कांशीराम: जिन्होनें मायावती और BSP को बनाया | कैसे मिली मायावती? BAMCEF से BSP तक | Kanshi Ram
भारत की राजनीति में यूं तो कई नेता आए, कई सरकारें बदली, कई नारों ने भीड़ जुटाई, जोश बढ़ाया। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं. जिन्होंने उन लोगों को बोलना सिखाया. जिन्हें इस देश में सियासत ने सिर्फ सुनने. के लिए छोड़ रखा था।. कांशीराम इसीलिए खास थे।. कांशीराम सिर्फ एक नेता नहीं थे। वे उस. दबे हुए गुस्से की आवाज थे जिसे भारतीय. राजनीति ने दशकों तक अनसुना कर रखा था।.
पंजाब से आने वाले कांशीराम के पीछे ना. कोई राजनीतिक विरासत थी, ना धनबल था, ना. मीडिया की चमक दमक। लेकिन एक ऐसी समझ थी. जिसने सत्ता की नींव हिला दी जो आज उनके. जाने के बाद भी अमल कर रही है क्योंकि. उन्होंने इस देश को एक ऐसी सच्चाई से. रूबरू कराया जिससे राजनीति हमेशा बच रही. थी।. कि करोड़ों लोग जिनकी संख्या भारत में है. उन्हें सत्ता से इसलिए दूर रखा गया. क्योंकि उनको कभी उनकी पहचान ही नहीं दी. गई। और इसीलिए जब 70 और 80 के दशकों में.
भारत बदल रहा था। गांव कस्बों छोटे शहरों. में दबा हुआ गुस्सा सड़कों पर आ रहा था।. करोड़ों वो लोग जो वोट देते थे, रैलियों. में भीड़ बनकर जाते थे। लेकिन राज कोई और. करता था। कांशीराम ने उस मानसिक गुलामी पर. पहला प्रहार किया। उनके ज़हन में यह सवाल. डाला कि अरे वोट तुम्हारा, संख्या. तुम्हारी तो राज तुम्हारा क्यों नहीं? कांशीराम. का ये राजनीतिक बयान नहीं था। यह व्यवस्था. के खिलाफ एक खुला विद्रोह था। जब उन्होंने.
कहा जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी. हिस्सेदारी। यह नारे से आगे निकलकर आंदोलन. बन गया। गांव-गांव साइकिल यात्रा निकलने. लगी। पढ़े लिखे कर्मचारी जुटने लगे और. बरसों का अपमान राजनीतिक गुस्से में. तब्दील हो गया। नतीजा दिल्ली ने देखा।. हजारों साइकिलें राजधानी की तरफ आईं। नीले. झंडों का समंदर सड़कों पर उतर गया और हवा. में एक आवाज़। वोट हमारा राज तुम्हारा. नहीं चलेगा नहीं चलेगा. मानो यह दबे हुए आत्मसम्मान का विस्फोट था.
पहली बार वो समाज सत्ता की आंखों में. आंखें डालकर खड़ा था और वही कांशीराम. बुलंद आवाज में कह रहे थे. राज कोई देता नहीं है राज लिया जाता है. कांशीराम उस दौर में इन लोगों को. सहानुभूति नहीं दे रहे थे वे उन्हें. सहानुभूति से आगे बढ़कर सत्ता हासिल करने. की भाषा सिखा रहे थे। उन्होंने. कार्यकर्ताओं को समझाया कि पहला चुनाव. हारने की लड़ो। दूसरा हरवाने के लिए और.
तीसरा जीतने के लिए। पहली बार में अजीब. लगा। लेकिन कांशीराम समझते थे कि सदियों. से सत्ता से बाहर रखा गया समाज एक दिन में. शासक नहीं बनता। पहले उसे अपनी ताकत को. पहचानना पड़ता है। फिर सत्ता को एहसास. कराना पड़ता है कि अगर हमारा समाज एकजुट. हो गया तो देश की मजबूत कुर्सियां हिल. जाएंगी। इसीलिए जब वो कहते कि इस देश में. लोकतंत्र के नाम पर बड़ा धोखा चल रहा है।. अमीरों के नोटों से गरीबों के वोटों के. साथ खिलवाड़ दिखा।. ये व्यवस्था के खिलाफ सीधा आरोप था।.
कांशीराम जिन्होंने भारतीय राजनीति में. बहुजन समाज को लेकर परिभाषा ही बदल दी।. और इस रास्ते में उन्हें वो मिली एक. तेजतर्रार।. [संगीत]. वो जिसकी आवाज तेज थी। मैं उनको विश्वास. दिलाना चाहती हूं।. बेखौफ अंदाज था आंखों में आग थी। जिसे. यूपीएससी की तैयारी से हटने को कांशीराम. ने कहा। ये कहते हुए कि तुम्हें कलेक्टर.
बनने की ख्वाहिश है लेकिन तुम्हें तो राज. करना है। तुम्हारे सामने सैकड़ों कलेक्टर. फाइल लेकर खड़े होंगे और फिर कांशीराम उसे. मुख्यमंत्री बना। एक बार नहीं बार-बार. बार-बार। यह कहानी काशीराम की।. इस कहानी में मायावती का हिस्सा है। लेकिन. मायावती की अगर पूरी कहानी आपको देखनी है. तो हमने अपने ही चैनल पर. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री. मायावती जी की पूरी कहानी विस्तार से घंटे. भर में बनाकर डाली है। आप लोग जाइएगा. देखिएगा। अब तक कई करोड़ लोग उसे देख चुके.
हैं। आप उसे देखिएगा। लेकिन ये जो कहानी. हम आज सुनाने वाले हैं यह मायावती जी की. कहानी से आगे बढ़कर है। उस शख्स की कहानी. है जिसने सरकारी नौकरी छोड़ी, शादी छोड़ी, परिवार छोड़ा। अपने पिता के अंतिम संस्कार. में नहीं गया। अपने घर वालों को लिखा कि. गरीबों, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों के. घर [संगीत] मेरे घर है। जो सच में कभी. नहीं लौटा, जिसकी मां ताऊ उम्र इंतजार. करती रही। बहने राखी पर रास्ता देखती रही, लेकिन उसने अपने जीवन को मिशन की तरह. समर्पण कर दिया। और इसीलिए शायद आज जब.
कांशीराम नहीं है तब भी वह हैं एक आंदोलन. बनकर सोच बनकर। नमस्कार, मैं हूं शुभांकर. मिश्रा और आज का ये वीडियो बड़ा स्पेशल. है। इस वीडियो में हमने बहुत सारी मेहनत. करके आपके लिए कांशीराम जी की कहानी को. लेकर आए हैं। वो कहानी जिसमें हम आपको. बताएंगे कैसे. कांशीराम ने एक बड़े समाज के हिस्से को. जिसे शोषित समाज कहा जा रहा था। अधिकार. नहीं राज मांगना सिखाया। हम आपको बताएंगे.
कैसे पंजाब के छोटे से गांव से निकलकर. नौकरी परिवार निजी जिंदगी छोड़कर अपने. जीवन को मिशन पर समर्पण कर दिया। बामसेफ. बीएसपी की स्थापना से लेकर मायावती जी को. राजनीति में लाने इलाहाबाद के ऐतिहासिक. चुनाव और दिल्ली दरबार को हिलाने वाले. उनके किंग मेकर बनने की पूरी कहानी हम. आपको बताएंगे।. वीडियो में आगे बढ़ने से पहले एक स्पेशल. थैंक्स टू ओडo जो आज के हमारे एपिसोड. पार्टनर हैं। ओडो एक कंप्लीट बिजनेस. स्यूशन प्रोवाइडर है जो आपके बिजनेस को. स्मूथली रन करने में आपकी मदद करता है।.
