Ambedkar: Myth vs Fact | 19 बड़े सवाल | Ambedkar के बारे में जो बताया गया..क्या वो सच? | Jai Bhim
इस देश में डॉ. अंबेडकर एक ऐसे व्यक्ति. हैं जिनकी मूर्ति हर शहर में लगती है।. जिनका नाम हर पार्टी के नेता की जुबान पर. है।. बाबा साहब अंबेडकर अंबेडकर जी. बाबा साहब अंबेडकर बाबा साहब अंबेडकर बाबा. साहब अंबेडकर।. बाबा साहेब अंबेडकर. बाबा साहेब अंबेडकर. जिनके बिना कोई भी राजनैतिक पार्टी आज देश. में चुनाव नहीं जीत सकती।. जय जय.
जय जय. इसीलिए उनकी तस्वीर को आप हर जगह पाएंगे. तस्वीर हर सरकारी दफ्तर में नेता के हाथों. में हर प्रोटेस्ट में लेकिन अफसोस कि भारत. में लोग डॉ भीमराव अंबेडकर को पढ़ते नहीं. है डॉ अंबेडकर का सच यह है कि वह इस मुल्क. के सबसे ज्यादा कोर्ट किए जाने वाले आदमी. हैं। पर अफसोस यह कि सबसे कम पढ़े जाने. वाले व्यक्तियों में से भी और जहां पर. पढ़ाई लिखाई कम होती है, वहां झूठ अपने आप.
उगने लगते हैं। खतपतवार की तरह बिना बोए, बिना पानी दिए। इसलिए हमें लगा कि जब सारा. देश अंबेडकर को कोट कर रहा है तो अंबेडकर. को लेकर जो झूठ, जो अफवाह या जो बातें. बढ़ा चढ़ाकर पेश की जाती हैं, आज उनको. एक्सपोज कर देते हैं। इसलिए आज इस वीडियो. में हम 19 सवाल लेकर आए हैं जो या तो. अंबेडकर के नाम पर झूठ में फैलाए गए हैं. या उन्हें छोटा दिखाने के लिए, उन्हें. गाली देने के लिए या जबरदस्ती बड़ा दिखाने. के लिए। इस वीडियो को सुनने से पहले हम.
चाहते हैं कि आप जान लें कि अगर आप यह सोच. कर बैठे हैं कि आज सामने वाले खेमे की. धुलाई होगी और आपका पक्ष बचकर निकल जाएगा. थोड़ा संभल कर क्योंकि हम ना गोदी मीडिया. है ना गोदी मीडिया हां हम दोनों की गोद. में नहीं बैठे हैं और इसीलिए आप संभल कर. बैठिएगा क्योंकि जहांजहां टूटना बनता है. वहांवहां आज टूटेगा चाहे वो किसी का पक्ष. हो कुछ झूठ हैं जो डॉक्टर अंबेडकर साहब को. छोटा दिखाने के लिए खड़े गए हैं और कुछ जो. उन्हें जबरदस्ती बड़ा दिखाने के चक्कर. चक्कर में उनके चाहने वालों ने खड़े हैं।.
और हमारा यह मानना है कि दूसरे वालों ने. भी अंबेडकर साहब का नुकसान कम नहीं किया. है। क्योंकि जब आप जबरदस्ती नकली मेडल. पहनाते हैं तो असली मेडल भी शक के दायरे. में आता है। इसलिए आज दोनों की बारी आएगी. और आज मैं किसी से माफी नहीं मांगने वाला. हूं क्योंकि किसी आदमी की बेइज्जती उसकी. आलोचना नहीं होती है। सबसे बड़ी बेइज्जती. ये होती है कि उसे बिना पढ़े पूछ लिया जाए. और बिना पढ़े गाली दी जाए। इसलिए आज आप. दोनों थोड़ा संभलकर पर यह भरोसा दिलाते. हैं कि अगर आप सचमुच अंबेडकर को पढ़ना.
चाहते हैं तो इस वीडियो के बाद आपको. अंबेडकर साहब को लेकर कोई दिमाग में शको. सुबा शंका नहीं रह जाएगी। अगर मैं आपसे. कहूं कि अगले दो दिनों में आपको उतनी. नॉलेज, उतने बिजनेस आइडियाज और उतने. कनेक्शंस मिल सकते हैं जिसको बनाने में कई. लोगों को 6 महीने से एक साल लग जाते हैं।. तो क्या आप अपनी जिंदगी के दो दिन. निकालेंगे? वेल अगर जवाब हां है तो 11 और. 12 सितंबर की तारीख नोट कर लीजिए क्योंकि. गुजरात के गांधीनगर स्थित महात्मा मंदिर. कन्वेंशन सेंटर में होने जा रहा है उडू. एक्सपीरियंस 2026 इंडिया एक ऐसा इवेंट.
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किसी ने अकेले बैठकर तीन साल तक कलम चलाई. और दरवाजा खोलकर देश को संविधान थमा दिया।. ये सुनने में बड़ा खूबसूरत है। लेकिन अगर. आप उस दौर में जाएंगे जहां पर संविधान. लिखा जा रहा था तो संविधान सभा में करीब. 300 सदस्य थे और उसकी दो दर्जन से ज्यादा. कमेटियां थी जिसमें ड्राफ्टिंग कमेटी. सिर्फ एक थी। इस कमेटी की बात करेंगे तो. यह कमेटी 29 अगस्त 1947 को बनाई जाती है. और डॉ. अंबेडकर समेत सात लोग इसमें होते.
हैं। इसके खास लोगों में अल्लादी. कृष्णस्वामी अय्यर साहब और के एम मुंशी. जैसे उस दौर के जो बड़े कानूनी दिमाग के. लोग थे वो शामिल थे। अब इस कमेटी के सामने. जो पहला ड्राफ्ट रखा गया वो आपको जानकर. हैरानी होगी कि डॉ. अंबेडकर का लिखा हुआ. था ही नहीं। वो अक्टूबर 1947 में संविधान. सभा के सलाहकार सर बी एन राव ने तैयार. किया था। जो खुद संविधान सभा के सदस्य तक. नहीं थे। जिस आदमी ने उस पूरे कानूनी. ढांचे को शब्दों में ढाला वो थे एसए. मुखर्जी साहब जिन्हें चीफ ड्राफ्टमैन कहा.
गया। तो इसका मतलब. [नाक से की जाने वाली आवाज़] क्या निकाला. जाए कि डॉक्टर अंबेडकर की कोई भूमिका नहीं. थी। नहीं यहीं पर इस कहानी का दूसरा पहलू. आता है और यह वाला पलड़ा काफी भारी हो. जाता है पहले वाले पर। दरअसल उसी. ड्राफ्टिंग कमेटी के एक सदस्य टीटी. कृष्णचारी ने खुद संविधान सभा में खड़े. होकर कहा था कि सात में से छह सदस्य असल. में वो नहीं दे पाए जो उनसे उम्मीद थी।. कोई इस्तीफा दे गया, कोई बीमारी से टूट. गया, कोई दूसरे कामों में चला गया। अब यह. बयान एक साथी सदस्य का है। किसी बाहर वाले.
का नहीं है और इसे शब्द दर शब्द उठाना. अय्यर जैसे लोगों के साथ नाइंसाफी होगी जो. उस दौर के सबसे बड़े संविधान विशेषज्ञों. में गिनाते थे। पर बुनियादी बात इससे. बदलती नहीं है कि कागज पर सात नाम थे। रोज. की मशक्कत का काम एक आदमी कंधे पर था। और. असली काम सच कहें तो ड्राफ्ट लिखना था भी. नहीं। असली काम था उस ड्राफ्ट को सदन के. बीचोंबीच खड़े होकर बचाना। हर सवाल का. जवाब देना, हर संशोधन से लड़ना और उसे. स्वीकार करना। यह आंकड़े खुद डॉ. अंबेडकर.
ने 25 नवंबर 1949 को अपने आखिरी भाषण में. दिए थे। अब संविधान को अगर आप समझेंगे तो. संविधान सभा 11 सत्रों में कुल 165 दिन. चलती है। जिनमें से 114 दिन अकेले ड्राफ्ट. बहस में आए। ड्राफ्टिंग कमेटी जो थी वो. 141 दिन बैठती है। मसौदे पर कुल 7635. संशोधन पेश किए गए। जिनमें से 2473 सदन. में सचमुच रखे भी गए थे। राव का ड्राफ्ट. 243 अनुच्छेदों का था। कमेटी ने उसे 315.
बनाया और आखिर में संविधान 395 अनुच्छेदों. पर जाकर रुक गया। यानी जो कागज अंदर गया. था और जो बाहर निकला वो एक चीज नहीं थी और. यह सिर्फ हिंदुस्तानियों की इमोशनल राय. नहीं है। संविधान पर दुनिया का सबसे बड़ा. अध्ययन करने वाले ग्रेनविल ऑस्टिन ने भी. यह बात स्वीकारी थी जो ना भारतीय थे ना. किसी के खेमे के और ऑस्टिन ने अंबेडकर की. भूमिका की इसमें तारीफ की थी। इस पूरी.
प्रक्रिया के केंद्र में उन्हें रखा था।. सबसे मजेदार बात यह कहा था कि अंबेडकर ने. अकेले थोड़ी लिखा था संविधान। यह बात सबसे. पहले डॉ. अंबेडकर ने ही कही थी। हां, साल. 1949 के भाषण में डॉ. अंबेडकर ने कहा कि. जो श्रेय उन्हें दिया जा रहा है, वह असल. में उनका पूरा नहीं है। उसका एक हिस्सा बी. एन राव का है और उससे भी बड़ा हिस्सा एसए. मुखर्जी साहब का है। जिनकी क्षमता उलझी से. उलझी बात को सरल कानूनी ढांचे में ढालने. की थी। [नाक से की जाने वाली आवाज़] और. उन्होंने मुखर्जी के नीचे काम करने वाले.
उस स्टाफ को भी याद किया जो आधी-आधी रात. जगकर कागजों में डूबे रहते थे। तो आप यह. सोचिए कितनी अजीब बात है कि जिसे हथियार. बनाकर डॉक्टर अंबेडकर पर ताना जा रहा है. उसे डॉक्टर अंबेडकर ने ही अपने हाथों से. भरे सदन में 70 साल पहले खुद रखा था। यानी. जो आदमी खुद ही क्रेडिट बांट रहा था आज. उसका श्रेय छीनने की मेहनत की जा रही है।. यह कहानी डॉ. अंबेडकर और संविधान की थी।. अब दूसरा इंपॉर्टेंट सवाल क्या डॉ. अंबेडकर ने भारत में महिलाओं को वोट देने.
का हक दिलाया था? यह सवाल जो है यह अंबेडकर से नफरत करने. वाले नहीं अंबेडकर को चाहने वालों की तरफ. से आता है और हर साल 14 अप्रैल को यह लाइन. आपके फोन पर गिरती है कि इस मुल्क की औरत. जो आज वोट डालती है वो केवल और केवल बाबा. साहेब की देन है। सच क्या है? देखिए सच. मिलाजुला है। इस देश में औरतों को वोट. डालने का हक पहली बार तब मिला जब डॉ.
अंबेडकर की उम्र 30 साल के आसपास थी और वो. लंदन में थे। वो साल था 1920। 1920 में. त्रावणकोर और झालावाड़ रियासतों ने यह हक. दिया था। 1921 में मद्रास प्रेसिडेंसी ने. वो नियम हटा दिया जो सिर्फ औरत होने की. वजह से वोट डालने से रोकता था। उसी साल. मुंबई विधान परिषद ने भी यह किया। हां, यह. हक जरूर अधूरा था क्योंकि जायदाद और पढ़ाई. की शर्तें बनी हुई थी। इसलिए बहुत कम. औरतें इसके दायरे में आ रही थी। लेकिन साल. 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने इसे और.
फैलाया और करीब 60 लाख औरतें वोटर बन जाती. हैं। पर यह भी इस मुल्क की कुल औरतों का. सिर्फ 2.5% था। और यह लड़ाई जानते हैं. किसने लड़ी? यह लड़ाई उस वक्त औरतों ने. खुद लड़ी थी। 1917 में वमस इंडियन. एसोसिएशन बनती है। साल 1927 में अखिल. भारतीय महिला सम्मेलन बनता है और यही. संगठन साइमन कमीशन से लेकर गोलमेज. सम्मेलनों तक अपनी बात रखता है और सबके.
लिए बराबर वोट का विचार यहां भी नया नहीं. था। क्योंकि 1928 की मोतीलाल नेहरू. रिपोर्ट भी इसकी सिफारिश कर चुकी थी। साल. 1931 में कांग्रेस के कराची अधिवेशन का. प्रस्ताव भी इसी बात पर मोहर लगा चुका था।. यानी कुल मिलाकर अगर समझे तो जब संविधान. सभा बैठती है तब तक यह सवाल तय हो चुका. था। बस बचा हुआ काम उसे कानून की शक्ल. देने का था। अब वो एक बात जो इस पूरे मिथक. की हवा निकालती है और शायद किसी को पता.
हो। संविधान सभा की मौलिक अधिकारों की. उपसमिति ने साफ कह दिया था कि सबके लिए. बराबर वोट पर कोई समझौता नहीं होगा। 1948. के ड्राफ्ट में लिख दिया गया था कि लोकसभा. का चुनाव एडल्ट वोटरों के अधिकार पर होगा. और जब यह बात सदन में आई तो इसका विरोध. करने के लिए उस वक्त सिर्फ एक सदस्य खड़े. हुए थे बिहार से बृजेश्वर प्रसाद और जैसे. वह खड़े हुए उस दौर के सभापति ने उन्हें. याद दिलाया कि यह तय हो चुका है और इस पर.
