हम. विरासत के दूसरे पे बोझ छोड़ के जा रहे हो. आगे आने वाली पीढ़ी को आप बोझ दूसरों पे. छोड़ के जा रहे हो कोई मेंटली रिटायर्डेड. है अब आप तो चले जाओगे दुनिया से आपकी. संतान रह जाएगी वो बाकी के लोगों को. भुगतना पड़ेगा उसको झेलना पड़ेगा. जैसे आपके मां-बाप के 11 बच्चे थे अब उस.
जमाने की बात छोड़िए ओशो जी की अपनी. भूमिका थी उन्होंने अपना काम किया आज वो. नहीं आप अपनी भूमिका निभा रहे हैं आज उनकी. आप बातों को आगे बढ़ा रहे हैं तो ऐसे ही. अगर सोचना बंद कर देंगे तो फिर क्या पता. कोई ओशो आना बंद हो जाए. नहीं ऐसा नहीं होगा। बहुत होश आ सकेंगे।. जितनी स्वतंत्रता होगी उतने ही ज्यादा है।. ऐसे प्रतिभाशाली टैलेंट देखकर ही. निकालेंगे। तो जैसे मैं इसको जितने महान. व्यक्ति हुए हैं कईयों के ऐसे अगर आप. माता-पिता को देखें तो उनके माता-पिता. बड़े साधारण व्यक्ति रहे। लेकिन जो पुत्र. हुआ या पुत्री हुई वो असाधारण निकल गई।.
उनके तो जेनेटिक जीन चेक नहीं हुए थे। वो. भगवान का आशीर्वाद है। जो भी कह लीजिए आप. करिश्मा था पुनर्जन्म का जहां से आया. तो फिर तो महान लोग पैदा होना बंद हो. जाएंगे।. जी नहीं महान लोग बहुत पैदा हो सकेंगे।. अभी जो विवाह व्यवस्था है जहां पति पत्नी. दोनों दुखी आ रहे हैं। दोनों दिन रात कलह. करते रहते हैं। मैं खूब अच्छे से जानता. हूं। दुनिया मैंने खूब घूमी है। बहुत घरों. में रुका हूं। शादी हुई है? हां मेरी शादी हुई है।. आपकी पत्नी खुश नहीं है आपसे? बहुत खुश है। हमारी शादी शादी नहीं हमारा. प्रेम संबंध है।.
शादी का सिर्फ नाम है। हम एक दूसरे के. मित्र हैं। आज भी मित्र ही हैं। हम. ये तो बेसिक फार्मूला है ना शादी खुश रखने. का कि आप मित्र बन जाइए। ये तो मेरा. पुंडरीिक जी बैठे थे। हम किसी के मालिक. नहीं है। वो हमारी मालकिन नहीं है। हम एक. दूसरे को निर्देशित नहीं करते। हम अपना. अपना जीवन बहुत प्रेम से स्वतंत्रता से. जीते हैं।. स्वतंत्रता का मायने क्या है इसमें? स्वतंत्रता का मायने हम अपनी जो हम करना. चाहते हैं अपनी छुपी हुई प्रतिभा को प्रकट. करना चाहते हैं। मेरी पत्नी जो करना चाहती. है उसकी उसकी पूरी आजादी है। मुझे पूरी. आजादी है। मैं जैसा करना चाहूं जैसा जीना.
चाहूं। पत्नी को पूरी आजादी वो जैसा जीना. चाहे।. अब आजादी के दायरे में फिर वही मैं घूम के. लाता हूं उसी बात पे। यानी आप नीचे के. लेवल. नीचे के लेवल तो नीचे के लेवल वाली आजादी. पूरी है या या उस उसपे वो एक दायरा है वो. सवाल नहीं उठता ना आप उस सिचुएशन को नहीं. समझ रहे जो ऊपर चला गया. उसके लिए वो सवाल ही नहीं उठता हमारे जीवन. में सहज ब्रह्मचर्य घटित हो गया दोनों के. है ना 25 साल से हमारा कोई शारीरिक संबंध. नहीं है और शायद कभी नहीं होगा कोई जरूरत. ही नहीं है आप वो वाली चीज समझ ही नहीं.
रहे कोई ऊपर निकल गया उसके हम नीचे वाले. सवाल उस ऊपर वाले पे लगा रहे हैं वो वहां. एप्लीकेबल ही नहीं है।. बट शुरुआत क्योंकि होती क्या है ना शुरुआत. महाराज जी नीचे से होती है।. आप उम्र के साथ ऊपर चलते चले गए।. लेकिन जो दूसरा व्यक्ति है वो इन बातों को. लेकर नीचे वाले में भी लिबर्टी ले ले रहा. है। वो आजादी में और वो ओशो को ही कोट कर. दे रहा है। इसलिए बार-बार मैं घूम के सवाल. वहीं ला रहा हूं।. तो वो तो मिसअंडरस्टैंडिंग खड़ी कर रहा. है।. यानी ओशो उस बात की आजादी नहीं देते कि आप. जानवर बन जाए कुलता बिल्ली की तरह।. कभी नहीं कभी नहीं।. हां ये इधर मैं आपको लेके आ रहा हूं।.
अच्छा एक चीज और है। ओशो ने सेक्स और. अध्यात्म को दोनों जोड़ दिया। अब ये कई. बार मुझे लगता है कि बड़ी उस दौर के हिसाब. से बड़ी हिमाकत करने वाली चीज रही होगी।. क्योंकि अध्यात्म को बड़ा परिटी का नाम. दिया जाता है। और सेक्स वो होता है जो. छिपछिपा कर या हमारे यहां बच-बचा कर या. उसको दूसरी मुंह बिचका कर दिखाता है। करते. सब हैं बच्चे सबके पैदा होते हैं। लेकिन. नजरिया अभी भी इंडिया में खासतौर पर अलग. तरीके से है। तो ये अध्यात्म और दोनों को. मिलाकर एक साथ रखना। ये आप जब इसको पढ़. रहे थे क्योंकि आपने भी उनको सुना पढ़ा. जाना।. आपको ये बड़ा बोल्ड मूव लगा ये?
देखिए मैं बचपन से ओशो को सुनता समझता आ. रहा हूं। उनकी जीवन शैली को जानता हूं। तो. मुझे तो इसमें कुछ भी ऑड नहीं लगा। बहुत. स्वाभाविक लगा। जब जीवन. अध्यात्म से जुड़ना।. हां।. हमारे भीतर एक ही ऊर्जा है। उसको आप नाम. मत दीजिए। सेक्स एनर्जी आप कहिए लाइफ. एनर्जी।. ठीक है।. नो प्रॉब्लम।. हां।. हमारे सात चक्र हैं।. हम. योग की भाषा में। अब ये एनर्जी जिस चक्र. से मैनिफेस्ट होगी उसका रूप ले लेगी।. जैसे समझो एक इलेक्ट्रिसिटी है।. हम. अगर सफेद बल्ब से आएगी तो सफेद दिखने.
लगेगी। हम. लाल रंग के बल्ब से गुजरेगी तो लाल रंग. रेडिएट होने लगेगा। माइक्रोफोन में जाएगी. तो ध्वनि तरंग में बदल जाएगी। माइक स्पीकर. में आएगी वहां बदल जाएगी। वही बिजली काम. कर रही है कैमरा में और वहां पे वो. रिकॉर्ड कर रही है विजुअल है ना। इसी. बिजली से एक्सरे बन जाती है। इसी से लेसर. बन जाती है। इसी से सब कुछ बन जाता है। सब. एक ही एनर्जी के भिन्न-भिन्न रूप हैं।. इसी से मैकेनिकल एनर्जी बन जाती है। पंखा. चल रहा है। एसी चल रहा है। इसी से ठंडक. पैदा हो जाती है। इसी से हीटर में गर्मी.
पैदा हो जाती है। बिजली तो एक है। लेकिन. मैनिफेस्टेशन कई प्रकार के हैं। अब इस. उदाहरण से आप समझिए हमारे अंदर एक लाइफ. एनर्जी है। वाइटल फोर्स।. हम. अगर वो मूलाधार चक्र से प्रकट होता है. हम।. तो वह सेक्स बन जाता है। लोएस्ट चक्र उससे. ऊपर जाता है ह्यूमन तो सेंसिटिविटी बन. जाती है। उससे और ऊपर जाता है साहस बन. जाता है। हिम्मत है ना उससे और ऊपर जाता. है लव। यहां से लव बढ़ आता है। है ना? टोटली डिफरेंट फ्रॉम सेक्स। जब तक हृदय पर.
ऊर्जा नहीं आएगी प्रेम नहीं होगा। तो. सामान्य लोग जिसको प्रेम कहते हैं आप. बार-बार जिसका सवाल पूछ रहे हैं ना वो. सेक्स को ही प्रेम कहते हैं। वहां बड़ी. मुसीबत है। एक मिसकंसेप्शन सेक्स प्रेम. नहीं है। हां संभावना है पोटेंशियल प्रेम. कह सकते हैं। उससे ज्यादा नहीं। जब हमारी. ऊर्जा उर्धगामी हो के हृदय चक्र पर आती है. तब प्रेम फलित होता है। इससे ऊपर और जाती. है इलेक्ट्रिसिटी हमारी कंठ चक्र जिसको. विशुद्धि कहते हैं। वहां से जब आएगी तब.
क्रिएटिविटी पैदा होगी। आदमी बहुत. क्रिएटिव होगा, इन्वेंटिव होगा। है ना? कुछ बहुत ओरिजिनल उससे निकलेगा। इससे और. ऊपर जाती है। जब आज्ञा चक्र में पहुंचती. है तब उसको अंतरदर्शन शुरू होता है। भीतर. की आंख खुलती है जिसको हम तीसरा नेत्र. कहते हैं। वो भीतर सुनना शुरू करता है।. वहां ब्रह्म की ध्वनि सुनाई देती है जिसको. अनाथ नाद कहते हैं। वहां उसे परमात्मा का. प्रकाश दिखाई देता है। अब बाहर की दुनिया. से नहीं रहा संबंध। अब वो भीतर चला गया।. और इससे ऊपर पहुंचता है जब सहस्त्रार पर. वहां वह समाधस्त हो जाता है। विलीन हो.
जाता है। वो रहते ही नहीं थोड़ी देर के. लिए। ही इज डिर्व्ड इनू नथिंगनेस। अब ये. पूरी यात्रा एक ही इलेक्ट्रिसिटी की है।. लेकिन अधिकांश लोग केवल नीचे के चक्र से. परिचित हैं और उसको सेक्सुअलिटी कहते हैं।. वही एनर्जी ऊपर जाकर मैनिफेस्ट होती है।. इस प्रकार से. तो क्या ये बात आप लोग को परेशान करती है।. तो मैं कहता हूं उसप आप सेक्स का लेवल मत. लगाइए। एक न्यूट्रल नाम रख दीजिए एक्स।. हां। मैं मैं उसको हटा देता हूं। मैं इसको. एक नए सिरे से कोट करता हूं।.
ओशो के भाई होने के नाते जब आप ओशो के. बारे में दुनिया में बात करते हैं तो क्या. यह बात आपको परेशान करती है कि जिस. व्यक्ति ने गीता पर इतना लिखा महावीर जी. पर बात की बुद्ध पर बात की संसार में हर. चीज पर बात की. उन सारी चर्चाओं से इत सबसे ज्यादा जो. उसके ऊपर लेबल लगा या जो कॉमन चला वो. संभोग से समाधि ही चलता गया उसी को ओशो पे. चिपका दिया गया कि ओशो मतलब संभोग से. समाधि. यही ओशो का सार है. यह जानकर केवल मुझे तरस आता है उन लोगों.