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उस बाबा की भविष्यवाणी को समझना पड़ेगा।. पंजाब का रोपड़ जिला वहां पर एक छोटा सा. गांव है खवासपुर जिसे कुछ सरकारी कागजों. में पीरपुर बंगा भी कहते हैं। यह एक ऐसा. गांव था जहां किसी भी इंसान की पहचान उसके. नाम से नहीं बल्कि उसकी जाति से होती थी।. कौन बड़ा है, कौन छोटा, किसे इज्जत. मिलेगी? किसे नहीं? यह सब बच्चे के पैदा. होते ही तय होने लगता था। उसी गांव में 15. मार्च साल 1934 को एक बच्चे का जन्म हुआ।. गांव के पुराने लोग और कुछ पुरानी चली आ.
रही कहानियां कहती हैं कि उनके पैदा होने. से पहले ही गांव के एक बाबा ने कहा था कि. इस घर में जो लड़का आएगा वो बहुत नाम. कमाएगा इतिहास बदल देगा। बुजुर्गों ने उसी. बाबा के नाम पर बच्चे का नाम रखा. कांशीराम।. उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह. बच्चा एक दिन पूरे देश की राजनीति को. उलट-पुलट कर रख देगा। उनका परिवार जो है. वह रामदसिया सिख समाज से था। यह वो समाज. था जो बरसों से छुआछूत और भेदभाव का दर. झेल रहा था। कहने को तो परिवार ने सिख. धर्म अपनाया था लेकिन जमीन पर हकीकत नहीं.
बदली थी। गांवों में जाति का पहरा अभी भी. उतना ही कड़ा था। कौन किसके साथ बैठेगा? किसके घर जाएगा? किस बर्तन ने पानी पिएगा. यह सब पहले तय था। मगर उनका परिवार बाकी. गरीब परिवारों से थोड़ी बेहतर स्थिति में. था। जिसकी वजह थी फौज। क्योंकि दादा. ढेलूराम अंग्रेजों की फौज में रह चुके थे।. फौज की नौकरी से जो पैसे मिले उससे थोड़ी. जमीन खरीदी। चमड़े का काम शुरू किया। घर. में कड़ा अनुशासन था। मेहनत थी और सबसे. बड़ी बात पढ़ाई लिखाई की कीमत समझी जाती.
थी। पिता हरी सिंह हर हाल में अपने बेटे. को पढ़ाना चाहते थे और इसी सोच के साथ. स्कूल भेज दिया। लेकिन स्कूल की चौखट पर. कदम रखते समझ में आया कि इस देश में पढ़ाई. से पहले जाति देखी जाती है। गरीब समाज के. बच्चों को बाकी बच्चों से अलग बैठाया जाता. था। उनके पीने का मटका भी अलग था। छोटा सा. बच्चा हर दिन यह सब देख रहा था। उसे समझ. में आ रहा था कि इस देश में अपनी प्यास. बुझाने के लिए भी अपनी जात बतानी पड़ती. है। हर सिंह को जब इस भेदभाव का पता चला, तो हार मानने के बजाय स्कूल में हंगामा.
किया और फिर बेटे का स्कूल बदलवाया। लेकिन. स्कूल बदल जाने से समाज की सोच थोड़ी. बदलती है। गांव की गलियों से लेकर. क्लासरूम तक हर जगह जाति जो थी वो रास्ता. रोके हुए खड़ी थी। धीरे-धीरे वो समझ रहे. थे कि इस देश में कुछ लोगों को इज्जत बिना. कुछ किए मिल जाती है और कुछ ऐसे होते हैं. जिन्हें इंसानी हक पाने के लिए भी पूरी. जिंदगी दांव पर लगाना पड़ता है। यही वो. दौर था जब उनके मन में इस नाइंसाफी के. खिलाफ पहली बार आवाज उठी।.
जिसने आगे चलकर एक महा क्रांति का रूप ले. लिया। दरअसल कांशीराम बचपन से चुप रहने. वाले इंसान नहीं थे। उनके भीतर एक अजीब सी. छटपटाहट और गुस्सा थी जो अपमान देखते ही. फूट पड़ती थी। लंबा कद, मजबूत शरीर और तेज. मिजाज।. वे बाकी बच्चों की तरह सब कुछ चुपचाप सहना. नहीं सीख रहे थे। उनके भीतर आत्मसम्मान. कूट-कूट कर भरा था। उनके ताऊ बसंत सिंह के. पुराने किस्सों को अगर सुने तो गांव में. एक बार एक किसी ऊंची जाति के कुछ लोगों ने. खेतों में काम करने वाले गरीब मजदूरों को.
डराने धमकाने की कोशिश की। उनकी बातों में. अहंकार था जो इन मजदूरों को बराबरी का. इंसान मानने को तैयार नहीं था। लेकिन पास. खड़े कांशीराम सुन रहे थे। उनका गुस्सा. बेकाबू हुआ। गांव के बुजुर्ग याद करते हुए. कहते हैं कि बिना डरे वहीं रखी कुर्सी. उठाई और तान दी उन लोगों पर। उस दौर में. उस बच्चे के तेवर को देखकर सभी हैरान थे।. तब किसी को यह अंदाजा नहीं था कि यह. गुस्सा एक दिन करोड़ों लोगों की आवाज बन. जाएगा। खैर पिता की जिद की वजह से पढ़ाई. का वो सिलसिला जारी रहा। वे पढ़ने में तेज.
थे। उस दौर में उनके समाज में किसी का. कॉलेज पहुंचना ही अपने आप में एक बड़ी बात. थी। लेकिन रोपड़ के सरकारी कॉलेज से. विज्ञान में उन्होंने बीएससी की डिग्री. ली। कॉलेज के इन दिनों में उनकी सोच का. दायरा और बड़ा हुआ। अब वे सिर्फ अपने गांव. का भेदभाव नहीं देख रहे थे बल्कि पूरे. सिस्टम को समझने लगे थे। उन्हें साफ समझ आ. गया था कि जाति का यह जहर सिर्फ गांवों तक. सीमित नहीं है। यह कॉलेजेस में है, नौकरियों में है, बड़े दफ्तरों में है और. सबसे ज्यादा लोगों के दिमाग में है। उनके. भीतर सिर्फ एक कामयाब इंसान बनने की इच्छा.
नहीं थी। अब बल्कि इस व्यवस्था से सीधे. टकराने की इच्छा थी, बेचैनी थी और इसके. लिए भीतर ही भीतर खुद को तैयार कर रहे थे।. वैसे कांशीराम जी की जिंदगी में जाति का. यह दर्द सिर्फ स्कूल या कॉलेजों से सीमित. नहीं रहा।. इसने घर के भीतर एक ऐसी आग जला दी जिसने. उनकी जिंदगी का रास्ता बदल दिया। स्कूल के. दिनों की बात है। एक दिन दोपहरी में जब वे. घर लौटे तो मां ने हाथ में खाने का डिब्बा.
थमाते हुए कहा कि बेटा यह खाना सीधे रोपड़. कैनाल के सरकारी गेस्ट हाउस चले जाओ।. तुम्हारे पिता वहां काम कर रहे हैं। उनको. दे देना। जब तपती धूप में उस बड़े से. सरकारी बंगले पर पहुंचे तो वहां का नजारा. देखकर वो ठिठक गए। पिता हर सिंह पसीने से. भीगे थे और बिना रुके छत से लटक रहे एक. बड़े से कपड़े के पंखे की रस्सी खींच रहे. थे। उस दौर में इसे बेगार कहा जाता था।. यानी बड़े लोगों या अफसरों के लिए बिना. पैसों के मुफ्त में मजदूरी करना। यह देखकर. उस बच्चे का दिल बैठ गया। उसने अपने पिता.