कोई बहस नहीं हुई। इसके बाद एक भी सदस्य. नहीं बोला। एक भी अब यह तस्वीर समझिएगा।. दुनिया के जिस सबसे बड़े फैसले पर पश्चिम. के मुल्कों में औरतें दशकों तक सड़कों पर. लड़ती हैं, जेल जाती हैं, भूख हड़ताल पर. बैठती हैं, वो फैसला इस सदन में बिना एक. लफ्ज़ की लड़ाई के पास हो गया क्योंकि. वहां बैठा लगभग हर आदमी और वो 15 औरतें सब. पहले से इस पर राजी थी। 26 नवंबर 1949 को. यह अनुच्छेद 326 के रूप में मंजूर होता है. और 26 जनवरी 1950 से लागू होता है और भारत.
में एक झटके में करीब 17 करोड़ नए वोटर बन. जाते हैं। अब सवाल यह है कि फिर अंबेडकर. की भूमिका क्या थी? भूमिका थी और असली थी।. वो ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष थे। वो. अनुच्छेद उन्हीं की कमेटी से होकर निकला. था और मताधिकार का सवाल उनके लिए भी नया. नहीं था। साल 1919 में साउथ बोरो कमेटी के. सामने अंबेडकर भी इसी सवाल पर गवाही दे. चुके थे। पर इस अनुच्छेद के पीछे 20 साल. की वो सामूहिक सहमति खड़ी थी जो किसी एक.
आदमी की नहीं थी। अब वो बात जो सबसे. ज्यादा चुभती है, जिस लड़ाई का श्रेय. उन्हें दिया जाता है, वह लड़ाई उन्हें. लड़नी नहीं पड़ी क्योंकि वह लड़ाई पहले से. ही जीती हुई थी और औरतों के लिए जो लड़ाई. उन्होंने सचमुच लड़ी, उसमें वह अकेले थे।. वो लड़ाई क्या थी वो इस वीडियो में हम. आपको आगे बताएंगे। अगला सवाल क्या डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आरक्षण की शुरुआत भारत. में की? [संगीत].
यह सवाल बड़ा मजेदार इसलिए है क्योंकि. अंबेडकर जी को गाली देने वाले और अंबेडकर. जी के लिए ताली बजाने वाले दोनों यहां पर. एक साथ गलत होते हैं। एक तरफ भारत में वो. लोग हैं जो तारीफ में कहते हैं कि बाबा. साहब की वजह से आरक्षण मिला। दूसरी तरफ वो. लोग हैं जो इस ताने में कहते हैं कि. आरक्षण को लेकर जितना विवाद है वो डॉ. अंबेडकर की वजह से है।. लेकिन सच क्या है? सच इन दोनों के बीच में. है। फैक्ट बताते हैं आपको। भारत में जब.
पहली बार आरक्षण लागू हुआ अंबेडकर जी उस. वक्त 12 साल के भी नहीं थे। तारीख थी 26. जुलाई साल 1902 जगह थी कोल्हापुर रियासत।. शाहू महाराज ने गजट में एक आदेश निकलवाया. जिसमें साफ लिखा था कि इस आदेश की तारीख. से जो भी पद खाली होंगे उनमें 50% पिछड़े. वर्गों से भरा जाएगा। और जिन दफ्तरों. [नाक से की जाने वाली आवाज़] में इनकी. संख्या 50% से कम है, वहां पर आगे जितनी. भी पोस्टिंग होगी, वो इन्हीं से होगी।. इतना ही नहीं हर विभाग के मुखिया को भी. तीन-ती महीने पर रिपोर्ट भेजने का आदेश.
था। यानी सिर्फ ऐलान नहीं था, निगरानी का. इंतजाम भी किया गया था। यह आदेश आज भी. दस्तावेजों में मौजूद है और इसे भारत में. आरक्षण का पहला सरकारी आदेश माना जाता है।. इसके बाद मैसूर की बारी आती है जहां पर. महाराजा नलवाड़ी कृष्णराज वाडियार ने साल. 1918 में गैर ब्राह्मणों के लिए आरक्षण की. सिफारिश करने कमेटी बिठाई। दिलचस्प बात यह. है कि उसी वक्त कमेटी बैठते ही उनके खुद. के दीवान एम विश्वेश्वरैया ने इसका विरोध. करके इस्तीफा दे दिया। लेकिन कमेटी की.
सिफारिशें साल 1921 में लागू हो गई। उसी. साल 16 सितंबर 1921 को मद्रास प्रेसिडेंसी. में जस्टिस पार्टी की सरकार पहला कम्युनल. गवर्नमेंट ऑर्डर लेकर आती है। जिसमें. सरकारी नौकरियों का बंटवारा समुदायों के. हिसाब से तय किया गया। यह सारा कुछ. अंबेडकर साहब के सार्वजनिक जीवन में उतरने. से पहले की बात है। सवाल फिर अंबेडकर साहब. ने किया क्या? तो अंबेडकर साहब ने वो किया. जो इन सबसे बड़ा था और वो बात बिना पूरी. तरह समझे यह बहस अधूरी है। यह तमाम आदेश.
जो हमने आपको बताए यह किसी राजा की. मेहरबानी थी या किसी सरकार की नहीं थी। अब. जो चीज मेहरबानी से आती है वो अगली. मेहरबानी से खत्म हो सकती है। शाहू महाराज. का आदेश अगला राजा एक कलम से पलट सकता था।. जस्टिस पार्टी हारती तो अगली सरकार वो. आदेश रद्दी में डाल सकती। अंबेडकर ने इसे. मेहरबानी की जगह संविधान में बिठा दिया।. जहां इसे छूने के लिए संसद में दो तिहाई. बहुमत होना चाहिए। उन्होंने आरक्षण शुरू. नहीं किया। उन्होंने उसे एहसान से हक में.
बदल दिया। और यह दोनों चीजें बहुत अलग है।. और चलते-चलते एक इत्तेफाक आपको और बताते. हैं। मजेदार है। जिन शाहू महाराज ने साल. 1902 में वो आदेश निकाला था आरक्षण का।. उन्हीं शाहू महाराज ने 1920 में उस नौजवान. भीमराव की जेब में पैसे डाले थे। जब वो. अपना पहला अखबार मूख नायक खड़ा करने की. कोशिश कर रहे थे। अब आप खुद बताइए इस देश. में आरक्षण का जनक किसे कहेंगे? उस राजा. को जिसने पहला आदेश निकाला अंबेडकर जी के.
अखबार के समय उन्होंने पैसे दिए या उन. अंबेडकर जी को जिन्होंने उसे कागज से. उठाकर हमेशा के लिए कानून बना दिया? फैसला. आप पर छोड़ते हैं। लेकिन अगला सवाल इससे. भी रोचक है। क्या डॉ. अंबेडकर ने आरक्षण. सिर्फ 10 साल के लिए रखा था? यह इस मुल्क का सबसे मेहनती मिथक है जो हर. साल हर बहस में हर WhatsApp ग्रुप में आता. है। लाइन भी आपको याद होगी कि अंबेडकर. साहब ने 10 साल के लिए आरक्षण लाए थे और.
नेताओं ने वोट के चक्कर में इसे बढ़ा. दिया। इस लाइन की ताकत यह है कि यह झूठ. नहीं है। यह आधा सच है और आधा सच पूरे झूठ. से ज्यादा खतरनाक होता है। क्योंकि उसे. पकड़ने के लिए किताब खोलनी पड़ती है। 10. साल की सीमा असली है। वो सचमुच संविधान. में लिखी हुई थी। लेकिन वह किस चीज पर. लिखी थी यह आदमी नहीं बताता है जो इसको. कोट करता है। अगर आप संविधान का आर्टिकल. 334 उठाएंगे जो मूल रूप से कहता था कि. लोकसभा और राज्यों के विधानसभाओं में.
अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटों का. आरक्षण एंग्लो इंडियन समुदाय के लोगों को. नामजद करके भेजाना संविधान लागू होने के. 10 साल बाद खत्म हो जाएगा। यानी 26 जनवरी. 1960 को खत्म हो जाएगा। अब यहां पर ध्यान. से शब्दों को सुनिएगा। शब्द हैं सीटें, विधानसभा, लोकसभा की कुर्सियां यानी. राजनीतिक आरक्षण। अब सवाल यह है कि नौकरी. और पढ़ाई वाला आरक्षण कहां बैठा है? वो. 334 में है ही नहीं। सरकारी नौकरियों वाला.
जो आर्टिकल है वो 164 में है। जो मूल. संविधान में शुरू से मौजूद था और शिक्षा. वाला वो 154 में है। जिसे 1951 में पहले. संविधान संशोधन के जरिए जोड़ा गया। उस. वक्त जब अंबेडकर खुद इस देश के कानून. मंत्री थे और अब आता है असली सवाल इन. दोनों आर्टिकल में क्या कोई तारीख कहीं. लिखी गई है कोई समय सीमा लिखी गई है कहीं. भी 10 साल 20 साल जवाब है नहीं.
एक भी शब्द नहीं लिखा गया है कहीं भी अगर. आपको मेरी बात पर भरोसा ना हो तो आप. संविधान को पढ़ लीजिए हां इतिहास खुद बोल. रहा है 1959 में आठवां संशोधन आया 1969. में 23वां 1980 में 45वां फिर 62वां 95वां. भी आ चुका है। 2019 में 114 जिसने यह. आरक्षण 2030 तक बढ़ाया। एंग्लो इंडियन. वाली व्यवस्था खत्म कर दी। हर बार 10 साल.
जोड़े गए। हर बार संशोधन हुआ। सिर्फ. आर्टिकल 334 में सीटों में। अब आप खुद. सोचिए अगर नौकरी वाले आरक्षण पर कोई समय. सीमा होती तो उसे बढ़ाने के लिए भी हर 10. साल पर संशोधन करना पड़ता और 70 साल में. एक बार भी नहीं करना पड़ा। क्यों? क्योंकि. वहां बढ़ाने के लिए कुछ था ही नहीं। कोई. ताला नहीं था जिसकी चाबी घुमानी पड़ती। अब. यहां तक आपको सुनकर लग रहा होगा कि मामला. निपट गया तो रुकिए। आरक्षण पर सवाल उठाने.
वालों का असली तर्क यह 10 साल वाला है ही. नहीं। यह तो सबसे कमजोर वार है जो नारों. में चलता है। उनका सबसे मजबूत तर्क कहीं. और बैठा है। ईमानदारी की मांग है कि वह भी. आपके सामने रखें। 30 नवंबर 1948 को. संविधान सभा में उसी अनुच्छेद पर बहस चल. रही थी जो आगे चलकर 16 बना और उस दिन खुद. अंबेडकर ने एक उदाहरण रखा। उन्होंने कहा. कि मान लीजिए किसी समुदाय या समुदायों के. समूहों के लिए आरक्षण इतना बढ़ा दिया जाए. कि वो राज्य के कुल पदों का 70% हो जाए और.
सिर्फ 30% बाकी के लिए रह जाए। तो क्या. कोई कह सकता है कि इसके अवसर की समानता. वाला सिद्धांत पूरा हो रहा है? उनका अपना. जवाब था कि नहीं हो रहा। फिर उन्होंने वो. लाइन कही जो आज कानूनी किताबों में दर्ज. है कि जो सीटें आरक्षित हो वो कुल सीटों. के एक छोटे हिस्से तक ही सीमित रहनी. चाहिए। यानी सीमा उन्होंने लगाई थी पर वो. सीमा घड़ी की नहीं थी। तराजू की थी। समय. की नहीं थी। दायरे की थी। उन्होंने यह. नहीं कहा कि 10 साल बाद बंद कर देना. चाहिए। उन्होंने कहा यह कभी बहुमत पर.
कब्जा ना कर लें। और यह कोई दबी हुई लाइन. नहीं है। 1992 में इंदिरा साहनी वाले. ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 50%. की जो सीमा तय की उसके पीछे अदालत ने. अंबेडकर की इसी बात को आधार बनाया था। तो. अगर आप पूरी तस्वीर देखेंगे अपने हिसाब से. फिर तय कीजिएगा कि जो चीज 10 साल के लिए. बनी थी वो थी विधानसभा की सीटें। नौकरी और. दाखिले पर वक्त की कोई मियाद थी ही नहीं।. लेकिन दायरे की एक हद जरूर थी और वह हद. खुद अंबेडकर के मुंह से निकली थी। इसका. मतलब यह हुआ कि आरक्षण पर बहस करने की.
गुंजाइश आज भी पूरी है। बस वो बहस सही जगह. होनी चाहिए। कैलेंडर पर नहीं पैमाने पर और. सबसे मजेदार बात यह कि 10 साल वाला नारा. लगाने वाले लोग अपने ही पक्ष का सबसे. मजबूत तर्क सालों से जाया कर रहे हैं।. क्योंकि वह संविधान खोलकर पढ़ते नहीं। तो. सवाल यह नहीं कि अंबेडकर ने आरक्षण कितने. साल के रखा? सवाल यह है कि इस देश में. उनके नाम पर लड़ने वाले दोनों पक्षों में. क्या किसी एक ने भी अंबेडकर को सलीके से. पढ़ा? अब अगला सवाल क्या आरबीआई अंबेडकर.
साहब ने बनाया था? [संगीत]. देखिए यह दावा हर साल 14 अप्रैल को आपके. फोन पर आता होगा कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया. की स्थापना डॉक्टर भीमराव अंबेडकर साहब ने. की थी। इस पूरी कहानी को समझने के लिए तीन. तारीखें काफी हैं। पहली साल 1923 की जब. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर. एडविन कैनन की देखरेख में उनका शोध पूरा. होता है और किताब की शक्ल में छपता है. जिसका नाम था द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी इट्स. ओरिजिन एंड स्यूशन और इसी काम पर लंदन.