पे. हम. जिन्होंने ये लेवल लगाया है।. हम. उनका आईक्यू लेवल कितना कम है इस पे दुख. होता है सोच के करुणा भाव पैदा होता है कि. जिन लोगों ने ओशो पे लेवल लगाया है. इनकी बुद्धिमत्ता कितनी कम है. हम. है ना और यह एक तथ्य है. पिछले वर्ल्ड वार के बाद मनोवैज्ञानिकों. ने नया-नया आईक्यू टेस्ट करने का उपाय. सोजा था और पहली बार मास स्केल पे सैनिकों. का आईक्यू निकाला गया और आपको जानकर हैरान.
होगी, दुख भी होगा। एवरेज आईक्यू 14 साल. है।. यानी सेक्सुअल मैच्योरिटी जब आई व्यक्ति. की उसकी बुद्धि बस वहीं रुक गई। अटक गई।. उसके अलावा उसको ना कुछ दिखता है ना कुछ. सूझता है ना कुछ वहां खत्म।. उसके बाद कोई विकास उसकी चेतना में नहीं. होता। कुछ रेयर लोग हैं जिनको हम बहुत. प्रतिभाशाली कहते हैं जो उससे आगे बढ़ते. हैं। अधिकांश लोग सिर्फ वहीं अटके हैं और. ये जो लेवल लगाया है ओशो पे इस लेवल से. ओशो के बारे में पता नहीं चलता। उन.
बुद्धिहीन लोगों के बारे में पता चलता है. जिन्होंने टैग लगाया है। उनको सिर्फ उतना. ही दिखाई देता। उसके अलावा उनको कुछ दिखाई. नहीं देता।. नहीं हमारे जो दर्शक देख रहे होंगे वो 2. घंटे बाद इस टॉपिक पे आए होंगे।. हां।. तो उनको इससे पहले ओशो के बारे में काफी. कुछ मिल गया होगा कि ओशो कौन है, क्या है, कैसे है? लेकिन आपकी एक बात मुझे याद आई।. आपने कहा ब्रह्मचर्य का आप पालन करते हैं।. अभी बीते कुछ. पालन नहीं करते।. कुछ समय से. पालन नहीं. उस उस तरह जीवन पद्धति में आ गए हैं।. अपने आप घटित. अपने आप घटित. पालन नहीं करते। पालन करने में ऐसा लगता.
है हमने कुछ चीज को दबा दिया है। छोड़. दिया है। उसके अगेंस्ट में है और हम कुछ. डिफरेंट बिहेवियर शब्दों को सही से कोट कर. रहे थे। ओशो जो थे वो खुद. ब्रह्मचारी थे या अपने जीवन में भौतिक सुख. जो थे उनका वो पालन करते थे? संभोग से. समाधि की ओर किताब में अगर आप पढ़ेंगे तो. उसमें ये सवाल उनसे पूछा गया है कि आपको. सेक्स के बारे में इतनी जानकारी कहां मिली. जो आज तक पूरी पृथ्वी पे किसी ने नहीं. बताई। आप वो बातें बता रहे हैं जबकि आप तो. गैर शादीशुदा हैं। ओशो ने कहा मैं अपना. सारा ज्ञान इसी जन्म का नहीं है। पिछले.
जन्मों के अनुभव हैं। पिछले किनहीं जन्मों. में मैं भी गृहस्थ जीवन जिया हूं। वो. अनुभव मुझे हैं। उससे मैं कह रहा हूं।. मेरे को अटल बिहारी वाजपेयी की ये लाइन. याद आ गई।. मैं शादीशुदा नहीं क्या नाम है? अह मैं. शादीशुदा नहीं हूं। पर यह बड़ी चीज बड़ी. खूबसूरत लाइन कोट की. देखिए कुछ लोग हैं जो पिछले जन्मों में. इतने विकसित हो चुके हैं कि इस जन्म में. उनको उन चीजों की जरूरत नहीं है जो. सामान्य आदमी को जरूरत है।. हम. है ना? वो ऑलरेडी कुछ बहुत कुछ क्रॉस करके. आए हैं। बहुत अनुभव गम में है।. हम. अब जैसे अपन आद्य शंकराचार्य की जीवनी.
देखें।. सही बात है। है ना? 30 साल में. 12 साल की उम्र में तो वो सन्यासी हो गए।. 12 साल तो खेलने कूदने के दिन होते हैं. बच्चों के।. जीवन ही 30 35 साल का था। पूरा. तो 12 साल में वो सन्यासी हो गए। तो इनकी. पिछले जन्मों की कुछ श्रंखला चली आ रही. है। आप इसी जन्म की कहानी से उनको नहीं कह. सकते कि 12 साल में इस बच्चे को ऐसा क्या. हो गया? इतना वैराग्य फलित हो गया और इतना. ज्ञान फलित हो गया। ये ज्ञान कहां से आ. गया इतनी छोटी सी उम्र में? है ना? पिछले जन्मों की लंबी श्रंखला है. जहां से हम आ रहे हैं और हर जन्म में.
हमारा और आगे आगे विकास होता है। तो ओशो. ने इस बात को खुद ही एक्सप्लेन किया है, समझाया है।. ठीक है? आजकल मेंटल हेल्थ की बड़ी बातें. होती है। मैं जो ओशो को सुनता है वो कहते. हैं मन का कोई अस्तित्व नहीं होता।. तो फिर ये मेंटल डिसीज जो है ये कहां से. आती है? ऐसा समझ लीजिए रात आप सपने देखते हैं।. हां।. है ना? सपने का कोई अस्तित्व तो नहीं. होता। लेकिन इफेक्ट तो होता है।. समझिए आप सपना देख रहे हैं कि जंगल में आप. खो गए हैं. और अंधेरा हो गया है और आप चल रहे हो पीछे.
से शेर दहाड़ता है. हम. और आप भागना शुरू कर देते हैं और शेर. दौड़ता आ रहा है और आपके बिल्कुल निकट ही. आ गया. हम. और अचानक आपके मुंह से चीख निकल जाती है।. एक नाइट मेयर एक दुख स्वप्न चल रहा है।. चीख से आपकी खुद की नींद खुल गई। हम्म।. अब आपको भली-भांति पता है कि ना जंगल है. ना अंधेरा है ना शेर है।. हम. मगर आपका जो रिएक्शन बॉडी में आ गया है. उसको सबसाइड होने में अभी 10 मिनट लगेंगे।. हृदय की धड़कन तेज हो गई है। सांस उखड़ गई. है। है ना? आपने वैसा व्यवहार कर रहे हैं.
जैसे कि एक्चुअली उस स्थिति में थे। आपको. भली-भांति पता है कि सपना नहीं नॉन. एक्जिस्टेंशियल है। है ना? लेकिन फिर भी. उसका इफेक्ट तो रहेगा।. ठीक ऐसा ही हमारा मन है जिसको संत लोग. कहते हैं माया। हम. नहीं है और है जैसा लगता है. हम. इसको बोलते हैं माया. हम. है ना क्षितिज दिखाई देता है हम. कि 34 किलोमीटर दूर होगा जमीन और आकाश. मिलते हैं. बट वो होता नहीं. ऐसा तो है नहीं हम कितना ही दौड़े पकड़ने. के लिए हम कभी भी क्षितिज तक नहीं. पहुंचेंगे वो है ही नहीं फिर भी दिख रहा.
है कि है. हमारी आंखों का भ्रम है. बहुत दौड़े हैं पकड़ने के लिए. तो ऐसा ही मन है. है ना संत कबीर कहते हैं मन ही माया. है ना तो माया का मतलब है संकल्प भी यूज़. यूज़ करते हैं माया शब्द का खूब। तो माया. का मतलब है दैट व्हिच डज नॉट एकिस्ट।. स्टिल इट अपीयरर्स टू एक्सिस्ट। हम. तो मैंने दो उदाहरण दिए सपने का और. क्षितिज का. है नहीं मगर फिर भी हैं जैसे लगते हैं. आभास मात्र जस्ट अपीयरेंस। तो ऐसा हमारा.
मन है और जब तक हम इस इसमें उलझे हैं। हम. अपने वास्तविक अस्तित्व को चेतना को नहीं. जान पाएंगे। परमात्मा को नहीं जान पाएंगे।. क्योंकि इसमें तो सपने चल रहे हैं। इससे. भी निकलने का वही तरीका है जो हमने बात की. थी। पाशा भाव बी ए विटनेस जो भी हो रहा हो. तुम याद करो कि मैं इसको देख रहा हूं। अगर. रात को नींद में हमें याद आ जाए कि ठीक है. जंगल है ये है शेर दौड़ रहा है मेरे पीछे. और मैं इसको जान रहा हूं। जैसे ही यह. स्मरण आया कि मैं इसको जानने वाला हूं।.
नींद टूट जाएगी कि जागरण आ ही गया। ऑलरेडी. आ गया कि मैं जानने वाला हूं और सपना भी. लीन हो जाएगा। शंकराचार्य जब कहते हैं कि. जब तुम जाग जाओगे तो पूरा संसार तुम्हें. स्वप्नवत लगेगा। माया। इसका यह मतलब नहीं. है कि ये कुर्सी नहीं है, ये टेबल नहीं. है। है अपनी जगह लेकिन मैं जैसा देख रहा. था वैसा नहीं है।. वैसा नहीं है। है ना? मैंने अपना इल्लुजन एक प्रोजेक्शन उस पर. थोपा था और मैं अपना ही सपना देख रहा था।. अभी अपन प्रेम की बात कर रहे थे। उसी को. उदाहरण समझ ले। एक युवक युवती आपस में.
मिले और एक दूसरे के प्रेम में पड़ गए। अब. इस समय जो एक दूसरे में ये देख रहे हैं. एक्चुअली वो नहीं है।. नहीं है।. मैं ये नहीं कह रहा कि युवक नहीं है और. युवती नहीं है। है लेकिन इन्होंने अपने. उसको एक पर्दा समझ के उस पे एक प्रोजेक्शन. प्रक्षेपित किया है अपनी ही वासनाओं का कि. वो ऐसी है। और वो लड़की समझ रही है युवक. ऐसा है। जब इनका विवाह हो जाएगा तब चार. दिन में पता चलेगा कि फंस गए। बुरी तरह. फंस गए। ये तो वैसा है ही नहीं।. अब धोखा किसने दिया है? इल्लुजन ने।. दूसरे ने नहीं दिया। अपने मन.
अपना ही मन माया है। मन प्रोजेक्टर है। है. ना? वो अपनी कहानी प्रोजेक्ट करता है।. और होता क्या है वो दिखाई देती है सामने. और है अपने भीतर सिनेमा हॉल में जाते हैं. टाकीज में सामने पर्दे पर कहानी चल रही. है।. बट वो है थोड़ी ना।. पीछे लगा है प्रोजेक्टर वहां से वो चल रहा. है वो।. तो ऐसा ही संसार एक धोखा है। यहां हम जो. देख रहे हैं वो एक्चुअल वहां नहीं है।. याद रखिए फैक्ट है लेकिन हम जो देख रहे. हैं वो फैक्ट नहीं था। वो कुछ और था। मैं. समझ गया सर।.
हमने अपना प्रोजेक्शन उसमें डाल दिया।. अपनी वासनाएं उसमें डाल दी और उसको हम देख. के आकर्षित हो रहे हैं। और फिर हम देख. पाएंगे कि हमारा सपना टूट गया, धोखा मिल. गया।. रियलिटी नहीं थी वो।. रियलिटी नहीं थी।. रजनीशपुरम इंडिया से अमेरिका जाना ओशो जी. का क्योंकि अमेरिका एक पावरफुल देश है और. कई लोग आज भी हिंदुस्तान में इस बात को. सोच कर रोमांचित हो जाते हैं कि एक पूरा. मुल्क उनका स्वागत करता है और फिर एक पूरा. मुल्क उनके खिलाफ आता है उनको हटाने के. लिए। लेकिन अमेरिका जाना ये आत्मरक्षा की. योजना थी या विस्तार की योजना थी?