से पूछा कि पापा आप इतनी भीषण गर्मी में. एक साहब के लिए पंखा काहे खींच रहे और. दूसरे हाथ से खुद को हवा क्यों नहीं करते? पिता ने बेटे की तरफ देखकर बड़ी बेबसी से. कहा कि बेटा मैं तो एक मामूली मजदूर हूं।. मेरा काम साहब को हवा देना है। खुद को हवा. करना मेरी किस्मत में नहीं। पिता की. लाचारी छोटे से बच्चे के सीने में एक गहरे. घाव की तरह छुप गई। वे जिंदगी भर के लिए. इस बेगार और गुलामी की व्यवस्था को मिटाने. की कसम खा लेते हैं।. सालों बाद जब वे देश की राजनीति के सबसे.
बड़े नेताओं में शुमार हुए। और सांसद बनकर. उसी रोपड़ कैनाल के वीआईपी गेस्ट हाउस में. रुके, तो रात के सन्नाटे में अचानक आंख. खुली। उनके करीबियों के अनुसार बिस्तर से. उठे कमरे का दरवाजा खोला और बाहर बरामदे. की तरफ देखने लगे। उन्हें ऐसा लगा कि जैसे. उनके बुजुर्ग पिता आज भी वहीं खड़े होकर. किसी साहब के लिए पंखे की रस्सी खींच रहे. हैं। उसी वक्त उन्होंने अपने साथियों से. कहा था कि मेरे पिताजी ने तो जिंदगी भर. दूसरों के लिए पंखा खींचा लेकिन मैं अपने. लोगों के पैरों से गुलामी की जंजीरें इस.
कदर तोडूंगा कि आने वाली पीढ़ियां किसी के. सामने पैसों के लिए इस तरह की मजदूरी नहीं. करेंगी। साल 1956 बीएससी की पढ़ाई पूरी. करने के बाद कांशीराम नौकरी की तलाश में. थे। परिवार में खुशी का माहौल था।. रिश्तेदारों को लग रहा था कि अब अच्छे दिन. आने वाले हैं। उस जमाने में शोषित समाज के. एक लड़के की सरकारी नौकरी किसी सपने के सच. होने जैसी थी। लेकिन कांशीराम के भीतर का. विद्रोह शांत नहीं हुआ था। पढ़ाई के बाद.
वो पंजाब से बाहर निकले। देहरादून पहुंचे।. जहां पर जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया में. काम करना शुरू किया।. वे साथ-साथ यूपीएससी की तैयारी कर रहे थे।. परिवार को पूरी उम्मीद थी कि बेटा एक दिन. बड़ा अवसर बनेगा। समाज विरुद्ध होगा। घर. की गरीबी खत्म हो जाएगी। लेकिन वे सिर्फ. अपने भविष्य के बारे में नहीं सोच रहे थे।. इस दौरान जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की. एक परीक्षा पास की। लेकिन नौकरी की शर्त. थी कि ज्वाइन करने से पहले बॉन्ड भरना. होगा। जिसके तहत वे एक तय समय तक नौकरी. नहीं छोड़ सकते थे। बहुत से लोग बिना सवाल.
की आंख मूंदकर ये शर्त पाल लेते। क्योंकि. सरकारी नौकरी एक बड़ा सपना होती है। लेकिन. उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे. बॉन्डेड लेबर यानी बंधुआ मजदूर बनकर काम. नहीं करेंगे। यह उनके कड़े स्वाभिमान की. पहली बड़ी गवाही थी। वे किसी के नीचे दबकर. जीने को तैयार नहीं थे। इसके बाद साल 1958. में पुणे के डिफेंस लैबोरेटरी में रिसर्च. असिस्टेंट की पक्की सरकारी नौकरी मिली। अब. वे एक वैज्ञानिक की सुरक्षित जिंदगी जी. रहे थे। अच्छा पैसा, इज्जत, शानदार. भविष्य। बाहर से दिखने पर सब कुछ परफेक्ट.
था। लेकिन पुणे की इसी लैब में कुछ साल. बाद एक ऐसी घटना होने वाली थी जो उनकी. जिंदगी को हमेशा हमेशा के लिए बदलने वाली. थी। पुणे की लैब में बाबा साहब की किताब. और बदल गए कांशीराम।. दरअसल पुणे की उस सरकारी लैब में. वैज्ञानिक के पद पर काम करते हुए उनकी. जिंदगी बड़े आराम से कट रही थी। वे अपने. काम में माहिर थे और उनका लक्ष्य एक बड़ा. वैज्ञानिक बनने का था। लेकिन यह वही दौर. था जब देश में बाबा साहब डॉ भीमराव. अंबेडकर के विचार भी पढ़े लिखे दलित.
युवाओं के बीच अपनी जगह बना रहे थे। वे भी. समाज को एक नए नजरिए से देखते थे। तभी लैब. में एक ऐसी घटना घटित हुई जिसने उनके भीतर. के गुस्से को बाहर निकाल दिया। उस लैब में. बुद्ध जयंती और अंबेडकर जयंती पर सरकारी. छुट्टी हुआ करती थी। लेकिन अफसरों को यह. बात पसंद नहीं आई। उन्होंने इन दोनों. छुट्टियों को खत्म कर दिया और उनकी जगह. दूसरे नेताओं की जयंती पर छुट्टी का ऐलान. किया। कर्मचारियों के लिए यह सीधे-सीधे. आत्मसम्मान पर चोट दी। सब नाराज थे। लेकिन. नौकरी जाने के डर से कोई भी मुंह खोलने को.
तैयार नहीं था। तभी राजस्थान के एक बेहद. साधारण परिवार से आने वाले छोटे कर्मचारी. दीना भाना ने चुप रहने से मना कर दिया।. उसने अफसरों को लिखित शिकायत दी कि. अंबेडकर जयंती की छुट्टी बहाल की जाए. क्योंकि यह उनका संवैधानिक अधिकार है।. अफसरों ने दीना भाना पर दबाव बनाया, धमकियां दी लेकिन वह पीछे नहीं हटे। नतीजा. यह हुआ कि दीना भाना को नौकरी से निकाला. गया।. वे यह सब कुछ बहुत करीब से देख रहे थे।. जाति के नाम पर होने वाला. रोज रोज का यह व्यवहार उन्हें मानसिक.
उत्पीड़न जैसा लग रहा था और यही वो पल था. जहां कायदों के बीच घिरा वैज्ञानिक सिर्फ. एक कर्मचारी नहीं रहा बल्कि उसके भीतर का. आंदोलनकारी भी जागने लगा। उन्होंने दीना. भाना का साथ देने का फैसला किया। बाकी. कर्मचारियों इकट्ठा करना शुरू किया।. रैलियां आयोजित की। अफसरों के खिलाफ आवाज. उठाई। मामला इतना बढ़ा कि तत्कालीन रक्षा. मंत्री यशवंत राव चौहान तक पहुंचा। जांच. बैठी और आखिरकार दीना भाना को उनकी नौकरी. वापस मिली। अंबेडकर जयंती और बुद्ध जयंती.