यूनिवर्सिटी ने उन्हें डिग्री दी थी। यह. किताब रुपए की गिरती कीमत और अंग्रेजों की. मुद्रा नीति पर उस दौर की बड़ी चीरफाड़ थी. और यह कोई मामूली बहस नहीं थी। इसमें वह. सीधे जॉन मेनार्ड की से भिड़ रहे थे। कीस. गोल्ड एक्सचेंज स्टैंडर्ड के पक्ष में थे. और अंबेडकर गोल्ड स्टैंडर्ड के एक 32 साल. का भारतीय दुनिया के सबसे बड़े. अर्थशास्त्री के सामने खड़ा होकर असहमत हो. रहा था। फिर दूसरी तारीख 15 सितंबर 1925. जब रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड. फाइनेंस जिसे हिल्टन यंग कमीशन कहते हैं.
वो भारत के दौर पर था और अंबेडकर उसके. सामने अपनी गवाही रखते हैं। यह गवाही आज. भी पूरी दुनिया के दस्तावेजों में दर्ज. है। सवाल और जवाब समेत। तीसरी तारीख है 1. अप्रैल 1935 जब इसी कमीशन की सिफारिशों पर. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 के तहत. आरबीआई खड़ा हो जाता है। अब आप खुद तय. कीजिए क्या इस कहानी में अंबेडकर की. भूमिका है? बिल्कुल है और बड़ी है। जिस. कमीशन ने भारत का केंद्रीय बैंक खड़ा किया.
उसके सामने एक भारतीय अपनी शोध की ताकत पर. खड़ा होकर यह गवाही दे रहा। यह उस दौर के. लिए मामूली बात नहीं थी। लेकिन क्या इसका. मतलब यह है कि आरबीआई को अंबेडकर जी ने. बनाया? तो जवाब है नहीं। कमीशन उन्होंने. नहीं बनाया। उनके सदस्य वह नहीं थे।. आरबीआई एक्ट उन्होंने नहीं लिखा। 1935 में. जब बैंक खड़ा हुआ तब वह सरकार में भी नहीं. थे। और सबसे बड़ी बात यह कि यह बैंक जिस. मुद्रा व्यवस्था पर बना वह कई जगह उनकी. बताई राह से अलग थी। इसलिए सही वाक्य यह.
बनता है कि रिजर्व बैंक की बुनियाद रखने. वाली बहस में अंबेडकर साहब एक अहम आवास. थे। और यहीं पर एक सवाल आपको अपने आप से. पूछना है कि जिस आदमी के असली कामों की. लिस्ट इतनी लंबी है कि एक वीडियो में ना. समा पाए। उसके सीने पर हमें एक नकली मेडल. टांगने की जरूरत क्यों पड़ रही है? झूठी. तारीफ किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी. दुश्मन होती है और जिस दिन वह पकड़ी जाती. है सामने वाला उसी की आड़ में असली कामों. पर भी सवाल खड़े करने लगता है। इसलिए इस. दावे को आप आगे मत बढ़ाइएगा। अब एक और.
दावा। क्या अंबेडकर जी के पास 32. डिग्रियां थी और 64 विषयों में महारत. हासिल थी? यह वो सवाल है जिस पर मुझे सबसे ज्यादा. गालियां पड़ सकती हैं। लेकिन मैं फिर भी. पूछूंगा। यह वाला मैसेज भी आपने बहुत सुना. होगा। ये लिस्ट आपने देखी होगी। 32. डिग्रियों की पूरी सूची, 64 विषयों की. महारत, कई भाषाओं का ज्ञान और सब कुछ. अंबेडकर जी के आसपास। तो पहले असली लिस्ट.
सुन लीजिए जो दस्तावेजों से निकलती है।. मुंबई यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीए किया।. उसके बाद कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एमए. किया। फिर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से. एमएससी, लंदन से डीएससी 1923 में। और उसके. बाद ग्रेजुइन से बैस्टर एटलॉ कोलंबिया से. पीएचडी 1927 में यानी छह डिग्रियां जो. उन्होंने पढ़कर परीक्षा देकर शोध करके. कमाई। इसके अलावा दो मानद उपाधियां साल. 1952 में कोलंबिया से एलएलडी और 1953 में.
उस्मानिया यूनिवर्सिटी से डी लिट। अब आप. सब जोड़ लीजिए। यह होती है आठ। खुद भारत. सरकार के सूचना विभाग की 2024 की प्रेस. जानकारी में यह गिनतियां आई थी। 5 डिग्री. दो मानत उपाधियां। 32 का आंकड़ा किसी भी. सरकारी या यूनिवर्सिटी के रिकॉर्ड से कहीं. नहीं मिलता। अब सवाल कि फिर ये 32 आती. कहां से हैं? यह वायरल कहां से हुई? यही. मजा है। वो लिस्ट आप उठाकर देखेंगे। उसमें. अलग-अलग लाइनों में लिखा है एमए इन.
इकोनॉमिक्स, एमए इन सोशियोलॉजी, एमए इन. हिस्ट्री, एमए इन फिलॉसफी। अब ये चार. अलग-अलग डिग्रियां नहीं है। ये एक ही एमए. के अंदर पढ़े गए विषय हैं। जिन्हें तोड़कर. चार अलग-अलग खानों में डाल दिया गया है।. उसी तरह उसमें बंबई, नागपुर, पंजाब, कर्नाटक, केरल, बड़ौदा, मैसूर और रंगून. जैसी यूनिवर्सिटीियों से एलएलडी गिना दी. गई है। जिनका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।. और सबसे मजेदार बात यह जो वेबसाइट यह. लिस्ट छापती हैं, वो खुद अपनी ही लिस्ट के.
नीचे लिख देती हैं कि सही संख्या पक्के. तौर पर पता नहीं। यानी छापने वाला भी. जानता है कि वह क्या छाप रहा है। अब आते. हैं उस तरफ जहां असली बात है। यह मिथक. दुखद इसलिए नहीं है कि यह झूठ है। यह. इसलिए दुखद है कि इसकी जरूरत ही नहीं थी।. साल 1913 में एक ऐसा लड़का न्यूयॉर्क की. कोलंबिया यूनिवर्सिटी में बैठकर. अर्थशास्त्र पढ़ रहा था जिसे उसके अपने. स्कूल में 10 साल पहले पानी का नल छूने की. इजाजत नहीं थी। 1923 में उसके पास लंदन से. डीएससी थी और वह भी उसी किताब पर जिस पर.
हमने बात की। वह विदेश जाकर अर्थशास्त्र. में डॉक्टरेट करने वाले पहले भारतीयों में. से एक थे। यह रिकॉर्ड है। इसमें एक भी अंग. जोड़ने की जरूरत नहीं और जो जोड़ता है वो. असल में यह मान रहा होता है कि असली. रिकॉर्ड काफी नहीं होता है। अब वो बात जो. मुझे सबसे ज्यादा चुभती है। जिस आदमी ने. पूरी जिंदगी एक ही चीज सिखाई कि सबूत. मांगो, डाटा पूछो।. जो लिखा है उसे जानो बिना पढ़े मत मानो।. आज सबसे ज्यादा बिना जांचा हुआ कागज उसी.
के नाम पर फॉरवर्ड हो रहा है। जिस आदमी ने. अंग्रेज विद्वानों की थ्योरी तर्क इसलिए. खारिज कर दी थी कि उसका सबूत कमजोर था, उसके अपने लोग उसके लिए सबूत गढ़ रहे हैं।. इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है? यह एक. इंपॉर्टेंट पार्ट था। अब आते हैं अंबेडकर. जी के अगले वायरल कोड पर। क्या अंबेडकर जी. ने कभी यह कहा था कि मैं संविधान जला. दूंगा? यह वो लाइन है जो हर बहस में तलवार की तरह. खींच आती है। एक तरफ के लोग कहते हैं कि.
देखो खुद संविधान बनाने वाला ही उसे जलाना. चाहता था। तो अगर हम बदलने की बात करें तो. क्या हर्ज है? दूसरी तरफ के लोग कहते हैं. कि अंबेडकर साहब ने कभी नहीं कहा कि वो. संविधान जलाएंगे। यह गढ़ा हुआ झूठ है। अब. सच क्या है? यह समझना जरूरी है। देखिए, यह. कोई फर्जी कोर्ट नहीं है। यह संसद के. रिकॉर्ड में दर्ज है। तारीख थी 2 सितंबर. 1953। जगह थी राज्यसभा। बहस चल रही थी. आंध्र स्टेट बिल पर यानी भाषा के आधार पर.
आंध्र राज्य बनाने की मांग। यह वही मामला. था जिसमें पोटी श्री रामलू आमरण अनशन पर. करते हुए अपनी जान गवा चुके थे और सरकार. तब जागी थी। अंबेडकर उस दिन खफा थे और. उनका खफा होना इस बात का था कि नए राज्य. में अल्पसंख्यकों को जिसमें दलित भी शामिल. थे जुल्म, दमन और सांप्रदायिकता से बचाने. के लिए ठोस इंतजाम नहीं किए जा रहे थे।. उन्होंने सुझाव दिया था इसके लिए राज्यपाल. को विशेष अधिकार दिए जाए और इसी बहस के. बीच वो लाइन निकली कि मैंने संविधान को. बनाया है। मैं बता दूं इसे जलाने वाला.
पहला आदमी मैं ही रहूंगा और यहीं ठीक इसी. जगह पर हर आदमी कहानी को रोक देता है। वो. स्क्रीनशॉट लेकर काट देता है। भाषण खत्म. कर देता है। लेकिन कहानी यहीं असली शुरू. होती है। क्योंकि इसके ढाई साल बाद 19. मार्च 1955 को राज्यसभा में फिर बहस चल. रही थी। और इस बार चौथे संविधान संशोधन पर. पंजाब से सांसद डॉ. अनूप सिंह ने खड़े. होकर अंबेडकर को उनकी वही पुरानी बात याद. दिलाई कि आप तो संविधान जलाने की बात करते. थे और अंबेडकर ने जवाब दिया वो इस पूरे. किस्से का दिल है। उन्होंने कहा पिछली बार.
जल्दबाजी में वजह नहीं बता पाया था। आज. मेरे दोस्त ने मौका दिया है तो सुन लीजिए।. हमने मंदिर एक देवता के लिए बनाया ताकि वह. आकर उसमें विराजे। लेकिन देवता के स्थापित. होने से पहले ही अगर उसमें राक्षस कब्जा. कर लेते हैं तो मंदिर गिरा देने के अलावा. रास्ता क्या बचता है? हमने यह मंदिर. असुरों के लिए नहीं बनाया था। देवताओं के. लिए बनाया था। इसलिए मैंने कहा था मैं इसे. जला देना चाहूंगा। और अब वो हिस्सा सुनिए. जो लगभग कोई नहीं सुनता। उसी बहस में.
बिहार के सांसद बीकेपी सिन्हा ने बीच में. टोका और कहा कि मंदिर गिराने के बजाय. राक्षस खत्म कर दीजिए। और अंबेडकर का जवाब. कुछ शब्दों का था। यह नहीं हो सकता। हमारे. पास इतनी ताकत नहीं है। यह एक थके आदमी का. जवाब था। संविधान से नफरत करने वाले का. नहीं। और उसी दिन उसी बहस में यह भी कहा. था कि जो संविधान इस देश को मिला है वह. शानदार दस्तावेज है और यह कहते हुए गर्व. महसूस होता है। यानी एक ही आदमी एक ही दिन. एक ही सदन में संविधान को शानदार भी कह.
रहा है और जलाने की बात भी दोहरा रहा है।. विरोधाभास आपको यह लग रहा होगा लेकिन यह. विरोधाभास नहीं है। बशर्ते आप उनके तर्क. को समझने की कोशिश करें। उनकी शिकायत उन. पन्नों से नहीं थी। उनकी शिकायत उन लोगों. से थी जो उन पन्नों को चलाने की कुर्सी पर. बैठे थे। नाराजगी मंदिर से नहीं थी। मंदिर. पर कब्जा जमाए लोगों से थी। और यह बात याद. रखिएगा कि 1953 और 1955 की बात है। यानी. उस दौर की जब वो हिंदू कोर्ट बिल अटकने पर. 1951 में मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके.
थे। और सरकार से उनका भरोसा लगातार टूट. रहा था। यह गुस्सा घट नहीं रहा था, बढ़. रहा था और इसे सब ठीक था। बस लागू करने. में जरा दिक्कत थी कहकर हल्का कर देना. उतनी ही बेईमानी होगी जितनी इसे संविधान. के खिलाफ बताना। तो जो लोग यह आधी लाइन. उठाकर कहते हैं कि संविधान बनाने वाले को. खुद संविधान पसंद नहीं था वो पूरी कहानी. नहीं बता रहे।. असली सवाल हालांकि इन दोनों से बड़ा है और. वह यह है कि अगर संविधान बनाने वाला आदमी. अपने ही बनाए मंदिर को देखकर कह रहा है कि.
इस पर तो राक्षसों ने कब्जा कर लिया तो 70. साल बाद हमें यह पूछने की हिम्मत करनी. चाहिए या नहीं कि आज उस मंदिर पर कौन बैठा. है? अब अगला सवाल बड़ा इंपॉर्टेंट है।. क्या डॉ भीमराव अंबेडकर सिर्फ एक जाति के. नेता थे? [संगीत]. यह इस देश में सवाल सबसे ज्यादा सुविधा के. साथ पूछा जाता है। कुछ लोग इसे तंज में. पूछते हैं कि वह तो बस अपने समाज की बात. करते थे। कुछ लोग इसे प्यार में मानते हैं. कि वह हमारे समाज के मसीहा थे और मजे की.