यह विस्तार की योजना थी। देखिए. क्योंकि मैंने आत्मरक्षा भी सर इसलिए कोट. किया क्योंकि इंडिया में भी उससे काफी. विरोध हो गया था और कई लोग इंडिया में. मानते हैं कि ओशव जी यहां से गए क्योंकि. इंडिया में अब वो सेफ नहीं थे। विदेशी. उनकी बातें अमेरिका के हिसाब से भले ही. सूट कर रही थी। इंडियन ऑडियंस को सूट नहीं. कर रही थी तो आत्मरक्षा के लिए भी वहां. जाना पड़ा।. देखिए इस बात को ऐसा समझिए। बुद्ध पुरुष. ये जो जीवन जीते हैं जो कि उनकी अपनी कोई. वासना नहीं है। हम. वह आउट ऑफ कंपैशन होता है। एक्चुअली जन्म.
ही इसलिए लेते हैं कि करुणावश जो उन्होंने. जाना है वो दूसरों को बता सकें। अपनी. शांति और आनंद को शेयर कर सकें। इसलिए. उनका जीवन है। तो हमारे मन में जैसी. कामनाएं और वासनाएं होती हैं जीवन को जीने. के लिए। उनके भीतर ऐसी कोई जीवना नहीं. होती तो ना तो उनको मृत्यु का डर होता ना. ही उनकी कोई सुरक्षा से कोई मतलब होता है. लेकिन एक करुणा है कि जब तक ये शरीर चल. सकता है मैं वह बात बताऊं जो बताने योग्य. है क्योंकि वो केवल आज का सवाल नहीं है. आगे आने वाले मनुष्य जाति के लिए भी काम. आएगी वह एक प्रकाश स्तंभ बनेगी जो रोशनी.
दिखाएगी सालों सालों हजारों साल तक तो. उनका जीवन करुणा से ओतप्रोत होता है हां. अब मैं आपकी बात पर आता हूं कि पूश्रम में. ऐसी स्थिति बन गई थी कि 5 7 हजार लोग आकर. रहने लगे और वहां ये संभव ही नहीं था।. इतना है ना तो बड़ी कठिन-कठिन. परिस्थितियों में रहते थे। कोरगांव के. आसपास खेत ही खेत थे। उस समय पुणे डेवलप. वहां नहीं था। सब खेत थे। टेंट लगा के. खेतों में रह रहे हैं। अब सोचिए तेज गर्मी. में क्या बीतती होगी? बरसात में क्या.
बीतती होगी? ठंड में क्या बीतती होगी? अधिकांश लोग टेंटों में रह। सारी होटलें. भरी हुई हैं। सारे रेस्टोरेंट भरे हुए. हैं। टेंटों में लगा लगा के रह रहे हैं।. जहां ना पानी का इंतजाम है। ना टॉयलेट. जाने की सुविधा है। कितनी परेशानी वो. विदेशी लोग जो बेचारे कभी ऐसी स्थिति में. नहीं रहे हैं। वो आकर रह रहे हैं। क्योंकि. ओशो से प्रेम है। ओशो का प्रवचन सुनना है. तो उसके लिए सब कुछ सहने तैयार हैं। किसी. भी कष्ट खूब बीमारियां फैलती थी। खासकर. वाटर पोलशन की वजह से जो बीमारियां होती.
है हमारे देश में गैस्ट्रेंट्राइटिस की. अमीबियासिस की जीआरडीआरसिस की वर्म. इंफेस्टेशन और ये पश्चिमी ठंडे देशों में. रहने वालों को ये इंफेक्शन कभी नहीं हुए. और भारत में आते ही से एक गिलास पानी भी. पिया है दो घंटे बाद उनको लूज मोशन शुरू. हो जाएगा तो बहुत कष्ट झेलने पड़ते. हेपेटाइटिस टाइफाइड जितने पानी से कीटाणु. फैलते हैं इनसे बहुत त्रस्त हो गए थे तो. अकेले ओशो की सुरक्षा का सवाल नहीं था. इतने हजारों ों लोग प्रेमवश श्रद्धावश. इतना कष्ट भोग रहे हैं। इसका भी ख्याल था।.
है ना? और ऐसी कोई संभावना नहीं थी कि. वहां कोई सुविधाजनक स्थिति बन सके। है ना? इन वजह से शिष्यों ने सोचा कि उनको ओशो. अगर तैयार हो जाते कहीं और जाने के लिए तो. बहुत अच्छा होगा। वहां ज्यादा सेफ. एनवायरनमेंट में है ना जहां सब लोग स्वस्थ. रह सके। स्वस्थ होना मुख्य सवाल था। प्लस. ओशो को पुणे में एलर्जी थी। जो भी कारण. रहे हो उनको धमाका अटैक पड़ता था जिसका कि. कोई इलाज नहीं हो पाता था। वह जब पुणे आए.
उसी दिन से शुरू हो गई थी। अगर उनकी. बायोग्राफी में आप देखेंगे तो सन 74 में. वो पुणे आए थे और कुछ दिनों ही बाद. उन्होंने कहा था कि यहां नहीं रहेंगे. क्योंकि बार-बार बार-बार एलर्जिक अटैक्स आ. रहे हैं। तो उनका स्वास्थ्य भी वहां अच्छा. नहीं रहता था। और बाकी अन्य लोग सब बहुत. प्रभावित हो जाते थे। तो यह प्लान खूब. दिनों से चल रहा था कि कहीं और बड़ी जगह. है ना जहां हम अपना पूरा इंतजाम कर सकें।. हम. ओशो विदेश नहीं जाना चाहते थे।. वो चाहते थे भारत में ही हो क्योंकि उनको.
भली-भांति पता है कि जब हमारा देश हमको. बर्दाश्त नहीं कर पा रहा तो दूसरे क्यों. करेंगे बर्दाश्त? है ना? उनकी क्रांतिकारी सोच को तो कौन. बर्दाश्त करेगा? यहां तो मजबूरी उनको. निकाल नहीं सकते। इसी देश की पैदाइश हैं।. बाहर वाले तो तुरंत हटा देंगे। इस बात को. भलीभांति जानते हुए उन्होंने खूब प्लान. किए। उनके शिष्यों ने जो उस समय उनके. सेक्रेटरी थे हिमाचल प्रदेश में कोई जगह. लेने की, कच्छ गुजरात में कोई जगह लेने की. और कई कई जगह चलता रहता था। हर प्रदेश के. लोग चाहते थे कि ओशव हमारे यहां आ जाए। तो.
काफी कुछ हुआ लेकिन किसी चीज में सफलता. नहीं मिल सकी सरकारी उसकी वजह से। इस बीच. में ओशो के ऊपर आठ बार कातिलाना हमला हुआ।. एक लास्ट लास्ट में तो बमार्डमेंट भी हुए।. आश्रम में भी हुआ। किताबों की गोडाउन थी।. उस जमाने में उसमें दो करोड़ की किताबें. थी।. सन 80 में आज की आप हिसाब लगा लो 200. करोड़ की लिटरेचर था जिसको एक सेकंड में. सब राख हो गया। आग लग गई इतनी बड़ी गोडाउन.
तो भांतिभांति के नुकसान किए गए। भरी सभा. में ओश के ऊपर छुरा फेंका गया. बोल के कि मैं आपको खत्म करने आया हूं। और. ये आदमी जो छुरा फेंकने आया है ये पुलिस. में रिपोर्ट करके आया है पहले से क्योंकि. मैं ऐसा करने जा रहा हूं। पुलिस का सपोर्ट. है उसको है ना और पता है कि इतने बज के. इतने मिनट पे फेंकूंगा प्रवचन के दौरान. 5000 लोग सुनने वाले हैं और वो खुद. चिल्लाया उसकी आवाज भी रिकॉर्ड हो गई।. ओशो एक सेकंड को रुके कुछ कह रहा है खड़े.
हो गए। उसने अपना क्रोध व्यक्त किया छुरा. फेंका। वो छुरा ओशो को तो नहीं लगा। एक. खंभे से टकराया और गिर गया। तो वो सारी. आवाज रिकॉर्ड हो गई। आधा मिनट बाद ओशो ने. फिर बोलना शुरू कर दिया जब वो शांत हुआ तो. है ना उस व्यक्ति को उठा के सब लोग बाहर. ले गए है ना बाहर उसी समय ठीक पुलिस वाले. आ गए जिनको पहले से पता है कि इतने बज के. इतने मिनट पे होगा वे उसकी सुरक्षा के लिए. आए हैं वो सब की सुरक्षा के लिए नहीं आए. पहले आना था उसको बचाने के लिए आए हैं. लेकिन आश्चर्य की बात है सन्यासियों ने उस.
व्यक्ति को एक चांटा भी नहीं मारा. और ओशो ने इस बात की बहुत तारीफ की अगले. दिन कि तुमने वैसा ऐसा व्यवहार किया जो. तुम्हें करना चाहिए था। प्रेमपूर्ण. व्यवहार, होशपूर्ण व्यवहार। वो क्रोध में. उसकी वो जाने।. है ना? तुमने वही किया जो एक सन्यासी को. करना चाहिए था। तुमने एक चांटा भी उसको. नहीं मारा। पुलिस वाले उसको ले गए। है ना? इस पर केस हम लोगों ने नहीं चलाया। आश्रम. की तरफ से कोई केस ओशो ने कभी किसी पर केस. नहीं चलाया। इतने उनके साथ दुर्व्यवहार.
किए गए। उसके बावजूद भी उन्हीं पर सब. लोगों ने केस चलाए। लेकिन क्योंकि वो. पुलिस में लिखवा के आया था कि मैं मर्डर. करने जा रहा हूं तो पुलिस की जिम्मेवारी. बनती थी केस चलाना तो पुलिस ने ही केस. चलाया सिर्फ दिखाओटी है ना ओशो की तरफ से. जो केस लड़ने वाले थे वो उस समय के सबसे. प्रसिद्ध वकील श्री राम जेठ मलानी. है ना और वो लोअर कोर्ट में ही हार गए. पहली ट्रायल में ही मतलब सब कुछ पहले से. तय है जिस चीज की रिकॉर्डिंग है वो क्रोध.
में चिल्लाना उसका छुरा फेंकना कि मैं. छुरा मारूंगा ये करूंगा वो करूंगा और छुरे. की आवाज वो सब रिकॉर्डेड हो चुकी है। और. 5000 लोग चश्मदीद गवाह हैं और रामजे मलानी. उस केस को हार जाते हैं। पहली ही ट्रायल. में हार जाते हैं। अब आप समझ सकते हैं. सरकार का शिकंजा कैसा है? इस स्थिति में एक करुणावान व्यक्ति सोचेगा. फिर यहां से हट जाओ। याद रखिए डर की वजह. से नहीं। ओशो जैसा साहसी आदमी नहीं है।. जिसने अपनी आत्मा को जाना उसको पता है कि.