की छुट्टियां एक बार फिर से बहाल की गई और. इसी कड़े संघर्ष के बीच उनके हाथ बाबा. साहब की ऐतिहासिक किताब एनलेशन ऑफ कास्ट. यानी जाति का उच्छेद लग गई। उनके. जीवनकारों के अनुसार इस किताब को पढ़ते. हुए पूरी रात वह सो नहीं सके। उस रात उनके. भीतर के वैज्ञानिक. का हमेशा हमेशा के लिए खात्मा हो गया और. उन्हें समझ में आया कि लैब में केमिकल का. प्रयोग करने ज्यादा इस देश की सामाजिक. व्यवस्था को बदलना है और यहीं से एक नए.
कांशीराम की शुरुआत हुई।. इससे पहले कि इस कहानी को हम आगे बढ़ाएं।. हमारी आपसे गुजारिश है कि अगर अब तक आपने. कहानी का आनंद लिया है तो हमारे WhatsApp. चैनल से भी जुड़िएगा। ऐसी अनगिनत कहानियां. हम आपको सुनाते रहते हैं और अगर आप. जुड़ेंगे तो हमें अच्छा लगेगा। लिंक हमने. WhatsApp का डिस्क्रिप्शन में कमेंट. सेक्शन में दे रखा है। आपके लिए स्कैनर भी. लगा दिया है। मोबाइल फोन से आप चाहे तो. स्कैन कर सकते हैं या WhatsApp पर भी आप.
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खींच रहे थे, उतना परिवार दूर उतरा रहा. था। साल 1964 में उन्होंने एक ऐसा फैसला. लिया जिसने उनके पूरे परिवार के पैरों के. नीचे जमीन खिसका दी। उन्होंने अपनी पक्की. सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया। उस दौर में. ऐसा करना पागलपन की पराकाष्ठा था क्योंकि. सरकारी नौकरी पूरे परिवार का इकलौता सहारा. थी। नौकरी छोड़ने के बाद अपने परिवार को. एक पत्र लिखा। उसमें साफ कहा कि अब कभी घर. नहीं लौटूंगा। कभी शादी नहीं करूंगा और ना. कोई निजी संपत्ति बनाऊंगा। अब से देश के. करोड़ों गरीब लोग मेरा असली परिवार है। यह.
खबर सुनते घर में कोहराम मच गया। उनकी मां. उन्हें समझाने खुद पुणे पहुंची। रोई बिलखी. लेकिन कांशीराम का फैसला पत्थर की लकीर. था। मां को हार कर वापस लौटना पड़ा और. हमेशा के लिए एक रोता हुआ अंजार पीछे छूट. गया। इस घटना के बाद मान्यवर सगी बहनों की. शादियों तक में नहीं गए। हद तो तब हो गई. जब उनकी एक बहन की अचानक मौत हुई। तब भी. वे बेलखते परिवार को ढांडस बधाने गांव. नहीं पहुंचे। यहां तक कि जब उनके पिता हरी.
सिंह अपनी आखिरी सांसे गिन रहे थे। पूरा. परिवार बड़े बेटे का रास्ता देख रहा था।. वापस नहीं लौटे। उनके छोटे भाई ने पिता को. मुखा दी। उन्होंने परिवार के हर रिश्ते की. कुर्बानी इसलिए दी क्योंकि उन्होंने तय. किया था कि अगर समाज को जगाना है तो खुद. को पूरी तरह मिटाना पड़ेगा। बहुजन आंदोलन. के इतिहास में मान्यवर के उस खत को 24. पन्नों का खत कहा जाता है। वो कोई आम. चिट्ठी नहीं थी। एक सन्यासी का ऐलान था. जिसने उनके निजी जीवन को मिटाया था।. उन्होंने उस पत्र में मुख्य रूप से तीन.
बड़ी भीष्म प्रतिज्ञाएं लिखी थी। पहली. प्रतिज्ञा अब जीवन में कभी अपने गांव नहीं. जाएंगे। पारिवारिक बंधनों से खुद को आजाद. करते हैं। दूसरी कसम कि जीवन भर कुंवारे. रहेंगे। कभी अपना घर या वंश आगे नहीं. बढ़ाएंगे। तीसरी प्रतिज्ञा जो सबसे कड़ी. थी कि इस दुनिया में कभी अपने नाम पर कोई. जमीन, संपत्ति या बैंक बैलेंस नहीं. बनाएंगे। उनका एक-एक पैसा सिर्फ समाज के. आंदोलन में काम आएगा। मां को संबोधित करते. हुए लिखा कि आपने मुझे पालपस कर सिर्फ एक. परिवार की भलाई के लिए बड़ा किया था।. लेकिन मेरा यह शरीर, मेरी ये सांसे उन.
करोड़ों शोषित समाज की धरोहर है जो सदियों. से अंधेरे और जिल्लत की जिंदगी जी रहे. हैं। मान्यवर ने इन प्रतिज्ञाओं को सिर्फ. लिखा नहीं बल्कि अपनी आखिरी सांस तक निभा. कर दिखाया। इस त्याग ने उन्हें एक आम. इंसान से उठकर महा क्रांति में बदल दिया. था।. खैर, नौकरी और परिवार सब कुछ छोड़ देने के. बाद उनके पास ना रहने का ठिकाना था, ना. जेब में पैसे। वे पुराने झोले में कुछ. किताबें और पर्चे लेकर साइकिल से एक दफ्तर. से दूसरे दफ्तर चक्कर काटने लगे। उनका.
मानना था कि जो लोग पढ़ लिखकर सरकारी बाबू. या अफसर बने हैं, वे समाज की ताकत है।. लेकिन अपनी सुख सुविधाओं में खोकर अपनी. जड़ों को भूल चुके हैं। वे अक्सर कहते कि. पढ़ा लिखा समाज सबसे ज्यादा अपने समाज को. धोखा देता है। इसलिए सबसे पहले इसी तबके. को उसकी जिम्मेदारी याद दिलानी होगी। इसी. सोच के साथ मेहनत शुरू की और 6 दिसंबर. 1978 को बामसेफ की स्थापना कर दी गई।. बामसेफ कोई राजनीतिक दल नहीं था। सरकारी. कर्मचारियों का एक मजबूत नेटवर्क था। उनकी.
कार्यशैली सबसे जुदा थी। वे ट्रेनों के. जनरल डिब्बों में सफर करते। छोटे-छोटे. कमरों में बैठकर करते। घंटों लोगों को. समझाते। उनकी मीटिंग में हमेशा एक लोहे का. पुराना बक्सा रहता जिसमें महापुरुषों की. तस्वीरें किताबें होती। जहां भी जाते इन. तस्वीरों को निकाल कर सजाते और समाज को. उसका इतिहास याद दिलाते। इसी दौर में 1982. में उन्होंने अपनी मशहूर किताब लिखी द. चमचा एज। इसमें उन्होंने पूना पैक के बाद. उभरे उन दलित नेताओं को चमचा कहकर उनकी. कड़ी आलोचना की जो बड़ी-बड़ी पार्टियों के.
हाथों का पुतली बने थे और अपने समाज का. सौदा कर रहे थे।. उन्होंने इस किताब में दो टूक लिखा कि. चमचा वो नेता है जो शोषित समाज में पैदा. तो होता है लेकिन वफादारी शोषकों के प्रति. निभाता है। मान्यवर का साफ कहना था कि जब. तक हमारा समाज अपने खुद के पैरों पर खड़ा. होकर स्वतंत्र नेतृत्व नहीं चुनेगा तब तक. यह चमचे हमें सिर्फ एक वोट बैंक बनाकर. रखेंगे। इस किताब ने पूरे आंदोलन को एक नई. वैचारिक दिशा दे दी और क्रांति का एक. मजबूत आधार तय कर दिया। सालों के संघर्ष.