बात यह है कि दोनों मिलकर उन्हें एक ही. डिब्बे में बंद कर देते हैं। एक कहता है. कि सिर्फ इतने ही थे और दूसरा कहता है. सिर्फ हमारे थे। और इसी चक्कर में उनका. आधा जीवन कहीं गायब हो जाता है। तो आइए. इसको भी समझते हैं। जुलाई 1942 में. अंबेडकर वायसराय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल. में लेबर मेंबर बनते हैं। यानी उस दौर के. हिसाब से देश के श्रम मंत्री और अगले 4. साल तक इस कुर्सी पर रहते हैं। 27 नवंबर. 1942 नई दिल्ली सातवां भारतीय श्रम. सम्मेलन उस वक्त इस मुल्क कानून हफ्ते के.
54 घंटे और दिन के 10 घंटे की इजाजत देता. था। फैक्ट्री की जमीन पर हालात उससे बुरे. थे। इसी सम्मेलन में 8 घंटे की शिफ्ट का. प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया और 1946 में. फैक्ट्रीज एक्ट में संशोधन करके हफ्ते के. घंटे 54 से घटाकर 48 कर दिए गए। यहीं पर. एक बात समझना जरूरी है क्योंकि इस पर सबसे. ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर बुलाता है। 8 घंटे की. शिफ्ट का विचार अंबेडकर जी ने इजाजद नहीं. किया था। यह लड़ाई दुनिया भर के मजदूर.
19वीं सदी से लड़े थे। 1919 यानी साल 1919. में आईएलओ इसे अपना पहला अंतरराष्ट्रीय. मानक बना चुका था। तो सही वाक्य यह है कि. लड़ाई शुरू उन्होंने नहीं की। पर इस मुल्क. में कानून की शक्ल देखकर उसकी मेज पर. उतारी। अब वो अपने आप में कोई छोटी बात. नहीं है। इस दौर में औरत मजदूरों के लिए. मातृत्व लाभ का इंतजाम हुआ। बराबर काम. करने के लिए बराबर मजदूरी का सिद्धांत. सामने रखा गया। प्रोविडेंट फंड का ढांचा. खड़ा हुआ। रोजगार दफ्तर यानी एंप्लॉयमेंट.
एक्सचेंज शुरू हुए। सामाजिक सुरक्षा का वो. पूरा खा बना जो 1948 में जाकर कर्मचारी. राज्य बीमा यानी ईएसआई की शक्ल में सामने. आया और आज आपकी कंपनी जो मेडिकल सुविधा. देती है उसकी जड़े यहीं दबी हैं। इसी दौर. में दामोदर वैली से लेकर हीराकोट तक देश. की बड़ी नदी घाटी योजनाओं का खाका बना।. पानी और सिंचाई के लिए वह केंद्रीय आयोग. बना जो आगे चलकर सेंट्रल वाटर कमीशन बना. और बिजली के लिए वह तकनीकी बोर्ड बना जो. आगे चलकर बिजली ढांचे की बुनियाद बना।.
यानी चाहे बांध हो, बिजली हो, पानी हो।. इनकी जो व्यवस्था आज हम देखते हैं उसका. नक्शा उस आदमी की मेज पर था जिसे हम सिर्फ. एक जाति का नेता कहकर कोने में बिठाते. हैं। यहां एक बात ईमानदारी की भी क्योंकि. इस वीडियो बढ़ा चढ़ाकर बोलना नहीं है। यह. सारे फैसले अकेले किसी एक आदमी के नहीं. थे। उस काउंसिल में और भी लोग थे।. अंग्रेजी सरकार अपनी जरूरतों से चल रही थी. और युद्ध का दबाव भी एक बड़ी वजह था कि. मजदूरों को खुश रखना पड़े। पर विभाग उनके.
पास था। फाइल उनकी मेज से गुजरती थी और. दिशा उन्होंने तय की। इसे अंबेडकर ने. अकेले कर लिया। कहना गलत होगा और अंबेडकर. का इसमें कुछ भी नहीं था। वो इससे बड़ा. झूठ होगा। अब वो लड़ाई जिसका वादा हमने इस. वीडियो की शुरुआत में किया था। आप याद. कीजिए औरतों को वोट देने का हक अंबेडकर ने. पूरी तरह से नहीं दिलाया। कानून बनाया था।. लेकिन औरतों के लिए एक लड़ाई अंबेडकर साहब. ने लड़ी थी। जिसमें वह हार गए थे। वो. लड़ाई थी हिंदू कोड बिल।.
आजादी के बाद कानून मंत्री बनने पर. उन्होंने यह बिल आगे बढ़ाया जिसमें हिंदू. औरतों को तलाक का हक, पिता की जायदाद में. हिस्सा और गोद लेने से लेकर शादी तक के. मामलों में बराबरी देने की बात थी। यह बिल. दलितों के लिए नहीं था। यह उन्हीं ऊंची. जातियों की औरतों के लिए था जिन पर. अंबेडकर साहब से भेदभाव करने का आरोप था. और जब यह बिल संसद में अटक गया तो सितंबर. 1951 में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा. दिया। 10 अक्टूबर 1951 को अपनी बात सबके. सामने रखी। अब आप ठहर कर सोचिए कुर्सी.
छोड़ना आसान काम नहीं होता और वो कुर्सी. उस आदमी ने छोड़ी जिसके पास खोने को सबसे. ज्यादा था और छोड़ी भी किसके लिए उन औरतों. के हक के लिए जो उनकी अपनी जाति की नहीं. थी।. यह वो कहानी है 14 अप्रैल ये किसी फॉरवर्ड. में नहीं मिलती। क्योंकि उसमें जीत है।. ऐसे आदमी को एक जाति के डिब्बे में बंद. करना क्या उसका अपमान नहीं है? सोचिएगा क्या यह हमारी अपनी नजर का छोटा. होना नहीं है? बड़ा इंपॉर्टेंट सवाल है.
यह। और फिर बताइएगा क्या अंबेडकर किसी एक. जात के थे? हैं? सोचिएगा। अगला सवाल क्या. डॉ. अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे? यह आरोप आज भी चलता है और इसके पीछे तीन. बातें गिनाई जाती हैं। पहली कि वो गोलमेश. सम्मेलनों में लंदन जाकर बैठते थे। जबकि. कांग्रेस पहला सम्मेलन बहिष्कार कर रही. थी। दूसरी कि उन्होंने दलितों के लिए अलग. वोटर लिस्ट और अलग उम्मीदवार वाली.
व्यवस्था मांगी जिससे समाज बढ़ता। तीसरी. 1942 में उन्होंने अंग्रेजी सरकार की. काउंसिल में मंत्री पद ले लिया। वो भी उसी. साल जब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। और. कांग्रेस के हजारों लोग जेल में थे। अब. आरोप को उसके सबसे मजबूत रूप में रखा गया।. अब इसका जवाब आपको बताते हैं। 20 नवंबर. साल 1930 लंदन पहला गोलमेज सम्मेलन वहां. खड़े होकर अंबेडकर साहब ने जो कुछ कहा था. वो आज भी सम्मेलन के सरकारी रिकॉर्ड में. दर्ज है। उन्होंने कहा कि वह 4 करोड़ 30.
लाख लोगों की तरफ से बोल रहे हैं। यानी. ब्रिटिश भारत के कुल आबादी के पांचवें. हिस्से की तरफ से। फिर उन्होंने अंग्रेजों. के मुंह पर कहा उनके जख्म आज भी खुले पड़े. हैं और भरे नहीं है। जबकि ब्रिटिश राज के. 150 साल गुजर चुके हैं। और उन्होंने यह भी. कहा कि वह अंग्रेजों पर बेरुखी का इल्जाम. नहीं लगाते बल्कि उनका नतीजा यह है कि. अंग्रेज इस समस्या का हल करने के काबिल. नहीं है। और सबसे बड़ी बात उन्होंने साफ. कहा कि दलित समाज आजादी की मांग अपने बाकी.
देशवासियों के साथ पूरी तरह खड़ा है। जब. तक सत्ता उनके हाथ में नहीं आती, उनकी. शिकायतें कोई नहीं दूर कर सकता। अब उल्टी. बात देखिए। जिस मंच पर जाने के लिए उन्हें. आज तक अंग्रेजों का पिट्ठू कहा जाता है, उसी मंच पर अंग्रेजी राज को नाकाबिल बताया. और 150 साल को बेकार बताया। एजेंट अपने. मालिक के घर जाकर मालिक की खिल्ली उड़ा. सकता है। अब आते हैं 1942 पर। जो असली. आरोप है। जब लाखों लोग जेल जा रहे थे, तब. उन्होंने अंग्रेज सरकार की कुर्सी क्यों.
ली? इसका जवाब समझने के लिए उनकी सोच का. वह हिस्सा समझना पड़ेगा जो आज भी असहस. करता है। उनकी लड़ाई में दुश्मन एक नहीं. थे। एक अंग्रेज और दूसरी जाति और उनका. हिसाब यह था कि अंग्रेज तो एक दिन चले. जाएंगे जाति नहीं जाएगी। जिस दिन अंग्रेज. जाएंगे अगर उससे पहले उनके लोगों के हाथ. कोई हक, कोई कानून, कोई हिस्सदारी नहीं. होगी तो एक मालिक की जगह दूसरा मालिक आकर. बैठ जाएगा और उनके लिए कुछ नहीं बदलेगा।. इसलिए उन्होंने वहां जगह बनाई जहां कानून. बनते थे और उस मेज से जो निकला वो हमने.
अभी गिनाया। 8 घंटे की शिफ्ट, मातृत्व. लाभ, प्रोविडेंट फंड, रोजगार दफ्तर यह. किसी वफादारी का इनाम नहीं था। यह 4 साल. की मेहनत का नतीजा था और वो कुर्सी 1946. में उन्होंने खुद छोड़ी। और इस आरोप का. आखिरी जवाब वक्त ने खुद दिया कि अगर वह. सचमुच अंग्रेजों के आदमी होते, तो 1947. में अंग्रेजों के जाते ही उनका करियर खत्म. हो जाना चाहिए था। पर हुआ क्या? इसका. उल्टा। आजाद भारत की पहली सरकार ने उन्हें. कानून मंत्री बनाया। उसी संविधान सभा ने.
उन्हें ड्राफ्टिंग कमेटी का अध्यक्ष चुना. जिसमें बहुमत उसी कांग्रेस का था जिससे. जिंदगी भर वह बढ़ते रहे। एजेंटों को आजादी. के बाद इनाम नहीं मिलते हिसाब मिलता है।. पर यहां पर एक बात ईमानदारी की भी। अगर. वोटर लिस्ट की मांग असती थी और उस पर उस. दौर में गहरी असहमति थी। बहुत लोगों को. लगता था कि इससे समाज का बंटवारा पक्का हो. जाएगा और यह डर बेवजह नहीं था। यह बहस उस. वक्त भी जायज थी और आज भी जायज है। लेकिन. असहमति और गद्दारी में जमीन आसमान का फर्क. होता है। किसी की रणनीति से असहमत होना एक.
बात है और उसे विदेशी ताकत का एजेंट कह. देना दूसरी बात है। पहली में बहस होती है।. दूसरी में बहस खत्म हो जाती है और शायद. यही असली मकसद होता है। अब अंबेडकर को. लेकर एक रोचक सवाल। क्या अंबेडकर को. अंबेडकर नाम एक ब्राह्मण ने दिया था? क्या. ऊंची जातियों ने उन्हें खड़ा किया था? देखिए यह सवाल कभी अकेला नहीं आता। यह तीन. सवाल के पैकेज में आता है। एक कि वो गरीब. थे ही नहीं। दूसरा उनका नाम एक ब्राह्मण.
मास्टर का दिया हुआ था और उनकी दूसरी. पत्नी ब्राह्मण थी। अब मैं आपको पहले ही. बता देता हूं तीनों बातें अलग-अलग सच है।. पूरा खेल इसमें नहीं है कि यह सच है या. नहीं है। पूरा खेल इसमें है कि तीनों को. एक साथ जोड़कर एक चौथी बात बेच दी जाती है. जो झूठ है कि इस आदमी को खड़ा तो ऊंची. जातियों ने किया था। फिर यह लड़ता उनके. खिलाफ रहा। तो आइए, तीनों को डिकोड करते. हैं और आप खुद समझिएगा कि सच क्या है।. सबसे पहले गरीबी। फिल्मों और भाषणों में. जो तस्वीर बनाई जाती है, वह कुछ ऐसी कि.
फटे कपड़े, भूखा पेट और एक बच्चा जो. अंधेरे से पढ़कर ऊपर गया। लेकिन असली. तस्वीर अलग है। उनके पिता रामजी मालोजी. सकपाल ब्रिटिश फौज में सूबेदार मेजर थे।. उन्होंने पुणे से पढ़ाने का डिप्लोमा लिया. था और 14 साल तक फौजी स्कूल के हेड मास्टर. रहे। उनके दादा मालोजी सकपाल भी फौज में. थे और अंबेडकर की मां भीमाबाई जी के घर. में तो उनके पिता और छवो चाचा सब सूबेदार. मेजर थे। यानी यह फौजी परिवार था जो पढ़ा.
लिखा परिवार था। गांव के मजदूर का परिवार. बिल्कुल नहीं था। सवाल कि क्या वो अमीर. थे? अ के दशक में रिटायर होने के बाद पिता. को महीने के ₹50 पेंशन मिलती थी। और उसी. से 14 बच्चों वाला परिवार चलता था। जिनमें. ज्यादातर बचपन में चल बसे। साल 1904 में. परिवार बंबई आया और लोअर परेल की एक चोल. में एक ही कमरे में रहने लगा। इसी इलाके. में जहां मिलके मजदूर रहते थे। यानी सही. शब्द गरीब नहीं है। सही शब्द है तंगहाली.