मैं अजर अमर हूं। है ना? उसको तो अपनी. जन्मों जन्मों की कहानी पता है। कितने. जन्म हो गए। कितनी बार मौत हो गई। कहां. मरे? फिर आ गए। उनके भीतर तो निर्भयता है, साहस है। है ना? लेकिन करुणा भी तो है। इन. मूर्खों के बीच में क्यों रहना? जो उसकी करुणा की बात समझ ही नहीं रहे. हैं। इस स्थिति में जब वो बम विस्फोट किया. गया तो यूएस का. तीन जगह जब बम विस्फोट हुआ उसके बाद फिर. ओशो ने तय किया कि ठीक यहां से चलते हैं. क्योंकि उनके शिष्य सब जगह से बुला रहे थे.
उनको। अमेरिका में कहां पर ये रजनीशपुरम. बनाया गया सर और इसकी इतनी बड़े इलाके की. इजाजत कैसे मिल गई? यह भी बड़ी. इंटरेस्टिंग कहानी है।. जमीन तो खरीदी हुई थी। इजाजत का क्या. सवाल? पर्सनल प्रॉपर्टी थी।. फिर भी एक दूसरे देश में जाना वहां पर एक. आश्रम बनाना जमीन खरीदना।. इसको क्यों भूल जा रहे हैं? ओशो के कितने. शिष्य हैं।. नहीं वही मैं जानना चाहता हूं। तो ये. अमेरिका का आईडिया कैसे आया? एक तो ये कि. सारे क्योंकि शिष्य तो कई और जगह भी. होंगे।. देखिए उस समय ओशो की जो सेक्रेटरी का काम. कर रही थी उनका नाम है महानशीला। है ना? है ना? वो स्वयं एक गुजराती महिला हैं।.
किंतु उनका विवाह अमेरिका में हुआ था।. उनके पति भी आश्रम में रहते थे। है ना? वो. किसी खास बीमारी से पीड़ित थे।. उनकी मृत्यु भी आश्रम में ही हुई। है ना? हम. तो महानंदशीला के पास अमेरिकन सिटीजनशिप. थी। है ना? उनके जीजाजी और बहन वगैरह सब. अमेरिका में ही रहते थे। उनके जीजा जी हैं. स्वामी सत्यवेदांत।. है ना? वो भी एक इंपॉर्टेंट व्यक्ति थे. आश्रम में। है ना? वो वहां पर यूनिवर्सिटी. के वाइस चांसलर थे अमेरिका में। ही वा बिग.
पोस्ट है ना उन्होंने ओशो का साहित्य. कैलिफोर्निया की यूनिवर्सिटी में वहां पर. टेक्स्ट बुक में करवाया था। मैंने ये सुना. सर कि अमेरिका में बहुत ज्यादा इन्फ्लुएंस. हो गया था ओशु जी का। इतना इन्फ्लुएंस हो. गया था कि वहां की सरकार भी सोचने लगी थी. कि ये व्यक्ति बड़ा पावरफुल होता आ रहा है. और असहाज स्थिति पैदा हो गई थी।. अमेरिका में क्यों विवाद हो गया? पहली चीज ओशो एंटी पॉलिटिक्स है। आपको मैं. पहले कह चुका हूं। तो सवाल ये नहीं होता. कि इंडियन पॉलिटिशियन है कि अमेरिकन है कि. इटालियन है कि जापानीज है।. वो चालाकी के और पाखंड के खिलाफ में है।.
अब वो चालाकी पाखंड एक धर्म गुरु करेगा तो. उस पे भी उंगली उठाएंगे। राजनेता करेगा तो. उस पे भी उठाएंगे। तो ओशो ने वहां जाके जब. देखा कि वहां के राजनेता क्या कर रहे हैं।. बकवास कह रहे हैं कंट्री ऑफ लिबर्टी, कंट्री ऑफ़ फ्रीडम। बोलने की स्वतंत्रता तो. है नहीं। अभी बंदूक लेकर आ जाते हैं लोग. मारने के लिए। है ना? तो ओशो ने उन बातों. को उजागर किया जो दुनिया में कोई नहीं. जानता था। मैं एक दो उदाहरण दूं आपको समय. हो तो जी. मैं संक्षेप में बताता हूं। जैसे दो तीन. बातें बता दें जैसे जिससे सरकार पगला.
जाएगी। पहली चीज जो मूल अमेरिकन निवासी थे. जिनको रेड इंडियन कहा जाता है जिनकी जमीन. थी।. पश्चिम के ये गोरे लोग गए यूरोप के और ये. सब अपराधी लोग थे। आपको पता होगा उस जमाने. की हिस्ट्री 300 साल पहले जब कोलंबस ने. खोजा था. तो यूरोप के जिन लोगों को. काला पानी की सजा दी जाती थी ना जैसे भारत. में ऐसे वहां पे जिन अपराधियों को सजा. देते थे उनको अमेरिका महाद्वीप पे छोड़. आते थे कि वहां रहो मरो ये सब अपराधियों. ने कब्जा कर लिया क्योंकि इनके पास हथियार. थे वहां के मूल आदिवासी तो बेचारे निहत्त.
थे इनके पास तो तीर कमान थे और ये बंदूक. के गोला और तोपें लेकर पहुंच गए उनको. तहसनहस कर दिया उनकी सारी प्रॉपर्टी. इन्हने लूट ली सब कब्जा जमा लिया हर जगह. और आज स्थिति यह है कि वहां के जो रेड. इंडियंस जो मूल अमेरिकन कहना चाहिए उनको. बाकी तो सब विदेशी हैं। यह तो कोई अमेरिकन. के हैं नहीं। उनको रिजर्वेशन में रखा है।. एक प्रकार के खुले जेल ओपन जेल उनको वोट. डालने का अधिकार नहीं है। अपना प्रतिनिधि. चुनने का अधिकार नहीं। उनको पढ़ाई लिखाई. करने की जरूरत नहीं। उनको कोई काम नहीं.
करना है। सोसाइटी में उनको आना भी नहीं. है। सबके बीच में बंद वहां रहना है। उनको. फ्री में पैसा दिया जाता है। और फ्री में. पैसा देना एक चालाकी है। षड्यंत्र है किसी. जाति को नष्ट करने का।. आपको लगेगा कि बड़े दयालु हैं। दयालु नहीं. है। बहुत बड़ा षड्यंत्र है इसके पीछे। जब. किसी पूरे शहर को जिसको आपने रिजर्वेशन. में रख दिया उन सबको हर महीने फ्री पैसा. मिल रहा है। वो करेंगे क्या? मेहनत करना भूल जाए। दारू पिएंगे, जुआ.
खेलेंगे, बलात्कार करेंगे, लड़ाई झगड़ा. करेंगे। जब लड़ाई झगड़ा करेंगे तो जेल में. पहुंच जाएंगे। उनप कोई केस चलने वाला. नहीं। क्योंकि बुल लोगों को तो भाषा ही. नहीं आती बाहर की।. उनकी तो भाषा ही अलग है। उनका केस कौन. लड़ेगा? तो अधिकांश युवा पीढ़ी जेल में है। हम. वहां पे जो बचे हैं उदार पी पी के उनकी. बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है। उनको अकल काम. तो उनको कुछ करना नहीं है। अच्छा जो नई. पीढ़ी आ रही है उसको भी पता है उनको तो.
फ्री में सब कुछ मिल रहा है। उनको करना. क्या है? तो बुद्धि विकसित ही नहीं होगी।. ये तो चैलेंज होता है तो होती है ना। अपन. छोटे बच्चों को अगर स्कूल नहीं भेजेंगे. जबरदस्ती। वो तो नहीं जाना चाहता। भेजते. हैं तो धीरे धीरे धीरे वो सीखता है. मैथमेटिक्स और सब चीजें सीख जाता है। हम. नहीं करेंगे फ़ तो वो तो कुछ नहीं सीखेगा।. उसकी तो टेंडेंसी नहीं है सीखने की।. हम. तो वहां की पूरी पीढ़ी दर पीढ़ी सबको. बर्बाद कर रहे हैं। ये सब नशेलची भंगेड़ी. गंजेड़ी ड्रग्स एडक्शन इंजेक्शन लगा रहे. हैं खुद ही अपने आप को।.
एक प्रकार से उनको मारने का एक सभ्य. तरीका। ओशो ने इस बात को उजागर किया. इंटरनेशनल प्रेस के आगे कि यहां के जो मूल. निवासी हैं उनको वोट डालने का अधिकार नहीं. है।. और ये कहते हैं कंट्री ऑफ लिबर्टी और बड़ी. डेमोक्रेसी भारत डेमोक्रेसी ये प्रजातंत्र. है।. इस प्रकार की बातें बहुत सारी बातें ओशो. ने उजागर की। अब इसका सरकार क्या जवाब दे? थैंक यू। अब हो गया आपका।. हमारे घर में रह के हमसे दुश्मनी.
हमसे दुश्मनी. फिर दूसरी चीज थी एक जिससे भ्रांति पैदा. हुई वो वाली ये तो हो गए रियल फैक्ट मैं. खूब सारे नहीं बता रहा आपको ओशो ने ईसाई. धर्म के खिलाफ लंबी प्रवचन माला दी एक. सीरीज जिसका नाम है द रजनीश बाइबल. रोज सुबह बोलते थे रजनीश बाइबल का प्रवचन. जिसमें बाइबल के खिलाफ और एक-एक सेंटेंस. बाइबल का उन्होंने उधेड़ कर रख दिया सब. पूरा कि सब गलत है बकवास है झूठी कल्पनाएं. है मनगढ़ंत कहानियां हैं और किसी के पास.
कोई जवाब नहीं और उसने चैलेंज किया कि. पादरी को कि आप आ जाओ यहां बैठ के हम एक. ही मंच पे बाद विवाद कर लें आप करो सिद्ध. सही कौन मानने वाला उनका विवाद उसने कहा. चलो तुम डर रहे हो मैं वहां आ जाता हूं. मुझे बुला लो रोम में तुम्हारे लोगों के. सामने अपन डिबेट कर लें तुम बताओ क्या बात. सही है बाइबल में और मैं बताऊं क्या गलत. है देखते हैं कौन जीतता है उत्तर तो कोई. नहीं लेकिन दुश्मनी याद रखना दुश्मनी आदमी. तब करता है जब उसके पास उत्तर नहीं होता।.
यदि उत्तर होता तो आप उत्तर देते। एक. उत्तर नहीं आया। एक साल तक प्रवचन देते. रहे रजनीश भाई पल और शाम को वो इंटरनेशनल. प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थी एवरीडे. इंटरनेशनल प्रेस कॉन्फ्रेंस एवरीडे और उस. सीरीज का नाम रखा था उन्होंने द लास्ट. टेस्टामेंट।. डॉ. हीराल हीरालाल गोत्री की याद है ना? जैसा उसको चढ़ाया था। और उन्होंने वहां. सबको चढ़ा के रख दिया। अब उनकी बाइबल. कहलाती है टेस्टामेंट। एक पुराना. टेस्टामेंट यहूदियों का धर्म ग्रंथ. फिर उस न्यू टेस्टामेंट ईसाइयों का वो भी.
उन्होंने रखा नाम था द लास्ट टेस्टामेंट. वो हीरालाल गोत्रे वाली बात इतनी बुरी तरह. से लोग भड़क गए है ना और किसी के पास किसी. बात का जवाब नहीं क्योंकि जो ओशो कह रहे. हैं वो फैक्ट है. तुम्हारे पास है तो बताओ कौन सी बात है. यहां से लोग अब उनको उखाड़ने की कोशिश. करते हैं. फिर एक दो भ्रांतियां हुई। पहली चीज हम. लोग गेरू रंग के कपड़े पहनते थे, माला.