के बाद धीरे-धीरे उनका आंदोलन रंग लाने. लगा। बामसेसफ कर्मचारियों की बड़ी ताकत बन. गया। लेकिन वह जानते थे कि सिर्फ दफ्तरों. के लोगों से हुकूमत नहीं बदली जाती। जमीन. पर ऐसे आक्रामक चेहरे भी चाहिए जो भीड़ के. गुस्से को आवाज दे सके। इसी होश के दौरान. दिल्ली की गलियों में एक युवा लड़की की. चर्चा तेज होने लगी। जिसकी आवाज में गजब. की कड़क थी और जो बिना किसी डर के मंच से. सीधे व्यवस्था पर हमला कर दी। यह लड़की.
कोई और नहीं। यह मायावती थी जो उस समय एक. स्कूल में टीचर थी। साथ ही कानून की पढ़ाई. और आईएएस बनने के लिए यूपीएससी की तैयारी. कर रही थी। कहा जाता है कि मान्यवर पहली. बार मायावती से दिल्ली की एक जनसभा के. दौरान प्रभावित हुए। उस सभा में जब एक. वक्ता ने शोषित समाज के लिए हरिजन शब्द का. इस्तेमाल किया तो मायावती ने तुरंत अपनी. तेज आवाज में उसे टोकते हुए कहा कि आप. हमें हरिजन कहकर हमारा अपमान कर रहे हैं।. हमें हमारे असली नाम से पुकारिए। उस लड़की. के इस बेखौफ अंदाज को देखकर उन्हें समझ.
में आ गया कि इस आवाज में पूरे देश की. राजनीति को बदलने का दमखम है। वे सीधे. मायावती घर पहुंचे। परिवार बहुत साधारण. था। उनके पिता अपनी बेटी को एक बड़ी. प्रशासनिक कुर्सी पर देखना चाहते थे।. इसलिए वे मान्यवर के आंदोलन के खिलाफ थे।. लेकिन उन्होंने मायावती की आंखों में. आंखें डालकर वह ऐतिहासिक बात कही जिसने. इतिहास का रुख मोड़ा। उन्होंने कहा कि तुम. अगर बहुत मेहनत करोगे तो ज्यादा से ज्यादा. एक जिले की कलेक्टर बन जाओगी और जिंदगी भर. मंत्रियों के सामने फाइल लेकर खड़ी रहोगी।.
लेकिन अगर तुम मेरे साथ इस आंदोलन में. जुड़ती हो तो मैं वादा करता हूं कि एक ऐसा. दिन आएगा जब इस देश के बड़े-बड़े आईएएस. कलेक्टर तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर खड़े. रहेंगे। यह विज़न इतना जादुई था कि मायावती. जी ने सिविल सर्विसेज का सपना छोड़ा और इस. महा आंदोलन की एक कद्दावर सिपाही बन गई।. और फिर 85 बनाम 15 का वह गणित कांशीराम ने. फेंका।. कांशीराम के सबसे बड़ी राजनीतिक कामयाबी. थी कि उन्होंने शोषित समाज को छोटी-छोटी.
जातियों के दलदल से बाहर निकाला। वे जानते. थे कि जब तक लोग अपनी उपजातियों में बटे. रहेंगे तब तक बड़ी पार्टियां उन्हें आपस. में लड़ाकर राज करेंगी। इसी बिखराव को. खत्म करने के लिए बहुजन शब्द को एक नए. राजनैतिक और सामाजिक हथियार के तौर पर पेश. किया। इसके पीछे दरअसल एक सोची समझी. सामाजिक रणनीति थी। वे कहते कि इस देश में. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य. पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और धार्मिक. अल्पसंख्यक कुल मिलकर आबादी का 85% हिस्सा. बनाते हैं। जबकि महज 15% लोग हुकूमत और.
संसाधनों पर कब्जा किए बैठे हैं। यहीं पर. उन्होंने नारा दिया कि जिसकी जितनी संख्या. भारी है उसकी उतनी हिस्सेदारी। इस 85 बनाम. 15 के समीकरण ने समाज को यह एहसास कराया. कि वे लाचार नहीं बल्कि इस देश के असली. मालिक हैं। उन्होंने सिर्फ वोट की राजनीति. नहीं की बल्कि एक गहरी बहुजन संस्कृति. खड़ी की। बामसेफ बीएस4 के मंचों से. क्रांतिकारी लोक लोकगीत के कैसेट रिलीज. करवाए। नाटकों और सांस्कृतिक रैलियों के. जरिए इतिहास के भुला दिए गए नायकों को आम.
जनता के दिलों में जिंदा किया। महिलाओं की. भागीदारी पर जोर बढ़ाया। इसीलिए रैलियों. में मायावती के अलावा कई अन्य जुझारू. महिलाओं को आगे लाए। भले ही इस लंबे सफर. में उधम सिंह जैसे बामसेफ के कई पुराने. साथियों ने कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ. दिया। लेकिन आगे चलकर मायावती जी इस पूरे. मिशन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरी। दरअसल. बामसेफ की सफलता के बाद कांशीराम समझ गए. थे कि सरकारी कर्मचारियों के दायरे से. बाहर निकलकर सीधे जनता के बीच जाना होगा।. इसी सोच के साथ 1981 में डीएस4 यानी दलित.
शोषित समाज संघर्ष समिति का गठन किया गया।. डीएस4 दफ्तरों में कैडर चलाना नहीं बल्कि. सड़कों पर उतर कर सीधे आंदोलन और संघर्ष. करना था। मान्यवर ने इसके जरिए साफ संदेश. दिया ठाकुर ब्राह्मण बनिया छोड़ बाकी सब. डीएस4 उनके नारे उस दौर में बेहद आक्रामक. हो रहे थे। तिलक तराजू और तलवार इनको मारो. जूते चार। ये सारे नारे जो हैं यह इसी दौर. की पैदाइश बताए जाते हैं। जिन्होंने. पारंपरिक राजनीति करने वालों के होश उड़ा.
दिए थे। समर्थकों के लिए गुस्से की आवाज. थी तो विरोधियों के लिए एक बड़ी चुनौती।. लेकिन यहां कहानी सिर्फ नारों तक सीमित. नहीं रही। उन्होंने आंदोलन को पूरे देश. में फैलाने के लिए अपनी मशहूर साइकिल. यात्राओं की शुरुआत की। उनका मानना था कि. आंदोलन के नेताओं को जमीन से जुड़ा दिखाना. चाहिए। इसीलिए बड़ी गाड़ियों को छोड़कर. साइकिलें चुनी गई। नीले झंडों के साथ. हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर निकल पड़ते।. हालांकि मुख्य संघर्ष उत्तर प्रदेश और. दिल्ली के आसपास केंद्रित था। लेकिन विज़न. पूरे देश के लिए था। इसीलिए पंजाब के अपने.
जुड़ाव से आगे बढ़कर कन्याकुमारी करघेल. कोहिमा पूरी पोरबंदर तक पहुंचे। बिना किसी. तामझाम के जब ये साइकिलें गांव में. पहुंचती है लोग हैरान हो जाते हैं। 15. मार्च 1984 को जब देश के अलग-अलग कोनों से. यात्राएं निकली तो दिल्ली के बोट क्लब. मैदान पहुंची तो पूरा मैदान नीले समंदर. में तब्दील हो गया। दिल्ली के मीडिया और. सत्ताधीशों ने शोषित समाज की इतनी बड़ी. संख्या मौजूदगी पहले कभी नहीं देखी थी और. रातोंरात राष्ट्रीय राजनीति का एक ऐसा. उभरता हुआ वह चेहरा बने जिससे दिल्ली का.