में जीता हुआ मध्यम परिवार जिसका मुखिया. इज्जत पर अड़ा रहा कि बच्चे पढ़ेंगे चाहे. कुछ भी हो जाए। अब वो बात जो इस तर्क की. कमर तोड़ती है। उस फौज में महार सिपाहियों. को कम तनख्वाह मिलती थी। रहने की खराब जगह. मिलती थी। वह चाहे कितने भी काबिल हो, कमांडिंग अफसर क्यों ना बन जाए। यानी. सूबेदार मेजर बन जाना बराबरी नहीं थी। एक. छत वाली नौकरी थी जिसके ऊपर दरवाजा पहले. से बंद था। इसलिए यह मिथक टूटने से उनकी. कहानी छोटी नहीं बल्कि और बड़ी होती है।. क्योंकि अगर उनका दुश्मन सिर्फ गरीबी होती.
तो पैसा आते ही मामला खत्म होना चाहिए था।. पर हुआ क्या? 1917 में वह अमेरिका और लंदन. से पढ़कर विदेश की डिग्रियां लेकर बड़ौदा. रियासत में ऊंचे ओदे पर नौकरी करने. पहुंचे। उस वक्त वह हिंदुस्तान के सबसे. पढ़े लिखे लोगों में से एक थे और उस आदमी. को शहर में रहने के लिए एक कमरा तक नहीं. मिला क्योंकि जाति पता चलते ही दरवाजे बंद. होते थे। एक पारसी सराय में झूठा नाम. बताकर ठहरना पड़ा और वहां भी भेद खुलते. लोग डंडे लेकर आए। सामान समेट कर निकलना. पड़ा। दिन में वह रियासत के अफसर थे और.
उसी शाम उनके पास सिर छुपाने की जगह नहीं. थी। अब दूसरी बात नाम डॉ भीमराव अंबेडकर. के नाम को लेकर बड़ी चर्चा चलती है। उनके. परिवार का असली सरनेम अंबेडकर नहीं था। वो. था सखपाल। उनके पुरखे रत्नागिरी जिले के. आम डवे गांव के थे। और उस जमाने में. महाराष्ट्र में चलन यह था कि स्कूल के. रजिस्टर में बच्चे का नाम उसके गांव के. नाम से लिखा हुआ था। इसलिए जब उनके पिता. ने सतारा के स्कूल में दाखिला करवाया तो.
नाम लिखवाया गया आर्म्ड वेकर यानी आमड़वे. गांव वाला और यही उनके एक मास्टर थे. कृष्णा जी केशव आंबेडकर जो ब्राह्मण थे और. इस बच्चे से बहुत प्यार करते थे और. उन्होंने रजिस्टर में आंबेड वेकर काटकर. अपना सरनेम आंबेडकर लिख दिया। अब सवाल यह. है कि सबूत क्या है? क्योंकि इस पर वाकई. झगड़ा होता है। सबसे भारी सबूत यह है कि. यह बात खुद अंबेडकर ने कही थी। 13 अप्रैल.
1947 को मराठी पत्रिका नवयुग में छपी एक. बातचीत में उन्होंने खुद बताया था कि उनका. असली सरनेम आंबडवेकर था। गांव का नाम. आंबड़वे था और यह सरनेम उनके मास्टर जी ने. दिया था। उसी बातचीत में दोनों वजह एक साथ. मौजूद है कि मास्टर को आंबेडकर बोलना. अटपटा लग रहा था और यह भी कि उस बच्चे पर. उनका प्यार था। इसके अलावा जिन तीन लोगों. ने उनकी सबसे बड़ी जीवनियां लिखी धनंजय. की, चांगदेव और वसंत मून तीनों के यहां यह.
बात दर्ज है। महाराष्ट्र में अंबेडकर पर. सबसे ज्यादा काम करने वाले जानकारों में. से एक हरी नरके ने भी इसे सही बताया है।. तो सीधा जवाब यह है कि हां यह बात सही. मानी जाती है कि अंबेडकर को नाम उनके. मास्टर साहब ने दिया। अब वो हिस्सा जिसके. लिए यह सवाल उठाया जाता है क्योंकि उसी. सतारा के स्कूल में उसी दौर में इस बच्चे. के साथ क्या हो रहा था वो भी सुन लीजिए।. क्लास में तो बैठने दिया गया पर बाकी. बच्चों के साथ नहीं कोने में अलग वो भी.
अपने घर से लाई हुई बोरी जिसे छुट्टी के. बाद खुद उठाकर जाना पड़ता था क्योंकि उसे. कोई हाथ नहीं लगाता था। कहा जाता है नाई. उनके बाल काटने को तैयार नहीं थे। यह काम. घर में उनकी बड़ी बहन करती थी और सबसे. बुरा हाल पानी का था। नल को छूने की. परमिशन नहीं। इसलिए स्कूल का चपरासी ऊपर. से पानी गिराता, वह नीचे मुंह खोलकर पी. लेते और जिस दिन चपरासी छुट्टी पर उस दिन. पानी नहीं मिलता था। यह बात किसी और ने. नहीं लिखी। यह बात उन्होंने लिखी और इसका. शीर्षक रखा था चपरासी नहीं तो पानी नहीं।.
तो एक ही स्कूल, एक ही उम्र, एक ही बच्चा।. एक तरफ मास्टर उसे प्रणाम दे रहा था। उसी. स्कूल में पानी नहीं मिल रहा था। और अब. तीसरी बात शादी। अंबेडकर की पहली पत्नी. रमाबाई का निधन 1935 में हुआ था। उसके बाद. 13 साल तक शादी का ख्याल नहीं किया। फिर. 40 के दशक में आखिर में उनकी सेहत टूटने. लगी। डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, पैरों में. नसों वाला दर्द जो रातों को नींद उड़ा रहा. था। इसी इलाज के दौरान साल 1947 में डॉ.
अंबेडकर की मुलाकात डॉ. शारदा कबीर से. होती है जो ग्रैंड मेडिकल कॉलेज से. एमबीबीएस थी और उस जमाने की गिनीचुनी. औरतों में से थी जिन्होंने डॉक्टरी की. पढ़ाई पूरी की थी। वो सारसत ब्राह्मण. परिवार से आती थी। दोनों के बीच चिट्ठियों. का सिलसिला चला जिसमें बात सिर्फ दवा की. नहीं होती। बुद्ध की समाज की किताबों की. होती थी। 15 अप्रैल साल 1948 को अपने. 97वें जन्मदिन के ठीक अगले दिन डॉ. अंबेडकर ने दिल्ली में उनसे शादी की और. शादी सिविल मैरिज एक्ट के तहत हुई। यानी.
किसी धार्मिक रीति से नहीं हुई। शारदा. कबीर अब सविता अंबेडकर थी। हालांकि वह. उन्हें आखिर तक शाहरुख बुलाते थे और. उन्हें मानने वालों ने उन्हें माई साहब तक. कह दिया था। हां, इस शादी में बहुत लोग. नाराज हुए थे। खुद अंबेडकर के खेमे के लोग. भी नाराज हुए थे। जिन्हें यह बात हजम नहीं. हुई थी। अब वो बात जिसके लिए पूरा हिस्सा. रखा गया। 1936 में लिखी अपनी सबसे मशहूर. किताब एनिलेशन ऑफ कास्ट में अंबेडकर साफ. लिख चुके थे कि जाति तोड़ने की असली दवा. दूसरी जाति में शादी है। क्योंकि जब तक.
खून नहीं मिलेगा तब तक अपनापन नहीं आएगा।. यानी जो बात उन्होंने 1936 में कागज पर. लिखी थी 1948 में अपनी जिंदगी में करके. दिखाई थी। तो अब तीनों को एक साथ रखकर. देखिए। हां, वो भूखे नहीं मरे। हां, नाम. एक ब्राह्मण ने उन्हें दिया था। और यह भी. सच है कि पत्नी ब्राह्मण थी। तीनों सच. जानने के बाद एक चौथी बात जिसका जिक्र. करना जरूरी है। क्योंकि जिस आदमी के पास. घर था उसे कमरा नहीं मिला। जिसे मास्टर ने. नाम दिया उसे स्कूल में पानी नहीं मिला।.
और जिससे ब्राह्मण से शादी की उसने वो. अपनी लिखी किताब पर अमल करते हुए की। अब. जो लोग इन तीनों को तंज की तरह उछालते हैं. वो असल में अपने बारे में एक बात बता रहे. होते हैं कि उन्होंने इस आदमी की एक भी. लाइन नहीं पढ़ी है। और ये एक बहुत बड़ा सच. है। ये सच कितना शॉकिंग था ये आप हमें. कमेंट सेक्शन में बता सकते हैं क्योंकि. बहुत सारे लोगों को यह वाला सच नहीं पता. था। अगला सवाल है क्या अंबेडकर साहब. कम्युनिस्ट थे? [संगीत].
यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि उनका सारा. काम गरीब, मजदूर और सबसे नीचे दबे हुए. आदमी के इर्द-गिर्द घूम रहा था। और इस देश. में एक आदत बन गई है कि जो भी गरीब की बात. करे उसे किसी ना किसी खाने में डाल दो। तो. जवाब क्या है? जवाब वो है जो दोनों तरफ के. लोगों को चुभेगा। पहला वो हिस्सा जो राइट. विंग को असह करेगा। अंबेडकर पूंजीवाद के. भक्त बिल्कुल नहीं थे। साल 1948 में. उन्होंने स्टेट्स एंड माइनॉरिटीज नाम का. एक दस्तावेज रखा जिसमें उनका प्रस्ताव था. कि देश के बड़े उद्योग और बीमा सरकार के.
हाथ में हो और खेती की जमीन को भी सरकारी. मालिकाने में लाकर सामूहिक तरीके से चलाया. जाए। अब यह कोई हल्कीफुल्की बात नहीं है।. यह उस दौर का बहुत आगे बढ़ा हुआ समाजवादी. खाका था। यानी जो लोग आज उनका नाम लेकर. बाजार की तारीफ करते हैं उन्होंने यह कागज. कभी खोला ही नहीं। अब वो हिस्सा जो दूसरी. तरफ को चुभेगा। 20 नवंबर साल 1956 को. काठमांडू में बौद्ध धर्म के एक बड़े. सम्मेलन में उन्होंने एक भाषण दिया जिसका.
नाम था बुद्धा और कार्ल मार्क्स। यह उनकी. जिंदगी के आखिरी हफ्तों की बात है। इसके. सिर्फ 16 दिन बाद उनका निधन हो गया। यानी. किसी जवानी के जोश में दिया गया भाषण नहीं. था। यह एक बीमार आदमी का आखिरी भाषण था।. उस भाषण में उन्होंने कहा कि बुद्ध और. मार्क्स की मंजिल एक ही है। दोनों दुख और. शोषण खत्म करना चाहते हैं। झगड़ा मंजिल का. नहीं रास्ते का है। और कम्युनिस्टों का. रास्ता क्या है? उनके मुताबिक दो ही चीजें. हिंसा और मजदूरों की तानाशाही। उन्होंने.
साफ कहा कि बुद्ध का तरीका समझाने का है, प्यार का है, नैतिक शिक्षा का है। और वो. हिंसा की इजाजत नहीं देता। फिर उन्होंने. वो लाइन कही जो सबसे कड़वी है।. कम्युनिस्टों को नतीजे जल्दी मिल जाते हैं. क्योंकि जब आप आदमी को मिटा देने का. रास्ता चुनते हैं तो विरोध करने के लिए वो. बचता ही नहीं। उन्होंने अपने कम्युनिस्ट. दोस्तों से कुछ अच्छे सवाल भी पूछे थे. जिसका जवाब कभी नहीं मिला और सबसे बड़ा. सवाल यह था कि तानाशाही के बाद क्या? आप. कहते हैं कि राज एक दिन अपने आप खत्म हो.
जाएगा। पर वो दिन कब आएगा? उसकी गारंटी. क्या है? उन्होंने यह भी लिखा कि मार्क्स. की यह बात कि समाजवाद अपने आप आएगा। वह. इतिहास ने गलत साबित कर दी और इस पूरे. झगड़े की जड़ इससे भी पुरानी है। 30 के. दशक में मुंबई के मिलों में अंबेडकर और. कम्युनिस्ट आमने-सामने थे और उनका सबसे. बड़ा इल्जाम कम्युनिस्टों पर यही था कि यह. लोग सिर्फ वर्ग देखते हैं। जाति देखते ही. नहीं। मजदूर को मजदूर मानकर हिसाब लगाते. यह भूल जाते हैं कि उस मिल के अंदर भी एक.
मजदूर दूसरे मजदूर के हाथ का पानी तक नहीं. पीता। तो जवाब यह है कि वह कम्युनिस्ट. नहीं थे पर वह पूंजीवादी भी नहीं थे। वो. चाहते थे कि गरीब का हक बंदूक से नहीं वोट. और कानून से आए और उनका सारा जीवन इसी. इज्जत का नाम था। अगला सवाल क्या अंबेडकर. आर्य आक्रमण सिद्धांत के समर्थक थे? आज इस देश में जो कहानी सबसे ज्यादा सुनाई. जाती है वो यह कि बाहर से आर्य आए और. उन्होंने यहां के मूल निवासियों को हराया।.
उन्हीं हारे हुए लोगों को शूद्र और अछूत. बना दिया गया और यह कहानी अक्सर अंबेडकर. के नाम से जोड़कर सुनाई जाती है। सच्चाई. यह है कि यह कहानी उन्होंने खारिज कर दी. थी। साल 1946 में उनकी किताब आई हु वेयर द. शूद्रास जो उन्होंने महात्मा ज्योतिराव. फुले को समर्पित की थी और उस किताब में. उन्होंने अंग्रेज विद्वानों की घड़ी हुई. आर्य नस्ल वाली पूरी थ्योरी की धज्जियां. उड़ा दी। उसके नतीजे बहुत सीधे थे। पहला. कि वेदों को आर्य नाम की कोई नस्ल पता ही.