पहनते थे और नाम हिंदी नाम या संस्कृत नाम. होते थे। ओशोज नाम देते थे। मुझको नाम. दिया स्वामी शैलन सरस्वती। मेरी पत्नी को. नाम दिया मां अमृतप्रिया। तो अमेरिकन से. जो आते थे या यूरोप के लोग जो आते थे सबको. नाम तो हिंदी वाले मिलते थे। स्वामी और. मां जोड़ के है ना उनका वो क्रिश्चियन नाम. तो हट जाता था। इससे एक भ्रांति फैली कि. ये सबको हिंदू धर्म में कन्वर्ट कर रहे. हैं और भगवा रंग तो पक्का प्रतीक है गेरवा. गेरुआ रंग तो हिंदू बना रहे हैं सबको सब.
माला पहन रहे हैं और नाम बदल गया संस्कृत. का और हिंदी के नाम हो गए कोई स्वामी. नारायण भारती है कोई कृष्ण कबीर है तो. हिंदी के नाम हो गए तो वहां के धर्म गुरु. घबरा गए कि हद हो गई कौन आदमी है जो गरीब. देश से आया और यहां के गोरे लोगों को. सिर्फ गोरे लोग नहीं प्रतिभाशाली. धनी संपन्न लोगों को यह हिंदू बना रहा है।. आज तक केवल ईसाइयों ने गरीब देशों में. जाकर गरीबों को कन्वर्ट किया है.
क्रिश्चियनिटी में लोभ और प्रलोभन देके कि. हम स्कूल खोल देंगे, अस्पताल खोल देंगे, इलाज करा देंगे, नौकरी लगवा देंगे। ये कुछ. देके प्रलोभन देके। यह कौन आदमी है जो कोई. प्रलोभन नहीं दे रहा ना ही भयभीत कर रहा. किसी को जो केवल कुछ अद्भुत बातें कहता है. और भीड़ चली आ रही भीड़ चली आ रही है वो. 64000 एकड़ जमीन खरीदना अपने आप में एक. बड़ी चीज थी अमेरिका की जो राजधानी है. वाशिंगटन उससे डेढ़ गुनी जमीन है.
रजनीशपुरम की डेढ़ गुनी राजधानी से. अमेरिका की कैपिटल से 64000 एकड़ जमीन. अब आप सोच लीजिए कितने ओशो के शिष्य हैं।. कितना उन्होंने डोनेशन दिया होगा। कितना. श्रम किया होगा। उस रेगिस्तानी इलाके में. शहर बसा दिया। तीन साल में फ्रॉम एबीसी. शुरू करके सड़कें बनाई। टेलीफोन तार. बिछाए, बिजली के तार बिछाए, हवाई जहाजें, हवाई ड्रम बनाया। इतना यातायात का इंतजाम. किया। घर बनाए रहने के लिए। किचन, इतना.
बड़ा डाइनिंग हॉल कि 10,000 पीपल कैन टेक. डिनर एट ए टाइम। इतने लोग वहां आते थे. उत्सव मनाने के लिए गुरु पूर्णिमा पर. 20,000 लोग वहां आते थे। अब 20,000 लोगों. के रहने का इंतजाम और सब कुछ एयर कंडीशन. करना होगा। वहां भयंकर गर्मी थी, भयंकर. ठंड भी थी और भयंकर बरसात थी। तीनों मौसम. वहां के खराब थे। उन विपरीत परिस्थितियों. में. एक फ्लोरिशिंग सिटी उभर के आई। सबको.
ईर्ष्या पैदा हो गई। अपन सोचते हैं ना कि. अमीर आदमियों को ईर्ष्या नहीं होगी। लेकिन. उस यहां सुपर रिचनेस सुपर से भी सुपर. रिचनेस आ गई। ईर्ष्या पैदा हो गई। अमेरिका. के अमीर लोगों को भी धर्मुरु और. पॉलिटिशियन तो बेचारे. उनके तो प्राण ही निकल गए क्योंकि इस आदमी. के एक बात का जवाब नहीं दे सकते वो। ऐसे. आर्गुमेंट्स हैं उसके पास कि वो ही सही. साबित होता है हमेशा। उनके सारे धर्म की. जड़े उखाड़ कर रख दी ईसाई धर्म के। उस. ईसाई धर्म को धर्मी नहीं मानते वो।.
ईश्वर की बात को बचकानी मनगढ़ंत कहानी. कहते हैं। कल्पना कहते हैं। इस बचकानेपन. से जागो। ऐसा कोई ईश्वर कहीं नहीं है।. एकमात्र इकलौते सन खूब मजाक उड़ाई ओशो ने।. उसके बाद क्या हुआ परिवार नियोजन कर ईश्वर. ने इकलौते बेटा. खूब और जो कि मजाक उड़ाने की जो टेंडेंसी. है तो आर्गुममेंट भी देते हैं फिलोसोफिकल. पूरे इंटेलेक्चुअल ढंग से और फिर उसके. व्यंग और मजाक और कटाक्ष भी करते हैं. चुभना चाहते हैं बिल्कुल. नेचुरली सब लोग भड़क गए है ना जो.
इंटेलेक्चुअल वर्क था वो ओशो से प्रभावित. वो ओशो का शिष्य हो रहा है लेकिन जो. सत्ताधिकारी हैं सत्ता दो प्रकार की है. बल्कि तीन प्रकार की समझ लीजिए एक सत्ता. है धर्म गुरुओं की उनकी बड़ी पकड़ है जनता. पे दूसरी है राजनेताओं की और तीसरी है. धनपतियों की है ना इन तीनों की सत्ता. डगमगा गई और इसलिए उन्होंने ओशो को वहां. से उखाड़ फेंका. अभी वो शहर. ये उनकी हार है ओशो को वहां से निष्कासित. करना उनकी मेंटल डिफीट वो मानसिक रूप से.
तार्किक रूप से बौद्धिक रूप से फिलोसफिकल. रूप से सब प्रकार से हार गए और तब. प्रतिशोध की भावना पैदा होती है. जमीन तो वो आप लोगों ने खरीदी थी। अभी वह. आप लोग के उस पे है या सरकार ले लिया. वो क्रिश्चियंस के हाथ में पहुंच गई सब. जो पैसे सब खत्म. कभी बाप लोग बाद में गए देखने वो शहर. नहीं कौन जाएगा देखना हम ओशो के संग आ गए. ओशो के संग आ गए अपने क्या लेना देना जमीन. से और शहर से और. स्लो पोइजन वाली कहानी भी वहीं से शुरू.
हुई थी. ये कहानी के पीछे दो-तीन चीजें बतानी. होंगी है ना. नहीं तो ओशो जी को ओशो जी की जो डेथ थी वो. नेचुरल डेथ थी या जो मार्केट में खबर. फैलती है कि स्लो पोइजन दिया गया था। मैं. आपको दो तीन बातें बताऊंगा फिर कंक्लूजन. दूंगा।. दो प्रकार की खबरें फैली हैं। एक है कि. अमेरिका ने पोइजन दिया था। उसकी वजह से. उनकी मृत्यु हुई और दूसरी खबर फैलाते हैं. लोग। उनके शिष्यों ने ही उनको मार डाला।. ठीक है? अब मैं आपको बताता हूं पूरी. कहानी। ओशो को बिना वारंट के गिरफ्तार कर.
लिया गया। याद रखिए बिना वारंट के. गवर्नमेंट टूक एन इललीगल एक्शन अपने ही. संविधान के खिलाफ। पुलिस वालों ने इंकार. कर दिया। पुलिस वाले कहेंगे पहले. मजिस्ट्रेट वारंट दे ना तब किसी को. गिरफ्तार करें। कैसे गिरफ्तार कर लें? तब. उन्होंने मिलिट्री को बुलाया।. सरकार अपने ही संविधान के खिलाफ जा रही. है। एक निहत्ते आदमी को पकड़ने के लिए. मिलिट्री वाले आए बंदों के लिए। है ना?
ओशो को गिरफ्तार करके उन्होंने 12 दिन. अलग-अलग जेलों में रखा। रोज जेल चेंज हो. जाए। अगले दिन फिर कहीं और फिर कहीं और. आरगान की राजधानी है पोर्टलैंड। तो. एक्चुअली तो वहां कोर्ट में सुनवाई तो. वहां होगी। मगर सरकार को पता है अगर कोर्ट. में जाएंगे तो वहां से तो छोड़ दिए. जाएंगे। कोई अपराध तो उनका है नहीं।. तो खूब डिले किया उसमें और इस बीच में ऐसा. अनुमान है। देखिए कोई प्रमाण इसका नहीं. है। अनुमान कह रहा हूं मैं। अनुमान है कि.
उनको एक पोइजन होता है जो बाद में डिटेक्ट. नहीं होता. वह दिया गया और. रेडिएशन पोइजनिंग दी गई। रेडिएशन को आप. डिटेक्ट नहीं कर सकते। तो हमेशा दाहिने. करवट सोते थे। है ना? तो तकिए में कुछ. रेडियोएक्टिव मटेरियल रखा। जिससे रात भर. रेडिएशन होता रहेगा। तो उसका कोई बाद में. प्रमाण कोई केमिकल तो है नहीं कि आप ब्लड. टेस्ट में पता लगा लो। रेडिएशन हाया चला. गया लेकिन उसके इफेक्ट छूट जाएंगे। तो 12. दिनों में रेडिएशन पोइजनिंग उनको दी गई।.
ऐसा अनुमान है क्योंकि इसको सिद्ध नहीं कर. सकते ना ही कोई असिद्ध कर सकता।. लेकिन बाद में जो प्रमाण मिले उनको इस. प्रकार की तकलीफें दाहिने तरफ शुरू हुई।. कंधे में शुरू हुआ, गर्दन में शुरू हुआ, दाहिने तरफ का जबड़ा, दांत, कान में दर्द. सब एक ही तरफ जो जो तकिए से एक्सपोज जितना. एरिया होता है। तो उससे एक्सपर्ट ने जो. पोइजन एक्सपर्ट्स हैं उन्होंने अनुमान. लगाया कि अमेरिका में यह प्रचलन है। ऐसा. वो करते हैं। इट इज वेल नोन फैक्ट कि. जेलों में ऐसा किया जाता है.
और नॉन डिटेक्टेबल पोइजंस आते हैं जो. इमीडिएट जान नहीं लेंगे। धीरे-धीरे भीतर. आर्गेंट को डैमेज कर देंगे। बाद में उनके. असर आएंगे क्योंकि सरकार ने खुद उनके जो. अटर्नी जनरल होता है अमेरिका का उसने. पब्लिक में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि. हम ओशो को मारना नहीं चाहते थे। नहीं तो. वो शहीद हो जाते और विश्व पर उनका बहुत. ज्यादा प्रभाव पड़ता जैसा ईसा मसीह का. पड़ा था। हम वो गलती नहीं करेंगे ईसा मसीह. को दोबारा वसूली देने की।.
लॉन्ग लास्टिंग इफेक्ट हो जाएगा उनका।. मारे इसलिए मारा नहीं है। ये अटर्नी जनरल. ऑफ अमेरिका ने कहा है प्रेस कॉन्फ्रेंस. में। लेकिन उन्होंने यह वाली चीज की है. स्लो पोइजन वाली चीज जो बाद में असर. दिखाएगी तुरंत कोई असर नहीं होगा। तो. महीने दो महीने बाद कुछ परिणाम आएंगे तब. तक वह केमिकल बॉडी से निकल चुका। किसी. यूरिन टेस्ट में ब्लड टेस्ट में कहीं नहीं. मिलेगा। यह भी वेल नोन प्रैक्टिस अमेरिकन. जेल में की जाती है। यह हो गई दो बातें।.