तख्त घबराने लगा था और यहीं से बीएसपी और. हाथी के चुनाव चिन्ह की शुरुआत होती है।. साइकिल यात्राओं की दरअसल अपार सफलता ने. कांशीराम को समझाया था कि हमारा समाज. सिर्फ रैलियों की भीड़ बनकर नहीं रहना. चाहता। उसे हुकूमत में सीधी हिस्सेदारी. चाहिए। इसी राजनीतिक गुलामी को हमेशा के. लिए काटने के लिए 14 अप्रैल 1984 को बाबा. साहब अंबेडकर की जयंती का दिन चुनकर. बीएसपी का गठन किया। बहुजन समाज पार्टी.
पार्टी का चुनाव चिन्ह हाथी चुना गया जो. इस बात का प्रतीक था कि जब यह समाज एकजुट. होकर चलेगा तो रास्ते की हर रुकावट तिनके. की तरह ढह जाएगी। पार्टी खड़ी करने के लिए. मान्यवर ने वही कड़ा और वही व्यवहारिक. फार्मूला आजमाया जिसकी चर्चा हम शुरुआत. में कर रहे थे। यानी पहला चुनाव पहचान. बनाने के लिए, हारने के लिए। दूसरा. विरोधियों को ताकत दिखाने के लिए और तीसरा. चुनाव जीतने के लिए। बसपा के भीतर एक कड़ा. फौजी अनुशासन तैयार किया। जहां. कार्यकर्ताओं को बिल्कुल सैनिकों की तरह.
अनुशासित रखा जाता। 1984 का शुरुआती आम. चुनाव बसपा के लिए कड़ा इम्तिहान था।. पार्टी के पास ना पैसा था ना संसाधन।. मायावती जी को कैराना लोकसभा सीट से उतारा. गया। इस पहले चुनाव में बसपा ज्यादातर. सीटों पर अपनी जमानत तक नहीं बचा पाई।. सुरक्षा राशि तक ज्त हो गई। लेकिन. कांशीराम विचलित नहीं हुए। मुस्कुराकर. कार्यकर्ताओं से कहते कि हमारा काम समाज. को अपना सिंबल और नाम याद करवाना था जो. पूरा हो गया। वे छोटी-छोटी बैठे करते. लोगों से एक एक रुपए तक का चंदा लेते।.
एक-एक वोट मांगते।. मीटिंग करने वालों के सामने शर्त रखते।. सभा में हजारों लोग और बड़ी संख्या में. साइकिल दिखनी चाहिए। धीरे-धीरे उत्तर. प्रदेश, पंजाब और दूसरे राज्यों में. बीएसपी का जनाधार बढ़ने लगा और जो समाज. दशकों से बड़ी पार्टियों को अपना राजनीतिक. घर मान रहा था वो अब नीले झंडे के नीचे. एकजुट होने लगा और फिर आया साल 1988।. साल 1988 का वो दौर था जब देश की सियासत. में बोफोर्स घोटाले को लेकर एक बहुत बड़ा. भूचाल आया था। देश की नजरें उत्तर प्रदेश.
की हाई प्रोफाइल इलाहाबाद लोकसभा सीट पर. होने वाले उपचुनाव पर टिकी थी। यह कोई. साधारण चुनाव नहीं था बल्कि एक तरफ बड़ी. पार्टियों के खिलाफ पूरे विपक्ष के सबसे. बड़े चेहरे के रूप में वीपी सिंह मैदान. में ताल ठोक रहे थे। दूसरी तरफ सत्ताधारी. पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी।. देश के तमाम बड़े राजनीतिक पंडित मान रहे. थे कि यह लड़ाई सिर्फ दो बड़े चेहरों के. बीच की है। तभी पैरों में हवाई चप्पल पहने. मान्यवर ने खुद इलाहाबाद के जमीन पर उतर. कर पर्चा दाखिल किया और इस मुकाबले को.
त्रिकोणीय बनाया। इलाहाबाद की गलियों में. अपनी मशहूर साइकिल रैलियों और चंदा मॉडल. के दम पर एक ऐसा आक्रामक चुनाव प्रचार. खड़ा किया जिसने दिल्ली के शासकों की. रातों की नींद उड़ा दी। इस ऐतिहासिक और. कड़े त्रिकोणीय मुकाबले में जीत भले ही. वीपी सिंह की हुई। मान्यवर तीसरे नंबर पर. रहे लेकिन उन्हें तकरीबन 72,000 वोट मिले. जो देश के बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों. को चौंकाने के लिए काफी थे। बोफोर्स लहर. के उस दौरान में भी स्वतंत्र रूप से मिला.
यह भारी जनसमर्थन सीधे देश की एक बड़ी. प्रतिष्ठित सीट पर बड़े-बड़े नेताओं को. कड़ी टक्कर देने की उनकी राजनीतिक ताकत को. साबित कर चुका था। इलाहाबाद उपचुनाव के. बाद वह ऐतिहासिक दौर आया जब उनकी राजनीतिक. बिसाद दिल्ली को डराने लगी। साल 1989 के. लोकसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी ने. पहली बार देश के चुनावी नक्शे पर अपनी. भारी धमक दिखाई और तीन लोकसभा सीटें जीतकर. देश की संसद में कदम रखा। जहां मायावती जी.
पहली बार खुद बिजनौर से सांसद चुनकर चुनी. गई। इसी दौरान केंद्र में वीपी सिंह के. नेतृत्व में सरकार बनी जिसे चलाने और. गिराने का दृश्य भी पहली बार दिल्ली के एक. छोटे से कमरे में रहने वाले मान्यवर के. हाथों में आ गया। उसी दौर में देश की. राजनीति के सबसे कद्दावर नेता और पूर्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उनके इस. बढ़ते कदमों से घबराए थे। इस कदर कि बड़े. कमरों में केवल इस बात की रणनीतियां थी कि. इस बहुजन उभार को उत्तर भारत में कैसे. रोका जाए। यह वो दौर था जब दिखाया गया कि.
उनका समाज रैलियों में ताली बजाने वाली. भीड़ नहीं बल्कि दिल्ली के तख्त पर बैठे. प्रधानमंत्री की किस्मत तय करने वाला देश. का सबसे बड़ा किंग मेकर बन गया। और फिर. हुआ मिले मुलायम कांशीराम।. साल 1990 के दशक की शुरुआत तक उनका आंदोलन. सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं था। बीएसपी. धीरे-धीरे उत्तर भारत की राजनीति में अपनी. जगह बना रही थी। लेकिन इसी दौरान देश की. राजनीति भी तेजी से बदल रही थी। एक तरफ. मंडल आयोग की राजनीति के तहत पिछड़ों के.
आरक्षण की बात थी। दूसरी तरफ कमंडल यानी. राम मंदिर का आंदोलन उभार था। पूरे उत्तर. भारत में जाति और धर्म की एक नई सियासी. जंग छिड़ी थी। इसी बीच में मान्यवर ने. बहुत ही चालाकी से इस दौर को भांपा। मंडल. और कमंडल दोनों को एक सिक्के के दो पहलू. करार दिया और कहा कि यह बहुजन समाज को आपस. में बांटने की चाल है। उन्होंने नारा दिया. कि वनवाद को करेंगे पस्त ओबीसी दलित होंगे. एकजुट। 1991 के चुनावों में भाजपा बड़ी. तेजी से उभरी। उत्तर प्रदेश में उसका. प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। लेकिन 92 में.