नहीं है। और उनमें कहीं इस बात का कोई. सबूत नहीं कि आर्य नाम की कोई कौम भारत पर. हमला करके यहां के लोगों को जीत ले गई हो।. और दूसरा कि आर्य दास्य और दस्यु का जो. फर्क बताया जाता है वह नस्ल का फर्क नहीं. था। उन्होंने लिखा आर्य कोई नस्ल का नाम. नहीं बल्कि एक भाषा और संस्कृति से जुड़ा. शब्द है। उनका तर्क यह था कि पश्चिमी. विद्वानों ने पहले नतीजा तय किया और फिर. उसे साबित करने के लिए शब्द चुने। यानी यह. जांच नहीं थी। जांच का नाटक था और फिर.
उन्होंने वो बात लिखी जो आज भी चौंकाती है. कि ब्राह्मण और अछूत एक ही नस्ल के लोग. हैं। अगर ब्राह्मण द्रविड़ है तो अछूत भी. द्रविड़ है और अगर ब्राह्मण नाग है तो. अछूत भी नाग है। अब आप समझिए. उनका पूरा तर्क क्या कह रहा था? वह कह रहे. थे कि जाति का जुल्म असली है, जबरदस्त है।. उसके खिलाफ लड़ना होगा। लेकिन उस जुल्म को. साबित करने के लिए दो अलग-अलग नस्लों की. काल्पनिक कहानी की जरूरत नहीं है। उनके. हिसाब से शूद्र बाहर से आए हुए हारे.
[नाक से की जाने वाली आवाज़] हुए लोग नहीं. थे। बल्कि उसी समाज का हिस्सा थे जिसे बाद. में धकेल कर नीचे किया गया। यानी लड़ाई. खून की नहीं थी, व्यवस्था की थी। और यहां. एक बात साफ करना जरूरी है। वरना यह हिस्सा. गलत हाथों में जाएगा। उनका यह नतीजा उनके. अपने जमाने में जो सबूत मौजूद थे उन्हीं. पर टिका था। उन्होंने यह जांच पूरी तरह. वेदों, पुराने ग्रंथों को पढ़कर की थी।. खुदाई के सबूत उस वक्त बहुत सीमित थे और. डीएनए वाला विज्ञान तो पैदा ही नहीं हुआ. था। आज ये सवाल बिल्कुल अलग औजारों से. जाचा जाता है और उसकी अपनी बहस है। इसलिए.
उनकी बात को आज के किसी भी पक्ष का. सर्टिफिकेट बनाकर पेश करना उनके साथ. बेईमानी होगी विज्ञान के साथ भी। पर एक. बात साफ है यह तथ्य आज के बहुत सारे लोगों. को असह कर सकता है और वो लोग उन्हीं के. नाम पर झंडा उठाकर घूम रहे हैं। जो आदमी. अपनी ही बात को सबूत कसौटी पर तोड़ने को. तैयार हो उसके नाम पर बिना पढ़े नारे लगाए. जा रहे हैं। अगला सवाल क्या अंबेडकर भाषा. के आधार पर राज्य बनने के खिलाफ थे?
इसका जवाब यह है कि वो तरीके खिलाफ थे जिस. तरीके से हो रहा था और उसकी वजह इतनी आगे. की थी कि आज 70 साल बाद भी वही बात इस देश. की सबसे बड़ी बहस है। 23 दिसंबर साल 1955. को औरंगाबाद में बैठकर एक छोटी सी किताब. खत्म की। थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स. जो राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों पर. उनका जवाब था। और उन्होंने जो सबसे पहली. बात पकड़ी वो थी राज्य के आकार का भारी. अंतर कि उनके अपने दिए आंकड़ों के हिसाब.
से उत्तर प्रदेश की आबादी 6 करोड़ के ऊपर. बैठ रही थी। बिहार के करीब 4 करोड़ जबकि. दक्षिण भारत के कई राज्य एक सवा करोड़ पर. सिमट रहे थे और यही उन्होंने वो बात लिखी. जो आज पढ़ने पर रोंगटे खड़े कर दिए हैं कि. आयोग की सिफारिशों का नतीजा यह होगा कि. उत्तर एकजुट हो जाएगा। दक्षिण टुकड़ों में. बट जाएगा। उन्होंने साफ पूछा क्या दक्षिण. उत्तर का दबदबा बर्दाश्त करेगा? अब जरा आज. की खबर उठाकर देखिए। जनगणना के बाद लोकसभा. की सीटों के बंटवारे को लेकर उत्तर और. दक्षिण के बीच तनातनी चल रही है। और यह.
हूबहू वही बहस है जो अंबेडकर जी 1955 में. लिख गए थे। उनका हल क्या था? सूत्र था एक. राज्य, एक भाषा और उन्होंने जोर देकर कहा. कि इसका उल्टा यानी एक भाषा एक राज्य. जरूरी नहीं। मतलब यह कि एक ही भाषा बोलने. वाले लोग कई राज्य में बंट सकते हैं और. इसमें कोई हर्ज नहीं है। इसी आधार पर. उन्होंने सुझाव दिया कि उत्तर प्रदेश को. तीन हिस्सों में बांटा जाए। बिहार को दो. हिस्सों में जिनकी राजधानियां पटना हो, रांची हो, मध्य प्रदेश को दो हिस्सों में, महाराष्ट्र को भी कई हिस्सों में मुंबई के.
लिए उनका अलग विचार था। उसे उन्होंने एक. अलग शहर राज्य बनाने का प्रस्ताव दिया था।. और एक सुझाव तो इससे बड़ा था कि देश की एक. दूसरी राजधानी भी होनी चाहिए। उसके लिए. उन्होंने हैदराबाद का नाम रखा था। अब. देखिए वक्त ने क्या किया। बाद में बिहार. से झारखंड बना।. राजधानी रांची बनी। मध्य प्रदेश से. छत्तीसगढ़ बना। उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड. बना। आंध्र से तेलंगाना बना। यानी जो बात. उन्होंने 1955 में लिखी थी। इस देश ने. अगले 50 साल में टुकड़ों-टुकड़ों में जाकर.
वही बात मानी। तो यह मिथक ही उल्टा है। वो. भाषा के दुश्मन नहीं थे। वो बड़े और भारी. राज्यों के दुश्मन थे। क्योंकि उनका मानना. था कि जब कोई एक राज्य इतना बड़ा हो जाए. कि पूरे देश की राजनीति उसकी मुट्ठी में आ. जाए तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता. है और उस डर पर हंसना आज थोड़ा मुश्किल है. क्योंकि आज उसी डर पर संसद में बहस हो रही. है। अब इस वीडियो का सबसे मजेदार हिस्सा. सबसे रोचक हिस्सा क्या गांधी विरोधी थे. अंबेडकर?
इस सवाल का जवाब आज दो तरह से दिया जाता. है और दोनों झूठ हैं। एक तरफ वो लोग हैं. जो कहते हैं कि दोनों में कोई झगड़ा नहीं. था। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो कहते हैं कि. दोनों एक दूसरे के जानी दुश्मन थे। और सच. यह है कि दोनों झूठ बोलते हैं क्योंकि. असली कहानी इसके बीच में है और वह कहानी. दिलचस्प है। गांधी जी और अंबेडकर जी में. टकराव असली था, गहरा था। दोनों की पहली. मुलाकात अगस्त 1931 में मुंबई में हुई थी.
और वहीं से हवा तनी हुई थी। फिर आता है 16. अगस्त 1932 जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री. रैंज़े ने कम्युनल अवार्ड का ऐलान किया. जिसमें दलितों को अलग वोटर लिस्ट का हक. मिल गया और अंबेडकर के लिए यह उनकी जिंदगी. की सबसे पहली जीत थी क्योंकि इसका मतलब था. दलित अपना नेता खुद चुनेंगे। ऊंची जातियों. के वोट के भरोसे नहीं रहेंगे और गांधी ने. इसे भारी चोट माना। उनका मानना था इससे. हिंदू समाज हमेशा के लिए दो हिस्सों में. कट जाएगा। इसीलिए 20 सितंबर 1932 को यमदा.
जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया। अब हालात. समझिए देश का सबसे बड़ा नेता जेल में भूखा. बैठा है। अखबार में उनकी सेहत की खबरें छप. रही हैं और पूरा मुल्क एक आदमी की तरफ. उंगली किए बैठा है। अगर गांधी जी की जान. चली जाती तो उसका सारा ठीकरा उस वक्त. दलितों के सिर फूटता और देश भर में उनके. खिलाफ हिंसा भड़क जाती। 24 सितंबर 1932 को. अंबेडकर ने पूना पैट पर दस्तखत किए और अलग. वोटर लिस्ट का हक छोड़ दिया। उन्होंने यह. कभी नहीं छुपाया कि यह फैसला दबाव में.
लिया गया था। पर अब वो हिस्सा देखिए जो. शायद ही कहीं बताया जाता है। इस समझौते. में दलितों के लिए प्रांतीय विधानसभाओं. में आरक्षित 71 से सीटें बढ़कर 148 हो गई।. यानी दोगुनी से ज्यादा। केंद्रीय विधानसभा. में 18% सीटें तय कर दी गई। यानी उन्होंने. एक हक गवाया और बदले में संख्या दोगुनी कर. ली। पर जो असली चेतावनी थी वह सीटों की. गिनती से कहीं ज्यादा थी और इसे जरा गौर. से सुनिए क्योंकि इस वीडियो के आखिर में. इसी बात पर लौटेंगे। दस्तखत के अगले ही. दिन 25 सितंबर 1932 को मुंबई की एक सभा.
में उन्होंने साफ कह दिया कि साझा वोटर. लिस्ट से चुनकर आने वाला दलित प्रतिनिधि. असल में दलितों का प्रतिनिधि होगा ही. नहीं। क्योंकि उसे जिताने वाले वोट ऊंची. जातियों के होंगे। इसलिए वह जवाबदेह भी. उन्हीं के प्रति रहेगा अपने समाज के प्रति. नहीं। और अब जरा आज के दौर में देखिए इस. देश में आज भी सबसे आम शिकायत यही है कि. आरक्षित सीट से जीता हुआ नेता पहले अपनी. पार्टी का होता है फिर अपने समाज का और यह. कोई नई शिकायत नहीं है। यह उस आदमी ने.
1932 में दस्तखत करने के 24 घंटे के भीतर. अपने हाथों से किए गए समझौते कमजोरी के. तौर पर बता दी थी। पर उनकी सबसे गहरी. लड़ाई नजरिए की थी। गांधी जी अछूतों को. हरिजन कहते थे। यानी ईश्वर के लोग। और. उनका रास्ता यह था कि ऊंची जाति के हिंदू. अपना दिल बदलें, छुआछूत छोड़ें। अंबेडकर. इसी बात पर भड़कते थे। उनका कहना था कि यह. तो भीख मांगना हुआ हक नहीं। अगर मेरा हक. तुम्हारे दिल बदलने पर टिका है तो जिस दिन.
तुम्हारा दिल नहीं बदला उस दिन मेरे लिए. कुछ नहीं बचेगा। इसलिए वह कानून, सत्ता और. हिस्सेदारी मांगते थे। दया नहीं। 1945 में. उन्होंने पूरी किताब लिख दी व्हाट. कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द. अनटचेबल्स। और 1955 में बीबीसी को दिए एक. इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा कि गांधी. को कभी महात्मा नहीं माना। पर तराजू का. दूसरा पलड़ा भी उतना ही ईमानदारी से रखना. होगा कि 1920 से गांधी और 1946 से गांधी. एक आदमी नहीं थे। 1935 में उन्होंने अपने.
अखबार हरिजन में लेख लिखा जिसका शीर्षक था. जाति को जाना होगा। 1946 आते-आते ऐलान कर. दिया था कि सेवा ग्राम आश्रम में किसी. जोड़े की शादी तभी होगी जब दोनों में से. एक हरिजन होगा। यानी आखिरी सालों में वो. सिर्फ अलग जाति में शादी के समर्थक नहीं. रह गए बल्कि उससे कम पर तैयार नहीं थे। और. यह सच भी है। गांधी जी के अनशन ने छुआछूत. को रातोंरात देश का सबसे बड़ा मुद्दा. बनाया था। तो सच क्या है? सच यह है कि यह. दो दुश्मनों की लड़ाई नहीं थी। यह दो ऐसे. आदमियों की लड़ाई थी जो एक ही बीमारी को.
पहचान चुके थे। बस एक दवा पर राजी नहीं. थे। एक कहता था समाज का दिल बदलो। दूसरा. कहता था समाज का कानून बदलो। आज 70 साल. बाद जब आप अखबार खोलते हैं और किसी गांव. में घोड़ी से उतारे गए दूल्हे खबर पढ़ते. हैं तो शायद यह मानना पड़ता है कि दोनों. में से किसी एक काम अब तक पूरा नहीं हुआ. है। लेकिन यह बात तो गांधी जी और अंबेडकर. जी की थी। असली सवाल तो यह है कि क्या. अंबेडकर और सावरकर के बीच में कोई तालमेल.
था? यह सवाल आज सबसे ज्यादा राजनीति के लिए. इस्तेमाल होता है और इसका जवाब इससे साफ. होना चाहिए। जवाब यह है कि एक बात पर. थोड़ा तालमेल था। बाकी हर चीजों पर. आमने-सामने की भिड़ंत थी और जो तालमेल था. उस पर भी सबूत आपस में लड़ रहे। पहले. तालमेल वाला हिस्सा सावरकर रत्नागिरी में. नजरबंद थे और वहां पर जाति के खिलाफ काफी. काम किया। फरवरी 1931 में वहां पतित पावन. मंदिर खुला जिसमें हर जाति के हिंदू को.