अब मैं दूसरी बात पे आता हूं। ओशो ने 1. जनवरी 1988 को प्रवचन में जब बताया कि. बुद्ध की आत्मा मेरे भीतर आई। उसके पहले. उन्होंने बताया कि पिछले सात हफ्तों में. मेरे भीतर जो पोइजन के इल इफेक्ट्स थे वो. सब खत्म हो गए हैं। अचानक मेरे शरीर के. सारे दर्द समाप्त हो गए। है ना? माय बॉडी. हैज़ बिकम प्यूरिफाइड जैसी पहले थी। और. इसके बाद ही बुद्ध की आत्मा ने प्रवेश. किया। यह वाली बात स्वयं ओशो ने प्रवचन. में कही है। इसका मतलब है तीन साल.
उन्होंने कष्ट झेला है। तो उसकी वजह से. मृत्यु नहीं हुई। कष्ट जरूर झेले हैं। तीन. साल काफी कष्ट उनको रहे शरीर में लेकिन उस. दिन के बाद से वो वाली चीज नहीं थी। बॉडी. उनकी प्यूरिफाइड हो चुकी थी। वो सिक. इफेक्ट उसके जा चुके थे। तो अब मृत्यु का. सवाल है। मृत्यु उस पोइजन से नहीं हुई।. ठीक है? दूसरी चीज अब आपको ध्यान में लाना. चाहूंगा।. मैंने मेरी पत्नी ने और हम जहां उस समय.
रहते थे मध्य प्रदेश में मैं बिरला जी के. हॉस्पिटल में नौकरी करता था। वहां एक. हमारे मित्र का एक बेटा था बांके बिहारी. उसका नाम है। बाद में वह भी सन्यासी हो. गया। उसका नाम है स्वामी प्रेम अन्वेशी।. अभी वह दिल्ली में ही रहता है। उसने एक. सपना देखा कि ओशो की मृत्यु हो गई है। उस. सपने में उसने देख रहा है और ओशो की डेड. बॉडी को वहां बुद्धा हाल में लाकर रखा गया. ऑडिटोरियम में और सारे सन्यासी सफेद रंग. के कपड़े पहने उत्सव मना रहे हैं।. सेलिब्रेट कर रहे हैं और ओशो के शरीर से.
प्रकाश निकल रहा है खूब। यह दृश्य उसने. देखा। श्मशान घाट पर ओशो की चिता को दाह. संस्कार किया जा रहा है। वह दृश्य उसने. देखा। वो अस्पताल आया। यह बात है करीब. अप्रैल या मई 89 की है ना। अस्पताल आया. जहां मैं काम करता था। उसने मुझसे कहा कि. डॉक्टर साहब कुछ सीरियस बात आपसे करना है।. लेकिन यहां हॉस्पिटल में नहीं करेंगे। जब. आप लंच के लिए घर जाएंगे तब करेंगे। दीदी. के आगे। मेरी पत्नी को दीदी कहता था।.
मैंने कहा ठीक घर आए उसने पहले कहा आप लोग. खाना खा लीजिए फिर बताऊंगा है ना खाना खा. लिया फिर उसने कहा कि खूब आंखों में उसके. आंसू आ गए कैसे कहूं मैं लेकिन जो देखा है. वो ऐसा ऐसा दृश्य है तो हमारे अंदर से. स्वाभाविक संदेह आया कि भाई सफेद कपड़े. सन्यासी क्यों पहनेंगे आपको बता दूं ओशो. जब अमेरिका से आए उसके बाद उन्होंने माला. पहनने के लिए और गेरू रंग के कपड़े पहनने.
के लिए मना कर दिया था। कोई स्पेशल ड्रेस. नहीं। नॉर्मल सिविल ड्रेस जैसे सब लोग. पहनते हैं वैसे पहनो। तो पिछले तीन चार. सालों से कोई विशेष ड्रेस नहीं थी। है ना? सन्यासी का कोई अलग से कुछ भी पहचान नहीं. थी। उसकी माला भी नहीं थी।. तो हमने कहा कि सफेद कपड़े क्यों पहनेंगे? सफेद कपड़े का कोई सवाल ही नहीं उठता. सन्यासी का। तो तुमने जो देखा है यह सही. नहीं हो सकता। हम. उसने कहा भाई सही है कि नहीं? मैं नहीं कह. सकता लेकिन ऐसा देखा है मैंने। फिर मेरी.
पत्नी को भी स्वप्न आना शुरू हुआ कि ओशो. विदा हो रहे हैं। है ना? सिंबालिक रूप से. कि ओशो की कार निकल गई। हम दोनों. भागे-भागे पहुंचे और तब तक पता चला कि वो. तो चले गए। फिर हम लोगों ने तय किया कि हम. अब पुणे जाकर रहेंगे।. वो शो के आखिरी काल आ गया है। तो हम दोनों. वहां नौकरी करते थे। वो म्यूजिक टीचर थी।. मैं डॉक्टर था। हम लोग रिजाइन देकर वहां. से चले गए। है ना? तो वहां जाकर. हमने देखा कि ओशो की जो किताबें छप रही.
हैं उनमें शीर्षक के साथ एक उप शीशीर्षक. सबटाइटल भी ओशो ने जोड़ दिया है। तो. अप्रैल 89 से लेके जनवरी 90 तक इन 10. महीनों में करीब 10 किताबें छपी। संयोग से. मेरा काम भी वहां पर पब्लिकेशन. डिपार्टमेंट मिला। मेरी पत्नी को भी वही. काम मिला हिंदी पब्लिकेशन में। तो वो. सबटाइटल हमको दिखाई देती थी जिसमें ओशो कह. रहा है कि मैं जा रहा हूं क्लियर एक दो. उदाहरण दूं आपको है ना समझो एक किताब का.
शीर्षक उन्होंने रखा. सुन सको तो सुनो थोड़ी देर और पुकारूंगा. फिर मैं चला जाऊंगा. 100% क्लियर अच्छा और किसी को नहीं समझ. में आ रहा हम दोनों को समझ में आ रहा है. कि वो सब क्या कह रहे हैं किताब का टाइटल. उन्होंने रखा है किताब का मेन टाइटल है पथ. के प्रदीप नीचे सबटाइटल उन्होंने दी जला. तो दिए हैं जलाए रखना. पथ के प्रदीप जला तो दिए हैं जलाए रखना.
क्लियर है कि वो जा रहे हैं एक किताब का. शीर्षक है क्रांति बीज. उसका उप शीर्षक है क्रांति बीज वो तो दिए. हैं देखना तुम कि बीज बीज ही ना रह जाए. सो क्लियर हम दोनों के लिए क्लियर लेकिन. हम किसी से बात कह नहीं सकते. हमारी विडंबना समझ रहे हैं आप? हमको पता. है. 9 महीने पहले से कि वो जाने वाले हैं और. वो सारे इंडिकेशन दे रहे हैं। एक किताब का.
शीर्षक है चल हंसा उस देश। हंस का मतलब. आत्मा चल हंसा उस देश। नीचे सबटाइटल है।. देर हुई बहुत अलडी इट इज टू लेट। चलो अपनी. आत्मा से कह रहे हैं चल हंसा उस देश। इस. प्रकार 10 किताबों के शीर्षक हैं जिनमें. बिल्कुल क्लियर क्लियर संदेश है कि मैं जा. रहा हूं।. एक किताब है एक ओंकार सतनाम उसका सबटाइटल. उन्होंने दिया। एक गीत और गा लूं तो चलूं।.
लास्ट सॉन्ग ये आखिरी किताब थी उनकी उस. समय की। एक गीत और गा लूं तो चलूं।. एक किताब का शीर्षक था इधर से गुजरा था।. सोचा सलाम करता चलूं। किसी शायर का एक वचन. था। है ना? सलाम करके वो जा रहे हैं।. उन्होंने अपनी तरफ से बिल्कुल क्लियर कर. दिया। लेकिन हम दोनों को यह बात समझ में. आती थी क्योंकि हमको वो विज़न पहले आ चुका. था। अब सबसे बड़ी मुसीबत उस दिन खड़ी हुई.
करीब अगस्त 89. एक दिन संदेश आया।. उनके सेक्रेटरी ने आकर घोषणा की मायोग. नीलम ने कि ओशो ने कहा है कि कल से सब लोग. शाम के समय सफेद कपड़े पहन के आएंगे।. अब हमारा दिल बैठ गया उस दिन।. ये तो कंफर्म हो गया। इतने महीने पहले जो. प्रेम अन्वेशी ने देखा था। है ना? हमारे.
पास एक ही सहारा था अपने मन को समझाने का. कि नहीं सफेद कपड़े क्यों आएंगे? उसने तो. मना कर दिया। कोई ड्रेस नहीं। सब सिंपल. कपड़े पहने जो पहनना हो रंग बिरंगे जब उस. दिन यह संदेश आया तब हमारा फिर रोना फूट. गया है ना अब कंफर्म हो गया कि ओशो जाने. वाले हैं. 19 जनवरी 1990 को ओशो ने देह त्यागी है ना. उसके पहले ही मैं पूरा आर्टिकल तैयार कर. चुका था सिर्फ उसमें डेट भर नहीं थी. जिसमें पूरी कहानी कैसे हुआ स्वप्न आया.
विजन आया फिर ये घटनाएं घटी अब आप पूछोगे. विज़न का कोई सॉलिड प्रूफ तो नहीं होता यह. एक्सपीरियंस तो होता है। बाहर हम प्रमाणित. नहीं कर सकते। लेकिन हम किसी को मानने की. थोड़ी करें कि आप मानो। लेकिन मुझे जो हुआ. वह मैं कैसे ना बताऊं। है ना? मानने नहीं. मानने का सवाल नहीं है।. मैं पूरा आर्टिकल तैयार कर चुका था और 20. जनवरी को वह आर्टिकल पब्लिश भी मैंने करवा. दिया कि ओशो का. महाप्रयाण. एक सुनिश्चित पूर्व नियोजित महायात्रा है।.
और फिर ओशो के कोटेशन भी उसमें मैंने दिए. हैं। कब ओशो ने क्या कहा है शरीर छोड़ने. के बारे में? सन 1969 में. उनका प्रवचन माला है। मैं मृत्यु सिखाता. हूं। उस शिविर में उन्होंने बताया था कि. जब मैं जागर यूनिवर्सिटी में पढ़ता था।. पेड़ के ऊपर बैठकर ध्यान करता था। एक रात. अचानक शरीर नीचे गिर गया और मेरी आत्मा. ऊपर ही रह गई। अब बड़ा विचित्र हो गया।.
मैं खुद ही देख रहा हूं ऊपर से कि नीचे. शरीर पड़ा है। जैसे आईने में देखते हैं. ऐसा दिखाई दे रहा। और एक मिस्टीरियस. एक्सपीरियंस मैं तो हूं यहां ढाल पर ऊपर. अब क्या होगा कुछ कहा नहीं जा सकता कुछ. घंटे बीते सुबह जब हुई गांव से दो महिलाएं. दूध ले आती थी हॉस्टल में देने के लिए. बच्चों को उन्होंने देखा कोई लड़का पड़ा. है गिर गया मर गया बेहोश है क्या हो गया. वो पास आई देखने के लिए और जैसे ही उस. महिला ने माथे पर हाथ रखा एकदम से वो.
चेतना वापस आ गई. एकदम आंख खोली उन्होंने उठकर बैठ गए फिर. उसने कहा यह अनुभव मुझे बारंबार हुआ देह. का शरीर आत्मा से अलग हो जाने का और छ. महीने के अंदर ऐसा लगा कि जैसे मेरी उम्र. 10 साल बढ़ गई 28 साल का हूं तो मुझे लगने. लगा मैं 38 40 साल का हो गया मेरे बहुत. बाल झड़ गए बहुत बाल सफेद हो गए सडन छ. महीने में इतना ड्रास्टिक चेंज कि काफी. उम्र बढ़ गई हो तब ने कहा उसमें घोषणा की.