बाबरी मस्जिद गिरने के बाद हालात बदल गए।. भाजपा के खिलाफ बाकी सभी दल एक साथ आने. लगे। वे समझ गए कि अगर भाजपा के रथ को. रोकना है तो पिछड़ी जातियों और दलितों को. साथ आना होगा। और यहीं से शुरू हुआ उस दौर. की सबसे चर्चित राजनीतिक साझेदारी. समाजवादी पार्टी और बीएसपी गठबंधन। एक तरफ. मुलायम सिंह यादव थे। दूसरी तरफ कांशीराम. मायावती। 1993 के उत्तर प्रदेश के. विधानसभा चुनावों में दोनों साथ आए।. मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर खुद इटावा.
से राजनीतिक जीत दर्ज की। संसद पहुंचे।. उत्तर प्रदेश बसपा का तूफानी उदय हुआ और. यहीं पर नारा मिला. के मिले मुलायम कांशीराम. हवा हो गए जय श्री राम. जिसको लेकर बीजेपी ने इसका विरोध किया. लेकिन इस नारे ने कांशीराम को राजनीतिक. तौर पर बहुत फायदा दिया। चुनाव के नतीजों. ने पूरे देश को चौंका दिया था क्योंकि. उत्तर प्रदेश की राजनीति बदल गई थी। सपा. और बसपा ने मिलकर सरकार बनाई थी और वह. भाजपा जो राम मंदिर आंदोलन के तहत आज भी.
सरकार बनाए बैठी है वो बाबरी मस्जिद. विध्वंस के बाद भी उत्तर प्रदेश में सरकार. नहीं बना पाई। शुरुआत में गठबंधन हालांकि. ऐतिहासिक था। लेकिन सरकार चलाने के दौरान. धीरे-धीरे टकराव बढ़े, तनाव बढ़े। भीतर की. दरारें इतनी बढ़ी कि 1995 आते-आते उन्हें. लग गया कि मुलायम सिंह के साथ चलना. मुश्किल है। उन्होंने मायावती जी को फैसला. लेने की छूट दी। फिर जून 1995 में उत्तर. प्रदेश की राजनीति में वो हुआ जिसने पूरे. देश को हिला कर रख दिया। मायावती जी ने.
सरकार समर्थन वापस लिया। जिसके बाद लखनऊ. के स्टेट गेस्ट हाउस से बसपा नेताओं और. मायावती जी के साथ हिंसा और बदसलूकी हुई।. जिसे बाद में गेस्ट हाउस कांड नाम दिया. गया।. इस गेस्ट हाउस कांड ने दोनों पार्टियों के. रिश्ते लगभग लगभग खत्म कर दिए।. लेकिन जब यह संकट अपने चरम पर था तब भाजपा. ने मायावती जी को समर्थन देने का फैसला. किया और 3 जून साल 1995 को मायावती पहली.
बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी।. देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बन. रही थी।. कांशीराम मंच के पीछे खड़े होकर एक संतोषी. और बड़ी मुस्कान के साथ मुस्कुरा रहे थे।. उनके चेहरे की वो चमक कह रही थी कि. विज्ञान की लैब छोड़ने वाले वैज्ञानिक ने. आखिरकार व्यवस्था को बदलने वाली अपनी. मास्टर चाबी ढूंढ ली है।.
उत्तर प्रदेश में मायावती जी के. मुख्यमंत्री बनने के बाद केंद्र की. राजनीति में बसपा की धमक बढ़ गई। आलम यह. था कि देश के बड़े-बड़े संगठन उनके सामने. सरकार बनाने के लिए मिन्नतें कर रहे थे।. इसी दौरान कहा जाता है कि देश के सियासी. गलियारों में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव आया।. राजनीतिक गलियारों और समकालीन चर्चाओं की. मानें तो यह कहा जाता है कि देश की कुछ. बड़ी पार्टियों ने मिलकर उन्हें भारत का. राष्ट्रपति बनने और सर्वोच्च संवैधानिक. कुर्सी पर बैठने का प्रस्ताव दिया था। उस.
समय किसी भी आम नेता के लिए राष्ट्रपति. भवन में जाना जिंदगी का एक बड़ा सपना हो. सकता था। कांशीराम थोड़ा अलग मिट्टी के. थे।. जानकार बताते हैं कि उस कुर्सी के ऑफर को. ठुकराया और कहा कि मुझे राष्ट्रपति भवन. में बैठकर सिर्फ रबर स्टैंप नहीं बनना है।. ना मुझे कि सरकारी फाइल पर दस्तखत करने का. शौक है। मेरा मकसद अपने लोगों को. राष्ट्रपति भवन का याचक बनाना नहीं बल्कि.
देश की संसद और विधानसभा का शासक बनाना. है।. यह वाक्या उनके उस अदम्य स्वाभिमान और. मिशन के प्रति अटूट निष्ठा को दिखाता है. जिसने पद और प्रतिष्ठा के सबसे बड़े लालच. को भी अपने समाज के आगे छोटा कर दिया।. हालांकि धीरे-धीरे कांशीराम और मायावती जी. के बीच में भी कहा जाता है वैचारिक. दूरियां बढ़ी थी। सत्ता के सर्वोच्च शिखर. पर पहुंचने के बाद बहुजन आंदोलन के भीतर. एक ऐसा कड़वा मोड़ आया जिसने अंदरूनी.
गलियारों को हिला कर रख दिया। पार्टी बढ़. रही थी, सरकारें बन रही थी। लेकिन चमकदमक. के बीच वैचारिक मिजाज और मायावती जी की. व्यवहारिक राजनीति के बीच एक अदृश्य दरार. गहरी होने लगी। समकालीन राजनीतिक. विश्लेषकों की मानें तो सफलता की चमक के. बीच दोनों के बीच कुछ वैचारिक मतभेद उतरे।. मान्यवर कांशीराम जी शुद्ध आंदोलनकारी थे।. जो किसी भी समझौते से पूरी सावधानी बरत।. जबकि मायावती जी को उत्तर प्रदेश की सत्ता. और पार्टी के विस्तार के लिए व्यवहारिक.
राजनीति वाले फैसले लेने पड़े। यह बहुजन. राजनीतिक की जटिलताओं को भी दिखाता है।. बाद के वर्षों में बसपा बहुजन से सर्जन की. तरफ बढ़ने लगी। जबकि कांशीराम मूल रूप से. 85 बनाम 15 के उसी कड़े गणित परिणित थे।. जबकि सत्ता की राजनीति में कुछ व्यवहारिक. बदलाव हुए और यहीं पर गुरु और शिष्य के. बीच उस सोच का अंतर दिखने लगा।. उधर कांशीराम जी का शरीर भी धीरे-धीरे. कमजोर हो रहा था उम्र की वजह से। लगातार. यात्राएं, अनियमित जीवन, तनाव, सालों की.
थकान, शरीर पर असर दिखा रही थी। डायबिटीज. और हाई ब्लड प्रेशर ने कमजोर किया था।. इसके बावजूद वह राजनीति से दूर नहीं हुए. थे। पार्टी के फैसलों के केंद्र में थे।. लेकिन जब यह एहसास हुआ कि शरीर अब ज्यादा. लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहेगा तो साल. 2001 में मायावती जी को अपना राजनीतिक. उत्तराधिकारी घोषित किया। आखिरी दिनों में. शारीरिक रूप से अकेले जरूर पड़े लेकिन. उनका मिशन करोड़ों लोगों के भीतर मजबूती. से जिंदा रहा। बिस्तर पर लेटे उस महानायक.