दाखिल होने का हक था। अब एक बात यहीं पर. साफ कर दें क्योंकि यह अक्सर गलत बताई. जाती है कि मंदिर की सोच सावरकर की थी पर. उसे बनवाने का पैसा भागोजी सेठ कीर का था. और खुद मंदिर के शिलालेख पर यह बात दर्ज. है। इसके अलावा सावरकर ने अलग-अलग जातियों. को एक पंगत में बिठाकर खाना खिलाने के. आयोजन किए। 22 फरवरी साल 1933 को छुआछूत. का पुतला भी जलवाया गया। अब वो चिट्ठी जो. आज सबसे ज्यादा उछाली जाती है। धनंजय कीर. जिन्होंने अंबेडकर और सावरकर दोनों की.
जीवनी लिखी। उन्होंने अपनी किताब में. अंबेडकर की एक चिट्ठी दर्ज की जिसमें. अंबेडकर सावरकर के सामाजिक सुधार वाले काम. की तारीफ करते हैं। पर उसी चिट्ठी में वो. एक शर्त भी जोड़ते हैं कि सिर्फ छुआछूत. हटाना काफी नहीं है। अगर अछूतों को हिंदू. समाज के इसलिए हिस्सा बनाना है तो पूरी जो. व्यवस्था है वर्ण की उसे तोड़ना होगा।. यानी वो पूरी सीढ़ी जिसमें ब्राह्मण सबसे. ऊपर, शूद्र सबसे नीचे। और अब वो हिस्सा जो. साथ में कहीं बताया नहीं जाता कि केर की.
किताब को इतिहासकार पूरी तरह सच नहीं. मानते क्योंकि वह सावरकर के प्रशंसक जीवनी. लेखक थे। और इससे भी बड़ी बात यह कि खुद. अंबेडकर के अखबार जनता में पतित पावन. मंदिर की आलोचनाएं भी छपी थी। यानी एक तरफ. तारीफ वाली चिट्ठियां हैं। दूसरी तरफ. उन्हीं के अखबार की आलोचना और जो लोग. इनमें से सिर्फ एक दिखाते हैं वो अधूरा सच. बता रहे हैं। बुनियादी फर्क तो कहीं गहरा. है कि सावरकर के लिए जाति सुधार हिंदू. समाज को मजबूत और एकजुट रखने का जरिया था।.
जबकि अंबेडकर के लिए सवाल एकता का था ही. नहीं बराबरी का था। सावरकर हिंदू राष्ट्र. की बात करते थे और अंबेडकर ने 1936 में. एनिशन ऑफ कास्ट लिखकर कहा कि जाति की जड़. धर्म ग्रंथों में है। जब तक उन ग्रंथों की. पवित्रता पर सवाल नहीं उठेगा जाति नहीं. जाएगी। 1956 में उन्होंने वो किया जो. सावरकर की सोच के उलट था। हिंदू धर्म ही. छोड़ दिया और सावरकर ने इस धर्म बदलने को. बेकार बताया था और सबसे बड़ी टक्कर तो.
कहीं और दर्ज है। अपनी किताब पाकिस्तान और. द पार्टीशन ऑफ इंडिया में अंबेडकर लिखते. हैं कि हैरानी की बात यह है कि दो राष्ट्र. वाले सवाल पर सावरकर और जिन्ना एक दूसरे. के विरोधी नहीं बल्कि पूरी तरह सहमत हैं।. दोनों मानते हैं इस देश में दो राष्ट्र. हैं। फर्क बस इतना है जिन्ना कहते हैं. उन्हें अलग हो जाना चाहिए और सावरकर कहते. हैं उन्हें एक ही देश में साथ रहना चाहिए. जिसमें हिंदू राष्ट्र होगा और मुसलमान. उनके भीतर रहेंगे। यानी अंबेडकर सावरकर के. सबसे बुनियादी सिद्धांत पर उंगली उठा रहे. हैं तो हिसाब यह बैठता है कि जाति के.
खिलाफ काम पर थोड़ी बहुत तारीफ और उसी दौर. में आलोचना भी। लेकिन धर्म पर पूरा टकराव, राष्ट्र की परिभाषा पर सीधी भिड़ंत और. धर्म बदलने के सवाल पर दोनों आमने-सामने. एक दूसरे के विरोध करते नजर आए। यह कहानी. सावरकर की थी। लेकिन क्या अंबेडकर आरएसएस. या हिंदू महासभा के भी करीबी थी? यह भी दावा 14 अप्रैल के आसपास जोर पकड़ता. है और इसके पीछे तीन बातें रखी जाती हैं।.
पहला 1949 में पुणे के एक आरएसएस शिविर. में अंबेडकर गए थे और वहां संघ के. संस्थापक हेडगवार से मिले थे। दूसरा कि. संघ से जुड़े दत्तोपथ ठेंगड़ी उनकी पार्टी. के सचिव रहे और संघ की तरफ से यह भी बताया. जाता है कि 1954 में भंडारा चुनाव में वो. उनके चुनावी एजेंट भी थे और तीसरी कि 1952. के चुनाव में मध्य प्रदेश में उनकी पार्टी. का जनसंघ के साथ तालमेल था। तो पहले. ईमानदारी से यह मान लीजिए कि इनमें से. पहली दो बातें पूरी तरह हवा में नहीं है।.
शिविर वाली बात संघ के अपने रिकॉर्ड में. है। उस दौर के कुछ लोगों की लिखी यादों. में दर्ज है जिसमें एक अनुसूचित जाति से. आने वाले सांसद बाला साहेब सालुंके भी. हैं। जिन्होंने 12 मई 1939 की तारीख तक. लिखी है और संघ की. [नाक से की जाने वाली आवाज़] तरफ से सबसे. मजबूत तर्क ये दिया जाता है कि यह बात. अंबेडकर के जीते जी खुलेआम कही जाती रही. और उन्होंने इसका खंडन भी कभी नहीं किया।. तो यह तर्क वाकई वजनदार है और इसका सीधा. जवाब यही है कि किसी जगह चले जाना उस. विचार का साथी हो जाना दो अलग चीजें हैं।.
अंबेडकर उस दौर में हर दरवाजे पर गए थे।. वो कांग्रेस से मिलते थे। अंग्रेजों की. काउंसिल में भी बैठे, मुस्लिम लीग से बात. की क्योंकि उनके पास अपने लोगों के लिए. कोई भी रास्ता ठुकराने की सहूलियत नहीं. थी। तो अब असली सवाल यह है कि उनकी अपनी. लिखी हुई राय क्या थी? और वो क्या मौजूद. है? साल 1951 में उन्होंने अपनी पार्टी. शेड्यूल कास्ट फेडरेशन का चुनावी. घोषणापत्र खुद लिखा था। उसमें साफ-साफ. दर्ज है फेडरेशन हिंदू महासभा या आरएसएस. जैसी किसी भी प्रक्रियावादी पार्टी से. यानी समाज को पीछे ले जाने वाले किसी भी.
पार्टी से कोई गठबंधन नहीं करेगी और वो. यहीं नहीं रुके। उसी घोषणापत्र में. कम्युनिस्ट पार्टी को भी बाहर रखा। यह. कहते हुए कि उसका मकसद आजादी और संसदीय. लोकतंत्र को खत्म करके तानाशाही को लाना. है और यह कोई सुनी सुनाई बात नहीं है। यह. महाराष्ट्र सरकार की छापी हुई उन रचनाओं. वाली किताब में दर्ज है। अब जनसंघ वाली. बात जहां एक बारीकी है जो दोनों तरफ के. लोग छोड़ देते हैं कि जिस घोषणापत्र में. उन्होंने मना किया था उसमें नाम हिंदू.
महासभा और आरएसएस का है। जनसंघ का नहीं।. जनसंघ तो अक्टूबर 1951 में बना ही था।. इसलिए यह मामला पूरी तरह साफ नहीं है और. जो इसे 100% दावे सताते हैं वो आपसे कुछ. छुपा रहे हैं। पर सबसे बड़ा सबूत चुनावी. हिसाब किताब में नहीं मिलता। उनके विचारों. में मिलता है। और पाकिस्तान और द पार्टीशन. ऑफ इंडिया में उन्होंने साफ लिखा कि अगर. इस देश में हिंदू राष्ट्र कायम हो गया तो. वो इस मुल्क के लिए सबसे बड़ी आफत होगी और. उसे हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। तो आखिर. में मामला सबूत के दर्जे पर आकर टिकता है।.
एक तरफ वो किस्से हैं जो दूसरों ने उनके. बारे में लिखे। बरसों बाद अपनी-अपनी याद. से और दूसरी तरफ वो कागज जो खुद लिखा खुद. छपवाया अपने नाम के साथ जनता के सामने. रखा। इतिहास में दोनों का वजन बराबर तो. नहीं होता। लेकिन जब पार्टीशन ऑफ इंडिया. का जिक्र कर दिया है तो अंबेडकर को लेकर. सबसे रोचक सवाल क्योंकि आजकल देश में. दलित, ओबीसी, मुस्लिम को लेकर एक. कॉम्बिनेशन बनाया जाता है और बाबासाहेब. अंबेडकर का जिक्र किया जाता है। और यह. विरोध करने वालों की तरफ सवाल आता है कि.
बाबा साहब तो मुसलमान विरोधी थे। तो सवाल. क्या डॉ अंबेडकर मुस्लिम विरोधी थे? यह इस वीडियो का सबसे नाजुक सवाल है और. सबसे ज्यादा कांट छांटकर इस्तेमाल किया. जाने वाला। इसलिए मैं पहले ही कह रहा हूं. पूरा सुनिएगा क्योंकि बीच में से काटा गया. कोई टुकड़ा उल्टा मतलब देगा। तो सीधा जवाब. पहले रख देता हूं। वो पाकिस्तान के विरोधी. नहीं थे। उन्होंने बंटवारों को दो बुरे.
रास्तों में कम बुरा रास्ता बताया था। और. वह मुसलमानों के विरोधी नहीं थे। वह हर उस. समाज के कड़े आलोचक थे जो अपने भीतर सुधार. करने से इंकार करते। अब सबूत साल 1940 में. उनकी किताब आई थॉट्स ऑन पाकिस्तान जिसका. 1945 वाला बड़ा संस्करण पाकिस्तान और द. पार्टीशन ऑफ इंडिया कहलाया। और यह जान. लीजिए कि पाकिस्तान की मांग पर उस दौर में. लिखी गई यह सबसे बड़ी और सबसे बारीक. किताबों में से एक है। कांग्रेस इस मांग. को सिरे से ठुकरा रही थी और अंबेडकर बैठकर.
इसका पूरा हिसाब किताब लगा रहे थे। आबादी. का, फौज का, माली हालत का, सरहद का। उनका. नतीजा क्या निकला? उनका नतीजा यह था कि. अगर मुसलमान मुल्क चाहते हैं अलग तो. उन्हें दे देना चाहिए। उनका तर्क भावुक. नहीं था। वो कहते थे कि जिस फौज और जिस. देश में एक बड़ी आबादी की वफादारी पर. लगातार सवाल बना रहेगा, वह देश को भीतर से. कमजोर करेगा। इससे बेहतर है कि अलग होना. साफ-साफ हो जाए और दोनों अपने-अपने घर में.
मजबूत रहे। और उन्होंने यह भी लिखा कि अगर. बंटवारा हो तो आबादी की अदला बदली भी होनी. चाहिए। वरना दोनों तरफ अल्पसंख्यक फंसे रह. जाएंगे। इसके लिए 1923 में यूनान और टर्की. के बीच समझौतों का उदाहरण दिया। यानी. कड़वा सच ये है कि पाकिस्तान बनने के पक्ष. में तर्क देने वालों में एक बड़ा नाम. अंबेडकर का भी है। इसीलिए उन्हें. पाकिस्तान विरोधी बताकर पेश करना इतिहास. से खिलवाड़ है। अब आते हैं उस हिस्से पर. जिससे मुस्लिम विरोधी छवि बनती है। और.
यहां मैं आपसे कुछ छिपाऊंगा नहीं क्योंकि. शुरुआत से हमने कहा है कि आधा सच बेचना सच. के खिलाफ होता है। उसी किताब में उन्होंने. मुस्लिम समाज की सामाजिक हालत पर बहुत. कड़ी बातें कही हैं। उनकी पर्दा प्रथा पर, समाज सुधार आंदोलन के ना होने पर, धार्मिक. नेताओं की राजनीति पर पकड़ पर और इस बात. पर भी कि मुसलमानों के भीतर भी ऊंचनीच और. जाति जैसा भेदभाव मौजूद है। अब यहां मैं. साफ कर दूं कि कुछ जगहों पर उनकी भाषा.
सिर्फ रिवाजों की आलोचना तक नहीं रुकती।. वह एक राजनीतिक समुदाय के तौर पर मुस्लिम. राजनीति के बर्ताव पर भी सख्त होती है और. जिसने किताब पढ़ी है, वह जानता है कि वह. पन्ने नरम नहीं है और यही पन्ने आज सोशल. मीडिया पर सबसे ज्यादा स्क्रीनशॉट में. वायरल होते हैं। तो फिर सवाल कहां बनता. है? सवाल वहां बनता है जहां लोग रुक जाते. हैं और इसका जवाब तुलना में नहीं तरीके. में है। उनका तरीका यह था कि हर समाज को. उसकी अपनी सामाजिक व्यवस्था के तराजू पर. तोलू। चाहे वह अपना हो या पराया और किसी.