कि अगर मैं 70 साल जीता तब मैं 60 साल ही. जी पाऊंगा लगभग लगभग वर्ड कहा उन्होंने. लगभग 10 साल मेरी उम्र घट गई है क्योंकि. आत्मा उस प्रकार से दोबारा समायोजित नहीं. हो पाती शरीर में जैसी पहले थी जैसे हम. किसी वृक्ष की जड़े उखाड़ ले एक बार और. फिर उसको लगाएं अब वो वैसी जड़े नहीं. बैठेंग जमीन में जैसी पहले जमीन थी और. बार-बार अगर हम उखाड़े लगाएं उखाड़े लगाएं. अब ये पेड़ की आयु घट जाएगी ओशो ने इस. उदाहरण से समझाया ऐसे मेरी आयु घट गई है.
तो ये नेचुरल डेथ थी एक दो प्रमाण और दे. दूं फिर उस बात पे आता हूं, है ना? पतंजलि. योग सूत्र पर जब वह प्रवचनमाला दे रहे थे, बहुत लंबी प्रवचन माला 100 प्रवचन दिए. करीब-करी करीब पौने दो घंटे पौने दो घंटे. के है ना। उसमें ओशो ने पतंजलि का सूत्र. समझाते हुए बताया कि एक जागृत पुरुष को जो. अत्यंत संवेदनशील है, उसे अपनी मृत्यु के. ठीक उतने दिन पहले पता चल जाता है, जितने. दिन वह मां के गर्भ में रहा।. नॉर्मल गेस्टेशन पीरियड 280 दिन होता है।.
प्लस माइनस सेवन है ना? ओशो के केस में 284 दिन था 284 है ना अब. आप कैलकुलेट कर लीजिए 10 अप्रैल को जब ओशो. प्रवचन देकर जा रहे थे अपनी कार में बैठने. लगे अचानक उनको लगा कि जैसे कोई चीज. उन्हें छोड़कर जा रही है नाभि से कोई. शक्ति निकली और जो महिला उनको ड्राइव कर. रही थी वो ने उससे कहा कि अब मैं प्रवचन. नहीं दे पाऊंगा बोल नहीं पाऊंगा कभी आज जो.
प्रवचन हुआ यह लास्ट है उसने पूछा क्या. हुआ क्योंकि उसको भी कुछ लगा कि समथिंग. हैज़ हैपेंड। उस महिला को कुछ क्लिक किया. कि ओशो जैसे अचानक. हिल गए हो या बैलेंस बिगड़ रहा हो। ओशो ने. बताया कि जैसे शरीर जब बनता है मां के. गर्भ में नाभि के द्वारा ही ऊर्जा आती है. बनने में लगभग सा 9 महीने लगते हैं। ठीक. ऐसे ही विसर्जन भी धीरे-धीरे होता है. ऊर्जा का। लगभग 9 महीने में जितने दिन मां.
के गर्भ में रहे थे उतने ही दिन में धीरे. धीरे-धीरे ऊर्जा विसर्जित हो जाएगी और तब. देह छूट जाएगा।. इसी जैसे वो आखिरी के समय मौन थे।. हां 10 अप्रैल को उन्होंने बोलना बंद कर. दिया। वो आखिरी दिन था। देह छोड़ी 19. जनवरी को 284 दिन बाद। ठीक है? तो ये वाली. बात एक नेचुरल डेथ में हो सकती है। अचानक. आपको गोली आके मार दे तो इसको आपको पहले. से नहीं पता चल सकता। है ना? लेकिन जब वो. नेचर में होगी, प्रकृति प्रदत्त होगी तब. एक संवेदनशील व्यक्ति इस बात को जान लेगा.
कि अब समय विदा होने का आ गया।. और वो 10 किताबों के शीर्षक बताते हैं।. कि विदा होने का समय आ गया। और जो विज़न. मेरे मित्र के बेटे ने प्रेमवेशी ने देखा. तो उस समय तो स्टूडेंट था। वो बहुत छोटी. उम्र थी उसकी। है ना? बाद में पता चला कि. इस प्रकार के विजन कई शिष्यों ने देखे। तो. ओशो ने कई प्रकार से सूचना दी।. अपनी किताबों के टाइटल के द्वारा भी दी और. लोगों को स्वप्न में भी प्रकट होकर. उन्होंने जाहिर किया कि जाने वाला हूं और.
इस समय बहुत लोग वहां आ गए।. बहुत लोग आ गए। पूरी दुनिया से खींचे चले. आए। कहीं ना कहीं से इंडिकेशन मिल गया कि. वो सो जाने वाले हैं। अगर सडन डेथ होती तो. ऐसा नहीं हो सकता। तो यह वाली बात भी गलत. है कि पोइजन से डेथ हुई थी। यह पोइजन से. नहीं थी। क्योंकि 88 1 जनवरी को ही ओशो कह. चुके थे कि मैं पोइजन से मुक्त हो चुका. हूं।. ठीक है? और ये वाली बात 284 दिन लगे शरीर.
छूटने में। ये धीरे-धीरे ग्रेजुअल प्रोसेस. है जो नेचर में होती है।. तो इस बात की बात ओसोई पहले ही बता चुके. थे ये वाली बातें। है ना? तो मेरा वह. आर्टिकल पूरी तरह तैयार था। सिर्फ उसमें. यही नहीं था। तारीख को उसे छोड़ेंगे शरीर।. लगभग अनुमान था कि 284 दिन बाद वो घटना. घटेगी 19 जनवरी को। आप देखेंगे 20 जनवरी. को हमने सब अखबारों में प्रकाशित करवा. दिया। प्रेस रिलीज उसकी दे दी। मैगजीन में. छप गया। आज भी वह आर्टिकल आप देखेंगे अगर.
एक वेबसाइट है www.s. विकी उस पर आज भी वह प्रिजर्व है जो उस. दिन मैंने लिखा था आर्टिकल. तो बिल्कुल स्पष्ट है कि ओशो की मृत्यु एक. सहज प्राकृतिक मृत्यु है। और ओशो जैसे. व्यक्ति के लिए मृत्यु वह मायने नहीं रखती. जो हमारे लिए रखती है। उनके लिए तो अजर. अमर आत्मा है। मृत्यु तो होती नहीं।. जन्मों जन्मों का खेल है। हमारे लिए गंभीर. मामला हो जाता है। है ना? उस दिन मेरे लिए. भी गंभीर मामला था। लेकिन आज नहीं है। है.
ना? आज मैं भी इस बात को जानता हूं कि कोई. मरता ही नहीं है।. उसने अपनी समाधि पे वही लिखवाया। नेवर. बोर्न नेवर डाइड ओनली विजिटेड दिस प्लेनेट. अर्थ बिटवीन दिस एंड दिस डेट। एक घुमक्कड़. हैं। एक पर्यटक हैं। घूमने के लिए आए थे. यात्रा करने। मजा मौज लिए चले गए। गंभीर. कोई बात ही नहीं है। तो जो लोग अफवाह. उड़ाते हैं ना एक तो उसको सीरियस इशू. बनाते हैं। बिल्कुल ही गलत बात है। ओशो. जैसे व्यक्ति के साथ मृत्यु कोई सीरियस. इशू है ही नहीं। उनके लिए तो खेल है। एक.
पर्यटक की भांति वो पृथ्वी ग्रह पर घूमने. आए थे। ऐसा तो सैकड़ों बार आ चुके हैं। हो. सकता है फिर आए। है ना? ओशो की विरासत को. लेकर कोई विवाद रहा क्योंकि उनके अनुयाय. में भी. मैं किसी विवाद में नहीं पड़ता है ना मुझे. चौथाई सदी बीत चुकी है मैं पुणे गया नहीं. हूं आश्रम में कभी मुझे कुछ लेना देना. नहीं आप पूछ रहे थे रजनीशपुरम की बात. रजनीशपुरम का मैं तो कभी पुणे भी नहीं. जाता आप पूछ रहे थे ना मंदिर मस्जिद जाने. से मंदिर मस्जिद जाने से कुछ नहीं होता तो.
वहां जाने से भी क्या होने वाला है जो. होना है अपने भीतर जाने से होना है तो ओशो. की शिक्षा का हमने सार ग्रहण किया अपने. भीतर ध्यान में डूबना है समाधिस्थ होना है. अपनी ऊर्जा को आज्ञा चक्र और सहस्तार चक्र. पे लाना है। यह मुख्य बात है। तो हम इस. झंझट में पड़ते नहीं। उनकी विरासत और. लिगेसी का कोई सवाल ही नहीं। हमें कोई. लेना देना नहीं है। पुणे वाला आश्रम किसके. पास है? उनकी वो जान उन्हीं से पूछिए मुझे. क्या पता। मैंने आपको बताया चौथाई सदी बीत. गई। मैं वहां नहीं गया हूं। मुझे वहां के. बारे में कुछ नहीं पता और ना ही कोई. इंटरेस्ट मुझे जानने का। दूसरी बात आपको.
यह भी बताऊं। पिछले 40 साल से मैंने अखबार. नहीं पढ़ा है और पिछले 25 साल से मैंने. टेलीविज़न नहीं देखा है। मुझे दुनिया के. बारे में कुछ नहीं पता।. ठीक है। है ना? एंड में सर एक दो सवाल और. है। ओशो की सबसे गलत समझे जाने वाली बात. कौन सी है? समझदार के लिए उनकी हर बात सही है और जो. नासमझ हैं उनके लिए हर बात गलत है।. नहीं नहीं मतलब सबसे जो गलत समझी गई।. मिसकंसेप्शन ओशो को लेकर सबसे बड़ा कौन सा. है दुनिया में? सबसे बड़ा तो अभी आपने जो चर्चा की थी.
सेक्स के बारे में। ओशो को सेक्स गुरु का. लेवल लगाया गया। आप ओशो को अच्छे से. पढ़ेंगे और साधना करेंगे तो आप पाएंगे. आपको ब्रह्मचर्य फलित हो जाएगा। हम. है ना? वो ब्रह्मचर्य के पक्षधर हैं। वो. प्रेम के पक्षधर हैं। वो परमात्मा के. पक्षधर हैं। और ये घटना तभी घटेगी जब आप. काम वासना से ऊपर उठेंगे। ये कमल का बीज. अगर कीचड़ में पड़ा रहेगा तो फूल नहीं. खिलेगा। इससे तो कीचड़ से ऊपर उठना होगा।. हां। कीचड़ को इंकार नहीं करते हैं। यहां. से मिसकंसेप्शन शुरू होता है।.
क्या ओशो आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक. हो गए हैं? यस। 100% यस और जैसे-जैसे लोग ज्यादा. शिक्षित होंगे, बुद्धिमान होंगे, ज्यादा. वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले होंगे वो पाएंगे. पुराने धर्मों के शिकंजे से वो बाहर हो. रहे हैं। अंधविश्वास और रूढ़ियों से बाहर. निकल रहे हैं। स्वतंत्र हो रहे हैं और ओशो. प्रतिदिन और और ज्यादा प्रासंगिक होते चले. जाएंगे। आगे एक दिन ऐसा आएगा कि आधुनिक. विज्ञान और ओशो जिसको स्पिरिचुअलिटी कह. रहे हैं इनका भी एक कॉम्बिनेशन हो जाएगा।. इनमें आपस में कोई विरोध नहीं है। याद.