ने बहुत धीमे से जवाब दिया था कि मुझे अब. कोई धन दौलत या नाम नहीं चाहिए। मुझे बस. थोड़ा समय चाहिए ताकि मैं अपनी कौम के. अधूरे काम को पूरा कर सकूं। उनका यह जवाब. दिखाता है कि आखिरी सांस तक उनके दिमाग. में सिर्फ और सिर्फ समाज का मिशन घूम रहा. था। अपनी वसीयत में साफ लिखा कि उनकी. अस्थियां किसी नदी में प्रभावित ना की जाए. बल्कि बहुजन आंदोलन केंद्र में रखी जाए. ताकि आने वाले समय में जो पीढ़ियां आए वो. प्रेरणा ले सके। 9 अक्टूबर 2006 को. कांशीराम जी इस दुनिया से चले गए। उनके.
जाने के साथ ही भारतीय राजनीति का एक ऐसा. अध्याय खत्म हुआ जिसने करोड़ों लोगों की. सोच को हमेशा के लिए बदल दिया। लंबे समय. से एक बड़ी सांस्कृतिक क्रांति की तैयारी. में थे। कांशीराम जी 2006 में ही बाबा. साहब अंबेडकर की 50वीं दीक्षा वर्षगांठ के. मौके पर औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपनाने. की घोषणा कर चुके थे। लेकिन उनकी सोची. समझी रणनीति के तहत वे चाहते थे कि. धर्मांतरण केवल एक व्यक्तिगत धार्मिक. बदलाव ना हो। बल्कि अक्सर कहते थे कि मैं. अकेला बौद्ध नहीं बनूंगा। जिस दिन पूरे.
समाज को वैचारिक रूप से तैयार कर लूंगा, उस दिन करोड़ों लोगों के साथ मिलकर धर्म. दीक्षा लूंगा। मगर उनकी अचानक बिगड़ती. सेहत और मौत के कारण यह अंतिम इच्छाधुरी. रह गई। उनकी मृत्यु के बाद कुछ समय तक. विवादों का दौर चला। उनके परिवार ने इलाज. और मृत्यु के कारणों को लेकर गंभीर सवाल. उठाए। पोस्टमार्टम की मांग की। लेकिन. कोर्ट ने उनकी लंबी मेडिकल हिस्ट्री. डॉक्टरों की आधिकारिक रिपोर्ट को देखते. हुए इन सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया।.
आखिरकार दिल्ली के निगम बोध घाट पर पूरे. राष्ट्रीय सम्मान के साथ बौद्ध रीति. रिवाजों के बीच मायावती जी ने खुद उनकी. चिता खूंखार दी थी। वे चले गए थे लेकिन. अपने पीछे एक सवाल छोड़ गए थे जिसे भारतीय. राजनीति अब कभी नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।. अब सवाल यह है क्या काशीराम जी इस देश के. करोड़ों शोषितों को. राजा बनने की प्यास दे पाए? 9 अक्टूबर. 2006 को जब दुनिया से गए तो उनका आंदोलन.
खत्म नहीं हुआ। क्योंकि सिर्फ पार्टी नहीं. बनाई थी। करोड़ों लोगों के दिमाग में एक. ऐसा सवाल छोड़ा था जिसे भारतीय राजनीति. कभी अनसुना नहीं कर सकती थी। उस पुरानी. सोच पर हमला किया था। संख्या तुम्हारी तो. सत्ता पर दावा तुम्हारा। और शायद यही वजह. है कि कायदों की बेड़ियों को तोड़ने वाले. उस महानायक कहानी सिर्फ एक नेता की कहानी. नहीं लगती। उस आदमी की कहानी लगती है. जिसने करोड़ों लोगों के भीतर दबा हुआ. आत्मसम्मान जगाने की कोशिश की। शायद यही. वजह थी कि 2007 के चुनावों में पहली बार.
बसपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार. बनाई।. कांशीराम इसके पीछे भी थे। वो सोच थी. जिसने पढ़े लिखे कर्मचारियों को आंदोलन से. जोड़ा। गांव में साइकिल यात्रा निकाली।. मायावती जैसी नेता तैयार किए। बहुजन. राजनीति को भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक. ताकतों में बदला। आज के दौर में भले ही. बसपा उत्तर प्रदेश की सर जमीन पर कमजोर. दिख रही हो। वोट बैंक छिटक रहा हो लेकिन. उनका वो सामाजिक फार्मूला आज भी देश के हर. कोने में जिंदा है। आज भी जब प्रतिनिधित्व.
जातिगत जनगणना हिस्सेदारी की बात होती है. तो उसके पीछे कांशीराम की सोच दिखाई पड़ती. है। कांशीराम ने अपने समाज को सिर्फ. अधिकार मांगना नहीं बल्कि हुकूमत सत्ता. मांगना सिखाया। जो रणनीति बनाई थी पहला. चुनाव हारो फिर हराने जाओ और फिर सरकार. बनाओ। वो सपना पूरा हुआ. और आज भी शायद वह अलग-अलग राजनीतिक. पार्टियों में दिखाई पड़ता है। आज भी जब. कोई हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व की बात.
करता है तो वो आवाजें आती हैं कि राज कोई. देता नहीं राज ले आता है। समाज को राजा. नहीं बनाया बल्कि शोषित समाज के खून में. राजा बनने की वो प्यास जगाई जिसे शायद अब. कोई बुझा नहीं पाएगा। इसीलिए मान्यवर. काशीराम जी की अनकही कहानी आज के इस दौर. की राजनीति के लिए एक बहुत बड़ा सबक है।. वो इंसान जिसने सरकारी नौकरी, परिवार, जमीन पूरी जिंदगी एक मिशन पर लगाई ताकि. आगे आने वाली पीढ़ियों को झुक कर नहीं. बल्कि आंखों में आंखें डालकर जिंदगी जीने. का हौसला मिले।.
आपको क्या लगता है? क्या आज का समाज. मान्यवर कांशीराम जी के उस अधूरे मिशन को. पूरा कर पाएगा? कर रहा है। क्या राजनीति. वापस अमीरों के नोट और गरीबों के वोटों का. स्कैम बन गई? मान्यवर कांशीराम जी की. कहानी आपको कैसी लगी? कमेंट सेक्शन में. जरूर साझा कीजिएगा। कांशीराम जी के जीवन. का कोई अनसुना किस्सा जो हम से छूट गया. हो। आप उसको भी कमेंट सेक्शन में जरूर. लिखिएगा। यह कहानी आपको कैसी लगी? इस.
कहानी से आपने क्या सीखा? क्या यह कहानी. आपको इंस्पायर करती है? कांशीराम जी के जीवन पर खोजी और ऐतिहासिक. विश्लेषण अगर आपको पसंद आया हो तो हमारी. आपसे गुजारिश है कि. हमारे चैनल से जुड़िएगा। हमारे WhatsApp. चैनल से भी जुड़िएगा। अपने दोस्तों के साथ. शेयर कीजिएगा।. मैं हूं शुभांकर मिश्रा। किसी और कहानी. में लेंगे। जाते-जाते आपको बता दें कि यह. पूरा वीडियो मान्यवर कांशीराम जी के. ऐतिहासिक भाषणों, बहुजन आंदोलनों के.
दस्तावेजों, उनके खिताब और समकालीन राजनीतिक. विश्लेषकों की रिपोर्ट पर आधारित था।.