को छूट मत दो। क्योंकि उनके हिसाब से. सुधार से इंकार ही किसी समाज की सबसे बड़ी. बीमारी थी। इस तराजू में सिर्फ एक पलड़ा. उठाकर उसे मुस्लिम विरोध कह देना उसके. पूरे तरीके को समझने से इंकार करना है। और. अगर आपको इस तरीके का सबूत चाहिए तो उसी. किताब में अक्सर उन्हीं अध्यायों में. मौजूद है जहां उन्होंने हिंदू समाज की. उससे भी कड़ी चीरफाड़ की है। अगर आप. एनलेशन ऑफ कास्ट या फिर रिडल्स इन. हिंदूइज्म उठा लेंगे तो वहां जो लिखा है.
उसके सामने मुस्लिम समाज वाली आलोचना. हल्की लगने लगती है। साल 1927 में. उन्होंने मनुस्मृति जलाई थी। किसी और की. किताब नहीं और एक सावधानी जो इस किताब को. पढ़ने वाले हर आदमी को बरतनी चाहिए कि. इसमें कई जगह वो पहले दूसरों के तर्क. विस्तार से रखते हैं फिर उन्हें काट देते. हैं। इसलिए जो लाइन आपको वायरल तस्वीर में. दिखती है वो कई बार उनकी अपनी राय नहीं. होती। वह किसी और का पक्ष होता है जिसे. अगले पन्ने पर वह तोड़ने वाले हैं और. दोनों खेमे यही खेल खेलते हैं। अब वो तथ्य.
जो इस पूरे सवाल की हवा निकालता है। साल. 1946 में संविधान सभा के चुनाव हुए।. अंबेडकर बंबई से हार गए क्योंकि वहां. कांग्रेस ने उनका रास्ता रोक दिया था।. यानी संविधान लिखने वाला आदमी उस सभा में. नहीं पहुंच पा रहा था। तब बंगाल से एक. आदमी आगे आया। जोगेंद्रनाथ मंडल जो नाम. शुद्ध समाज से थे और अंबेडकर की पार्टी के. बंगाल प्रमुख थे और उन्होंने जेसोर खुलना. की सीट का इंतजाम करवाया जिसमें मुस्लिम. लीग का सहयोग शामिल था। यहां एक बारीक समझ.
समझिए क्योंकि इस पर बहुत गलत बातें फैल. जाती हैं कि संविधान सभा के सदस्य आम जनता. नहीं चुनती थी। उन्हें उस वक्त की सुबाई. विधानसभाओं में बैठे विधायक चुनते थे।. यानी यह किसी मुस्लिम मतदाता का वोट नहीं. था। यह बंगाल विधानसभा में बैठे मुस्लिम. लीग के विधायकों का समर्थन था। पर बात का. वजन फिर वहीं रहता है कि संविधान सभा में. अंबेडकर का पहला दाखिला मुस्लिम लीग के. समर्थन से हुआ था और फिर वक्त ने पलटी. मारी बंटवारे में जोर शोर और खुलना पूर्वी. पाकिस्तान चले गए। उनकी सदस्यता खत्म हो.
गई। साल 1947 में उन्हें दोबारा चुनाव. लड़कर जाना पड़ा। इस बार मुंबई से और इस. बार कांग्रेस की मदद से जब एम आर जयकर ने. अपनी सीट खाली की और जोगेंद्र नाथ मंडल का. वो पाकिस्तान चले गए और पाकिस्तान के पहले. कानून मंत्री बने।. वहां पर अलसकु की जो हालत देखी उससे वो. टूट गए और फिर 1950 में इस्तीफा देकर वापस. भारत लौट आए और यहीं पर गुमनामी में उनकी. मौत हुई।.
यह एक कहानी है जो आपको असह कर सकती है।. इसलिए दोनों इसे बीच में से काट लेते हैं।. अब फैसला आप पर है। आप डॉ. अंबेडकर को. एंटी मुस्लिम, एंटी पाकिस्तान के देखेंगे. या जो ये ब्रॉड नजरिया हमने दिया है, इससे. एक नया नजरिया पैदा करना चाहेंगे? अब आते. हैं सेकंड लास्ट क्वेश्चन पर। क्या. अंबेडकर आर्टिकल 370 हटाने के पक्ष में. थे? पिछले कुछ सालों में एक कोट बार-बार सामने. आया होगा जिसमें अंबेडकर शेख अब्दुल्ला से. कहते हैं कि आप चाहते हैं भारत कश्मीर की.
रक्षा करें, सड़कें बनाए, अनाज दे, बराबर. का दर्जा दे लेकिन भारत के किसी नागरिक को. कश्मीर में कोई हक ना मिले और फिर वो कहते. हैं कि कानून मंत्री होने के नाते वो अपने. देश के हितों के साथ ऐसी गद्दारी नहीं. करेंगे। अब यह कोर्ट संसद तक पहुंच चुका. है। बड़े-बड़े नेताओं के भाषणों लेखों में. छपा है। तो सवाल यह है कि आया कहां से? इसकी पूरी पड़ताल सुनिए। क्योंकि यह अपने. आप में सबक है। अंबेडकर के लिखे हुए उनके. भाषणों में संविधान सभा की बहसों में कहीं. भी यह बात दर्ज नहीं है। इस कोर्ट का सबसे.
पुराना निशान 1991 में मिलता है। यानी. अंबेडकर की मौत के 35 साल बाद जब एक. पत्रिका के संपादकीय में एक वरिष्ठ नेता. बलराज मधोक के जुबानी बयान के हवाले से यह. बात छपी गई थी और मधुक जीवन भर आर्टिकल. 370 के खिलाफ अभियान चला रहे थे। वहां से. यह बात लेख में गई। फिर 2016 में एक छपी. हुई किताब में वहां से उठाकर राजनीतिक. भाषणों में इस्तेमाल होने लगी और सबसे. दिलचस्प बात यह कि जब उस किताब के लेखक से. पूछा गया तो उन्होंने खुद माना कि. उन्होंने अंबेडकर के किसी लेखन से नहीं.
लिया था। यह भी माना कि हो सकता है इसे. किसी राजनीतिक मकसद से गढ़ा गया हो। अब. यहां पर एक बात साफ कर दें क्योंकि कहानी. किसी एक पार्टी की नहीं है। जब 2019 में. आर्टिकल 370 हटाया गया तो इसी कोर्ट का. सहारा लेकर उनका समर्थन उन दलित राजनीति. करने वाली पार्टियों ने भी किया जो खुद को. अंबेडकर की सबसे बड़ी वायरिस बताती है।. यानी बिना जांचे इस्तेमाल करने का काम हर. तरफ से हुआ। अब जो बात पक्के तौर पर दर्ज. है वो सुनिए।. आर्टिकल 370 जो उस वक्त ड्राफ्ट में 306 ए.
के नाम से था। संविधान सभा में 17 अक्टूबर. 1949 को एन गोपालस्वामी अयंगार ने पेश. किया था जो खुद जम्मू कश्मीर के दीवान रह. चुके थे। अंबेडकर ने इसे पेश नहीं किया. था। उस दिन की बहस में उनका कोई भी भाषण. रिकॉर्ड में नहीं मिलता। तो ईमानदार जवाब. क्या है? ईमानदार जवाब यह है कि इस. अनुच्छेद के मामले में रिकॉर्ड खामोश है।. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उन्होंने. इसका विरोध किया ना ही सबूत है कि समर्थन. किया। और जब रिकॉर्ड खामोश होता है तो. ईमानदारी कहती है कि खामोश रहें। ना कि. मरे हुए आदमी के मुंह में अपनी लाइन डाल.
कर दे। और यह इस वीडियो का बहुत बड़ा सबक. है कि जब कोई आदमी इतना बड़ा हो जाए कि हर. पक्ष उसे अपना बताना चाहे, उसके नाम पर. बोलना चाहे तो पहले उसकी अधूरी बातें उठाई. जाती हैं। फिर काटी हुई बातें और कई बार. वो बातें भी जो वो कहता भी नहीं है। और अब. आते हैं आखिरी सवाल पर। क्या डॉ. अंबेडकर. कभी चुनाव नहीं हारे? आज इस देश में डॉ. अंबेडकर की तस्वीर हर. पार्टी के मंच पर है। हर नेता हर इलेक्शन. में बिना अंबेडकर का नाम इस्तेमाल किए.
भाषण नहीं देता। तो आपको क्या लगता है कि. डॉ. अंबेडकर अपने जमाने में कितने बड़े. नेता रहे होंगे? सच थोड़ा अलग है। 1952. में आजाद भारत का पहला आम चुनाव होता है।. और अंबेडकर बंबई नॉर्थ सेंट्रल में खड़े. हुए। खुद जवाहरलाल नेहरू उस सीट पर प्रचार. करने आए। नतीजा यह निकला कि संविधान लिखने. वाले आदमी को 12,23,000 वोट मिले और उसे. हराने वाले को 1 लाख 38,000।. यानी करीब 15,000 वोटों का फासला। अब. सुनिए हराया किसने था। जीतने वाले का नाम.
था नारायण सदोबा। कांग्रेस के उम्मीदवार. और यह आदमी खुद अनुसूचित जाति से थे। उससे. भी बड़ी बात वो एक वक्त खुद अंबेडकर के. निजी सहायक थे। अब वो बात याद कीजिए जो. आपने इसी वीडियो में सुनी थी जिसका वादा. मैंने किया था। 25 सितंबर 1932 को पूना. पैक पर दस्तखत करने के 24 घंटे बाद इसी. आदमी ने मुंबई की एक सभा में कहा था कि. साझा वोटर लिस्ट से जीत कर आने वाला. प्रतिनिधि दलितों का असली प्रतिनिधि नहीं.
होगा क्योंकि उसे जिताने वाले वोट ऊंची. जातियों के होंगे और वह जवाबदेह भी उनके. प्रति होगा। 20 साल बाद उसी व्यवस्था के. तहत ठीक वैसा एक उम्मीदवार खड़ा किया गया. और वह जीत गया। यानी जो चेतावनी उन्होंने. अपने हाथों से किए गए समझौते में की थी।. इसका पहला शिकार डॉ. अंबेडकर खुद बने। अब. इस तस्वीर को बड़े पैमाने पर देखिए। जिस. आदमी ने इस देश के हर नागरिक के वोट को. संविधान में बिठाया। जिसने आरक्षित सीटों. का पूरा ढांचा अपने हाथ से लिखा। जिसने. खुद बताया कि इस ढांचे में छेद कहां पर है. उसे उसी के छेद से बाहर किया गया। हार के.
बाद अंबेडकर ने सार्वजनिक रूप से इस नतीजे. पर सवाल भी उठाया था और कहा था इसकी जांच. होनी चाहिए। 2 साल बाद 1954 में उन्होंने. भंडाराव चुनाव लड़ा और इस बार सिर्फ हारे. नहीं बल्कि इस बार वह तीसरे नंबर पर आए।. लोकसभा में वह कभी नहीं पहुंच पाए। संसद. में गए तो राज्यसभा के रास्ते और आखिरी. सांस तक वही रहे। 6 दिसंबर 1956 को उनका. निधन हुआ और इस देश का सबसे बड़ा नागरिक. सम्मान भारत रत्न उन्हें साल 1990 में. मिला। यानी मरने के 34 साल बाद। तो आज जब.
आप किसी मंच पर उनकी तस्वीर देखें और नीचे. खड़ा नेता उन्हें भगवान बता रहा हो तो याद. रखिएगा कि जिस आदमी को आज हर पार्टी अपना. बताती है उसे उसके अपने जमाने में दोबारा. हराया गया और उसका सम्मान करने में 34 साल. लग गए।. अब इन 19 सवालों के बारे में हमने आपको. बताया और अगर आप इतना सुनने के बाद भी अब. तक वीडियो में बने हुए हैं तो आज आपने. देखा होगा कि डॉ अंबेडकर को लेकर कितना. झूठ गढ़ा गया कि अकेले कुछ नहीं लिखा।.
अंग्रेज के आदमी थे। एक जाति के नेता थे।. मुसलमानों के दुश्मन थे। आपने यह भी देखा. कि पक्ष में कितना झूठ गया। आरबीआई को. बनाया। 32 डिग्रियां थी। औरतों को वोट. दिलाया। 370 पर वो कहा जो कहा नहीं और. दोनों झूठ की जड़ एक ही है। दोनों तब पैदा. होते हैं जब कोई आदमी इतना बड़ा हो जाए कि. उसका नाम काम आने लगे। उससे किताब किसी के. काम ना रहे। जिस आदमी ने अपनी पूरी जिंदगी. एक ही बात लगा दी कि सबूत मांगो, स्त्रोत. पूछो जो लिखा है बिना जांचे मत मांगो। उसी. के नाम पर आज इस मुल्क में सबसे ज्यादा. बिना जांचे कागज घूम रहा है और शायद इसलिए.
उसे पढ़ना जरूरी है क्योंकि जिस आदमी को. पूजा जाने लगता है उसे पढ़ा जाना बंद हो. जाता है और अंबेडकर के साथ यह देश यही कर. रहा है। उनकी मूर्तियां हर चौराहे पर लगाई. गई है। उससे किताबें हर अलमारी बंद की गई. है। आज इन 19 सवालों के बाद अगर आप में से. कुछ लोग उनकी एक किताब भी खोलकर पढ़ लेंगे. तो मैं समझूंगा ये वीडियो आपके काम आ गया।. और अगर लोग भविष्य में जब झूठ आएगा तो यह. वीडियो फॉरवर्ड कर देंगे तो मैं समझूंगा. यह वीडियो काम करके आता है। डॉक्टर.
अंबेडकर का कौन सा काम ऐसा है जो आपको. सबसे ज्यादा इंस्पायर करता है? कमेंट. सेक्शन आपका इंतजार कर रहा है। जय हिंद जय. भारत। दोस्तों. नहीं.