रखिए विज्ञान का विरोध ईसाई धर्म से था, यहूदी धर्म से था।. ओशो जो कह रहे हैं उससे बिल्कुल मैचिंग. है। सब कुछ मैचिंग है। और आने वाले दिन. में हो सकता है अपन स्पिरिचुअलिटी वर्ड को. ही हटा दें। जैसे अभी विज्ञान के कई रूप. हैं। एक फिजिक्स है, केमिस्ट्री है, जियोलॉजी है, भांतिभांति की क्वांटम. फिजिक्स है, मैथमेटिक्स है। ठीक ऐसे ही. जैसे मनोविज्ञान आ गया। एक नई चीज आई. मनोविज्ञान सवा साल पहले नहीं था। मन को. अपन अस्वीकार करते थे वैज्ञानिक फिर. मनोविज्ञान खड़ा हो गया। वेरी वेल.
एस्टैब्लिश्ड। ठीक ऐसे ही ओशो की बात को. अगर हम मान के चलेंगे जान के चलेंगे अनुभव. करेंगे तो हम पाएंगे साइंस ऑफ सोल साइंस. ऑफ द कॉन्शसनेस ये डेवलप हो जाएगा धर्म. नाम से ही छुटकारा हो जाए अब आखरी सवाल सर. ओशो को आने वाली पीढ़ियां जो है वो कैसे. याद रखेंगी एक गुरु के तौर पर एक लेखक के. तौर पर एक विद्रोही के तौर पर कैसे ओशो को. हम याद रखें कौन थे. देखिए उनप कोई लेवल नहीं लगता कई लोग उनको.
फिलॉसफर कहते हैं मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं. लगता। है ना? वो फिलॉसफर नहीं है। ना ही. वो कोई लेखक हैं। है ना? उन्होंने अपने. भीतर जो जाना उसको शेयर किया। है ना? बिना. किसी बाउंड्री के, बिना किसी लिमिट के है. ना? उनको हम कह सकते हैं एक इंसान जिसने. अपने भीतर भगवान को जाना और सबके भीतर. भगवान को होने को पहचाना।. एक साधारण इंसान मैं जोड़ना चाहता हूं।. साधारण इंसान जैसे हम आप सब हैं वैसे ही. और अपने भीतर उस असाधारण तत्व को जाना.
जिसे जानकर परम शांति और परमानंद मिलता. है। आप चाहे तो उसको भगवान कह लें मर्जी. आपकी। चाहे तो ना कहें। पुराने धर्मों के. भगवान से उसका कोई लेना देना नहीं है। ना. वो गुरु हैं किसी के। ना उन्होंने कोई. किसी को अपने अनुयायी बनाया है। ना वो. लेखक हैं ना वो तीर्थंकर हैं ना वो पैगंबर. हैं। वो किसी का पैगाम नहीं लाए। वो किसी. के पोस्टमैन नहीं है ना वो तीर्थंकर है ना. वो कोई अवतार हैं किसी के कुछ भी नहीं. पुराने हम जो भी लेवल लगाते हैं उसमें. किसी कोटि में वो फिट नहीं होते ही इज.
ए यूनिक पर्सन उनको हम कैटेगराइज कर ही. नहीं सकते वो अपने आप में एक अद्वती. खिलावट है उनको उसी रूप में स्मरण किया. जाए. एक घुमक्कड़ जो धरती पर आया घुमा टहला. हां मजा लिया. मजा लिया. सबको मजा लेना सिखाया और विदा हो. मैं भी आपने तो आखिरी सवाल पूछ लिया। मैं. भी आखिरी में कुछ बातें दर्शकों से कहना. चाहता हूं।. ओशो फ्रेगरेंस संस्था है सोनीपत में जिसका.
आश्रम है। एक छोटा सा गांव है। वहां. दीपालपुर हरेभरे खेतों के बीच में छोटा सा. आश्रम जिसका नाम है श्री रजनीश ध्यान. मंदिर।. यहां पर हर महीने एक-ए हफ्ते के दो शिविर. होते हैं। ओशो की देशनाओं पर आधारित और दो. हफ्ते हम बाहर घूमते हैं। दूसरी दूसरी जगह. जाते हैं। हम भी घुमक्कड़ प्रवृत्ति के. देश में विदेश में सब जगह ओशो की बात को. प्रचारित करते हैं। इसके अलावा. ऑनलाइन प्रोग्राम झूम मीटिंग पे चलता है।.
ऑलवेज करीब-करीब 1000 लोग इसको प्रतिमाह. अटेंड करते हैं। तो आपको हमारे पास भी आने. का कष्ट उठाने की जरूरत नहीं है। आप अपने. घर बैठे ज़ूम मीटिंग से अटेंड कर सकते हैं।. इसका हमने कोई शुल्क भी नहीं रखा है।. स्वेच्छ अनुसार वालंटरी कंट्रीब्यूशन कोई. जो देना चाहे उसका स्वागत है। कोई उसके. फिक्स फीस नहीं है।. अगली बात मैं कहना चाहूंगा कि ओशो का सारा. साहित्य. बड़ा नंबर है। साहित्य सागर है वो। 650.
मूल किताबें हिंदी और अंग्रेजी की। लगभग. 6000 ऑडियो प्रवचन। कई हजार वीडियो. प्रवचन। उनके करीब करीब 10,000 से अधिक. खूबसूरत फोटोग्राफ. उनके सिग्नेचर्स अपने आप में एक कोटि है. उनके सिग्नेचर पीस ऑफ आर्ट है वो म्यूजिक. भजन कीर्तन मेडिटेशन की म्यूजिक ये सब कुछ. फ्री ऑफ चार्ज लिंक पर उपलब्ध है। आज के. डिजिटल युग में सब चीजें डिजिटलाइज हो गई.
हैं। किसी चीज को खरीदने की कोई आवश्यकता. नहीं है। आप मुझे WhatsApp पर मैसेज. भेजिए। हां, मैं फोन नहीं सुनता हूं। फोन. नहीं करिएगा। मैं फोन कभी नहीं उठाता। आप. मुझे मैसेज कीजिए। आपको क्या चाहिए? 24. घंटे के अंदर-अंदर मैं 24 मिनट के लिए. अपना मोबाइल ऑन करता हूं और जिसका जो. मैसेज आया उसको वो रिप्लाई जरूर करता हूं।. तो 24 घंटे के अंदर आपको जो चाहिए मैं. आपको WhatsApp पर भेज दूंगा। आप लिंक से. सीधा ही खोल लीजिए या अथवा डाउनलोड कर. लीजिए। नो चार्ज। तो यह एक बहुत बड़ी चीज.
आज के आधुनिक युग में विज्ञान की प्रगति. के बाद संभव हो पाई। पुराने जमाने में. बहुत कठिन था। विश्व का साहित्य प्राप्त. करना ही कठिन था या इतना एक्सपेंसिव था कि. अगर एक व्यक्ति चाहे कि उनकी सारी ऑडियो. कैसेट, सारी वीडियो कैसेट और सारी किताबें. खरीद ले तो 1990 में भी 25 लाख का खर्चा. होता था और इतना बड़ा रूम सिर्फ अलमारी ही. अलमारी उसमें हो कुछ ना हो तब जाकर आप. उसको रख सकते थे। आज वो सब कुछ बिल्कुल. ईजीली अवेलेबल हो गया है। आप लिंक क्लिक. कीजिए और वो चीज खुल जाएगी। तो यह बहुत.
बड़ा सौभाग्य है। इस सौभाग्य का मैं. चाहूंगा सभी मित्र उपयोग करें और ज़ूम. मीटिंग भी कोरोना काल में आई थी। उस समय. तो बहुत 10 लोग अटेंड किए। उसके बाद भी. हजार लोग करीब लगातार अटेंड कर रहे हैं।. तो इसको हमने जारी रखा है। किसी के आने की. जरूरत नहीं। कहीं जाने की जरूरत नहीं।. अपने घर बैठे आप अटेंड कीजिए।. आनंद आया सर आपसे बात करके। ओशो को समझने. का मौका मिला। अगली बार ओशो के जीवन किसी. एक विशेष हिस्से को पकड़ के अवश्य.
उन किताबों को पढ़ के ऑडियो को सुन के. किसी एक विशेष हिस्से पर आपसे चर्चा. करेंगे। मैं चाहूंगा कि ओशो ने जो साधना. पद्धति दी है ना वो जनता तक पहुंचे लोगों. तक पहुंचे वो असली काम की बात है। फिजूल. की बात है कि रजनीशपुरम में क्या हुआ था. कि पॉलिटिशियन ने क्या किया? हाउ डज इट. मैटर? जो बीत गई सब बात गई। उनके शिष्यों. ने क्या किया? अधिकांश जो बदनामी की बातें. हैं और जो आरोप हैं ओशो पर नहीं है। वह. उनके आसपास जो लोग थे उनकी करतूतों पर. हैं। तो ओशो का क्रियाएं थोड़ी है वो है.
ना उनकी करतूतों पे हैं। उसकी चर्चा करने. से भी क्या लाभ लोग फालतू की बातें करते. रहते हैं। जो असली बात है अध्यात्म की. साधना जिससे हमारा जीवन रूपांतरित हो सकता. है। हमारी सारी अशांति बेचैनी मानसिक. प्रताड़ना सब खत्म हो सकती है। हम बहुत. आनंद की अवस्था में सदाबहार रूप से रह. सकते हैं। उसके सूत्र लोगों तक पहुंचाएं।. वो असली कीमती खजाना है। उसकी चाबी है। बस. खोलना है और खुल जाएगा ताला और बहुत आसान.
है। ना तो त्याग करना है। ना घर द्वार. छोड़ना है ना परिवार के खिलाफ होना है ना. उपवास करना है। आराम से अपने घर में रहिए।. अच्छे से खाइए, पीजिए, मजा लीजिए। अपना. जीव का उपार्जन कीजिए। अपने परिवार का. देखभाल करिए। खूब प्रेम से और याद रखिए. प्रेम के साथ जिम्मेवारी भी आती है। हम. जिससे प्रेम करते हैं उसके साथ हमारा. उत्तरदायित्व और रिस्पांसिबिलिटी बनती है।. ओशो की ये बातें. ओशो की फेवरेट लाइन कौन सी है आपकी? कोई. एक कोट अगर आप जाते-जाते बताना चाह. एक लाइन में अगर मैं कहना चाहूं जो मुझे. बहुत प्रिय लगती है अक्सर मैं कहता हूं वो.
है धन्य है वे जो स्वयं को खोजते हैं. स्वयं को पाते हैं और स्वयं हो जाते हैं।. मैं समझता हूं इससे बड़ी कोई बात हो नहीं. सकती। हम बाहर दुनिया में तलाशते रहते. हैं। कुछ और होने की कोशिश करते रहते हैं।. किसी की नकल के किसी से प्रतिस्पर्धा कहीं. वहां पहुंचना है, यहां पहुंचना है। वो सब. दुर्भाग्य की घटनाएं हैं। सौभाग्यशाली हैं. वो जो स्वयं को खोजते अपनी आत्मा की तलाश. करते मैं कौन हूं। जो स्वयं को पाते और.
स्वयं ही हो जाते। इसके साथ ओशो यह भी. कहते हैं कि तुम कुछ और हो ही नहीं सकते।. तुम केवल तुम ही हो सकते हो।. है ना? और हम सब कुछ और होने की दौड़ में. हैं। हम संसार की भागदौड़ में उलझ गए और. स्वयं से चूक गए। हमारा स्वयं का होना. परमात्मा का होना है। हम खुद परमात्मा. हैं। लेकिन हम भीतर जाएं, तलाशें, पाएं तब. हम पाएंगे। वाह क्या बात। हम भी कैसे. बुद्धू बने।.
थैंक यू सर। लवली टॉक टू यू।. थैंक यू।.
